Wednesday, July 13, 2011

बंद करिए जनता को मूर्ख बनाना

1993 से लेकर 2011 तक देश की आर्थिक राजधानी मुंबई ने 9 बार इंसानियत को छलनी कर देने वाले धमाके देखे हैं। आज़ाद भारत के इतिहास को देखें तो किसी एक ही शहर ने इतने दंश नहीं झेले हैं, जितने इस जीवंत शहर ने झेले हैं। इन धमाकों का शिकार कोई देश, प्रांत या शहर नहीं बल्कि इंसानियत होती है। धमाकों का शोर और धुंआ छटने के बाद आंसू, दुख, रक्तरंजित लाशें और कभी न भुलाया जा सकने वाला दर्द बचता है। दर्द किसी को खोने का, असमय किसी के चले जाने का।

Cartoon courtsey: Hindustan Times tooningin
इन सबसे इतर एक कौम और है, जो इस दर्द पर नमक रूपी मरहम लगाती रहती है और वो है नेताओं की कौम। वो नेता जो सरकार चलाते हैं, जिनके मातहत प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां काम करती हैं, जो जनता को सुरक्षा का वादा देकर अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम कर लेते हैं। ऐसे धमाके और हमले उन्हें नहीं हमें हताहत करते हैं।

न जाने क्यों, पर जब कल (13 जुलाई 2011) शाम को मुंबई में फिर से सिलसिलेवार धमाकों की खबर मिली तो 2008 वाली घटना की याद ताजा हो गई। मन में दुख और गुस्सा दोनों उठा। दुख उन बेकसूरों के लिए जिन्होंने बिना वजह अपनी जानें गंवाईं और गुस्सा उस नकारा तंत्र के लिए, जो हर बार ऐसी घटना के बाद अपनी झूठी और मक्कार जुबान से एक ही बात दोहराने के लिए तैयार हो जाता है। चाहे एनडीए की सरकार रही हो या फिर यूपीए की, जनता ने हमेशा सुरक्षा और विकास के बारे में सोचा है। यह अलग बात है कि सरकार नाम का रथ जिसे भी हांकने को मिलता है, वो केवल अपनी जेब और राजनीतिक हित ही देख पाता है। इससे आगे की उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। शायद दिखाई भी न देता हो।

जिन्हें धमाका करना था, वो तो अपने मकसद में कामयाब हो गए, पीछे छोड़ गए नेताओं को, कुछ इस तरह के वक्तव्य देने के लिए मशहूर हैं “यह कायराना कदम है” “हम ऐसे हमले की निंदा करते हैं” “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा” “हम अंतरराष्ट्रीय मंच के द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाएंगे” “पाकिस्तान को आरोपियों की सूची और सबूत दिए जाएंगे” “ऐसी घटनाओं से भारत डरने वाला नहीं है और मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा” “हमारी फौज हर तरह के हमलों के लिए तैयार है….” वगैरह-वगैरह। ये अलग बात है कि होता कुछ नहीं है। अगर वाकई कुछ होना होता तो बार-बार ऐसी घटनाएं होती ही क्यों?

देश के नेताओं की यह आदत बन चुकी है कि घटना होते ही तुरंत एक संगठन या देश पर आरोप मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लो। बाकी जांच वांच के लिए तो दर्जनों एजेंसियां और विभाग हैं, जहां लोगों को कुर्सी तोड़ने और चापलूसी से फुरसत मिले तो शायद वो अपने काम के बारे में भी सोचें।

हमारा तंत्र “न कुछ करेंगे और न करने देंगे” की तर्ज पर काम करता है। संसद पर हमले के बाद सेना को हमले के लिए तैयार कर दिया गया, लेकिन आखिरी समय पर संयम का राग बजने लगा। इन हमलों के पीछे के चाहे पाकिस्तान आरोपी हो या फिर कोई पाक प्रायोजित आतंकी संगठन, वो अच्छी तरह जान चुके हैं कि भारत में कभी भी कहीं भी कुछ भी किया जा सकता है। इसलिए जब भी एजेंसियां और पुलिस पुख्ता व्यवस्थाओं का दंभ भरने लगते हैं, तभी इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं। शायद ये देशवासियों को आईना दिखाने के लिए।

बंद करिए जनता को मूर्ख बनाना

1993 से लेकर 2011 तक देश की आर्थिक राजधानी मुंबई ने 9 बार इंसानियत को छलनी कर देने वाले धमाके देखे हैं। आज़ाद भारत के इतिहास को देखें तो किसी एक ही शहर ने इतने दंश नहीं झेले हैं, जितने इस जीवंत शहर ने झेले हैं। इन धमाकों का शिकार कोई देश, प्रांत या शहर नहीं बल्कि इंसानियत होती है। धमाकों का शोर और धुंआ छटने के बाद आंसू, दुख, रक्तरंजित लाशें और कभी न भुलाया जा सकने वाला दर्द बचता है। दर्द किसी को खोने का, असमय किसी के चले जाने का।

Cartoon courtsey: Hindustan Times tooningin
इन सबसे इतर एक कौम और है, जो इस दर्द पर नमक रूपी मरहम लगाती रहती है और वो है नेताओं की कौम। वो नेता जो सरकार चलाते हैं, जिनके मातहत प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां काम करती हैं, जो जनता को सुरक्षा का वादा देकर अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम कर लेते हैं। ऐसे धमाके और हमले उन्हें नहीं हमें हताहत करते हैं।

न जाने क्यों, पर जब कल (13 जुलाई 2011) शाम को मुंबई में फिर से सिलसिलेवार धमाकों की खबर मिली तो 2008 वाली घटना की याद ताजा हो गई। मन में दुख और गुस्सा दोनों उठा। दुख उन बेकसूरों के लिए जिन्होंने बिना वजह अपनी जानें गंवाईं और गुस्सा उस नकारा तंत्र के लिए, जो हर बार ऐसी घटना के बाद अपनी झूठी और मक्कार जुबान से एक ही बात दोहराने के लिए तैयार हो जाता है। चाहे एनडीए की सरकार रही हो या फिर यूपीए की, जनता ने हमेशा सुरक्षा और विकास के बारे में सोचा है। यह अलग बात है कि सरकार नाम का रथ जिसे भी हांकने को मिलता है, वो केवल अपनी जेब और राजनीतिक हित ही देख पाता है। इससे आगे की उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। शायद दिखाई भी न देता हो।

जिन्हें धमाका करना था, वो तो अपने मकसद में कामयाब हो गए, पीछे छोड़ गए नेताओं को, कुछ इस तरह के वक्तव्य देने के लिए मशहूर हैं “यह कायराना कदम है” “हम ऐसे हमले की निंदा करते हैं” “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा” “हम अंतरराष्ट्रीय मंच के द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाएंगे” “पाकिस्तान को आरोपियों की सूची और सबूत दिए जाएंगे” “ऐसी घटनाओं से भारत डरने वाला नहीं है और मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा” “हमारी फौज हर तरह के हमलों के लिए तैयार है….” वगैरह-वगैरह। ये अलग बात है कि होता कुछ नहीं है। अगर वाकई कुछ होना होता तो बार-बार ऐसी घटनाएं होती ही क्यों?

देश के नेताओं की यह आदत बन चुकी है कि घटना होते ही तुरंत एक संगठन या देश पर आरोप मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लो। बाकी जांच वांच के लिए तो दर्जनों एजेंसियां और विभाग हैं, जहां लोगों को कुर्सी तोड़ने और चापलूसी से फुरसत मिले तो शायद वो अपने काम के बारे में भी सोचें।

हमारा तंत्र “न कुछ करेंगे और न करने देंगे” की तर्ज पर काम करता है। संसद पर हमले के बाद सेना को हमले के लिए तैयार कर दिया गया, लेकिन आखिरी समय पर संयम का राग बजने लगा। इन हमलों के पीछे के चाहे पाकिस्तान आरोपी हो या फिर कोई पाक प्रायोजित आतंकी संगठन, वो अच्छी तरह जान चुके हैं कि भारत में कभी भी कहीं भी कुछ भी किया जा सकता है। इसलिए जब भी एजेंसियां और पुलिस पुख्ता व्यवस्थाओं का दंभ भरने लगते हैं, तभी इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं। शायद ये देशवासियों को आईना दिखाने के लिए।

Monday, July 11, 2011

प्रीत नहीं थी जहां की रीत कभी…


चित्र: पोस्ट ऑन पॉलिटिक्स ब्लॉग से साभार
आज आपको एक ऐसे देश के बारे में बताना चाह रहा हूं, जिसके बारे में शायद आपको काफी कुछ पता होगा। मसलन यह बहुत ही महान देश है, विविधता में एकता इसकी खासियत रही है साथ ही शांति एवं संयम तो यहां की आबो-हवा में घुली हुई हैं। ये सब कुछ ऐसे तर्क हैं जो बचपन से ही किताबों तथा गाथाओं और किवदंतियों के माध्यम से हमें घुट्टी की तरह पिलाए गए हैं। तो ये कहानी है उस देश की जिसे, भारत, इंडिया और हिंदुस्तान जैसे नामों से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहां के लोग शांतिप्रिय, साफ दिल वाले तथा ईमानदार होते हैं।

ये तो रही वो बातें जो हम अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हुए खुद ही कहते हैं तथा इसकी सार्थकता बढ़ाने के लिए इन बातों को स्कूल व कॉलेजों के माध्यम में भी फैलाया जाता है। महाभारत जैसे महाकाव्य तथा रामायण को पूजते हैं। भगवतगीता की मिसालें देते हैं तथा केवल कर्म करने जैसी पाखंडी बातों को बोलते हुए हमारी जुबानें कभी नहीं थकती हैं। जबकि हकीकत में इन सब बातों से शायद ही लेना देना हो किसी का। अब ज़रा ज़मीनी हकीक़त पर नज़र दौड़ाते हैं।

पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सटे गुड़गांव के एक गांव में गांववालों ने एक शख्स को सरेआम जलाकर मार डाला। इस शख्स पर गांव के सरपंच की हत्या का आरोप था। यह घटना पुलिस के सामने ही घटित हुई थी। इस प्रकार की घटनाएं आए दिन देश में होती रहती हैं। जनता तो जनता कई बार पुलिस वाले भी आरोपी के साथ ऐसा कृत्य करते हैं, जिससे इंसानियत शर्मसार हो जाए। हरियाणा, यूपी और बिहार की पुलिस ने तो ऐसे कारनामों में रिकॉर्ड कायम कर रखा है। खुद को शांतिप्रिय कहने वाले ऐसी हरकतें करते हैं क्या?

ये हमारा ही देश है, जहां पर दुनिया के किसी भी अन्य मुल्क के मुकाबले सबसे ज्यादा कन्या भ्रूण हत्याएं की जाती हैं। इसके बाद इज्ज़त व मूंछ के नाम पर होने वाली ऑनर किलिंग इसमें चार चांद लगाती है। भ्रष्टाचार तो मानों एक लाइलाज बीमारी बन चुका है। सत्ता का मद नेताओं में कानून का भय कम कर चुका है। अनेकता में एकता जैसे शब्द बेमानी हो चुके हैं। यदि विश्वास न हो तो बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश तथा महाराष्ट्र जैसे राज्यों की स्थिति देखिए। यहां पर जाति तथा क्षेत्रवाद का बोलबाला है। यदि ऐसा न होता तो हम आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, जैसे राज्यों के रहवासियों को “साउथ इंडियन” नाम की संज्ञा न देते। यदि आप कभी ध्यान दें तो पाएंगे कि लोग दूसरे प्रदेश के लोगों का परिचय कुछ इस अंदाज में देते हैं, कि “मैं फलां बंदे को जानत हूं, वो मराठी है/ उडिया है/ मद्रासी या अन्ना है/ पंजाबी है” आदि।

देश की एकता में मतभेद के सैकड़ों छेद हैं। कुछ महीनों पहले महाराष्ट्र की दो पार्टियों महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना तथा शिवसेना ने उत्तर भारतीयों को “भैया” कहते हुए प्रदेश से खदेड़ने की मुहिम छेड़ रखी थी। एक बार तो दिल्ली की मुख्यमंत्री ने भी कह डाला था कि बाहर से आकर रहने वाले लोगों की वजह से दिल्ली में अपराध बढ़ रहे हैं। तो ये है हमारी एकता और अखंडता। देश में आम नागरिकों जिनमें गरीब भी शामिल हैं के अलावा कोई ऐसा नहीं है, जो कानून से डरता हो। खासकर के नेता, नौकरशाह और रसूखदार प्राणी। उनका यह मानना है कि वो सड़क पर चलकर और इस देश् में रहकर अहसान कर रहे हैं इसलिए उन्हें कुछ भी करने विशेषाधिकार प्राप्त है।

...और तो और कानून बनाने वालों ने कानून की देवी की आंखों में पट्टी इसलिए बांधी थी, ताकि वो शुद्ध न्याय कर सके, लेकिन वही पट्टी उसके लिए बाधा साबित हो रही है। इस पट्टी का फायदा उठाते हुए प्रभावशाली लोग कानून की पहुंच से बाहर चले जाते हैं। फंसते हैं तो कमजोर या फिर ऐसे लोग जिन्हें बचाना जरूरी न हो। मसलन राजनीतिक रूप से किसी को ठिकाने लगाना हो तब भी कानून का सहारा लिया जाता है। हालांकि ए. राजा, कनिमोझी और कुछ अपवाद भी कानून के शिकंजे में हैं। लेकिन मनु शर्मा और पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर जैसे लोग भी हैं, जो कानून के सहारे ही कानून से बचते रहे हैं।

हमारा समाज भी अत्यंत की दोहरे चरित्र वाला है। हो सकता है कि मेरी इस बात से गिनती के लोग ही सहमत हों, पर मैं तब भी अपनी बात पर अटल हूं कि हम दोहरे मापदंडों पर जीने वाले लोग हैं। या फिर कुछ ऐसे कहें कि हम चाहते तो सब हैं, पर खुद कुछ नहीं करना चाहते हैं। मसलन “भगत सिंह पैदा हों, पर हमारे नहीं पड़ोसी के घर पर…”। जी हां, यही है हमारी मानसिकता। हम में से अधिकांश लोग दिन में कम से कम दर्जनों बार दफ्तर के बाहर, सड़कों पर और बाजारों में अपशब्दों का प्रयोग करते हुए लोगों को सुनते ही होंगे। तो तरह-तरह के अलंकरणों के साथ बात करते हैं। बावजूद इसके सार्वजनिक रूप से ऐसी बातों को स्वीकारना हमें पसंद नहीं है। समाज की गंदगी जब किताबों में या पर्दे पर दिखाई जाती है तो आंदोलन करने के बेताब लोग झंडे-बैनर लेकर विरोध करने के लिए उतर जाते हैं।

ऐसे लोगों को क्या कहा जाए? खैर, ये जो भड़ास मैंने शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरी है, उसका सिर्फ एक ही मकसद है कि हम इस मुगालतों में जीना छोड़कर सच्चाई का सामना करें। आगे मर्जी आपकी। धन्यवाद….

Wednesday, June 1, 2011

बुरा मानो या भला, कटु सत्य यही है


अण्णा हजारे का आंदोलन

वो समय ही अलग था, जब एक दुबली पतली काठी वाला इनसान लाठी लेकर अनशन पर बैठा और फिरंगी हुकूमत की आंखों से रातों की नींद तक उड़ गई थी। नतीजा यह कि उन्हें यह देश छोड़कर जाना पड़ा। उस इनसान का नाम मोहनदास करमचंद गांधी था, जिसने यह कारनामा कर दिखाया था। इन्हीं गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी भी चल रही थी, पर कौन जानता था कि आज़ादी के बाद यही कांग्रेस पार्टी फिरंगियों की राह पर चलते हुए आम जनता का जीना मुहाल कर देगी।

आखिर कांग्रेस ऐसा क्यों न करें, जबकि उसकी स्थापना ही एक अंग्रेज ए.ओ. ह्यूम के नेतृत्व में हुई थी। खैर, आज के हालातों पर नज़र दौड़ाकर देखिए, और सोचिए कि क्या वाकई यह वही देश है, जिसे महाशक्ति और दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्था के तमगों से लादा जा रहा है। यह कहने में कम से कम मुझे तो कोई गुरेज़ नहीं हो रहा है कि हर वो भारतीय जो अपने पद एवं अधिकारों का दुरुपयोग कर सकता है, करता है। उदाहरण एक या दो नहीं बल्कि हजारों या कहें कि शायद लाखों में मिल सकते हैं।

हो सकता है कि समाज का बुद्धिजीवी टाइप का वर्ग मेरी बातों से सहमत न भी हो, लेकिन जो सच है वो तो सच ही है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह जी का कहना है कि आंदोलनों और अनशन से कुछ नहीं होता है। उनके इस बयान का क्या मतलब लगाया जा सकता है? क्या यह कि सरकार को लोगों की भावनाओं और आंदोलन से कोई वास्ता नहीं है। हालात तो इसी ओर इशारा कर रहे हैं। अण्णा हजारे ने अनशन किया तो पूरा देश खासकर के युवा उनके समर्थन में आगे आए और सरकार ने आनन फानन में उनकी मांगो को मानने का लॉलीपॉप टिका दिया। शायद सरकार और उसकी मशीनरी “जनता की याददाश्त कमजोर होती है और जल्दी ही सबकुछ भूल जाएगी” वाले फॉर्मूले का इस्तेमाल करना चाह रही है। तभी हमारे योग गुरू बाबा रामदेव आगे आए और उन्होंने कालेधन के मुद्दे पर सरकार को घेरने का काम शुरू कर दिया। साथ ही यह भी इशारा कर दिया कि हजारे साहब के आंदोलन से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

यहीं पर हमारी सरकार की अंगेजी चाल स्पष्ट दिखाई देने लगी। तुरंत बाबा को मनाने के लिए कबीना मंत्रियों के दल को भेजा गया। वीवीआईपी ट्रीटमेंट के साथ हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया गया। उनके पैरों के नीचे लाल कारपेट बिछा दिया गया। यह सब जुगत सिर्फ इसलिए ताकि बाबा अपना आंदोलन न करें और सरकार को अण्णा के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने का एक बहाना मिल जाए। इसे एक तीर से दो शिकार करना भी कह सकते हैं।

अब जरा बात करते हैं बाबाओं की। बाबाओं का हमारे देश और इसकी राजनीति से पुराना लगाव रहा है। कुछ बाबा टाइप के भगवाधारी तो बकायदा लोकसभा एवं राज्यसभा में भी जा चुके हैं। इसके अलावा राजनीतिक संकट के समय भी बाबा भी अपनी सेटिंग का भभूत फूंकते हैं। ऐसे ही एक बाबा थे तांत्रिक चंद्रास्वामी, जो राजनीतिक जोड़तोड़ और न जाने किन किन विधाओं के पारंगत थे। हालांकि आजकल वो गुमनामी में साधना कर रहे हैं। दक्षिण में भी इस तरह के कई बाबा पाए जाते हैं, जिन पर कभी यौनाचार तो भी भ्रष्टाचार के आरोपों का तिलक लगता रहा है। पर क्या करें, हम भारतीय धर्म और आस्था के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं।

हमारे देश का मुख्य विपक्षी दल भी हर बुरे वक्त पर धर्म का सहारा लेने के लिए प्रसिद्ध है। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि यहां पर न तो अच्छे नेता है और न ही अच्छा सिस्टम। विपक्षी पार्टी का एक सूत्रीय कार्यक्रम सरकारी की निंदा करना रह गया है। पेटोल हो या महंगाई वो केवल शोर करना जानता है। इससे निपटने का कोई हल उसके पास नहीं है। हल हो भी तो कैसे, आखिर हैं तो वो भी नेता ही। और जिस किसी ने भी यह कहावत “चोर-चोर मौसेरे भाई एवं एक ही थाली के चट्टे-बट्टे” कही थी, काफी दूरदर्शी था।

इसलिए चाहे बाबा आंदोलन करें या फिर हजारे अनशन करें, सरकार के कान में जूं भी नहीं रेंगने वाली है। क्योंकि यहां की सरकारें जनता के लिए नहीं, बल्कि पार्टी एवं व्यक्तियों के लिए बनती हैं। वाह रे लोकतंत्र।

जय हो।

Tuesday, May 24, 2011

यह कैसी महाशक्ति है?


शेर पर भौंकता हुआ कुत्ता। गूगल खोज से साभार
कुछ दिनों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बयान जारी कर कहा था, दुनिया के मुल्कों को भारत से शांति की शिक्षा लेनी चाहिए। ओबामा का मानना है कि यदि दक्षिण एशिया में भारत जैसा समझदार और शांतिप्रिय देश नहीं होता, तो यहां के हालात बद्तर हो सकते थे। ओबामा के इस कूटनीतिक बयान को भारत ने सकारात्मक रूप से लिया है। लेकिन क्या शांतिप्रिय बने रहना हमारे देश के लिए हमेशा फायदेमंद रहेगा? शायद नहीं।

अमेरिका जैसा देश अपने फायदे के लिए गधे को भी बाप मानने वालों में से है। यह वही देश है, जिसने ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को तैयार किया था, जो बाद में उसके लिए ही भस्मासुर साबित हुआ था। अब जबकि ओसामा का किस्सा ही खत्म हो चुका है, तब अमेरिका ने पाकिस्तान को यह समझाना शुरू कर दिया है कि वह भारत से दोस्ती बढ़ाए। उधर पाकिस्तान ने अपनी नीतियों में बदलाव करते हुए अपनी निष्ठा को चीन की तरफ दंडवत कर दिया है।

चीन ने भी कह दिया है कि पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई को वो बर्दाश्त नहीं करेगा। चीन का इशारा अमेरिकी सैन्य कार्रवाईयों एवं भारत की ओर से संभावित कार्रवाई है। हालांकि चीन भी यह जानता है कि भारत कभी भी हमले की पहल नहीं करेगा। यहां पर भारत और पाकिस्तान की स्थिति को महाभारत काल से भी जोड़ा जा सकता है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की मां को यह वचन दिया था कि वो शिशुपाल की सौ गलतियों को माफ कर देंगे। लेकिन 101वीं पर वो उसका वध करने के लिए मजबूर होंगे। यहां पर पाकिस्तान की स्थिति को शिशुपाल से जोड़ा तो जा सकता है, पर भारत को श्रीकृष्ण मानना हमारी भूल हो सकती है।

यदि कारगिल के बाद से लेकर अब तक की स्थितियों पर नजर दौड़ाएं तो आपको पता चलेगा कि हमारे देश का बूढ़ा नेतृत्व कितना मजबूर और इच्छाशक्ति विहीन है। कारगिल की घटना को गंभीरता से न लेने के चलते ही हमारी सेना को बड़ी संख्या में हानि उठानी पड़ी थी। उचित रणनीति के अभाव ने कई सैनिकों को जबरन काल के गाल में ढकेल दिया और उस पर भी घोटाले हुए सो अलग। देश के लोकतांत्रिक मंदिर संसद भवन पर पाकिस्तानी आतंकवादियों का हमला हुआ, तो ऐसा लगा मानो इस बार तो आरपार की लड़ाई होगी, लेकिन जो हुआ, उसे क्या संज्ञा दी जाए, समझ नहीं आता।

मुंबई में हमला हुआ तो हम पाकिस्तान से चिट्टी चिट्टी का खेल खेलने में लग गए। भारत उसे मना रहा है कि वो हमले में अपना हाथ होना कबूल कर ले। क्या चोर कभी कहेगा कि उसने चोरी की है। इतना ही नहीं, हद तो इस पर है कि अफजल गुरू नाम के षड्यंत्रकारी को, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुना रखी है, उसे भी हमारा देश दामाद की तरह पाल रहा है। यही हाल मुंबई हमले में पकड़े गए आमिर अजमल कसाब का भी है। उस पर मुकदमा करके उससे कबूल करवाने का प्रयत्न किया जा रहा है, ताकि वह 26/11 के हमले में अपना हाथ होना कबूल ले। इससे ज्यादा हास्यास्पद क्या होगा।

रही सही कसर आज 25 मई को पूरी हो गई, जब पाकिस्तान ने भारत द्वारा दी गई 50 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची को यह कहते हुए लौटा दिया कि पहले भारत यह जांच ले कि इनमें से कितने लोग भारत में रह रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार, नौकरशाह या फिर दोनों। अकर्मण्यता और आपसी समन्वय की कमी के चलते देश की नाक कहीं न कहीं कट ही जाती है। फिर चाहे वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी दूसरे देश का भाषण पढ़ देना हो या फिर इस तरह की सूची बनाना हो, जिसमें दिए गए नाम हमारे ही मोहल्ले में रह रहे हों।

बताइए, हम एक ऐसे विकासशील, मजबूत अर्थव्यवस्था एवं तेजी उभरती हुई महाशक्ति हैं, जिनकी मजबूती में दीमक लगी हुई है। भ्रष्टाचार की दीमक और कामचोरी की दीमक। देश में नौकरशाही अपनी ढपली बजाता है और नेता अपना राग आलापते हैं। कहीं कोई सुरताल नहीं, जिसे जो मर्जी वो कर रहा है। एक दो भ्रष्टाचारी हों तो गिनाएं भी जाएं। यहां इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि दो तीन भ्रष्टाचार नगर बसाए जा सकते हैं।

वैसे यह कभी न खत्म होने वाला विषय है। आप और हम इस पर लाखों पन्नों का महाकाव्य भी लिख सकते हैं। हालांकि यह किस्सा शायद तब भी खत्म न हो।

यह कैसी महाशक्ति है?

कुछ दिनों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बयान जारी कर कहा था, दुनिया के मुल्कों को भारत से शांति की शिक्षा लेनी चाहिए। ओबामा का मानना है कि यदि दक्षिण एशिया में भारत जैसा समझदार और शांतिप्रिय देश नहीं होता, तो यहां के हालात बद्तर हो सकते थे। ओबामा के इस कूटनीतिक बयान को भारत ने सकारात्मक रूप से लिया है। लेकिन क्या शांतिप्रिय बने रहना हमारे देश के लिए हमेशा फायदेमंद रहेगा? शायद नहीं।

अमेरिका जैसा देश अपने फायदे के लिए गधे को भी बाप मानने वालों में से है। यह वही देश है, जिसने ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को तैयार किया था, जो बाद में उसके लिए ही भस्मासुर साबित हुआ था। अब जबकि ओसामा का किस्सा ही खत्म हो चुका है, तब अमेरिका ने पाकिस्तान को यह समझाना शुरू कर दिया है कि वह भारत से दोस्ती बढ़ाए। उधर पाकिस्तान ने अपनी नीतियों में बदलाव करते हुए अपनी निष्ठा को चीन की तरफ दंडवत कर दिया है।

चीन ने भी कह दिया है कि पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई को वो बर्दाश्त नहीं करेगा। चीन का इशारा अमेरिकी सैन्य कार्रवाईयों एवं भारत की ओर से संभावित कार्रवाई है। हालांकि चीन भी यह जानता है कि भारत कभी भी हमले की पहल नहीं करेगा। यहां पर भारत और पाकिस्तान की स्थिति को महाभारत काल से भी जोड़ा जा सकता है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की मां को यह वचन दिया था कि वो शिशुपाल की सौ गलतियों को माफ कर देंगे। लेकिन 101वीं पर वो उसका वध करने के लिए मजबूर होंगे। यहां पर पाकिस्तान की स्थिति को शिशुपाल से जोड़ा तो जा सकता है, पर भारत को श्रीकृष्ण मानना हमारी भूल हो सकती है।

यदि कारगिल के बाद से लेकर अब तक की स्थितियों पर नजर दौड़ाएं तो आपको पता चलेगा कि हमारे देश का बूढ़ा नेतृत्व कितना मजबूर और इच्छाशक्ति विहीन है। कारगिल की घटना को गंभीरता से न लेने के चलते ही हमारी सेना को बड़ी संख्या में हानि उठानी पड़ी थी। उचित रणनीति के अभाव ने कई सैनिकों को जबरन काल के गाल में ढकेल दिया और उस पर भी घोटाले हुए सो अलग। देश के लोकतांत्रिक मंदिर संसद भवन पर पाकिस्तानी आतंकवादियों का हमला हुआ, तो ऐसा लगा मानो इस बार तो आरपार की लड़ाई होगी, लेकिन जो हुआ, उसे क्या संज्ञा दी जाए, समझ नहीं आता।

मुंबई में हमला हुआ तो हम पाकिस्तान से चिट्टी चिट्टी का खेल खेलने में लग गए। भारत उसे मना रहा है कि वो हमले में अपना हाथ होना कबूल कर ले। क्या चोर कभी कहेगा कि उसने चोरी की है। इतना ही नहीं, हद तो इस पर है कि अफजल गुरू नाम के षड्यंत्रकारी को, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुना रखी है, उसे भी हमारा देश दामाद की तरह पाल रहा है। यही हाल मुंबई हमले में पकड़े गए आमिर अजमल कसाब का भी है। उस पर मुकदमा करके उससे कबूल करवाने का प्रयत्न किया जा रहा है, ताकि वह 26/11 के हमले में अपना हाथ होना कबूल ले। इससे ज्यादा हास्यास्पद क्या होगा।

रही सही कसर आज 25 मई को पूरी हो गई, जब पाकिस्तान ने भारत द्वारा दी गई 50 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची को यह कहते हुए लौटा दिया कि पहले भारत यह जांच ले कि इनमें से कितने लोग भारत में रह रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार, नौकरशाह या फिर दोनों। अकर्मण्यता और आपसी समन्वय की कमी के चलते देश की नाक कहीं न कहीं कट ही जाती है। फिर चाहे वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी दूसरे देश का भाषण पढ़ देना हो या फिर इस तरह की सूची बनाना हो, जिसमें दिए गए नाम हमारे ही मोहल्ले में रह रहे हों।

बताइए, हम एक ऐसे विकासशील, मजबूत अर्थव्यवस्था एवं तेजी उभरती हुई महाशक्ति हैं, जिनकी मजबूती में दीमक लगी हुई है। भ्रष्टाचार की दीमक और कामचोरी की दीमक। देश में नौकरशाही अपनी ढपली बजाता है और नेता अपना राग आलापते हैं। कहीं कोई सुरताल नहीं, जिसे जो मर्जी वो कर रहा है। एक दो भ्रष्टाचारी हों तो गिनाएं भी जाएं। यहां इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि दो तीन भ्रष्टाचार नगर बसाए जा सकते हैं।

वैसे यह कभी न खत्म होने वाला विषय है। आप और हम इस पर लाखों पन्नों का महाकाव्य भी लिख सकते हैं। हालांकि यह किस्सा शायद तब भी खत्म न हो।

Tuesday, May 3, 2011

एक लादेन से खत्म नहीं होगा आतंकवाद

इधर लादेन मारा गया, उधर पूरे अमेरिका में जश्न की शुरुआत हो गई। ऐसा लग रहा है मानों अमेरिकियों ने दुनिया फतह कर ली है। दुनिया भर के अखबार लादेन की मौत की खबरों से रंगे हुए हैं। पर लाख टके का सवाल अभी वही है कि क्या लादेन के खात्मे के साथ ही दुनिया से आतंकवाद भी खत्म हो गया है। नहीं, आतंकवाद का नासूर दुनिया में इस कदर अपनी जड़ें जमाए हुए है, कि उसे एक लादेन की मौत से खत्म नहीं किया जा सकता है। लादेन की मौत ने केवल अमेरिकी गुरूर को पूरा किया है और 9/11 की राख को ठंडा किया है।

दरअसल ओसामा बिन लादेन ने आतंकवाद का जो अंपायर खड़ा किया है, उसे नेस्तनाबूद कर पाना शायद एक अकेले अमेरिका के बस में नहीं है। उसने अपने पीछे इतने सिपहसालार तो खड़े कर ही लिए हैं, जो उसके न होने पर भी आतंकी मकसद को बदस्तूर जारी रखेंगे। इसलिए दुनिया से आतंकवाद को खत्म करने के लिए दुनिया के सभी मुल्कों को एकसाथ आना होगा।

वैसे जिस तरह से अमेरिका ने पाकिस्तान को बिना विश्वास में लिए उनकी ही राजधानी के पास अपना ऑपरेशन पूरा किया, उससे एक बात तो सिद्ध होती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से कुछ भी किया जा सकता है। अमेरिका के लिए लादेन को को मारना एक चुनौती के साथ साथ सम्मान का विषय बन चुका था। लादेन को मारकर उन्होंने आतंकवाद के सरपरस्तों को यह संदेश भी दे दिया है कि अमेरिका के खिलाफ उठने वाले किसी भी सर को इसी तरह से कुचल दिया जाएगा। दूसरा यह भी कि उनके लिए दुनिया के मुल्कों की सीमाएं मायने नहीं रखती हैं।

हालांकि लादेन का पाकिस्तान में मारा जाना, हमारे पड़ोसी मुल्क के लिए शर्मिंदगी की बात है, क्योंकि वो शुरू से ही कहता आ रहा है कि लादेन से उसका कोई लेना देना नहीं है। पाकिस्तान ने हमेशा जोर देकर कहा है कि वो अपनी जमीन का उपयोगी आतंकी गतिविधियों के लिए नहीं करने देगा। हालांकि इस ऑपरेशन के बाद पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तानी हुक्मरानों की भी भद पिटी है। अभी हाल में ही एक अमेरिकी रक्षा अधिकारी ने भी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को आतंकी संगठन की तरह काम करने की संज्ञा दी थी। इस घटना से यह तो तय हो गया है कि पाकिस्तान आतंकवादियों के लिए सरपरस्ती का काम कर रहा है। संभव तो यह भी है कि अब अमेरिका के दुश्मनों की फेहरिस्त में उसका नाम भी शामिल हो जाए।

अमेरिकी रणनीतिक अब यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि आखिर कैसे पाकिस्तानी प्रशासन ओसामा के पाकिस्तान में रहने से अनभिज्ञता जता रहा था। क्यों अमेरिकी शक की सूई को हर बार अफगानिस्तान की ओर घुमाता था।

जो भी हो, पर ओसामा बिन लादेन की मौत से सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका और बराक ओबामा हो होगा, लेकिन इसका नुकसान दक्षिण एशियाई मुल्कों खासतौर पर हमारे देश को भुगतान पड़ सकता है। अलकायदा अपने नेता की मौत का बदला लेने के लिए कुछ भी करेगा। हो सकता है कि दुनिया भर में अमेरिकी नागरिकों और अमेरिका के मित्र देशों को निशाना बनाया जाए। हालांकि इससे पाकिस्तान भी अछूता रहे, ऐसा संभव नहीं दिखता है।

अब देखना यह है कि लादेन के बाद आतंकवाद क्या राह पकड़ता है और अमेरिका की रणनीति पाकिस्तान और चरमपंथियों के लिए अब क्या रहेगी।

एक लादेन से खत्म नहीं होगा आतंकवाद

इधर लादेन मारा गया, उधर पूरे अमेरिका में जश्न की शुरुआत हो गई। ऐसा लग रहा है मानों अमेरिकियों ने दुनिया फतह कर ली है। दुनिया भर के अखबार लादेन की मौत की खबरों से रंगे हुए हैं। पर लाख टके का सवाल अभी वही है कि क्या लादेन के खात्मे के साथ ही दुनिया से आतंकवाद भी खत्म हो गया है। नहीं, आतंकवाद का नासूर दुनिया में इस कदर अपनी जड़ें जमाए हुए है, कि उसे एक लादेन की मौत से खत्म नहीं किया जा सकता है। लादेन की मौत ने केवल अमेरिकी गुरूर को पूरा किया है और 9/11 की राख को ठंडा किया है।

दरअसल ओसामा बिन लादेन ने आतंकवाद का जो अंपायर खड़ा किया है, उसे नेस्तनाबूद कर पाना शायद एक अकेले अमेरिका के बस में नहीं है। उसने अपने पीछे इतने सिपहसालार तो खड़े कर ही लिए हैं, जो उसके न होने पर भी आतंकी मकसद को बदस्तूर जारी रखेंगे। इसलिए दुनिया से आतंकवाद को खत्म करने के लिए दुनिया के सभी मुल्कों को एकसाथ आना होगा।

वैसे जिस तरह से अमेरिका ने पाकिस्तान को बिना विश्वास में लिए उनकी ही राजधानी के पास अपना ऑपरेशन पूरा किया, उससे एक बात तो सिद्ध होती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से कुछ भी किया जा सकता है। अमेरिका के लिए लादेन को को मारना एक चुनौती के साथ साथ सम्मान का विषय बन चुका था। लादेन को मारकर उन्होंने आतंकवाद के सरपरस्तों को यह संदेश भी दे दिया है कि अमेरिका के खिलाफ उठने वाले किसी भी सर को इसी तरह से कुचल दिया जाएगा। दूसरा यह भी कि उनके लिए दुनिया के मुल्कों की सीमाएं मायने नहीं रखती हैं।

हालांकि लादेन का पाकिस्तान में मारा जाना, हमारे पड़ोसी मुल्क के लिए शर्मिंदगी की बात है, क्योंकि वो शुरू से ही कहता आ रहा है कि लादेन से उसका कोई लेना देना नहीं है। पाकिस्तान ने हमेशा जोर देकर कहा है कि वो अपनी जमीन का उपयोगी आतंकी गतिविधियों के लिए नहीं करने देगा। हालांकि इस ऑपरेशन के बाद पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तानी हुक्मरानों की भी भद पिटी है। अभी हाल में ही एक अमेरिकी रक्षा अधिकारी ने भी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को आतंकी संगठन की तरह काम करने की संज्ञा दी थी। इस घटना से यह तो तय हो गया है कि पाकिस्तान आतंकवादियों के लिए सरपरस्ती का काम कर रहा है। संभव तो यह भी है कि अब अमेरिका के दुश्मनों की फेहरिस्त में उसका नाम भी शामिल हो जाए।

अमेरिकी रणनीतिक अब यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि आखिर कैसे पाकिस्तानी प्रशासन ओसामा के पाकिस्तान में रहने से अनभिज्ञता जता रहा था। क्यों अमेरिकी शक की सूई को हर बार अफगानिस्तान की ओर घुमाता था।

जो भी हो, पर ओसामा बिन लादेन की मौत से सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका और बराक ओबामा हो होगा, लेकिन इसका नुकसान दक्षिण एशियाई मुल्कों खासतौर पर हमारे देश को भुगतान पड़ सकता है। अलकायदा अपने नेता की मौत का बदला लेने के लिए कुछ भी करेगा। हो सकता है कि दुनिया भर में अमेरिकी नागरिकों और अमेरिका के मित्र देशों को निशाना बनाया जाए। हालांकि इससे पाकिस्तान भी अछूता रहे, ऐसा संभव नहीं दिखता है।

अब देखना यह है कि लादेन के बाद आतंकवाद क्या राह पकड़ता है और अमेरिका की रणनीति पाकिस्तान और चरमपंथियों के लिए अब क्या रहेगी।

दुनिया की मीडिया में ओसामा बिन लादेन की मौत का कव्हरेज

दुनिया की मीडिया में ओसामा बिन लादेन की मौत का कव्हरेज

Wednesday, April 27, 2011

जेब-जंतु


गूगल खोज से साभार
आप सबको रामायण का वह वाकया तो याद होगा जिसमें हनुमान जी चालीस योजन समुद्र लांघकर लंका की ओर जा रहे थे और उनका सामना सुरसा से हुआ था। जी हां, वही सुरसा जो हनुमान जी के कद के बराबर अपना मुंह खोल रही थी। खैर यह तो बात एक असुर की थी, जो अपने शिकार के हिसाब से अपना मुंह बड़ा कर रही थी, लेकिन हमारे देश के नेताओं की भूख या कहें कि उनकी जेब कभी भर ही नहीं सकती है। उसने पूरी दुनिया का पैसा भर दें तब भी उनका लालच खत्म नहीं होगा।

अब उदाहरणों की बात करें, तो हमारे देश का हाल ऐसा है कि एक खोजेंगे तो हजार मिलेंगे। लेकिन अपन तो मध्यप्रदेश की बात करते हैं। लगता है यहां के मंत्रियों को मिलने वाले "अदृश्य भत्ते" कम लगने लगे हैं। यही वजह है कि राज्य शासन ने उनके दैनिक भत्ते बढ़ाने का फैसला लिया है। यह हाल तब है जबकि राज्य में पहले से ही माननीय जनप्रतिनिधियों के लिए पहले से ही काफी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

खास बात यह है कि राज्य के मंत्रियों को अभी मिलने वाला दैनिक भत्ता भी कमतर नहीं कहा जा सकता है। फिलहाल माननीयों को प्रदेश में रहने पर 750 रोजाना और प्रदेश के बाहर रहने पर 900 रुपए दैनिक के हिसाब से भत्ता मिलता है। माननीय विधायकों का भत्ता भी पिछले साल बढ़ चुका है।

विधायकों को राज्य में 600 रुपए और राज्य के बाहर 750 रुपए दैनिक भत्ता मिल रहा है। विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष को 800 रुपए दैनिक भत्ता मिलता है।

इतना ही नहीं इन माननीयों के विदेश दौरे के भत्ते भी रिवाइज़ किए जा रहे हैं। नए तय किए गए विदेश भत्ते में मंत्रियों को 19 डॉलर (845 रुपए) और विधायकों को 16 डॉलर (712 रुपए) दैनिक मिलेगा।

आइए अब आपको बताएं कि मध्यप्रदेश में माननीयों पर किस तरह से सरकार मेहरबान है। सबसे पहले बात करते हैं मंत्रियों कीः
  • सभी मंत्रियों को 62000 रुपए वेतन के अलावा, वाहन, बंगला, स्टाफ, मुफ्त रेल यात्रा, हवाई यात्रा, फोन, फर्नीचर, मुफ्त बिजली, लैपटॉप इत्यादि। पद में न रहने पर भी उन्हें मुफ्त रेल यात्रा तथा मेडिकल सुविधा आजीवन उपलबध रहती है।
  • ऐसी ही व्यवस्था विधायकों के लिए भी है। उन्हें भी मुफ्त आवास, रेल यात्रा, गैस कनेक्शन, वाटर प्यूरीफायर, टीवी, केबल कनेक्शन, फर्नीचर, बिजली, अलमारियां, टेलीफोन कनेक्शन और लैपटॉप इत्यादि दिया जाता है। विधायक न रहने पर भी उन्हें मुफ्त रेल यात्रा तथा मेडिकल सुविधा आजीवन दी जाती है।
सबसे ऊपर यह है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक और व्यवस्था कर दी थी, जिसके मुताबिक कोई भी मुख्यमंत्री जब पद में नहीं रहेगा तथा केवल विधायक रहेगा तब भी उसे सरकारी बंगला एवं लालबत्ती वाली गाड़ी की सुविधा मिली रहेगी। ऐसी ही सुविधा पूर्व विधानसभा अध्यक्षों के लिए भी है।

भत्तो सहित वेतन पर एक नजरः
  • मुख्यमंत्री: 65 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए दैनिक भत्ता
  • मंत्री: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते, प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए प्रतिदिन भत्ता।
  • राज्य मंत्री: 60 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए दैनिक भत्ता
  • विधायक: 50,252 रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते, प्रदेश में 600 और बाहर 750 रुपए दैनिक भत्ता
  • विधान सभा अध्यक्ष: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा 800 रुपए दैनिक भत्ता
  • नेता प्रतिपक्ष: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अतिरिक्त 800 रुपए प्रतिदिन भत्ता। कुल 86 हजार
  • विधान सभा उपाध्यक्ष: 60 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा 800 रुपए दैनिक भत्ता। कुल 84 हजार रुपए।

जेब-जंतु


गूगल खोज से साभार
आप सबको रामायण का वह वाकया तो याद होगा जिसमें हनुमान जी चालीस योजन समुद्र लांघकर लंका की ओर जा रहे थे और उनका सामना सुरसा से हुआ था। जी हां, वही सुरसा जो हनुमान जी के कद के बराबर अपना मुंह खोल रही थी। खैर यह तो बात एक असुर की थी, जो अपने शिकार के हिसाब से अपना मुंह बड़ा कर रही थी, लेकिन हमारे देश के नेताओं की भूख या कहें कि उनकी जेब कभी भर ही नहीं सकती है। उसने पूरी दुनिया का पैसा भर दें तब भी उनका लालच खत्म नहीं होगा।

अब उदाहरणों की बात करें, तो हमारे देश का हाल ऐसा है कि एक खोजेंगे तो हजार मिलेंगे। लेकिन अपन तो मध्यप्रदेश की बात करते हैं। लगता है यहां के मंत्रियों को मिलने वाले "अदृश्य भत्ते" कम लगने लगे हैं। यही वजह है कि राज्य शासन ने उनके दैनिक भत्ते बढ़ाने का फैसला लिया है। यह हाल तब है जबकि राज्य में पहले से ही माननीय जनप्रतिनिधियों के लिए पहले से ही काफी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

खास बात यह है कि राज्य के मंत्रियों को अभी मिलने वाला दैनिक भत्ता भी कमतर नहीं कहा जा सकता है। फिलहाल माननीयों को प्रदेश में रहने पर 750 रोजाना और प्रदेश के बाहर रहने पर 900 रुपए दैनिक के हिसाब से भत्ता मिलता है। माननीय विधायकों का भत्ता भी पिछले साल बढ़ चुका है।

विधायकों को राज्य में 600 रुपए और राज्य के बाहर 750 रुपए दैनिक भत्ता मिल रहा है। विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष को 800 रुपए दैनिक भत्ता मिलता है।

इतना ही नहीं इन माननीयों के विदेश दौरे के भत्ते भी रिवाइज़ किए जा रहे हैं। नए तय किए गए विदेश भत्ते में मंत्रियों को 19 डॉलर (845 रुपए) और विधायकों को 16 डॉलर (712 रुपए) दैनिक मिलेगा।

आइए अब आपको बताएं कि मध्यप्रदेश में माननीयों पर किस तरह से सरकार मेहरबान है। सबसे पहले बात करते हैं मंत्रियों कीः
  • सभी मंत्रियों को 62000 रुपए वेतन के अलावा, वाहन, बंगला, स्टाफ, मुफ्त रेल यात्रा, हवाई यात्रा, फोन, फर्नीचर, मुफ्त बिजली, लैपटॉप इत्यादि। पद में न रहने पर भी उन्हें मुफ्त रेल यात्रा तथा मेडिकल सुविधा आजीवन उपलबध रहती है।
  • ऐसी ही व्यवस्था विधायकों के लिए भी है। उन्हें भी मुफ्त आवास, रेल यात्रा, गैस कनेक्शन, वाटर प्यूरीफायर, टीवी, केबल कनेक्शन, फर्नीचर, बिजली, अलमारियां, टेलीफोन कनेक्शन और लैपटॉप इत्यादि दिया जाता है। विधायक न रहने पर भी उन्हें मुफ्त रेल यात्रा तथा मेडिकल सुविधा आजीवन दी जाती है।
सबसे ऊपर यह है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक और व्यवस्था कर दी थी, जिसके मुताबिक कोई भी मुख्यमंत्री जब पद में नहीं रहेगा तथा केवल विधायक रहेगा तब भी उसे सरकारी बंगला एवं लालबत्ती वाली गाड़ी की सुविधा मिली रहेगी। ऐसी ही सुविधा पूर्व विधानसभा अध्यक्षों के लिए भी है।

भत्तो सहित वेतन पर एक नजरः
  • मुख्यमंत्री: 65 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए दैनिक भत्ता
  • मंत्री: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते, प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए प्रतिदिन भत्ता।
  • राज्य मंत्री: 60 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए दैनिक भत्ता
  • विधायक: 50,252 रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते, प्रदेश में 600 और बाहर 750 रुपए दैनिक भत्ता
  • विधान सभा अध्यक्ष: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा 800 रुपए दैनिक भत्ता
  • नेता प्रतिपक्ष: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अतिरिक्त 800 रुपए प्रतिदिन भत्ता। कुल 86 हजार
  • विधान सभा उपाध्यक्ष: 60 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा 800 रुपए दैनिक भत्ता। कुल 84 हजार रुपए।

Tuesday, April 5, 2011

विश्वकप और हिन्दी अखबारों के प्रथम पृष्ठ

विश्व कप के अगले दिन यानी रविवार को देश के प्रमुख अखबारों के प्रथम पेज कुछ तरह से सजे हुए थे। सभी ने हेडिंग एवं फोटो के साथ कई प्रयोग किए थे। हालांकि तस्वीरें लगभग एक जैसी ही थीं, बस अंतर था तो उनके प्रस्तुतिकरण का।
हिन्दुस्तान दिल्ली संस्करण
हिन्दुस्तान रांची संस्करण
दैनिक भास्कर चंडीगढ़ संस्करण

दैनिक भास्कर जयपुर, रायपुर एवं भोपाल
दैनिक भास्कर नागपुर संस्करण
दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण
दैनिक जागरण दिल्ली संस्करण
पत्रिका सभी संस्करण
नईदुनिया इंदौर संस्करण
प्रभात खबर रांची
अमर उजाला
अमर उजाला कॉम्पैक्ट
राष्ट्रीय सहारा दिल्ली

विश्वकप और हिन्दी अखबारों के प्रथम पृष्ठ

विश्व कप के अगले दिन यानी रविवार को देश के प्रमुख अखबारों के प्रथम पेज कुछ तरह से सजे हुए थे। सभी ने हेडिंग एवं फोटो के साथ कई प्रयोग किए थे। हालांकि तस्वीरें लगभग एक जैसी ही थीं, बस अंतर था तो उनके प्रस्तुतिकरण का।
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Wednesday, March 30, 2011

सबसे भ्रष्ट देशों की टॉप-5 फेहरिस्त में हमारा देश


दुनिया के अमीरों या तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के मामले में किसी सूची में भारत को शीर्ष पर देखकर भले ही सभी भारतीयों को गर्व होता है, लेकिन यह ऐसी सूची है जिसमें कभी भी भारतीय अपने को शीर्ष पर नहीं देखना चाहेंगे। भारत को एशिया प्रशांत के सबसे भ्रष्ट देशों की सूची में शामिल किया गया है। हांगकांग स्थित कारोबार सलाहकार फर्म पीईआरसी ने एशिया क्षेत्र के सर्वे में भारत को फिलीपींस और कंबोडिया के साथ एशिया के सबसे भ्रष्ट 16 देशों की सूची में शामिल किया है।

पॉलिटिकल एंड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी (पीईआरसी) ने भ्रष्टाचार के मामले में भारत को 8.67 की रेटिंग दी है। शून्य से 10 तक के स्केल में ज्यादा रेटिंग का मतलब है ज्यादा भ्रष्ट। सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार वाले देशों में कंबोडिया (9.27), इंडोनेशिया (9.25) और फिलीपींस (8.9) शामिल रहे। चीन की रेंकिंग 7.93 और वियतनाम की 8.3 रही है।भ्रष्ट देशों के मामले में थाईलैंड 7.55 अंकों के साथ 11वें स्थान पर है। तुलनात्मक रूप से सिंगापुर 0.37 रेटिंग के साथ सबसे कम भ्रष्ट देश रहा है। इसके बाद हांगकांग (1.10), ऑस्ट्रेलिया (1.39) जापान (1.90) और अमेरिका (2.39) सबसे कम भ्रष्टाचार वाले देश रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्थानीय निकाय और स्थानीय स्तर के राजनेता राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट पाए गए। स्थानीय नेताओं को सूची में 9.25 अंक मिले हैं, जबकि राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व 8.97 फीसदी के साथ थोड़ा कम भ्रष्ट रहा। शहर स्तर के नौकरशाह भी केंद्रीय नौकरशाहों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट पाए गए।एशियन इंटेलिजेंस रिपोर्ट में पीईआरसी ने कहा है कि भारत में भ्रष्टाचार बढ़ा है और मनमोहन ङ्क्षसह के नेतृत्व वाले यूपीए के दूसरे कार्यकाल में यह काफी भारी पड़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि टेलीकॉम लाइसेंस वितरण, राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी, सैन्य भूमि घोटाले और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण वितरण में घोटालों के कारण सरकार की नींद उड़ी हुई है।हालांकि एजेंसियां इन मामलों जांच कर रही हैं, लेकिन भारतीय जनता लगातार यह सवाल कर रही है कि प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार को रोक पाने में समर्थ भी हैं या नहीं। संसद में विपक्ष ने भी इस मामले पर सरकार को घेर रखा है। विकीलीक्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु करार पर संसद की स्वीकृत में सरकार ने सांसदों को रिश्वत दी। इसके बाद सरकार और घिर चुकी है।

हिंदी अखबार दैनिक हिंदुस्तान एवं बिज़नेस भास्कर में प्रकाशित खबरों से साभार

सबसे भ्रष्ट देशों की टॉप-5 फेहरिस्त में हमारा देश


दुनिया के अमीरों या तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के मामले में किसी सूची में भारत को शीर्ष पर देखकर भले ही सभी भारतीयों को गर्व होता है, लेकिन यह ऐसी सूची है जिसमें कभी भी भारतीय अपने को शीर्ष पर नहीं देखना चाहेंगे। भारत को एशिया प्रशांत के सबसे भ्रष्ट देशों की सूची में शामिल किया गया है। हांगकांग स्थित कारोबार सलाहकार फर्म पीईआरसी ने एशिया क्षेत्र के सर्वे में भारत को फिलीपींस और कंबोडिया के साथ एशिया के सबसे भ्रष्ट 16 देशों की सूची में शामिल किया है।

पॉलिटिकल एंड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी (पीईआरसी) ने भ्रष्टाचार के मामले में भारत को 8.67 की रेटिंग दी है। शून्य से 10 तक के स्केल में ज्यादा रेटिंग का मतलब है ज्यादा भ्रष्ट। सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार वाले देशों में कंबोडिया (9.27), इंडोनेशिया (9.25) और फिलीपींस (8.9) शामिल रहे। चीन की रेंकिंग 7.93 और वियतनाम की 8.3 रही है।भ्रष्ट देशों के मामले में थाईलैंड 7.55 अंकों के साथ 11वें स्थान पर है। तुलनात्मक रूप से सिंगापुर 0.37 रेटिंग के साथ सबसे कम भ्रष्ट देश रहा है। इसके बाद हांगकांग (1.10), ऑस्ट्रेलिया (1.39) जापान (1.90) और अमेरिका (2.39) सबसे कम भ्रष्टाचार वाले देश रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्थानीय निकाय और स्थानीय स्तर के राजनेता राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट पाए गए। स्थानीय नेताओं को सूची में 9.25 अंक मिले हैं, जबकि राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व 8.97 फीसदी के साथ थोड़ा कम भ्रष्ट रहा। शहर स्तर के नौकरशाह भी केंद्रीय नौकरशाहों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट पाए गए।एशियन इंटेलिजेंस रिपोर्ट में पीईआरसी ने कहा है कि भारत में भ्रष्टाचार बढ़ा है और मनमोहन ङ्क्षसह के नेतृत्व वाले यूपीए के दूसरे कार्यकाल में यह काफी भारी पड़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि टेलीकॉम लाइसेंस वितरण, राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी, सैन्य भूमि घोटाले और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण वितरण में घोटालों के कारण सरकार की नींद उड़ी हुई है।हालांकि एजेंसियां इन मामलों जांच कर रही हैं, लेकिन भारतीय जनता लगातार यह सवाल कर रही है कि प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार को रोक पाने में समर्थ भी हैं या नहीं। संसद में विपक्ष ने भी इस मामले पर सरकार को घेर रखा है। विकीलीक्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु करार पर संसद की स्वीकृत में सरकार ने सांसदों को रिश्वत दी। इसके बाद सरकार और घिर चुकी है।

हिंदी अखबार दैनिक हिंदुस्तान एवं बिज़नेस भास्कर में प्रकाशित खबरों से साभार

Thursday, March 24, 2011

भारत में धर्म है सबसे बड़ा कारोबार


किसी सभा में बाबा अपने अनुयायियों का आह्वान करते हुए

क्या आप जानते हैं कि भारत में सबसे बड़ा और अमूमन सफल कारोबार किस चीज का है। अगर नहीं जानते हैं तो आपका ज्ञानवर्धन करते हुए हम बता रहे हैं कि भारत में धर्म सबसे बड़ा कारोबार है। धर्म के नाम पर आप एक आम भारतीय से बिना किसी लाग लपेट के पैसा निकलवा सकते हैं। जी हां, यह सच है और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ने अपने शोध में इसे साबित भी कर दिया है।

यूनिवर्सिटी की शोध में बताया गया है कि भारत में धार्मिक संगठन न सिर्फ व्यावसायिक संगठनों की तरह काम करते हैं, बल्कि लोगों की निष्ठा बरकरार रखने के लिए अपनी गतिविधियों में विविधता भी लाते रहते हैं। इतना ही नहीं इन संगठनों के बीच कारोबारी संगठनों की तरह ही कड़ी स्पर्धा भी होती है।

यह अध्ययन भारतीय मूल की शिक्षाविद श्रेया अय्यर की अगुवाई में किया गया है। भारत के धार्मिक संगठनों से जुड़े इस अध्ययन के नतीजों का विवरण रिसर्च होराइजंस के ताजा संस्करण में प्रकाशित किया गया है। यह अध्ययन महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और गुजरात स्थित धार्मिक संगठनों पर किया गया।

अर्थशास्त्र विभाग के एक दल ने दो वर्षो तक भारत के अलग-अलग 568 धार्मिक संगठनों पर अध्ययन किया। इसमें भारतीय राज्यों के धार्मिक संगठनों की धार्मिक और गैर धार्मिक गतिविधियों पर अध्ययन किया गया। जिसमें निष्कर्ष निकला कि जिस तरह कारोबारी बाजार में अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं, उसी तरह धार्मिक संगठन भी स्पर्धा में आगे निकलने के लिए अपने आसपास के राजनीतिक, आर्थिक और अन्य तरह के माहौल को बदलते हैं।

अध्ययन के मुताबिक भारतीय धार्मिक संगठन रक्तदान, नेत्र शिविर, चिकित्सा सेवा शिविर और गरीबों के लिए सामूहिक विवाह जैसे कई कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, ताकि अपने से जुड़े लोगों की निष्ठा को बरकरार रख सकें और अन्य लोगों को अपनी ओर खींच सकें। विचारधारा के मामले पर धार्मिक संगठन उसी तरह का रुख अपनाते हैं जैसे कारोबारी संगठन अपनी बिक्री बढ़ाने की कोशिश के लिए नीतियां अपनाते हैं।

एक बात और, यह धार्मिक संगठन अपने पत्र पत्रिकाएं भी प्रकाशित करते हैं तथा विभिन्न धार्मिक आयोजनों के दौरान कलम, कॉपियां, अंगूठियां, गले की चेन एवं लॉकेट, चाबी के छल्ले जैसे वस्तुएं तक बेचते हैं, जिससे इनका प्रचार भी होता है तथा आमदनी भी बढ़ती है।

भारत में धर्म है सबसे बड़ा कारोबार


किसी सभा में बाबा अपने अनुयायियों का आह्वान करते हुए

क्या आप जानते हैं कि भारत में सबसे बड़ा और अमूमन सफल कारोबार किस चीज का है। अगर नहीं जानते हैं तो आपका ज्ञानवर्धन करते हुए हम बता रहे हैं कि भारत में धर्म सबसे बड़ा कारोबार है। धर्म के नाम पर आप एक आम भारतीय से बिना किसी लाग लपेट के पैसा निकलवा सकते हैं। जी हां, यह सच है और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ने अपने शोध में इसे साबित भी कर दिया है।

यूनिवर्सिटी की शोध में बताया गया है कि भारत में धार्मिक संगठन न सिर्फ व्यावसायिक संगठनों की तरह काम करते हैं, बल्कि लोगों की निष्ठा बरकरार रखने के लिए अपनी गतिविधियों में विविधता भी लाते रहते हैं। इतना ही नहीं इन संगठनों के बीच कारोबारी संगठनों की तरह ही कड़ी स्पर्धा भी होती है।

यह अध्ययन भारतीय मूल की शिक्षाविद श्रेया अय्यर की अगुवाई में किया गया है। भारत के धार्मिक संगठनों से जुड़े इस अध्ययन के नतीजों का विवरण रिसर्च होराइजंस के ताजा संस्करण में प्रकाशित किया गया है। यह अध्ययन महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और गुजरात स्थित धार्मिक संगठनों पर किया गया।

अर्थशास्त्र विभाग के एक दल ने दो वर्षो तक भारत के अलग-अलग 568 धार्मिक संगठनों पर अध्ययन किया। इसमें भारतीय राज्यों के धार्मिक संगठनों की धार्मिक और गैर धार्मिक गतिविधियों पर अध्ययन किया गया। जिसमें निष्कर्ष निकला कि जिस तरह कारोबारी बाजार में अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं, उसी तरह धार्मिक संगठन भी स्पर्धा में आगे निकलने के लिए अपने आसपास के राजनीतिक, आर्थिक और अन्य तरह के माहौल को बदलते हैं।

अध्ययन के मुताबिक भारतीय धार्मिक संगठन रक्तदान, नेत्र शिविर, चिकित्सा सेवा शिविर और गरीबों के लिए सामूहिक विवाह जैसे कई कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, ताकि अपने से जुड़े लोगों की निष्ठा को बरकरार रख सकें और अन्य लोगों को अपनी ओर खींच सकें। विचारधारा के मामले पर धार्मिक संगठन उसी तरह का रुख अपनाते हैं जैसे कारोबारी संगठन अपनी बिक्री बढ़ाने की कोशिश के लिए नीतियां अपनाते हैं।

एक बात और, यह धार्मिक संगठन अपने पत्र पत्रिकाएं भी प्रकाशित करते हैं तथा विभिन्न धार्मिक आयोजनों के दौरान कलम, कॉपियां, अंगूठियां, गले की चेन एवं लॉकेट, चाबी के छल्ले जैसे वस्तुएं तक बेचते हैं, जिससे इनका प्रचार भी होता है तथा आमदनी भी बढ़ती है।

क़ायम रहेगा हिंदी का वर्चस्व


भविष्य में हिंदी का वर्चस्व कम से कम दक्षिण एशिया के क्षेत्रों में तो अवश्य ही रहेगा और इसका कारण है बहुत बड़े वर्ग का हिंदी भाषा जानना.


बीबीसी हिंदी
हिंदी भाषा की महत्ता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व की शीर्षतम सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपने उत्पादों को हिंदी में बनाना भी शुरू किया है. एक कंपनी जो सारे विश्व में अंग्रेजी भाषा में अपने उत्पाद बेचती है, पर भारत में वह अपने सॉफ्टवेयर हिंदी में ला रही है.

इतना ही नहीं, मोबाइल कंपनियों ने अपने हैंडसेट्स में भारतीय भाषाओं को भी शामिल करना शुरू कर दिया है.

मीडिया सम्राट रूपर्ट मर्डोक जब भारत में अपना टीवी नेटवर्क शुरू करते हैं, तो वो भी हिंदी में. यह इस बात का इशारा है कि भारतीय जनमानस के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हिंदी भाषा की सहायता बहुत ही ज़रूरी है.

वेब पत्रकारिता

जिस समय विश्व में इंटरनेट का पदार्पण हुआ उस समय जो डॉट कॉम कंपनियां उभरीं, उन्होंने अपना काम अंग्रेज़ी भाषा में शुरू किया, जबकि वेबदुनिया ने उस समय हिंदी पोर्टल शुरू किया.

अपने शैशव काल से लेकर आज तक इंटरनेट ने जो सीढ़ियां चढ़ीं हैं वो अपने आप में प्रतिमान हैं लेकिन जितनी प्रसिद्धि हिंदी भाषा की वेबसाइटों को मिलती है, उतनी किसी और को नहीं मिलती.

भारत में कोई भी वस्तु तब तक नहीं प्रचलित होती है, जब तक कि उसमें भारतीयता का पुट न सम्मिलित हो इसलिए हिंदी भाषा वो पुट है, जिसके बिना ख्याति संभव नहीं.

हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपना बधाई संदेश हिंदी में प्रसारित करते हैं क्योंकि हिंदी भाषा अपनत्व का बोध कराती है.

बीबीसी हिंदी और वेबदुनिया की वेबसाइटों को देखने वाले सबसे ज़्यादा लोग विदेशी हैं यानी वे भारतीय जो बाहर के देशों में बसे हैं. लगभग 80 प्रतिशत पेज इंप्रेशन तो उन्हीं से बनता है.

ऐसे में यह कहना कतई ग़लत नहीं होगा कि हिंदी भविष्य की भाषा है.

यदि समसामयिक गतिविधियों पर नज़र दौड़ाएंगे तो यह संभावना और भी ज़्यादा प्रबल होगी कि भविष्य में हिंदी का ही बोलबाला रहेगा.


सोमवार, 03 अप्रैल, 2006 को सर्वश्रेष्ठ हिंदी समाचार वेबसाइट बीबीसी हिंदी डॉट कॉम एवं बेवदुनिया डॉट कॉम में प्रकाशित मेरा लेख

क़ायम रहेगा हिंदी का वर्चस्व


भविष्य में हिंदी का वर्चस्व कम से कम दक्षिण एशिया के क्षेत्रों में तो अवश्य ही रहेगा और इसका कारण है बहुत बड़े वर्ग का हिंदी भाषा जानना.


बीबीसी हिंदी
हिंदी भाषा की महत्ता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व की शीर्षतम सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपने उत्पादों को हिंदी में बनाना भी शुरू किया है. एक कंपनी जो सारे विश्व में अंग्रेजी भाषा में अपने उत्पाद बेचती है, पर भारत में वह अपने सॉफ्टवेयर हिंदी में ला रही है.

इतना ही नहीं, मोबाइल कंपनियों ने अपने हैंडसेट्स में भारतीय भाषाओं को भी शामिल करना शुरू कर दिया है.

मीडिया सम्राट रूपर्ट मर्डोक जब भारत में अपना टीवी नेटवर्क शुरू करते हैं, तो वो भी हिंदी में. यह इस बात का इशारा है कि भारतीय जनमानस के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हिंदी भाषा की सहायता बहुत ही ज़रूरी है.

वेब पत्रकारिता

जिस समय विश्व में इंटरनेट का पदार्पण हुआ उस समय जो डॉट कॉम कंपनियां उभरीं, उन्होंने अपना काम अंग्रेज़ी भाषा में शुरू किया, जबकि वेबदुनिया ने उस समय हिंदी पोर्टल शुरू किया.

अपने शैशव काल से लेकर आज तक इंटरनेट ने जो सीढ़ियां चढ़ीं हैं वो अपने आप में प्रतिमान हैं लेकिन जितनी प्रसिद्धि हिंदी भाषा की वेबसाइटों को मिलती है, उतनी किसी और को नहीं मिलती.

भारत में कोई भी वस्तु तब तक नहीं प्रचलित होती है, जब तक कि उसमें भारतीयता का पुट न सम्मिलित हो इसलिए हिंदी भाषा वो पुट है, जिसके बिना ख्याति संभव नहीं.

हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपना बधाई संदेश हिंदी में प्रसारित करते हैं क्योंकि हिंदी भाषा अपनत्व का बोध कराती है.

बीबीसी हिंदी और वेबदुनिया की वेबसाइटों को देखने वाले सबसे ज़्यादा लोग विदेशी हैं यानी वे भारतीय जो बाहर के देशों में बसे हैं. लगभग 80 प्रतिशत पेज इंप्रेशन तो उन्हीं से बनता है.

ऐसे में यह कहना कतई ग़लत नहीं होगा कि हिंदी भविष्य की भाषा है.

यदि समसामयिक गतिविधियों पर नज़र दौड़ाएंगे तो यह संभावना और भी ज़्यादा प्रबल होगी कि भविष्य में हिंदी का ही बोलबाला रहेगा.


सोमवार, 03 अप्रैल, 2006 को सर्वश्रेष्ठ हिंदी समाचार वेबसाइट बीबीसी हिंदी डॉट कॉम एवं बेवदुनिया डॉट कॉम में प्रकाशित मेरा लेख

Sunday, February 20, 2011

हाल-ए-वतन


लगता है कुशासन, भ्रष्टाचार, चोरी, कामचोरी और लूट जैसी नियति हमारे देश यानी भारत की किस्मत में उकेर कर लिखे गए हैं। कभी सोने की चिडिया था, इसलिए लोगों ने इसे लूटा। फिर बारी आई अपने ही घर के वाशिंदो की। उन्होंने भी लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं। लेकिन क्या कभी इस बात का भी घमंड कर पाएंगे कि हमारे देश में गरीबी, बेरोजगारी, अराजकता, भ्रष्टाचार और लूट न हो। शायद नहीं। हो सकता है कि आप इसे नकारात्मक मानें, लेकिन अफसोस कि और कुछ दिख भी तो नहीं रहा है।

आजादी के पहले की बात को अगर भूल भी जाएं, तो भला आजादी के बाद ऐसे कौन से महानतम काम किए गए हैं, जिन पर सीना चौड़ा किया जा सके। लोगों की गाढ़ी कमाई में से लिए जाने वाले कर की राशि को नेता और अफसर अपनी अय्याशी में उड़ा लेते हैं। करों की फेहरिस्त ऐसी कि देखने वाला चकरा ही जाए। लेकिन इन करों से प्राप्त राशि का इस्तेमाल कितनी जगह होता है। सरकार टीवी पर विज्ञापन देती है कि जनता से लिया जाने वाल कर विकास में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि साठ साल से ज्यादा हो गए हैं, आखिर विकास नाम की चिडिया किस बागीचे में दाना चुग रही है।

शुरुआत देश की राजधानी से ही करें तो सारी पोल खुलती हुई दिखाई देगी। यहां पर कानून व्यवस्था का हाल यह है कि बहू-बेटियों को राह चलते ही अगवा कर लिया जाता है और पुलिस जांच की ऐसी राह पकड़ती है, जिसका कोई अंत ही नहीं होता है। सड़क पर चलने वाला या फिर वाहन चलाने वाला नहीं जानता है कि कब उसके नीचे की सड़क धंस जाएगी और वह जमींदोज़ हो जाएगा। एनसीआर कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश से लगा हिस्सा तो अपनी अलग ही कहानी बयान करता है। यहां पर न तो कानून है और न ही प्रशासन। हाल ही में बहन मायावती ने गाजियाबाद और नौएडा का दौरा किया। लेकिन मजे की बात तो यह कि जनता से मिलने के नाम पर शहर-दर-शहर उड़नखटोला लिए जा रही बहिन से कोई मिला ही नहीं है। मिले भी कैसे, बहिनजी जिस भी शहर पहुंचती हैं, उनके पुलिस वाले वहां पर अघोषित कर्फ्यू लगा देते हैं और किसी को भी मैडम से मिलने नहीं दिया जाता है।

मैडम जी को दिखाने के लिए सड़कों के किनारे गमले सजा दिए जाते हैं। शहर में लाइट कटना बंद हो जाती है, लेकिन जैसे ही उनका उड़नखटोला यहां से निकला वहीं हालात दोबारा आ गए। क्या हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि जनता को मूर्ख मानते हैं। या उनका शायद ऐसा मानना है कि अगर उनके बंगले में पीने का साफ पानी आ रहा है, तो आम लोगों को भी ऐसा ही मिल रहा होगा। या अगर उनकी कोठी बिजली से रोशन है तो गरीब की झोपड़ी में भी बिजली होगी।

लेकिन ऐसा नहीं है। वो जानते हैं कि आम जनता चारों ओर से बेहाल है। तभी तो चुनावी बादल छाते ही मेंढक की तरह विकास, बिजली और पानी दिलवाने का राग टर्राने लगते हैं।

खैर, असल बात पर लौटते हैं। खेलों के नाम पर आम आदमी के पैसों का खेल किया जाता है और कोई राजा बनता है तो कोई बेबस। यहां बेबस से आशय हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री का है। अर्थशास्त्र के प्रकांड ज्ञानी हैं, पर न जाने क्यों जनता के अर्थशास्त्र के अलावा सारे शास्त्र समझते हैं। अमीरों के फायदे के लिए तो इनके पास योजनाओं का भंडार है, लेकिन आम जनता के लिए वो बैठकें करते हैं और सोचते हैं। हालांकि इस सोच के परिमाण अभी तक दिखाई नहीं दे पाए हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर स्कूल के बच्चों की तरह स्वयं को निर्दोष बताते हैं। जनता ने इन्हे सबसे शक्तिशाली पद पर इसलिए तो नहीं बैठाया था कि जब जनहित की बात आए तो ये गठबंधन का रोना रोएं या कहें कि उन्हें कुछ पता ही नहीं है।

सोचिए कि अगर देश का प्रधानमंत्री ही कहे कि वो मजबूर है तो फिर किसके सामने गुहार लगाई जाए।

हाल-ए-वतन


लगता है कुशासन, भ्रष्टाचार, चोरी, कामचोरी और लूट जैसी नियति हमारे देश यानी भारत की किस्मत में उकेर कर लिखे गए हैं। कभी सोने की चिडिया था, इसलिए लोगों ने इसे लूटा। फिर बारी आई अपने ही घर के वाशिंदो की। उन्होंने भी लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं। लेकिन क्या कभी इस बात का भी घमंड कर पाएंगे कि हमारे देश में गरीबी, बेरोजगारी, अराजकता, भ्रष्टाचार और लूट न हो। शायद नहीं। हो सकता है कि आप इसे नकारात्मक मानें, लेकिन अफसोस कि और कुछ दिख भी तो नहीं रहा है।

आजादी के पहले की बात को अगर भूल भी जाएं, तो भला आजादी के बाद ऐसे कौन से महानतम काम किए गए हैं, जिन पर सीना चौड़ा किया जा सके। लोगों की गाढ़ी कमाई में से लिए जाने वाले कर की राशि को नेता और अफसर अपनी अय्याशी में उड़ा लेते हैं। करों की फेहरिस्त ऐसी कि देखने वाला चकरा ही जाए। लेकिन इन करों से प्राप्त राशि का इस्तेमाल कितनी जगह होता है। सरकार टीवी पर विज्ञापन देती है कि जनता से लिया जाने वाल कर विकास में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि साठ साल से ज्यादा हो गए हैं, आखिर विकास नाम की चिडिया किस बागीचे में दाना चुग रही है।

शुरुआत देश की राजधानी से ही करें तो सारी पोल खुलती हुई दिखाई देगी। यहां पर कानून व्यवस्था का हाल यह है कि बहू-बेटियों को राह चलते ही अगवा कर लिया जाता है और पुलिस जांच की ऐसी राह पकड़ती है, जिसका कोई अंत ही नहीं होता है। सड़क पर चलने वाला या फिर वाहन चलाने वाला नहीं जानता है कि कब उसके नीचे की सड़क धंस जाएगी और वह जमींदोज़ हो जाएगा। एनसीआर कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश से लगा हिस्सा तो अपनी अलग ही कहानी बयान करता है। यहां पर न तो कानून है और न ही प्रशासन। हाल ही में बहन मायावती ने गाजियाबाद और नौएडा का दौरा किया। लेकिन मजे की बात तो यह कि जनता से मिलने के नाम पर शहर-दर-शहर उड़नखटोला लिए जा रही बहिन से कोई मिला ही नहीं है। मिले भी कैसे, बहिनजी जिस भी शहर पहुंचती हैं, उनके पुलिस वाले वहां पर अघोषित कर्फ्यू लगा देते हैं और किसी को भी मैडम से मिलने नहीं दिया जाता है।

मैडम जी को दिखाने के लिए सड़कों के किनारे गमले सजा दिए जाते हैं। शहर में लाइट कटना बंद हो जाती है, लेकिन जैसे ही उनका उड़नखटोला यहां से निकला वहीं हालात दोबारा आ गए। क्या हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि जनता को मूर्ख मानते हैं। या उनका शायद ऐसा मानना है कि अगर उनके बंगले में पीने का साफ पानी आ रहा है, तो आम लोगों को भी ऐसा ही मिल रहा होगा। या अगर उनकी कोठी बिजली से रोशन है तो गरीब की झोपड़ी में भी बिजली होगी।

लेकिन ऐसा नहीं है। वो जानते हैं कि आम जनता चारों ओर से बेहाल है। तभी तो चुनावी बादल छाते ही मेंढक की तरह विकास, बिजली और पानी दिलवाने का राग टर्राने लगते हैं।

खैर, असल बात पर लौटते हैं। खेलों के नाम पर आम आदमी के पैसों का खेल किया जाता है और कोई राजा बनता है तो कोई बेबस। यहां बेबस से आशय हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री का है। अर्थशास्त्र के प्रकांड ज्ञानी हैं, पर न जाने क्यों जनता के अर्थशास्त्र के अलावा सारे शास्त्र समझते हैं। अमीरों के फायदे के लिए तो इनके पास योजनाओं का भंडार है, लेकिन आम जनता के लिए वो बैठकें करते हैं और सोचते हैं। हालांकि इस सोच के परिमाण अभी तक दिखाई नहीं दे पाए हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर स्कूल के बच्चों की तरह स्वयं को निर्दोष बताते हैं। जनता ने इन्हे सबसे शक्तिशाली पद पर इसलिए तो नहीं बैठाया था कि जब जनहित की बात आए तो ये गठबंधन का रोना रोएं या कहें कि उन्हें कुछ पता ही नहीं है।

सोचिए कि अगर देश का प्रधानमंत्री ही कहे कि वो मजबूर है तो फिर किसके सामने गुहार लगाई जाए।

Saturday, February 5, 2011

माँ-बाप होते हैं सच्चे दोस्त

लेखकः  नीहारिका झा पांडेय
नन्हे पैर लड़खड़ाते हुए कब खुद सँभलना सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता। माँ-बाप के लिए यह एक सुखद अहसास होता है। अपने बच्चों को यूँ ‍आत्मनिर्भर होते देखना, लेकिन समय के साथ-साथ उनकी मानसिक जरूरतें भी तेजी से बढ़ने लगती हैं। उनके मन में कई तरह के सवाल पैदा होते, जिनको जानना उनके लिए जरूरी होता है। ऐसे में माँ-बाप ही अपने बच्चों के सच्चे दोस्त और मार्गदर्शक बनकर उन्हें अच्छे-बुरे की पहचान करा सकते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि बेटा माँ का लाडला होता है और बेटियाँ पिता की लाडली। लेकिन सच तो ये है कि बढ़ती बेटियाँ अपने माँ की सबसे अच्छी सहेली होती है और एक पिता अपने बेटे के बेस्ट फ्रेंड। बेटियाँ जब बड़ी होने लगती हैं तो अपने पिता से उनकी झिझक बढ़ने लगती है और वहाँ एक लिहाज और दूरी का भाव आने लगता है। वहीं बेटा बड़ा होने लगे तो अपनी माँ से कटने लगता है और ज्यादातर वक्त अपने दोस्तों के साथ बिताना पसंद करता है। कभी-कभी यह लड़कों में भटकाव और तनाव की स्थिति पैदा कर देती है। ऐसे में एक समझदार पिता एक दोस्त की तरह उसकी सारी जिज्ञासाओं को जानने की कोशिश करता है, जिसे उसे अपनी माँ से बताने में झिझक महसूस होती है। बेटियाँ अपने मन में उठते अजीबोगरीब सवालों को सुलझाने के लिए सीधे अपनी माँ के पास ही जाती हैं। ये सवाल उनके लिए अजीबोगरीब होते हैं, लेकिन एक माँ अपनी बेटी के उन सवालों को उतनी ही गंभीरता और प्यार से हल करती है, क्योंकि वो भी कभी उस दौर गुजरी होती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये विचार, ये सवाल हमेशा उठते रहे हैं, लेकिन उनका हल हर पीढ़ी ने उतनी आसानी से नहीं निकाला है, लेकिन हर दौर के साथ माँ-बाप का रवैया अपने बच्चों के प्रति बदलता रहा है। अब वैसे माँ-बाप कम ही मिलते हैं, जो दिन भर अनुशासन का हंटर लिए उनके सिर पर सवार रहते हों। वो अब एक दोस्त और सच्चे हमराज की तरह उनका सुख-दु:ख और उनकी समस्याएँ बाँटने लगे हैं।

जब किसी घर में एक वयस्क होती बेटी और माँ को हँसी-ठिठोली करते हुए देखते हैं तो ऐसा महसूस होता है कि जब ऐसा दोस्त घर पर आपके साथ है, तो फिर बाहर दोस्तों की तलाश करने की क्या आवश्यकता है? बेटी जिस जागरूकता के साथ अपने सौंदर्य की देखभाल करती है, उसी प्यार और दुलार से अपनी माँ पर भी कोई-न-कोई नुस्खा आजमाती रहती है। नए-नए व्यंजन बनाकर उन्हें खुश करने की कोशिश या फिर पर्व-त्योहार के मौके पर दौड़-दौड़कर उनके काम को आसान करने का प्रयास करना, ऐसी भावना और ऐसा दोस्ताना रिश्ता माँ-बेटी से इतर और कहाँ देखने को मिल सकता है। माँ भी अपने दिल के सारे दर्द खुलकर अपनी बेटी के साथ बाँटती है। इससे न केवल उनका मन हल्का होता, बल्कि उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनके इतने करीब है, जिससे वो अपने मन की सारी बातें खुलकर बता सकती हैं।

बेटा जब कॉलेज जाने की उम्र में पहुँचता है तो पिता उसकी भावनाएँ बेहतर समझ पाते हैं। बहुत से पिता अपने बेटे को बतौर सरप्राइज गाड़ी गिफ्ट करते हैं। कॉलेज का पहला दिन और अपना मनचाहा गिफ्ट पाकर अपने पिता के प्रति उसका प्यार और विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है। वह जब चहकते हूए घर लौटता है तो सबसे पहले अपने पिता को ही कॉलेज के पहले दिन के अनुभव के बारे में बताता है, क्योंकि उसे आभास हो जाता है कि उसके पिता से बेहतर उसे कोई और नहीं समझ सकता।

पिता का बेटे के साथ और माँ का अपनी बेटी के साथ यह दोस्ताना रवैया जहाँ एक ओर सुखद अहसास का अनुभव कराता है, वहीं यह परिवार का दृढ़ आधार-स्तंभ भी है।

**वेबदुनिया पोर्टल में प्रकाशित नीहारिका झा पांडेय का लेख, वहीं से साभार

माँ-बाप होते हैं सच्चे दोस्त

लेखकः  नीहारिका झा पांडेय
नन्हे पैर लड़खड़ाते हुए कब खुद सँभलना सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता। माँ-बाप के लिए यह एक सुखद अहसास होता है। अपने बच्चों को यूँ ‍आत्मनिर्भर होते देखना, लेकिन समय के साथ-साथ उनकी मानसिक जरूरतें भी तेजी से बढ़ने लगती हैं। उनके मन में कई तरह के सवाल पैदा होते, जिनको जानना उनके लिए जरूरी होता है। ऐसे में माँ-बाप ही अपने बच्चों के सच्चे दोस्त और मार्गदर्शक बनकर उन्हें अच्छे-बुरे की पहचान करा सकते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि बेटा माँ का लाडला होता है और बेटियाँ पिता की लाडली। लेकिन सच तो ये है कि बढ़ती बेटियाँ अपने माँ की सबसे अच्छी सहेली होती है और एक पिता अपने बेटे के बेस्ट फ्रेंड। बेटियाँ जब बड़ी होने लगती हैं तो अपने पिता से उनकी झिझक बढ़ने लगती है और वहाँ एक लिहाज और दूरी का भाव आने लगता है। वहीं बेटा बड़ा होने लगे तो अपनी माँ से कटने लगता है और ज्यादातर वक्त अपने दोस्तों के साथ बिताना पसंद करता है। कभी-कभी यह लड़कों में भटकाव और तनाव की स्थिति पैदा कर देती है। ऐसे में एक समझदार पिता एक दोस्त की तरह उसकी सारी जिज्ञासाओं को जानने की कोशिश करता है, जिसे उसे अपनी माँ से बताने में झिझक महसूस होती है। बेटियाँ अपने मन में उठते अजीबोगरीब सवालों को सुलझाने के लिए सीधे अपनी माँ के पास ही जाती हैं। ये सवाल उनके लिए अजीबोगरीब होते हैं, लेकिन एक माँ अपनी बेटी के उन सवालों को उतनी ही गंभीरता और प्यार से हल करती है, क्योंकि वो भी कभी उस दौर गुजरी होती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये विचार, ये सवाल हमेशा उठते रहे हैं, लेकिन उनका हल हर पीढ़ी ने उतनी आसानी से नहीं निकाला है, लेकिन हर दौर के साथ माँ-बाप का रवैया अपने बच्चों के प्रति बदलता रहा है। अब वैसे माँ-बाप कम ही मिलते हैं, जो दिन भर अनुशासन का हंटर लिए उनके सिर पर सवार रहते हों। वो अब एक दोस्त और सच्चे हमराज की तरह उनका सुख-दु:ख और उनकी समस्याएँ बाँटने लगे हैं।

जब किसी घर में एक वयस्क होती बेटी और माँ को हँसी-ठिठोली करते हुए देखते हैं तो ऐसा महसूस होता है कि जब ऐसा दोस्त घर पर आपके साथ है, तो फिर बाहर दोस्तों की तलाश करने की क्या आवश्यकता है? बेटी जिस जागरूकता के साथ अपने सौंदर्य की देखभाल करती है, उसी प्यार और दुलार से अपनी माँ पर भी कोई-न-कोई नुस्खा आजमाती रहती है। नए-नए व्यंजन बनाकर उन्हें खुश करने की कोशिश या फिर पर्व-त्योहार के मौके पर दौड़-दौड़कर उनके काम को आसान करने का प्रयास करना, ऐसी भावना और ऐसा दोस्ताना रिश्ता माँ-बेटी से इतर और कहाँ देखने को मिल सकता है। माँ भी अपने दिल के सारे दर्द खुलकर अपनी बेटी के साथ बाँटती है। इससे न केवल उनका मन हल्का होता, बल्कि उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनके इतने करीब है, जिससे वो अपने मन की सारी बातें खुलकर बता सकती हैं।

बेटा जब कॉलेज जाने की उम्र में पहुँचता है तो पिता उसकी भावनाएँ बेहतर समझ पाते हैं। बहुत से पिता अपने बेटे को बतौर सरप्राइज गाड़ी गिफ्ट करते हैं। कॉलेज का पहला दिन और अपना मनचाहा गिफ्ट पाकर अपने पिता के प्रति उसका प्यार और विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है। वह जब चहकते हूए घर लौटता है तो सबसे पहले अपने पिता को ही कॉलेज के पहले दिन के अनुभव के बारे में बताता है, क्योंकि उसे आभास हो जाता है कि उसके पिता से बेहतर उसे कोई और नहीं समझ सकता।

पिता का बेटे के साथ और माँ का अपनी बेटी के साथ यह दोस्ताना रवैया जहाँ एक ओर सुखद अहसास का अनुभव कराता है, वहीं यह परिवार का दृढ़ आधार-स्तंभ भी है।

**वेबदुनिया पोर्टल में प्रकाशित नीहारिका झा पांडेय का लेख, वहीं से साभार

शेष यादें...

लेखकः  नीहारिका झा पांडेय

बचपन के वो बेफिक्र दिन, जहाँ न खाने की चिंता और न ही कमाने की। अपनी ही दुनिया होती है, जिसमें बड़ों के लिए रत्‍तीभर जगह नहीं होती। वैसी बेफिक्री चाहकर भी हम दुबारा हासिल नहीं कर सकते। आज जब उन दिनों को याद करती हूँ तो मन एक अनजाने बोझ से दबने लगता है। स्‍कूल छोड़े तो एक अरसा हो गया, लेकिन आज भी वो यादें जेहन में ताजा हैं, क्‍योंकि जिस बेफिक्री की मैं बात कर रही हूँ, वो मेरे हिस्‍से कभी नहीं आई।

आज भी वो शोर मेरे कानों में गूँजते हैं। मैं पढ़ाई में विशेष तो नहीं थी, लेकिन हाँ अपनी मेहनत से खुद को पिछड़ने भी नहीं देती थी। शिक्षक की लाडली होने के लिए यही पर्याप्‍त नहीं था। कक्षा में प्रथम आना ही उसकी पहली कसोटी थी। जो कमजोर थे, उन्‍हें गिनता ही कौन था। वो तो संख्‍या बढ़ाने वाले धरती के बोझ थे, उनकी क्‍या बिसात। परीक्षाएँ होती रहीं, और मैं कक्षा-दर-कक्षा पास होती रही, लेकिन इस दौरान मैं कभी खास नहीं बन पाई। आखिरकार स्‍कूल में हमारी विदाई का दिन भी आ गया, प्रथम आने वाली वो 'खास' शिष्‍याएँ, उन्‍हें खासतौर से भविष्‍य निर्माण की घुटि्टयाँ पिलाई जा रही थीं।

कॉलेज आते-आते सबने अपनी-अपनी राह चुन ली। कोई डॉक्‍टरी करने के सपने सँजोने लगी, तो किसी ने मास्‍टरी को ही अपना लक्ष्‍य मान लिया। मैं स्‍नातक करने मुंबई चली गई, कॉलेज में स्‍कॉरशिप मिली और ऑस्‍ट्रेलिया के एक विश्‍वविद्यालय में पढ़ने का मौका मिला।

अब पूरे परिवार के साथ कनाडा में हूँ, यहीं कॉलेज में मुझे लेक्‍चररशिप मिल गई। मेरी इच्‍छा हुई कि उन खास लोगों के बारे में कुछ जानकारी मिले, क्‍योंकि जीवन में उन्‍हें खास ही मिला होगा। लेकिन यह जानकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ कि एक की शादी हो गई और उसने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी और एक उसी शहर में स्‍कूल टीचर हो गई है। यह जानकर थोड़ा सुकून भी हुआ, लेकिन स्‍कूल के दिनों की वो टीस आज भी ताजा हो उठती है।

एक टीस...."मैं पढ़ाई में विशेष तो नहीं थी, लेकिन हाँ अपनी मेहनत से खुद को पिछड़ने भी नहीं देती थी। शिक्षक की लाडली होने के लिए यही पर्याप्‍त नहीं था। कक्षा में प्रथम आना ही उसकी पहली कसोटी थी। जो कमजोर थे, उन्‍हें गिनता ही कौन था।"

शेष यादें...

लेखकः  नीहारिका झा पांडेय

बचपन के वो बेफिक्र दिन, जहाँ न खाने की चिंता और न ही कमाने की। अपनी ही दुनिया होती है, जिसमें बड़ों के लिए रत्‍तीभर जगह नहीं होती। वैसी बेफिक्री चाहकर भी हम दुबारा हासिल नहीं कर सकते। आज जब उन दिनों को याद करती हूँ तो मन एक अनजाने बोझ से दबने लगता है। स्‍कूल छोड़े तो एक अरसा हो गया, लेकिन आज भी वो यादें जेहन में ताजा हैं, क्‍योंकि जिस बेफिक्री की मैं बात कर रही हूँ, वो मेरे हिस्‍से कभी नहीं आई।

आज भी वो शोर मेरे कानों में गूँजते हैं। मैं पढ़ाई में विशेष तो नहीं थी, लेकिन हाँ अपनी मेहनत से खुद को पिछड़ने भी नहीं देती थी। शिक्षक की लाडली होने के लिए यही पर्याप्‍त नहीं था। कक्षा में प्रथम आना ही उसकी पहली कसोटी थी। जो कमजोर थे, उन्‍हें गिनता ही कौन था। वो तो संख्‍या बढ़ाने वाले धरती के बोझ थे, उनकी क्‍या बिसात। परीक्षाएँ होती रहीं, और मैं कक्षा-दर-कक्षा पास होती रही, लेकिन इस दौरान मैं कभी खास नहीं बन पाई। आखिरकार स्‍कूल में हमारी विदाई का दिन भी आ गया, प्रथम आने वाली वो 'खास' शिष्‍याएँ, उन्‍हें खासतौर से भविष्‍य निर्माण की घुटि्टयाँ पिलाई जा रही थीं।

कॉलेज आते-आते सबने अपनी-अपनी राह चुन ली। कोई डॉक्‍टरी करने के सपने सँजोने लगी, तो किसी ने मास्‍टरी को ही अपना लक्ष्‍य मान लिया। मैं स्‍नातक करने मुंबई चली गई, कॉलेज में स्‍कॉरशिप मिली और ऑस्‍ट्रेलिया के एक विश्‍वविद्यालय में पढ़ने का मौका मिला।

अब पूरे परिवार के साथ कनाडा में हूँ, यहीं कॉलेज में मुझे लेक्‍चररशिप मिल गई। मेरी इच्‍छा हुई कि उन खास लोगों के बारे में कुछ जानकारी मिले, क्‍योंकि जीवन में उन्‍हें खास ही मिला होगा। लेकिन यह जानकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ कि एक की शादी हो गई और उसने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी और एक उसी शहर में स्‍कूल टीचर हो गई है। यह जानकर थोड़ा सुकून भी हुआ, लेकिन स्‍कूल के दिनों की वो टीस आज भी ताजा हो उठती है।

एक टीस...."मैं पढ़ाई में विशेष तो नहीं थी, लेकिन हाँ अपनी मेहनत से खुद को पिछड़ने भी नहीं देती थी। शिक्षक की लाडली होने के लिए यही पर्याप्‍त नहीं था। कक्षा में प्रथम आना ही उसकी पहली कसोटी थी। जो कमजोर थे, उन्‍हें गिनता ही कौन था।"

Friday, February 4, 2011

मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे


लेख्नकः नीहारिका झा पांडेय


मीडिया का भविष्य और युवाऒं की भूमिका
मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे। समय की मांग युवा शक्ति है। जिस क्षेत्र में युवा काम करते हैं उसकी तरक्की देखकर आप मेरे तर्क को जान सकते हैं। इंजीनियरिंग आईटी और मैजेजमेंट तीनों की क्षेत्रों में युवा शक्ति ही काम कर रही है। उनसे काम लेने का सबसे बड़ा फायदा है ऊर्जा। कहने का मतलब यह कि युवा तेजी से काम करते हैं। इसका मतलब यह भी नहीं है कि उम्रदराज लोगों की क्षमताऒं को नकारा जा रहा है। उनका उपयोग अनुभवी के रूप में लिया जा सकता है। मसलन आप मीडिया में नजर डालें तो टीवी मीडिया तो युवा शक्ति पर ही टिका है। अधिकांश रिपोर्टर युवा हैं और ३०-३५ की उम्र के हैं। मीडिया जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है उसके पीछे युवाऒं का हाथ ही है। चाहे वो संपादकीय विभाग के हों या फिर प्रबंधन से जुड़े हुए हों।

करियर 
मैंने मीडिया को सिर्फ एक पेशा मानती हूं। समय की मांग भी यही है कि बजाय किसी मिशन की बात करने के अगर हम अपने काम को ईमानदारी से अंजाम दें तो ज्यादा अच्छा होगा। मीडिया में काम करने का मेरा उद्देश्य अच्छा करियर बनाना है। इस पेशे से मैं अपनी जीविकोपार्जन करती हूं। साथ ही अपने काम को पूरी ईमानदारी से पूरा करना मेरी पहली प्राथमिकता हमेशा से रही है। चाहे कोई भी संस्थान हो। करियर को ध्यान में रखते हुए ही मैंने एक महीने पहले अपनी जॉब चेंज की है। यहां मेरे पास ज्यादा जिम्मेदारियां हैं।

मीडिया में अंतर
जब मैंने मीडिया को एक पेशे के रुप में चुना था उस वक्त कहा जाता था कि इस फील्ड में पैसे नहीं मिलते हैं। परिवार के लिए वक्त नहीं मिलता है। हालांकि शुरु के डेढ़ साल तो मैंने भी ऐसे ही काटे थे जब तनख्वाह आज के मुकाबले आधे से भी काफी कम थी। पर आज परिदृश्य काफी बदल गया है। अब इस क्षेत्र में पैसे बढ़ गए हैं। तकनीक में भी बदलाव आए हैं।

ब्लॉगिंग का भविष्य
ब्लागिंग अपनी भावनाऒं को जताने और मुद्दों पर चर्चा करने का सबसे अच्छा जरिया साबित हो रहा है। इसका भविष्य किसी पोर्टल और अखबार से ज्यादा उज्जवल है। यहां से लोग कम से कम बिना किसी डर के अपनी बात रख सकते हैं। मीडिय कहने को तो अभिव्यक्ति जताने का माध्यम है पर यहां मालिक की मर्जी और कंपनी की पॉलिसी के इतर काम करना यानि नौकरी से हाथ धोना। ऐसे में ब्लॉग वह जरिया है जिससे अपनी मन की बात और उन मुद्दों पर भी चर्चा और बहस की जा सकती है जो प्रोफेशनली नहीं की जा सकती है।

जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही हर चीज के दो पक्ष होते हैं एक तो पॉजिटिव और दूसरा नेगेटिव। ऐसा ही ब्लॉगिंग के साथ भी है। लोग इसका सदुपयोग करने के साथ ही दुरुपयोग भी करते हैं। मसलन दूसरों पर कीचड़ उछालना और अभद्र शब्दों का प्रयोग करना। अभिव्क्ति के इस माध्यम को ऐसी गंदगी से बचाना चाहिए। इस बातचीत के अंत में मैं एक बात कहना चाहूंगी कि कुछ लोग ब्लॉगिंग को अपनी ख्याति बढ़ाने के लिए उपयोग कर रहे हैं। हालांकि यह उनकी अपनी रुचि है कि वो अपने ब्लॉग पर क्या लिखें पर कम से कम इससे मानवता के मुद्दो को रोमांटीसाइज न किया जाए तो भी अच्छी तरह से ब्लॉगिंग की जा सकती है। मसलन आजकल स्त्री मुद्दों पर बड़ी शिद्दत के साथ लिखा जाता है कमेंट भी काबिले तारीफ आते हैं। पर कितने लोग ऐसे हैं जो वाकई वैसे ही हैं जैसा वो अपने आपको प्रोजेक्ट करते हैं।