Saturday, January 25, 2014

किस करवट बैठेगा 'आप' का ऊंट

आम आदमी पार्टी यानी 'आप' ने बहुत ही कम वक्त में वो शोहरत और कामयाबी हासिल की है, जो अब तक देश में किसी भी दूसरी पार्टी को नहीं मिली है। अपने गठन के महज एक वर्ष के अंदर उन्होंने दिल्ली के राज्य विधान सभा चुनावों में अप्रत्याशित जीत हासिल की, समर्थन से ही सही दिल्ली में सरकार भी बनाई। इसके बाद शुरू हुआ विवादों का सिलसिला, जो अब तक जारी है।
दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की वजह से पार्टी को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। दिल्ली सरकार ने दो पुलिसवालों के तबादले तथा निलंबन को लेकर सड़क पर आंदोलन किया। केंद्र सरकार के साथ सीधे आमना सामना भी हुआ, लेकिन अंततोगत्वा जीत केंद्र सरकार ही हुई।
केंद्रीय गृह मंत्रालय पुलिसवालों को छुट्टी पर भेज दिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपना धरना वापस ले लिया। दिल्ली के मुख्यमंत्री के इस कदम से यह तो स्पष्ट हो गया कि उनके पास प्रशासनिक अनुभव और दृष्ट‍ि की कमी है। दिल्ली में बिजली के दाम करने का उनका फैसला भी सराहा नहीं जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। शुक्रवार को एक टीवी चैनल से बातचीत में पार्टी के शीर्ष नेता योगेंद्र यादव ने भी यह तो मान ही लिया कि उनकी पार्टी की सरकार के कुछ फैसले अनुभवहीनता की वजह से हुए हैं। यहां तक कि उनके मंत्रियों के बड़बोलेपन का खामियाजा भी पार्टी को ही उठाना पड़ रहा है। दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर जो आरोप लगे हैं, पार्टी उनपर ध्यान नहीं दे रही है। उलटा मीडिया के बिकाऊ होने की बात कही जा रही है।
पार्टी जिस तेजी से आगे बढ़ी है, संभव है उसी तेजी से उसकी ख्याति में सेंध भी लगे। दरअसल खुद को पाक साफ बताने वाली आम आदमी पार्टी की सदस्यता हासिल करना कठिन नहीं है। इसलिए इससे कोई भी शख्स जुड़ सकता है। पार्टी ने बताया कि उसके सदस्यों की संख्या का आंकड़ा 50 लाख तक पहुंच चुका है। इस आंकड़े के साथ ही विवादों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। कुछ दिनों पहले ही खबर आई थी, कि किसी ने दाऊद इब्राहिम के नाम से भी पार्टी की सदस्यता हासिल कर ली थी।
कहने का मतलब यह है कि पार्टी का सदस्य बनना काफी आसान है और कोई भी बन सकता है। लेकिन डर सिर्फ इस बात का है कि अपराधियों से लेकर हर वो आदमी पार्टी का सदस्य बन सकता जो विवादास्पद है। 'आप' की विरोधी पार्टियां भी अपने लोगों को पार्टी में शामिल करा सकती हैं ताकि पार्टी के अंदर अराजकता फैला सके। नई पार्टी के लिए ये सब चीजें एक गंभीर समस्या पैदा कर सकती हैं।
पार्टी के पास नए सदस्यों के बारे में जानकारी जुटाने का कोई तंत्र या व्यवस्था नहीं है। आम आदमी पार्टी के गठन के वक्त अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी पार्टी में केवल उन्हीं लोगों को शामिल किया जाएगा, जो पाक-साफ होंगे। यह कहा जा सकता है कि 'आप' एक फैशन भी बन गया है। लोगों को आम आदमी पार्टी ज्वॉइन करने और मैं हूं आम आदमी लिखी हुई टोपी पहनने में मजा आने लगा है। स्पष्ट नीतियों के अभाव में 'आप' के नाम पर अराजकता भी फैल रही है। कुछ दिनों पहले ही बिहार में कुछ लोगों ने आप के नाम पर हुड़दंग मचाया था। बाद में पता चला था कि आम आदमी पार्टी से उनको कोई लेनदेन नही था।
केवल स्वयंसेवकों के बूते पर आखिर यह पार्टी कब तक चलेगी। अगर भारत के राजनीतिक पटल पर इन्हें अपनी छाप छोड़नी है और वाकई बदलाव लाना है तो कई गंभीर और दूरगामी फैसले लेने होंगे। आम आदमी पार्टी से इन्हें ऐसे लोगों को भी जोड़ना होगा जो राजनीति को कीचड़ मानते हैं और इससे दूर ही रहना चाहते हैं। पेशेवरों को अपने साथ जोड़ना होगा तथा गुटबाजी फैलाने वालों एवं खुद को मठाधीश समझने वालों से पार पाना होगा।

किस करवट बैठेगा 'आप' का ऊंट

आम आदमी पार्टी यानी 'आप' ने बहुत ही कम वक्त में वो शोहरत और कामयाबी हासिल की है, जो अब तक देश में किसी भी दूसरी पार्टी को नहीं मिली है। अपने गठन के महज एक वर्ष के अंदर उन्होंने दिल्ली के राज्य विधान सभा चुनावों में अप्रत्याशित जीत हासिल की, समर्थन से ही सही दिल्ली में सरकार भी बनाई। इसके बाद शुरू हुआ विवादों का सिलसिला, जो अब तक जारी है।
दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की वजह से पार्टी को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। दिल्ली सरकार ने दो पुलिसवालों के तबादले तथा निलंबन को लेकर सड़क पर आंदोलन किया। केंद्र सरकार के साथ सीधे आमना सामना भी हुआ, लेकिन अंततोगत्वा जीत केंद्र सरकार ही हुई।
केंद्रीय गृह मंत्रालय पुलिसवालों को छुट्टी पर भेज दिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपना धरना वापस ले लिया। दिल्ली के मुख्यमंत्री के इस कदम से यह तो स्पष्ट हो गया कि उनके पास प्रशासनिक अनुभव और दृष्ट‍ि की कमी है। दिल्ली में बिजली के दाम करने का उनका फैसला भी सराहा नहीं जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। शुक्रवार को एक टीवी चैनल से बातचीत में पार्टी के शीर्ष नेता योगेंद्र यादव ने भी यह तो मान ही लिया कि उनकी पार्टी की सरकार के कुछ फैसले अनुभवहीनता की वजह से हुए हैं। यहां तक कि उनके मंत्रियों के बड़बोलेपन का खामियाजा भी पार्टी को ही उठाना पड़ रहा है। दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर जो आरोप लगे हैं, पार्टी उनपर ध्यान नहीं दे रही है। उलटा मीडिया के बिकाऊ होने की बात कही जा रही है।
पार्टी जिस तेजी से आगे बढ़ी है, संभव है उसी तेजी से उसकी ख्याति में सेंध भी लगे। दरअसल खुद को पाक साफ बताने वाली आम आदमी पार्टी की सदस्यता हासिल करना कठिन नहीं है। इसलिए इससे कोई भी शख्स जुड़ सकता है। पार्टी ने बताया कि उसके सदस्यों की संख्या का आंकड़ा 50 लाख तक पहुंच चुका है। इस आंकड़े के साथ ही विवादों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। कुछ दिनों पहले ही खबर आई थी, कि किसी ने दाऊद इब्राहिम के नाम से भी पार्टी की सदस्यता हासिल कर ली थी।
कहने का मतलब यह है कि पार्टी का सदस्य बनना काफी आसान है और कोई भी बन सकता है। लेकिन डर सिर्फ इस बात का है कि अपराधियों से लेकर हर वो आदमी पार्टी का सदस्य बन सकता जो विवादास्पद है। 'आप' की विरोधी पार्टियां भी अपने लोगों को पार्टी में शामिल करा सकती हैं ताकि पार्टी के अंदर अराजकता फैला सके। नई पार्टी के लिए ये सब चीजें एक गंभीर समस्या पैदा कर सकती हैं।
पार्टी के पास नए सदस्यों के बारे में जानकारी जुटाने का कोई तंत्र या व्यवस्था नहीं है। आम आदमी पार्टी के गठन के वक्त अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी पार्टी में केवल उन्हीं लोगों को शामिल किया जाएगा, जो पाक-साफ होंगे। यह कहा जा सकता है कि 'आप' एक फैशन भी बन गया है। लोगों को आम आदमी पार्टी ज्वॉइन करने और मैं हूं आम आदमी लिखी हुई टोपी पहनने में मजा आने लगा है। स्पष्ट नीतियों के अभाव में 'आप' के नाम पर अराजकता भी फैल रही है। कुछ दिनों पहले ही बिहार में कुछ लोगों ने आप के नाम पर हुड़दंग मचाया था। बाद में पता चला था कि आम आदमी पार्टी से उनको कोई लेनदेन नही था।
केवल स्वयंसेवकों के बूते पर आखिर यह पार्टी कब तक चलेगी। अगर भारत के राजनीतिक पटल पर इन्हें अपनी छाप छोड़नी है और वाकई बदलाव लाना है तो कई गंभीर और दूरगामी फैसले लेने होंगे। आम आदमी पार्टी से इन्हें ऐसे लोगों को भी जोड़ना होगा जो राजनीति को कीचड़ मानते हैं और इससे दूर ही रहना चाहते हैं। पेशेवरों को अपने साथ जोड़ना होगा तथा गुटबाजी फैलाने वालों एवं खुद को मठाधीश समझने वालों से पार पाना होगा।

Friday, January 3, 2014

उफ्फ ये आलीशान सादगी

आम आदमी पार्टी यानी आप ने भ्रष्टाचार हटाने और सुशासन लाने के नाम पर खूब प्रचार किया और उन्हें इसका फल भी मिला। दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्हें अप्रत्याशित जीत हासिल हुई और पंद्रह वर्षों से सत्ता पर काबिज कांग्रेस पार्टी पर झाड़ू फिर गई। काफी उठा पटक के बाद अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाने की हामी भरी और कांग्रेस पार्टी ने समर्थन भी दिया।
इसके बाद सादगी के ओवरडोज से भरे भाषणों का दौर शुरू हुआ। लालबत्ती, सरकारी गाड़ी और बंगला न लेने की घोषणाओं की बाढ़ आ गई। दिल्ली विधानसभा के सत्र के पहले दिन सादगी दिखाई भी दी। क्योंकि कोई ऑटो से पहुंचा था तो कोई रिक्शे से। हालांकि यह सादगी का चोला केवल छह दिन में ही उतर गया।
अरविंद केजरीवाल जल्द ही दस कमरों के फ्लैट में रहने के लिए जाने वाले हैं। इतना ही नहीं उनके मंत्रिमंडल के साथी भी वीआईपी नंबरों वाले एसयूवी वाहनों में सचिवालय पहुंचने लगे। तिस पर मनीष सिसोदिया का तर्क कि उनकी पार्टी ने लालबत्ती न लेने की बात कही थीं और बंगलों में न रहने की बात की थी। बिना लालबत्ती की कार और सरकारी फ्लैट में तो रहना जायज बताया।
एक क्षेत्रीय कहावत में इसे गुड़ खाना और गुलगुले से परहेज करना भी कहा जाता है। आम आदमी पार्टी के उदय के साथ लोगों ने काफी उम्मीदें बनाई हैं। लेकिन यह कब तक कायम रहेगी यह कहना मुश्किल लग रहा है। अगर इसे सादगी कहते हैं तो फिर ममता बनर्जी और मानिक सरकार को क्या कहेंगे। लाल बहादुर शास्त्री और महात्मा गांधी को क्या कहेंगे।