Wednesday, June 30, 2010

भोपाल कांड से सबक लेने की जरूरत है

पच्चीस साल पहले भोपाल में वह दर्दनाक हादसा हुआ था। अगर हताहतों की संख्या पर गौर करें तो सिद्ध हो जाएगा कि वह दुनिया की भयावहतम औद्योगिक त्रासदी थी। यकीनन खतरनाक जहरीले केमिकल का इतनी लापरवाही से रखरखाव एक आपराधिक मामला था। लेकिन जो अदालती फैसला आया उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता।

हजारों मौतों के जिम्मेदार लोगों में से कोई भी जेल में नहीं है। अमेरिका ने यूनियन कार्बाइड प्रमुख वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। भारत की न्याय प्रणाली में पैठी सुस्ती को भी दोष दिया जाना चाहिए। अनुमान के मुताबिक भारत की अदालतों में 2 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं, जिन्हें निपटाने में 320 साल लग जाएंगे।

भोपाल केस इसलिए भी सुस्त पड़ गया, क्योंकि भारत का जोर पहले मुआवजे पर था। हादसे के तीन साल बाद जाकर आपराधिक मामला शुरू हुआ। पांच साल बाद जाकर यूनियन कार्बाइड ने 45 करोड़ डॉलर का मुआवजा दिया, जबकि इससे कहीं ज्यादा मांगे गए थे। इससे तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सीधे-सीधे यही संदेश जाता है कि वे आएं, पर्यावरण को दूषित करें और फिर कोई बखेड़ा होने पर चुपचाप बच निकलें। मैक्सिको की खाड़ी के तटवर्ती इलाकों में रहने वाले बाशिंदों को भी यही डर सता रहा है, क्योंकि बीपी, उसके सहयोगियों और अमेरिकी नियामक एजेंसियों के बीच फिलहाल दोषारोपण का खेल चल रहा है। खाड़ी को भोपाल के सबक याद रखने होंगे।

द वैंकुवर सन से अनूदित

भोपाल कांड से सबक लेने की जरूरत है

पच्चीस साल पहले भोपाल में वह दर्दनाक हादसा हुआ था। अगर हताहतों की संख्या पर गौर करें तो सिद्ध हो जाएगा कि वह दुनिया की भयावहतम औद्योगिक त्रासदी थी। यकीनन खतरनाक जहरीले केमिकल का इतनी लापरवाही से रखरखाव एक आपराधिक मामला था। लेकिन जो अदालती फैसला आया उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता।

हजारों मौतों के जिम्मेदार लोगों में से कोई भी जेल में नहीं है। अमेरिका ने यूनियन कार्बाइड प्रमुख वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। भारत की न्याय प्रणाली में पैठी सुस्ती को भी दोष दिया जाना चाहिए। अनुमान के मुताबिक भारत की अदालतों में 2 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं, जिन्हें निपटाने में 320 साल लग जाएंगे।

भोपाल केस इसलिए भी सुस्त पड़ गया, क्योंकि भारत का जोर पहले मुआवजे पर था। हादसे के तीन साल बाद जाकर आपराधिक मामला शुरू हुआ। पांच साल बाद जाकर यूनियन कार्बाइड ने 45 करोड़ डॉलर का मुआवजा दिया, जबकि इससे कहीं ज्यादा मांगे गए थे। इससे तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सीधे-सीधे यही संदेश जाता है कि वे आएं, पर्यावरण को दूषित करें और फिर कोई बखेड़ा होने पर चुपचाप बच निकलें। मैक्सिको की खाड़ी के तटवर्ती इलाकों में रहने वाले बाशिंदों को भी यही डर सता रहा है, क्योंकि बीपी, उसके सहयोगियों और अमेरिकी नियामक एजेंसियों के बीच फिलहाल दोषारोपण का खेल चल रहा है। खाड़ी को भोपाल के सबक याद रखने होंगे।

द वैंकुवर सन से अनूदित

Monday, June 28, 2010

दिल मानता नहीं और जेब है कि भरती नहीं

और कितना कमाना चाहते हैं ये हमारे "माननीय"। जनता को महंगाई और टैक्स के दो पाटों के बीच रहे हैं और अपनी जेबें भरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जरा ये आंकड़े देखिए। पहले ही भारी हैं सुविधाएं:
  • सांसदों पर हर महीने 21 करोड़ 14 लाख, 70 हजार रुपए खर्च किया जाता है।
  • करीब 14 हजार रुपए तो ऑफिस का ही खर्च है।
  • संसदीय क्षेत्र के लिए मासिक अलाउंस 10 हजार मिलता है।
  • संसद के तीन सत्र होते हैं। प्रत्येक सत्र के लिए इन्हें डेली अलाउंस के तौर पर एक हजार रुपए मिलते हैं।
  • हर सांसद और उनके पति या पत्नी को रेलवे की तरफ से मुफ्त एसी-1 की सुविधा भी।
  • पति या पत्नी के साथ बिजनेस क्लास में देश में कहीं भी 40 यात्राएं मुफ्त करते हैं सांसद।
  • इन्हें दिल्ली में बंगला या फ्लैट दिया जाता है, जिसका किराया मात्र दो हजार रुपए होता है।
  • पचास हजार यूनिट बिजली मुफ्त और साथ में पानी फ्री।
  • बंगलों में एसी, फ्रिज, टीवी की सुविधा। सोफा की सफाई, पर्दो की धुलाई मुफ्त की जाती है।
  • तीन फोन लाइनों की पात्रता। हर साल 170,000 लोकल कॉल फ्री किए जा सकते हैं।

दिल मानता नहीं और जेब है कि भरती नहीं

और कितना कमाना चाहते हैं ये हमारे "माननीय"। जनता को महंगाई और टैक्स के दो पाटों के बीच रहे हैं और अपनी जेबें भरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जरा ये आंकड़े देखिए। पहले ही भारी हैं सुविधाएं:
  • सांसदों पर हर महीने 21 करोड़ 14 लाख, 70 हजार रुपए खर्च किया जाता है।
  • करीब 14 हजार रुपए तो ऑफिस का ही खर्च है।
  • संसदीय क्षेत्र के लिए मासिक अलाउंस 10 हजार मिलता है।
  • संसद के तीन सत्र होते हैं। प्रत्येक सत्र के लिए इन्हें डेली अलाउंस के तौर पर एक हजार रुपए मिलते हैं।
  • हर सांसद और उनके पति या पत्नी को रेलवे की तरफ से मुफ्त एसी-1 की सुविधा भी।
  • पति या पत्नी के साथ बिजनेस क्लास में देश में कहीं भी 40 यात्राएं मुफ्त करते हैं सांसद।
  • इन्हें दिल्ली में बंगला या फ्लैट दिया जाता है, जिसका किराया मात्र दो हजार रुपए होता है।
  • पचास हजार यूनिट बिजली मुफ्त और साथ में पानी फ्री।
  • बंगलों में एसी, फ्रिज, टीवी की सुविधा। सोफा की सफाई, पर्दो की धुलाई मुफ्त की जाती है।
  • तीन फोन लाइनों की पात्रता। हर साल 170,000 लोकल कॉल फ्री किए जा सकते हैं।

Friday, June 25, 2010

UPA bites reform bullet

Move leaves governing alliance vulnerable, with inflation already in double digits and an interest rate hike likely


New Delhi: In a bold political gambit, the Congress-led United Progressive Alliance (UPA) government decontrolled petrol prices and raised those of diesel, liquefied petroleum gas (LPG) and kerosene.

The decision will further stoke inflation, which is already running in double digits, and leave the alliance politically vulnerable weeks before the monsoon session of Parliament.

The long-awaited decision will help the government trim its fiscal deficit, strengthen the finances of oil marketing companies (OMCs) and promote the use of more energy-efficient technologies.

Petrol prices went up by Rs3.50 per litre, diesel by Rs2 per litre, kerosene by Rs3 per litre and LPG by Rs35 per cylinder at midnight.

Fears that higher inflation could force the Reserve Bank of India to raise interest rates earlier than expected spooked the bond market. Yields on benchmark 10-year paper opened at 7.59%, jumped to 7.68% intraday and closed at 7.65%.

Importantly, the government has retained the option to intervene if international oil prices turn volatile. Petroleum secretary S. Sundareshan said: “While the periodicity of revision in petrol prices has not been fixed as petrol is a sensitive item, in cases of extreme volatility of international prices of crude, the government will intervene.”

Courtesy: LiveMint.com & HindustanTimes.com

कमर तोड़ देगी महंगाई

हमारे लोकतांत्रिक देश की सरकार ने ईंधन की कीमतों को एक बार फिर बढ़ा दिया है और साथ में यह तुर्रा  यह दिया गया है कि मूल्यों पर से सरकारी नियंत्रण हटाने के लिए ऐसा किया गया है।

पेट्रोल, डीजल, केरोसीन और रसोई गैस के दाम बढ़ा दिए गए हैं। सरकार नियंत्रण हटे ना हटे पर घरेलू बजट जरूर अनियंत्रित कर दिया गया है। पहले ही महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ रखी है उस पर से दाम बढ़ाने का चाबूक। वैसे भी इस महंगाई का असर हमारे माननीय जनप्रतिनिधियों पर तो पड़ता नहीं है, इसलिए वो बेहिचक दाम बढ़ा देते हैं।

तकनीकी रूप में सरकार का यह कदम भले ही सही हो, लेकिन इसका तात्कालिक खामियाजा तो आम जनता को ही भुगतना होगा।

कमर तोड़ देगी महंगाई

हमारे लोकतांत्रिक देश की सरकार ने ईंधन की कीमतों को एक बार फिर बढ़ा दिया है और साथ में यह तुर्रा  यह दिया गया है कि मूल्यों पर से सरकारी नियंत्रण हटाने के लिए ऐसा किया गया है।

पेट्रोल, डीजल, केरोसीन और रसोई गैस के दाम बढ़ा दिए गए हैं। सरकार नियंत्रण हटे ना हटे पर घरेलू बजट जरूर अनियंत्रित कर दिया गया है। पहले ही महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ रखी है उस पर से दाम बढ़ाने का चाबूक। वैसे भी इस महंगाई का असर हमारे माननीय जनप्रतिनिधियों पर तो पड़ता नहीं है, इसलिए वो बेहिचक दाम बढ़ा देते हैं।

तकनीकी रूप में सरकार का यह कदम भले ही सही हो, लेकिन इसका तात्कालिक खामियाजा तो आम जनता को ही भुगतना होगा।

Thursday, June 24, 2010

नए रूप रंग का अमर उजाला

उत्तर भारत के बड़े अखबारों में शुमार अमर उजाला ने गुरुवार से अपना रूपरंग बदल लिया है। काफी नीरस से दिखने वाले डिजाइन को त्यागकर अखबार ने एकदम नए कलेवर को अपनाया है। इस नए लेआउट में व्हाइट स्पेस का पूरा ध्यान रखा गया है। साथ ही नए तरह के फोंट्स का इस्तेमाल भी किया गया है। रंगों का भी सही उपयोग किया गया है, ताकि अखबार खुला हुआ सा लगे।

पहले का लेआउट अभी की बनिस्पद काफी घुटनवाला सा प्रतीत होता था। उसमें नयापन भी नहीं मालूम होता था। वाकई अमर उजाला को इस तरह से देखकर काफी अच्छा महसूस हुआ। उम्मीद है कि खबरों पर भी वो इसी तरह खरा उतरेगा।

अमर उजाला में बदलाव का संदेश पहले पेज परः
नमस्कार। आज का दिन खास है क्योंकि आपके विश्वास से अर्जित शक्ति ने अमर उजाला को एक और बदलाव का साक्षी बनाया है। नए स्तंभ, नए स्तंभकार, विशेष प्रस्तुति, रंग संयोजन और ज्यादा गरिमापूर्ण रूप में अमर उजाला आपके हाथों में है। नया आकाश, नई तसवीर, आपका सृजन है। आप सब का अभिनंदन! -अमर उजाला

नए रूप रंग का अमर उजाला

उत्तर भारत के बड़े अखबारों में शुमार अमर उजाला ने गुरुवार से अपना रूपरंग बदल लिया है। काफी नीरस से दिखने वाले डिजाइन को त्यागकर अखबार ने एकदम नए कलेवर को अपनाया है। इस नए लेआउट में व्हाइट स्पेस का पूरा ध्यान रखा गया है। साथ ही नए तरह के फोंट्स का इस्तेमाल भी किया गया है। रंगों का भी सही उपयोग किया गया है, ताकि अखबार खुला हुआ सा लगे।

पहले का लेआउट अभी की बनिस्पद काफी घुटनवाला सा प्रतीत होता था। उसमें नयापन भी नहीं मालूम होता था। वाकई अमर उजाला को इस तरह से देखकर काफी अच्छा महसूस हुआ। उम्मीद है कि खबरों पर भी वो इसी तरह खरा उतरेगा।

अमर उजाला में बदलाव का संदेश पहले पेज परः
नमस्कार। आज का दिन खास है क्योंकि आपके विश्वास से अर्जित शक्ति ने अमर उजाला को एक और बदलाव का साक्षी बनाया है। नए स्तंभ, नए स्तंभकार, विशेष प्रस्तुति, रंग संयोजन और ज्यादा गरिमापूर्ण रूप में अमर उजाला आपके हाथों में है। नया आकाश, नई तसवीर, आपका सृजन है। आप सब का अभिनंदन! -अमर उजाला

Wednesday, June 23, 2010

भारत ने यूनियन-कार्बाइड को दायित्व मुक्त कर दिया था : डाउ

भोपाल गैस कांड में फंसी यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन (यूसीसी) का अधिग्रहण करने वाली अमेरिकी रसायन कंपनी डाउ केमिकल ने दावा किया है कि भारत सरकार ने 1984 की त्रसद औद्योगिक दुर्घटना के मामले में यूसीसी और उसकी सहायक भारतीय कंपनी को एक समझौते के तहत मुआवजे के दायित्व से पूरी तरह मुक्त कर दिया था।

डाउ केमिकल कंपनी के प्रवक्ता स्काट व्हीलर ने कहा कि 1989 में भारत सरकार ने पीड़ित लोगों की ओर से कार्रवाई करते हुए संसद के कानून के तहत 47 करोड़ डालर में मामले का निपटान समझौता किया था और यूसीसी तथा यूनियन कार्बाइड इंडिया लि को गैस हादसे के लिए मुआवजे के दायित्व से मुक्त कर दिया था।

एक सवाल के जवाब में डाउ केमिकल ने कहा है कि युनियन कार्बाइड के भोपाल संयंत्र का स्वामित्व उसके (डाउ के) हाथ में नहीं था और न ही कभी उसे यह इकाई विरासत में मिली थी। व्हीलर ने कहा कि जब डाउ ने यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन का अधिग्रहण किया था, उससे बहुत पहले यूसीसी ने भारत में कारोबार बंद कर दिया था और अपनी हिस्सेदारी यूनियन कार्बाइड इंडिया लि को बेच चुकी थी।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यूसीसी एक अलग कंपनी है, जिसका अलग निदेशक मंडल और अलग खाते तथा अपने कर्मचारी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भोपाल कारखाने का परिचालन करने वाली यूनियन कार्बाइड इंडिया लि आज भी चलती हुई कंपनी है और इसका नाम इसका नाम बदल कर एवर रेडी डंडस्ट्रीज इंडिया लि कर दिया गया है। डाउ का उससे कभी कोई सम्पर्क नहीं रहा है।

भारत ने यूनियन-कार्बाइड को दायित्व मुक्त कर दिया था : डाउ

भोपाल गैस कांड में फंसी यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन (यूसीसी) का अधिग्रहण करने वाली अमेरिकी रसायन कंपनी डाउ केमिकल ने दावा किया है कि भारत सरकार ने 1984 की त्रसद औद्योगिक दुर्घटना के मामले में यूसीसी और उसकी सहायक भारतीय कंपनी को एक समझौते के तहत मुआवजे के दायित्व से पूरी तरह मुक्त कर दिया था।

डाउ केमिकल कंपनी के प्रवक्ता स्काट व्हीलर ने कहा कि 1989 में भारत सरकार ने पीड़ित लोगों की ओर से कार्रवाई करते हुए संसद के कानून के तहत 47 करोड़ डालर में मामले का निपटान समझौता किया था और यूसीसी तथा यूनियन कार्बाइड इंडिया लि को गैस हादसे के लिए मुआवजे के दायित्व से मुक्त कर दिया था।

एक सवाल के जवाब में डाउ केमिकल ने कहा है कि युनियन कार्बाइड के भोपाल संयंत्र का स्वामित्व उसके (डाउ के) हाथ में नहीं था और न ही कभी उसे यह इकाई विरासत में मिली थी। व्हीलर ने कहा कि जब डाउ ने यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन का अधिग्रहण किया था, उससे बहुत पहले यूसीसी ने भारत में कारोबार बंद कर दिया था और अपनी हिस्सेदारी यूनियन कार्बाइड इंडिया लि को बेच चुकी थी।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यूसीसी एक अलग कंपनी है, जिसका अलग निदेशक मंडल और अलग खाते तथा अपने कर्मचारी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भोपाल कारखाने का परिचालन करने वाली यूनियन कार्बाइड इंडिया लि आज भी चलती हुई कंपनी है और इसका नाम इसका नाम बदल कर एवर रेडी डंडस्ट्रीज इंडिया लि कर दिया गया है। डाउ का उससे कभी कोई सम्पर्क नहीं रहा है।

Tuesday, June 22, 2010

क्या वाकई भारतीय महान हैं

हां, शायद भारतीय महान होते हैं। क्योंकि आजादी के आंदोलन के बाद कभी भी उन्होंने कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं किया। या यूं कहें कि हमारे तथाकथित "सिस्टम" ने उसे ऐसा करने ही नहीं दिया। वो सिस्टम जिसके बारे में "शायद" शासन और प्रशासन भी नहीं जानते होंगे। तभी सिस्टम की वजह से एंडरसन जैसा व्यक्ति भाग जाता है। इसी सिस्टम की वजह से गैस त्रासदी जैसी घटना को सामान्य दुर्घटना की तरह ट्रीट किया जाता है। इतना ही नहीं, इसी सिस्टम के चलते छत्तीसगढ़ के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने पूरी की पूरी नदी एक निजी कंपनी को बेचने की योजना बना डाली थी। इतना ही नहीं उन्होंने एक ऐसा बिल भी पास करवा दिया था, जिसके बाद पूरे राज्य में कुकुरमुत्ते की तरह विश्वविद्यालय खुलने लगे। जिसे भी डिग्री चाहिए, वो अपना ही विश्वविद्यालय बनाकर डिग्री ले ले।

इसी सिस्टम की देन हैं ऐसे अधिकारी और अफसर, जो कहने के लिए तो जनसेवा के लिए हैं, लेकिन उनकी नजर दूसरों की बहू-बेटियों पर रहती हैं। और यदि किसी ने उनके खिलाफ मुंह खोलने की हिमाकत कर ली तो समझो उसकी तो शामत ही आ जाएगी। दुनिया भर की धाराओं का उपयोग उसी के खिलाफ कर लिया जाएगा। मुझे एक किस्सा याद आता है। घटना भोपाल के एक आईजी की पत्नी से जुड़ा है।

उसके पहले मैं आप सभी से एक बात पूछना चाहूंगा, कि क्या आपमें से किसी का मोबाइल कभी चोरी हुआ है। क्या आपमें से किसी ने मोबाइल चोरी की घटना किसी पुलिस थाने में लिखवाने की कोशिश की है। जितना मुझे पता है, देशभक्ति और जनसेवा का अपमान करने वाले पुलिस अधिकारी कभी भी मोबाइल चोरी की शिकायत दर्ज नहीं करते हैं। वो हमेशा मोबाइल गुम होने की शिकायत लिखते हैं। क्योंकि चोरी की शिकायत, मतलब एफआईआर, और एफआईआर का मतलब कि थाने में एक और केस बढ़ जाएगा और उसे फॉलोअप करने का कष्ट करना पड़ेगा।

लेकिन आईजी की पत्नी वाली घटना के बाद से मुझे यह समझ आ गया कि सारी सुविधाएं और शासन प्रशासन सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए है, जो उसका हिस्सा हैं। आईजी साहब की बीवी का मोबाइल सब्जी मंडी से चोरी हो गया तो पुलिस ने पूरे शहर में नाकेबंदी कर दी। सारी तकनीक का उपयोग कर मोबाइल ट्रेस किया गया और आखिरकार भोपाल से कई किलोमीटर दूर एक दूसरे शहर से मोबाइल बरामद भी कर लिया गया।

तो यह तो है पुलिसिया मुस्तैदी।

एसपीएस राठौर वाले मामले से तो आप सभी अच्छी तरह वाकिफ ही होंगे। कैसे पद और ताकत का सारा इस्तेमाल उसने अपने बचाव के लिए किया। और तो और अभी भी उसे मिली सजा, ऊंठ के मुंह मे जीरे के समान ही है।

ऐसा ही हाल नेताओं का भी है। गैस त्रासदी वाले मुद्दे को 26 साल तक खींच डाला और नतीजा, खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाला रहा।

अब और लिखने का मन नहीं कर रहा है। क्या-क्या लिखूं और किस पर अफसोस करें। दोषी तो हम भी हैं। यदि हम यानी जनता जागरुक हो तो इतना सबकुछ कभी नहीं हो सकता है। पर खैर.....सवाल अब भी वहीं का वहीं है कि क्या वाकई हम उस महान देश के वाशिंदे हैं।

क्या वाकई भारतीय महान हैं

हां, शायद भारतीय महान होते हैं। क्योंकि आजादी के आंदोलन के बाद कभी भी उन्होंने कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं किया। या यूं कहें कि हमारे तथाकथित "सिस्टम" ने उसे ऐसा करने ही नहीं दिया। वो सिस्टम जिसके बारे में "शायद" शासन और प्रशासन भी नहीं जानते होंगे। तभी सिस्टम की वजह से एंडरसन जैसा व्यक्ति भाग जाता है। इसी सिस्टम की वजह से गैस त्रासदी जैसी घटना को सामान्य दुर्घटना की तरह ट्रीट किया जाता है। इतना ही नहीं, इसी सिस्टम के चलते छत्तीसगढ़ के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने पूरी की पूरी नदी एक निजी कंपनी को बेचने की योजना बना डाली थी। इतना ही नहीं उन्होंने एक ऐसा बिल भी पास करवा दिया था, जिसके बाद पूरे राज्य में कुकुरमुत्ते की तरह विश्वविद्यालय खुलने लगे। जिसे भी डिग्री चाहिए, वो अपना ही विश्वविद्यालय बनाकर डिग्री ले ले।

इसी सिस्टम की देन हैं ऐसे अधिकारी और अफसर, जो कहने के लिए तो जनसेवा के लिए हैं, लेकिन उनकी नजर दूसरों की बहू-बेटियों पर रहती हैं। और यदि किसी ने उनके खिलाफ मुंह खोलने की हिमाकत कर ली तो समझो उसकी तो शामत ही आ जाएगी। दुनिया भर की धाराओं का उपयोग उसी के खिलाफ कर लिया जाएगा। मुझे एक किस्सा याद आता है। घटना भोपाल के एक आईजी की पत्नी से जुड़ा है।

उसके पहले मैं आप सभी से एक बात पूछना चाहूंगा, कि क्या आपमें से किसी का मोबाइल कभी चोरी हुआ है। क्या आपमें से किसी ने मोबाइल चोरी की घटना किसी पुलिस थाने में लिखवाने की कोशिश की है। जितना मुझे पता है, देशभक्ति और जनसेवा का अपमान करने वाले पुलिस अधिकारी कभी भी मोबाइल चोरी की शिकायत दर्ज नहीं करते हैं। वो हमेशा मोबाइल गुम होने की शिकायत लिखते हैं। क्योंकि चोरी की शिकायत, मतलब एफआईआर, और एफआईआर का मतलब कि थाने में एक और केस बढ़ जाएगा और उसे फॉलोअप करने का कष्ट करना पड़ेगा।

लेकिन आईजी की पत्नी वाली घटना के बाद से मुझे यह समझ आ गया कि सारी सुविधाएं और शासन प्रशासन सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए है, जो उसका हिस्सा हैं। आईजी साहब की बीवी का मोबाइल सब्जी मंडी से चोरी हो गया तो पुलिस ने पूरे शहर में नाकेबंदी कर दी। सारी तकनीक का उपयोग कर मोबाइल ट्रेस किया गया और आखिरकार भोपाल से कई किलोमीटर दूर एक दूसरे शहर से मोबाइल बरामद भी कर लिया गया।

तो यह तो है पुलिसिया मुस्तैदी।

एसपीएस राठौर वाले मामले से तो आप सभी अच्छी तरह वाकिफ ही होंगे। कैसे पद और ताकत का सारा इस्तेमाल उसने अपने बचाव के लिए किया। और तो और अभी भी उसे मिली सजा, ऊंठ के मुंह मे जीरे के समान ही है।

ऐसा ही हाल नेताओं का भी है। गैस त्रासदी वाले मुद्दे को 26 साल तक खींच डाला और नतीजा, खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाला रहा।

अब और लिखने का मन नहीं कर रहा है। क्या-क्या लिखूं और किस पर अफसोस करें। दोषी तो हम भी हैं। यदि हम यानी जनता जागरुक हो तो इतना सबकुछ कभी नहीं हो सकता है। पर खैर.....सवाल अब भी वहीं का वहीं है कि क्या वाकई हम उस महान देश के वाशिंदे हैं।

Saturday, June 19, 2010

आखिर बोल ही पड़े अर्जुन सिंह


26 वर्ष पुरानी चुप्पी को आखिरकार मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जी ने तोड़ ही दिया। हिंदुस्तान टाइम्स भोपाल के स्थानीय संपादक श्री एन के सिंह जी से बातचीत में उन्होंने गैस कांड मुद्दे तथा एंडरसन को सुरक्षित निकल जाने के मुद्दे पर अपना पक्ष रखा। देखिए इस खबर कोः

I didn’t let Anderson go: Arjun
NK SinghBhopal. Breaking his silence for the first time on the roiling controversy of former Union Carbide chief Warren Anderson’s release from Bhopal, Arjun Singh said he had “no locus standi” on the matter. He spoke exclusively to Hindustan Times on the phone.
When asked if he wanted to clear the controversy, Singh told HT on the phone, “I have no locus standi on this issue,” virtually lobbing the controversial ball back into then-Central government’s court. The Congress has reacted sharply to then-foreign secretary M K Rasgotra’s comment that the Rajiv Gandhi government had promised “safe passage” to Anderson.
The 79-year-old veteran Congressman refused to elaborate any further.
He however indicated his autobiography, which is in the works, will have details. “Naturally,” is all he said when asked whether the Bhopal tragedy and the Anderson saga would form part of the book
Even since the Bhopal verdict came on June 7, there has been a deluge of reports in the media on the circumstances under which Anderson, who was placed under house arrest in Bhopal, left the country.
While Congress leaders and former high-ranking officials have offered their versions of the events of the days following the gas leak, the man at the centre of it —Arjun Singh — has refused to speak.
According to then deputy chief of mission at the US Embassy, Gordon Streeb, when Anderson was arrested in Bhopal he (Streeb) “immediately contacted the foreign ministry and was assured the government of India will honour its commitment to provide Anderson safe passage in and out of India”.
Then foreign secretary Rasgotra has claimed Anderson was given “safe passage” on the advice of then-home minister P V Narasimha Rao and cabinet secretary C R Krishnaswamy Rao. American secret service CIA’s East Asia brief dated December 8, 1984, declassified in January 2002, indicates the Rajiv Gandhi government had hastened the release of Anderson from house arrest and blames the MP government for the arrest.
हिंदुस्तान टाइम्स से साभार

आखिर बोल ही पड़े अर्जुन सिंह


26 वर्ष पुरानी चुप्पी को आखिरकार मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जी ने तोड़ ही दिया। हिंदुस्तान टाइम्स भोपाल के स्थानीय संपादक श्री एन के सिंह जी से बातचीत में उन्होंने गैस कांड मुद्दे तथा एंडरसन को सुरक्षित निकल जाने के मुद्दे पर अपना पक्ष रखा। देखिए इस खबर कोः

I didn’t let Anderson go: Arjun
NK SinghBhopal. Breaking his silence for the first time on the roiling controversy of former Union Carbide chief Warren Anderson’s release from Bhopal, Arjun Singh said he had “no locus standi” on the matter. He spoke exclusively to Hindustan Times on the phone.
When asked if he wanted to clear the controversy, Singh told HT on the phone, “I have no locus standi on this issue,” virtually lobbing the controversial ball back into then-Central government’s court. The Congress has reacted sharply to then-foreign secretary M K Rasgotra’s comment that the Rajiv Gandhi government had promised “safe passage” to Anderson.
The 79-year-old veteran Congressman refused to elaborate any further.
He however indicated his autobiography, which is in the works, will have details. “Naturally,” is all he said when asked whether the Bhopal tragedy and the Anderson saga would form part of the book
Even since the Bhopal verdict came on June 7, there has been a deluge of reports in the media on the circumstances under which Anderson, who was placed under house arrest in Bhopal, left the country.
While Congress leaders and former high-ranking officials have offered their versions of the events of the days following the gas leak, the man at the centre of it —Arjun Singh — has refused to speak.
According to then deputy chief of mission at the US Embassy, Gordon Streeb, when Anderson was arrested in Bhopal he (Streeb) “immediately contacted the foreign ministry and was assured the government of India will honour its commitment to provide Anderson safe passage in and out of India”.
Then foreign secretary Rasgotra has claimed Anderson was given “safe passage” on the advice of then-home minister P V Narasimha Rao and cabinet secretary C R Krishnaswamy Rao. American secret service CIA’s East Asia brief dated December 8, 1984, declassified in January 2002, indicates the Rajiv Gandhi government had hastened the release of Anderson from house arrest and blames the MP government for the arrest.
हिंदुस्तान टाइम्स से साभार

Friday, June 18, 2010

भोपाल गैस त्रासदी

भोपाल गैस त्रासदी
दहल गया, सहम गया
सुनी खबर ठिठक गया
भौचक्के  सब थे पूछते
अरे, ये कैसे हो गया ?
इस हादसे जैसी खबर
न पहले थी सुनी कभी
भोपाल गैस त्रासदी....भोपाल गैस त्रासदी

वो कैसी काली रात थी
मची हुई गुहार थी
भागते चले चलो
बस यही गुहार थी
कीड़े मकोड़ों की तरह
थी लाशों से सडकें पटी
भोपाल गैस त्रासदी .......भोपाल गैस त्रासदी

मरे हज़ार बेगुनाह
तड़प तड़प के भरके आह
आज भी हैं भोगते
वो दंश कितने, बेपनाह
न भूल पायेंगे कभी
वह रात, वह पिछली सदी
भोपाल गैस त्रासदी........भोपाल गैस त्रासदी

मचा हुआ कोहराम था
अप्रादी परेशान था
दिखा दिया गद्दारों ने
की यह तो हिन्दुस्तान था
रसूख वालों को यहाँ
है माफ़ चाहे जो वो करें, सभी
भोपाल गैस त्रासदी ..........भोपाल गैस त्रासदी

हुई तो गिरफ्तारी भी
ठाणे से ही ज़मानत भी
एंडरसन की फरारी में
वाहन भी थे सरकारी ही
कायम नई मिसाल की
भोपाल गैस त्रासदी .........भोपाल गैस त्रासदी

इस त्रासदी से भी बड़ी
हुई है "न्याय त्रासदी "
मिला न न्याय लोगों को
पचीस साल बाद भी
सजा है नाम मात्र को
इतने बड़े गुनाह की
भोपाल गैस त्रासदी .........भोपाल गैस त्रासदी

श्री अजय पाठक जी की रचना, भोपाल हादसे पर (लेखक, मध्यप्रदेश के सिंगरौली में एक्टिविस्ट हैं)

भोपाल गैस त्रासदी

भोपाल गैस त्रासदी
दहल गया, सहम गया
सुनी खबर ठिठक गया
भौचक्के  सब थे पूछते
अरे, ये कैसे हो गया ?
इस हादसे जैसी खबर
न पहले थी सुनी कभी
भोपाल गैस त्रासदी....भोपाल गैस त्रासदी

वो कैसी काली रात थी
मची हुई गुहार थी
भागते चले चलो
बस यही गुहार थी
कीड़े मकोड़ों की तरह
थी लाशों से सडकें पटी
भोपाल गैस त्रासदी .......भोपाल गैस त्रासदी

मरे हज़ार बेगुनाह
तड़प तड़प के भरके आह
आज भी हैं भोगते
वो दंश कितने, बेपनाह
न भूल पायेंगे कभी
वह रात, वह पिछली सदी
भोपाल गैस त्रासदी........भोपाल गैस त्रासदी

मचा हुआ कोहराम था
अप्रादी परेशान था
दिखा दिया गद्दारों ने
की यह तो हिन्दुस्तान था
रसूख वालों को यहाँ
है माफ़ चाहे जो वो करें, सभी
भोपाल गैस त्रासदी ..........भोपाल गैस त्रासदी

हुई तो गिरफ्तारी भी
ठाणे से ही ज़मानत भी
एंडरसन की फरारी में
वाहन भी थे सरकारी ही
कायम नई मिसाल की
भोपाल गैस त्रासदी .........भोपाल गैस त्रासदी

इस त्रासदी से भी बड़ी
हुई है "न्याय त्रासदी "
मिला न न्याय लोगों को
पचीस साल बाद भी
सजा है नाम मात्र को
इतने बड़े गुनाह की
भोपाल गैस त्रासदी .........भोपाल गैस त्रासदी

श्री अजय पाठक जी की रचना, भोपाल हादसे पर (लेखक, मध्यप्रदेश के सिंगरौली में एक्टिविस्ट हैं)

Blame Game बना एंडरसन का मामला

यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन के तत्कालीन सीईओ वारेन एंडरसन को भगाने का मामला Blame Game का रूप ले चुका है। अगर कड़ी कड़ी जोड़ते हुए देखिए तो सारे रास्ते घूम फिर कर सत्ता के गलियारों में ही पहुंच रहे हैं। लेकिन खुद को इससे अलग करके पाक साफ बनने की कोशिश कर रहा है और आरोपों का कीचड़ दूसरे पर फेंक रहा है।

शुरुआत यहां से करते हैः
  • तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी ने कहा कि उन्हें चीफ सेक्रेटरी ने आदेश दिया था
  • तत्कालीन भोपाल कलेक्टर मोती सिंह का कहना है कि उन्हें “ऊपर” से आदेश मिला था।
  • राज्य में ऊपर का मतलब सीएम हाउस/सेक्रेटिरिएट से होता है।
  • सीबीआई के पूर्व संयुक्त महानिदेशक बी आर लाल का कहना है कि उन्हें केंद्र सरकार से एंडरसन जांच मामले में “गो स्लो यानी धीरे चलो” का आदेश मिला था।
  • उस समय के स्टेट प्लेन के पायलट का कहना है कि उन्हें सीएम हाउस से आदेश मिला था कि स्टेट प्लेन से एंडरसन को दिल्ली पहुंचाओ।
  • धीरे से अर्जुन सिंह को निशाने पर लिया गया।
  • वो चुप रहे और चुप ही हैं।
  • तत्कालीन पीएम राजीव गांधी का नाम भी शामिल किया गया। जबकि उस समय उन्हें प्रधानमंत्री मंत्री बने महज कुछ हफ्ते ही हुए थे।
  • पार्टी सांसत में फंसी।
  • प्रवक्ताओं ने कहा कि न तो पीएम और न ही सीएम दोषी।
  • “सिस्टम” ने भगाया एंडरसन को।
  • अब नरसिम्हाराव की ओर सारे आरोप मोड़ दिए गए हैं।
  • पूर्व विदेश सचिव एम के रसगोत्रा का दावा, तत्कालीन गृहमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने दिया था आदेश
  • नरसिम्हाराव के बेटे का जवाब, उनके पिता अकेले दोषी नहीं हैं इसमें।
पूरा मामला घूमकर वहीं लौट आया जहां था।


भोपाल को चाहिए जवाब

Blame Game बना एंडरसन का मामला

यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन के तत्कालीन सीईओ वारेन एंडरसन को भगाने का मामला Blame Game का रूप ले चुका है। अगर कड़ी कड़ी जोड़ते हुए देखिए तो सारे रास्ते घूम फिर कर सत्ता के गलियारों में ही पहुंच रहे हैं। लेकिन खुद को इससे अलग करके पाक साफ बनने की कोशिश कर रहा है और आरोपों का कीचड़ दूसरे पर फेंक रहा है।

शुरुआत यहां से करते हैः
  • तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी ने कहा कि उन्हें चीफ सेक्रेटरी ने आदेश दिया था
  • तत्कालीन भोपाल कलेक्टर मोती सिंह का कहना है कि उन्हें “ऊपर” से आदेश मिला था।
  • राज्य में ऊपर का मतलब सीएम हाउस/सेक्रेटिरिएट से होता है।
  • सीबीआई के पूर्व संयुक्त महानिदेशक बी आर लाल का कहना है कि उन्हें केंद्र सरकार से एंडरसन जांच मामले में “गो स्लो यानी धीरे चलो” का आदेश मिला था।
  • उस समय के स्टेट प्लेन के पायलट का कहना है कि उन्हें सीएम हाउस से आदेश मिला था कि स्टेट प्लेन से एंडरसन को दिल्ली पहुंचाओ।
  • धीरे से अर्जुन सिंह को निशाने पर लिया गया।
  • वो चुप रहे और चुप ही हैं।
  • तत्कालीन पीएम राजीव गांधी का नाम भी शामिल किया गया। जबकि उस समय उन्हें प्रधानमंत्री मंत्री बने महज कुछ हफ्ते ही हुए थे।
  • पार्टी सांसत में फंसी।
  • प्रवक्ताओं ने कहा कि न तो पीएम और न ही सीएम दोषी।
  • “सिस्टम” ने भगाया एंडरसन को।
  • अब नरसिम्हाराव की ओर सारे आरोप मोड़ दिए गए हैं।
  • पूर्व विदेश सचिव एम के रसगोत्रा का दावा, तत्कालीन गृहमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने दिया था आदेश
  • नरसिम्हाराव के बेटे का जवाब, उनके पिता अकेले दोषी नहीं हैं इसमें।
पूरा मामला घूमकर वहीं लौट आया जहां था।


भोपाल को चाहिए जवाब

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।

उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-ष्भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थानष् (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।

उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-ष्भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थानष् (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

Thursday, June 17, 2010

आओ भोपालः बदल दें इस घटिया सिस्टम को

जरा अब्राहिम लिंकन साहब के इस कथन पर गौर करिएगा कि "Any people anywhere, being inclined and having the power, have the right to rise up, and shake off the existing government, and form a new one that suits them better. This is a most valuable - a most sacred right - a right, which we hope and believe, is to liberate the world." यह भोपाल मामले और खासकर कि हमारे देश के लिए सटीक बैठता है।


घोर अफसोस और शर्म की बात है कि भोपाल गैस त्रासदी को “सिस्टम” की कारसतानी बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की जा रही है। जी हां दोस्तों, कांग्रेस पार्टी का कहना है कि एंडरसन के बच निकलने में न तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जिम्मेदार थे और ही मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री। जिम्मेदार तो सिस्टम था।

अब जरा इन स्वयंभू समझदार और जनता को मूर्ख समझने वाले नेताओं से यह भी पूछा जाए कि आखिर वो ‘सिस्टम’ का क्या मतलब समझते हैं। जहां तक हमारी गैर राजनीतिक बुद्धि समझ पा रही है, सरकार ही सिस्टम है और उसे चलाती है। तो फिर यह कौन सा सिस्टम था, जिसने एंडरसन को भारत छोड़ने दिया और तो और सिस्टम का ही इसी हिस्सा लोगों को इसकी खबर लगने में 26 साल लग गए।


एक कहावत मैंने सुनी थी कि “12 साल में घूरे के दिन भी फिर जाते हैं।“ लेकिन कमबख्त नेतागिरी ने तो इस कहावत को भी झुठला दिया है। यूनियन कार्बाइड कारखाना भी वहीं का वहीं है और बाकी जिंदा बचे लोग भी। कारखाने में पड़ा जहरीला कचरा भोपाल की फिजा में जहर घोल रहा है। न तो कोई उसे साफ करने वाला है और न ही कोई उस हादसे के जिम्मेदार लोगों को पकड़ने वाला।

क्या कोतवाल और क्या चोर। सबने मिलकर भोपाल के साथ धोखा किया है। आज जब पोल खुल रही है और जनता सवाल पूछ रही है तो उसे सिस्टम का झुनझुना सुनाया जा रहा है। यदि आप उस समय के जिम्मेदार लोगों के बयानात पर गौर करेंगे तो अपनी हंसी और गुस्से दोनों को ही रोक नहीं पाएंगे। लेकिन इससे पहले जरा इस पर गौर करिए और बताइएगा कि क्या ऐसा संभव है।

मान लीजिए, 26/11 को हुए मुंबई हमले एकमात्र जीवित बचा आरोपी अजमल आमिर कसाब यह कहे कि उसे एक बार उसके घर जाने दिया जाए। वो परिजनों से मिलकर जल्द ही वापस आए जाएगा। तो क्या हमारा सिस्टम ऐसा करेगा। शायद नहीं। तो फिर एंडरसन के मामले में ऐसा कैसे होने दिया गया। क्योंकि एंडरसन को इसी मूर्खतापूर्ण वायदे के आधार पर जाने दिया गया था। हालांकि यह बात गले के नीचे उतर नहीं पा रही है।

तत्कालीन पुलिस अधीक्षक और बाद में डीजीपी पद से रिटायर हुए स्वराज पुरी को दी जा रही सभी सुविधाएं इसलिए हटा ली गई हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी सरकारी कार से एंडरसन को स्टेट हैंगर तक पहुंचाया था। अब अगर कार से स्टेट हैंगर तक छोड़ना इतना बड़ा गुनाह है तो फिर राज्य सरकार के शासकीय विमान का पायलट भी दोषी रहा होगा, जिसने एंडरसन को दिल्ली तक पहुंचाया था।

तो क्या वो “लोग” दोषी नहीं हैं, जिन्होंने इनको “सिस्टम” के नाम पर आदेश दिया हो। उठो भोपाल अब वक्त आ गया है। धोखेबाजों को सबक सिखाने का और अपना हक मांगने का। वरना किसी दिन सिस्टम की आड़ में राहत राशि को भी हजम कर जाएंगे।


उठो भोपाल, दलालों को कुचल दो और अपना हक छीन लो।

आओ भोपालः बदल दें इस घटिया सिस्टम को

जरा अब्राहिम लिंकन साहब के इस कथन पर गौर करिएगा कि "Any people anywhere, being inclined and having the power, have the right to rise up, and shake off the existing government, and form a new one that suits them better. This is a most valuable - a most sacred right - a right, which we hope and believe, is to liberate the world." यह भोपाल मामले और खासकर कि हमारे देश के लिए सटीक बैठता है।


घोर अफसोस और शर्म की बात है कि भोपाल गैस त्रासदी को “सिस्टम” की कारसतानी बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की जा रही है। जी हां दोस्तों, कांग्रेस पार्टी का कहना है कि एंडरसन के बच निकलने में न तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जिम्मेदार थे और ही मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री। जिम्मेदार तो सिस्टम था।

अब जरा इन स्वयंभू समझदार और जनता को मूर्ख समझने वाले नेताओं से यह भी पूछा जाए कि आखिर वो ‘सिस्टम’ का क्या मतलब समझते हैं। जहां तक हमारी गैर राजनीतिक बुद्धि समझ पा रही है, सरकार ही सिस्टम है और उसे चलाती है। तो फिर यह कौन सा सिस्टम था, जिसने एंडरसन को भारत छोड़ने दिया और तो और सिस्टम का ही इसी हिस्सा लोगों को इसकी खबर लगने में 26 साल लग गए।


एक कहावत मैंने सुनी थी कि “12 साल में घूरे के दिन भी फिर जाते हैं।“ लेकिन कमबख्त नेतागिरी ने तो इस कहावत को भी झुठला दिया है। यूनियन कार्बाइड कारखाना भी वहीं का वहीं है और बाकी जिंदा बचे लोग भी। कारखाने में पड़ा जहरीला कचरा भोपाल की फिजा में जहर घोल रहा है। न तो कोई उसे साफ करने वाला है और न ही कोई उस हादसे के जिम्मेदार लोगों को पकड़ने वाला।

क्या कोतवाल और क्या चोर। सबने मिलकर भोपाल के साथ धोखा किया है। आज जब पोल खुल रही है और जनता सवाल पूछ रही है तो उसे सिस्टम का झुनझुना सुनाया जा रहा है। यदि आप उस समय के जिम्मेदार लोगों के बयानात पर गौर करेंगे तो अपनी हंसी और गुस्से दोनों को ही रोक नहीं पाएंगे। लेकिन इससे पहले जरा इस पर गौर करिए और बताइएगा कि क्या ऐसा संभव है।

मान लीजिए, 26/11 को हुए मुंबई हमले एकमात्र जीवित बचा आरोपी अजमल आमिर कसाब यह कहे कि उसे एक बार उसके घर जाने दिया जाए। वो परिजनों से मिलकर जल्द ही वापस आए जाएगा। तो क्या हमारा सिस्टम ऐसा करेगा। शायद नहीं। तो फिर एंडरसन के मामले में ऐसा कैसे होने दिया गया। क्योंकि एंडरसन को इसी मूर्खतापूर्ण वायदे के आधार पर जाने दिया गया था। हालांकि यह बात गले के नीचे उतर नहीं पा रही है।

तत्कालीन पुलिस अधीक्षक और बाद में डीजीपी पद से रिटायर हुए स्वराज पुरी को दी जा रही सभी सुविधाएं इसलिए हटा ली गई हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी सरकारी कार से एंडरसन को स्टेट हैंगर तक पहुंचाया था। अब अगर कार से स्टेट हैंगर तक छोड़ना इतना बड़ा गुनाह है तो फिर राज्य सरकार के शासकीय विमान का पायलट भी दोषी रहा होगा, जिसने एंडरसन को दिल्ली तक पहुंचाया था।

तो क्या वो “लोग” दोषी नहीं हैं, जिन्होंने इनको “सिस्टम” के नाम पर आदेश दिया हो। उठो भोपाल अब वक्त आ गया है। धोखेबाजों को सबक सिखाने का और अपना हक मांगने का। वरना किसी दिन सिस्टम की आड़ में राहत राशि को भी हजम कर जाएंगे।


उठो भोपाल, दलालों को कुचल दो और अपना हक छीन लो।

Monday, June 14, 2010

लालची नेता ही हैं जिम्मेदार

जहां तक मुझे याद है, (दिसंबर 1984 और उसके बाद के अखबारों और पत्रिकाओं को पढ़कर) भोपाल गैस त्रासदी की घटना के समय जो हो-हल्ला हुआ था, उसके बाद यदि कुछ हो रहा है; तो वो अब हो रहा है। क्या अखबार और क्या टीवी चैनल, सभी के बीच आगे बढ़कर खबर देने की होड़ मची है। कुछ दिन तो खबरों का केंद्र वारेन एंडरसन ही था। हालांकि मोती सिंह और स्वराज पुरी के मुंह खोलने के बाद फोकस में अर्जुन सिंह भी आ गए हैं। खैर, इसे देर से आए पर दुरुस्त आए कहा जा सकता है। लेकिन एक सवाल और है कि आखिर इतने वर्षों तक ये नौकरशाह क्यों अपनी जुबान पर ताला लगाए बैठे रहे। इस समय जो कुछ भी हो रहा है उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि मानो हम सांप निकल जाने के बाद लाठी ही पीट रहे हैं।

देश के नेता जो आदत से मजबूर हैं, एक ही काम करने में लगे हैं। आरोपों का गोबर एक-दूसरे पर फेंक रहे हैं और जता रहे हैं कि उनके ज्यादा पाक साफ तो कोई है ही नहीं। क्या कांग्रेस और क्या भाजपा। सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। दरअसल यह देश की बदकिस्मती ही है कि यहां का नेता जनता को मूर्ख मानकर चलता है और अपने हित साधता रहता है।

तभी तो हर पांच वर्ष बाद बेशर्मी के साथ झूठे वादों का पुलिंदा लिए हर दरवाजे पर वोट के लिए विनती करता है। लेकिन हमारी जनता करे भी तो क्या करे। वोट न देना या फिर 49 (ओ) का प्रयोग कोई स्थायी हल तो नहीं है ना। भ्रष्टाचार हमेशा ऊपर से नीचे आता है। इसलिए अगर तंत्र को सुधारना है और लोगों को इसमें शामिल करना है तो सुधार भी ऊपर से ही शुरू करना होगा।

एक और बात, मेरे मन में हमेशा से एक सवाल सिर उठाता रहा है, कि आखिर कोई भी शख्स जब नेता बनता है तो उसके पास दौलत कहां से आ जाती है। जब बारी आती है संपत्ति के खुलासे की तो बताते हैं कि वो तो “बे”कार, “बे”घर हैं। तो फिर जिन कारों में वो पूरी शानो शौकत से घूमते हैं वो क्या दान में मिली होती है। जब इन नेताओं के पास घर ही नहीं होता है तो ये रहते कहां है। फुटपाथ पर तो कोई नेता दिखाई नहीं देता है। ऐसा झूठ यह साबित करता है कि वाकई हमारे देश के कानून की आंखों पर पट्टी बंधी है।

अचानक मुझे एक बात और याद आई है कि अगर कहीं भूलवश गैस त्रासदी वाले मुद्दे पर किसी नेता या अफसर से पूछताछ की भी गई तो वो शख्स बीमार तो जरूर पड़ जाएगा। क्योंकि यह तो इन लोगों का विशेषाधिकार है। और हां, सबसे पहले चेस्ट पेन ही होता है और फिर कमजोरी आ जाती है। इसलिए इन त्रासदी से जुड़े लोगों से पूछताछ करते समय डॉक्टरों को तो वहां जरूर रखना चाहिए। वरना मामला अगले एक दशक और खिंच सकता है।

ऐसा मत सोचिएगा कि मैं विषय से भटक गया हूं। यह सब याद भी गैस त्रासदी के समान ही जरूरी भी है और कहीं न कहीं जुड़ा भी है। खैर, एंडरसन तो कमर तक कब्र में लटका हुआ है और भारत लाकर भी ना जाने क्या कर लेंगे उसका। जबकि सारे सबूत चीख-चीख कर कह रहे हैं कि एंडरसन इतना ताकतवर नहीं था कि भोपाल से बाहर भाग जाता और सकुशल भारत से निकल पाता। यह बिना राजनीतिक प्रश्रय से हो ही नहीं सकता था।

हालांकि जिम्मेदारी तय होने में अभी वक्त लगेगा, क्योंकि अभी तक इसी पर विचार मंथन हो रहा है कि कैसे तत्कालीन केंद्र सरकार और उसके मुखिया का नाम इस मामले से हटाकर उस समय के एमपी के सीएम पर ही सारी जिम्मेदारी मढ़ दी जाए। वैसे इसकी नौबत आने के आसार अभी थोड़ी दूर हैं क्योंकि फिलहाल तो सब लोग आरोप की गंदगी एक-दूसरे पर फेंकने पर आमादा हैं। कोई कह रहा है कि कांग्रेस जिम्मेदार है। तो कांग्रेस कह रही है कि अर्जुन सिंह जिम्मेदार हैं। कुल मिलाकर किसी एक को बलि का बकरा बनाने की तैयारी की जा रही हे। जबकि दोषी एक नहीं कई हैं।

चाहे उस समय की केंद्र की सरकार रही हो या फिर राज्य की भोपाल गैस त्रासदी के लिए दोनों ही जिम्मेदार हैं। साथ ही जिम्मेदार वो अफसरान भी हैं, जिन्होंने चुपचाप इस पाप में साथ दिया। यदि दस्तावेजों को देखा जाए तो पता चलता है कि एंडरसन को भगाने में एक नहीं कई महान लोग शामिल थे।

कार्टूनः मंजुल जी का है और दैनिक भास्कर से साभार लिया गया है

लालची नेता ही हैं जिम्मेदार

जहां तक मुझे याद है, (दिसंबर 1984 और उसके बाद के अखबारों और पत्रिकाओं को पढ़कर) भोपाल गैस त्रासदी की घटना के समय जो हो-हल्ला हुआ था, उसके बाद यदि कुछ हो रहा है; तो वो अब हो रहा है। क्या अखबार और क्या टीवी चैनल, सभी के बीच आगे बढ़कर खबर देने की होड़ मची है। कुछ दिन तो खबरों का केंद्र वारेन एंडरसन ही था। हालांकि मोती सिंह और स्वराज पुरी के मुंह खोलने के बाद फोकस में अर्जुन सिंह भी आ गए हैं। खैर, इसे देर से आए पर दुरुस्त आए कहा जा सकता है। लेकिन एक सवाल और है कि आखिर इतने वर्षों तक ये नौकरशाह क्यों अपनी जुबान पर ताला लगाए बैठे रहे। इस समय जो कुछ भी हो रहा है उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि मानो हम सांप निकल जाने के बाद लाठी ही पीट रहे हैं।

देश के नेता जो आदत से मजबूर हैं, एक ही काम करने में लगे हैं। आरोपों का गोबर एक-दूसरे पर फेंक रहे हैं और जता रहे हैं कि उनके ज्यादा पाक साफ तो कोई है ही नहीं। क्या कांग्रेस और क्या भाजपा। सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। दरअसल यह देश की बदकिस्मती ही है कि यहां का नेता जनता को मूर्ख मानकर चलता है और अपने हित साधता रहता है।

तभी तो हर पांच वर्ष बाद बेशर्मी के साथ झूठे वादों का पुलिंदा लिए हर दरवाजे पर वोट के लिए विनती करता है। लेकिन हमारी जनता करे भी तो क्या करे। वोट न देना या फिर 49 (ओ) का प्रयोग कोई स्थायी हल तो नहीं है ना। भ्रष्टाचार हमेशा ऊपर से नीचे आता है। इसलिए अगर तंत्र को सुधारना है और लोगों को इसमें शामिल करना है तो सुधार भी ऊपर से ही शुरू करना होगा।

एक और बात, मेरे मन में हमेशा से एक सवाल सिर उठाता रहा है, कि आखिर कोई भी शख्स जब नेता बनता है तो उसके पास दौलत कहां से आ जाती है। जब बारी आती है संपत्ति के खुलासे की तो बताते हैं कि वो तो “बे”कार, “बे”घर हैं। तो फिर जिन कारों में वो पूरी शानो शौकत से घूमते हैं वो क्या दान में मिली होती है। जब इन नेताओं के पास घर ही नहीं होता है तो ये रहते कहां है। फुटपाथ पर तो कोई नेता दिखाई नहीं देता है। ऐसा झूठ यह साबित करता है कि वाकई हमारे देश के कानून की आंखों पर पट्टी बंधी है।

अचानक मुझे एक बात और याद आई है कि अगर कहीं भूलवश गैस त्रासदी वाले मुद्दे पर किसी नेता या अफसर से पूछताछ की भी गई तो वो शख्स बीमार तो जरूर पड़ जाएगा। क्योंकि यह तो इन लोगों का विशेषाधिकार है। और हां, सबसे पहले चेस्ट पेन ही होता है और फिर कमजोरी आ जाती है। इसलिए इन त्रासदी से जुड़े लोगों से पूछताछ करते समय डॉक्टरों को तो वहां जरूर रखना चाहिए। वरना मामला अगले एक दशक और खिंच सकता है।

ऐसा मत सोचिएगा कि मैं विषय से भटक गया हूं। यह सब याद भी गैस त्रासदी के समान ही जरूरी भी है और कहीं न कहीं जुड़ा भी है। खैर, एंडरसन तो कमर तक कब्र में लटका हुआ है और भारत लाकर भी ना जाने क्या कर लेंगे उसका। जबकि सारे सबूत चीख-चीख कर कह रहे हैं कि एंडरसन इतना ताकतवर नहीं था कि भोपाल से बाहर भाग जाता और सकुशल भारत से निकल पाता। यह बिना राजनीतिक प्रश्रय से हो ही नहीं सकता था।

हालांकि जिम्मेदारी तय होने में अभी वक्त लगेगा, क्योंकि अभी तक इसी पर विचार मंथन हो रहा है कि कैसे तत्कालीन केंद्र सरकार और उसके मुखिया का नाम इस मामले से हटाकर उस समय के एमपी के सीएम पर ही सारी जिम्मेदारी मढ़ दी जाए। वैसे इसकी नौबत आने के आसार अभी थोड़ी दूर हैं क्योंकि फिलहाल तो सब लोग आरोप की गंदगी एक-दूसरे पर फेंकने पर आमादा हैं। कोई कह रहा है कि कांग्रेस जिम्मेदार है। तो कांग्रेस कह रही है कि अर्जुन सिंह जिम्मेदार हैं। कुल मिलाकर किसी एक को बलि का बकरा बनाने की तैयारी की जा रही हे। जबकि दोषी एक नहीं कई हैं।

चाहे उस समय की केंद्र की सरकार रही हो या फिर राज्य की भोपाल गैस त्रासदी के लिए दोनों ही जिम्मेदार हैं। साथ ही जिम्मेदार वो अफसरान भी हैं, जिन्होंने चुपचाप इस पाप में साथ दिया। यदि दस्तावेजों को देखा जाए तो पता चलता है कि एंडरसन को भगाने में एक नहीं कई महान लोग शामिल थे।

कार्टूनः मंजुल जी का है और दैनिक भास्कर से साभार लिया गया है

Tuesday, June 8, 2010

मोस्ट वांटेड कौन? पार्ट-2

भोपाल गैस त्रासदी और अदालती आदेश से संबंधित खबरें देशभर के अखबारों में छाई हुई हैं। सबने कानून एवं सरकारों को इसके लिए आड़े हाथ लिया है। हेडलाइंस को जितना हो सका उतना मार्मिक बनाया गया। कहीं जस्टिस बरिड हुआ, तो कहीं इंसाफ दफन हुआ, लेकिन एक सवाल जस का तस मुंह उबाए खड़ा है। कि असल जिम्मेदार आखिर है कौन? यूनियन कार्बाइड, वारेन एंडरसन या फिर वो जिम्मेदार नेता जिन्होंने वहां कारखाना स्थापित होने दिया।

इस पूरे मामले में एक बात गौर करने लायक है, जिस पर कोई भी अखबार या मीडिया हाउस उंगली नहीं उठा रहा है और वह है कि आखिर तत्कालीन सरकार ने उस वक्त कोई भी प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की थी। क्यों इस बात का पता नहीं चल सका कि गिरफ्तार किए गए वारेन एंडरसन को तुरत फुरत में छोड़ दिया गया।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ भी सिर्फ इस मामले को खबर मानते हैं। बरसी का मौका हो या फिर सुनवाई का, हेडलाइन और पैकेज के बाद मामला कहीं दफन हो जाता है। सामाजिक हितों का राग अलापने वाले संस्थानों ने इस मुद्दे को कितनी बार प्रमुखता से उठाया। इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है कि प्रमुख अखबारों में सामाजिक सरोकारों की खबरें न छापने का अघोषित आदेश रहता है। यही वजह है कि ऐसे मुद्दे तभी छपते हैं जब गरमाते हैं। अन्यथा कोई पूछता तक नहीं है।

मानवता के खिलाफ इस षड्यंत्र में वो सभी शामिल कहे जा सकते हैं, जो इसे रोक सकते थे। चाहे वो तत्कालीन मंत्री रहे हों या फिर नौकरशाह। एक और अकाट्य सत्य यह भी है कि इस हादसे में जिनकी भी जानें गईं थीं, वो सब आम लोग थे, वरना न यह मामला इतना लंबा शायद नहीं खिंचता। जिस तरह से सांप के निकलने के बाद लकीर पीटना व्यर्थ है उसी तरह से यह मामला भी रहा। कुल मिलाकर बात यह कि जिसने भी यह पंक्तियां कहीं हैं कि “जस्टिस डिलेड, इज जस्टिस डिनाइड” बिलकुल सही कहीं हैं।


कार्टूनः हिंदुस्तान टाइम्स से साभार