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Monday, July 11, 2011

प्रीत नहीं थी जहां की रीत कभी…


चित्र: पोस्ट ऑन पॉलिटिक्स ब्लॉग से साभार
आज आपको एक ऐसे देश के बारे में बताना चाह रहा हूं, जिसके बारे में शायद आपको काफी कुछ पता होगा। मसलन यह बहुत ही महान देश है, विविधता में एकता इसकी खासियत रही है साथ ही शांति एवं संयम तो यहां की आबो-हवा में घुली हुई हैं। ये सब कुछ ऐसे तर्क हैं जो बचपन से ही किताबों तथा गाथाओं और किवदंतियों के माध्यम से हमें घुट्टी की तरह पिलाए गए हैं। तो ये कहानी है उस देश की जिसे, भारत, इंडिया और हिंदुस्तान जैसे नामों से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहां के लोग शांतिप्रिय, साफ दिल वाले तथा ईमानदार होते हैं।

ये तो रही वो बातें जो हम अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हुए खुद ही कहते हैं तथा इसकी सार्थकता बढ़ाने के लिए इन बातों को स्कूल व कॉलेजों के माध्यम में भी फैलाया जाता है। महाभारत जैसे महाकाव्य तथा रामायण को पूजते हैं। भगवतगीता की मिसालें देते हैं तथा केवल कर्म करने जैसी पाखंडी बातों को बोलते हुए हमारी जुबानें कभी नहीं थकती हैं। जबकि हकीकत में इन सब बातों से शायद ही लेना देना हो किसी का। अब ज़रा ज़मीनी हकीक़त पर नज़र दौड़ाते हैं।

पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सटे गुड़गांव के एक गांव में गांववालों ने एक शख्स को सरेआम जलाकर मार डाला। इस शख्स पर गांव के सरपंच की हत्या का आरोप था। यह घटना पुलिस के सामने ही घटित हुई थी। इस प्रकार की घटनाएं आए दिन देश में होती रहती हैं। जनता तो जनता कई बार पुलिस वाले भी आरोपी के साथ ऐसा कृत्य करते हैं, जिससे इंसानियत शर्मसार हो जाए। हरियाणा, यूपी और बिहार की पुलिस ने तो ऐसे कारनामों में रिकॉर्ड कायम कर रखा है। खुद को शांतिप्रिय कहने वाले ऐसी हरकतें करते हैं क्या?

ये हमारा ही देश है, जहां पर दुनिया के किसी भी अन्य मुल्क के मुकाबले सबसे ज्यादा कन्या भ्रूण हत्याएं की जाती हैं। इसके बाद इज्ज़त व मूंछ के नाम पर होने वाली ऑनर किलिंग इसमें चार चांद लगाती है। भ्रष्टाचार तो मानों एक लाइलाज बीमारी बन चुका है। सत्ता का मद नेताओं में कानून का भय कम कर चुका है। अनेकता में एकता जैसे शब्द बेमानी हो चुके हैं। यदि विश्वास न हो तो बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश तथा महाराष्ट्र जैसे राज्यों की स्थिति देखिए। यहां पर जाति तथा क्षेत्रवाद का बोलबाला है। यदि ऐसा न होता तो हम आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, जैसे राज्यों के रहवासियों को “साउथ इंडियन” नाम की संज्ञा न देते। यदि आप कभी ध्यान दें तो पाएंगे कि लोग दूसरे प्रदेश के लोगों का परिचय कुछ इस अंदाज में देते हैं, कि “मैं फलां बंदे को जानत हूं, वो मराठी है/ उडिया है/ मद्रासी या अन्ना है/ पंजाबी है” आदि।

देश की एकता में मतभेद के सैकड़ों छेद हैं। कुछ महीनों पहले महाराष्ट्र की दो पार्टियों महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना तथा शिवसेना ने उत्तर भारतीयों को “भैया” कहते हुए प्रदेश से खदेड़ने की मुहिम छेड़ रखी थी। एक बार तो दिल्ली की मुख्यमंत्री ने भी कह डाला था कि बाहर से आकर रहने वाले लोगों की वजह से दिल्ली में अपराध बढ़ रहे हैं। तो ये है हमारी एकता और अखंडता। देश में आम नागरिकों जिनमें गरीब भी शामिल हैं के अलावा कोई ऐसा नहीं है, जो कानून से डरता हो। खासकर के नेता, नौकरशाह और रसूखदार प्राणी। उनका यह मानना है कि वो सड़क पर चलकर और इस देश् में रहकर अहसान कर रहे हैं इसलिए उन्हें कुछ भी करने विशेषाधिकार प्राप्त है।

...और तो और कानून बनाने वालों ने कानून की देवी की आंखों में पट्टी इसलिए बांधी थी, ताकि वो शुद्ध न्याय कर सके, लेकिन वही पट्टी उसके लिए बाधा साबित हो रही है। इस पट्टी का फायदा उठाते हुए प्रभावशाली लोग कानून की पहुंच से बाहर चले जाते हैं। फंसते हैं तो कमजोर या फिर ऐसे लोग जिन्हें बचाना जरूरी न हो। मसलन राजनीतिक रूप से किसी को ठिकाने लगाना हो तब भी कानून का सहारा लिया जाता है। हालांकि ए. राजा, कनिमोझी और कुछ अपवाद भी कानून के शिकंजे में हैं। लेकिन मनु शर्मा और पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर जैसे लोग भी हैं, जो कानून के सहारे ही कानून से बचते रहे हैं।

हमारा समाज भी अत्यंत की दोहरे चरित्र वाला है। हो सकता है कि मेरी इस बात से गिनती के लोग ही सहमत हों, पर मैं तब भी अपनी बात पर अटल हूं कि हम दोहरे मापदंडों पर जीने वाले लोग हैं। या फिर कुछ ऐसे कहें कि हम चाहते तो सब हैं, पर खुद कुछ नहीं करना चाहते हैं। मसलन “भगत सिंह पैदा हों, पर हमारे नहीं पड़ोसी के घर पर…”। जी हां, यही है हमारी मानसिकता। हम में से अधिकांश लोग दिन में कम से कम दर्जनों बार दफ्तर के बाहर, सड़कों पर और बाजारों में अपशब्दों का प्रयोग करते हुए लोगों को सुनते ही होंगे। तो तरह-तरह के अलंकरणों के साथ बात करते हैं। बावजूद इसके सार्वजनिक रूप से ऐसी बातों को स्वीकारना हमें पसंद नहीं है। समाज की गंदगी जब किताबों में या पर्दे पर दिखाई जाती है तो आंदोलन करने के बेताब लोग झंडे-बैनर लेकर विरोध करने के लिए उतर जाते हैं।

ऐसे लोगों को क्या कहा जाए? खैर, ये जो भड़ास मैंने शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरी है, उसका सिर्फ एक ही मकसद है कि हम इस मुगालतों में जीना छोड़कर सच्चाई का सामना करें। आगे मर्जी आपकी। धन्यवाद….

Tuesday, May 24, 2011

यह कैसी महाशक्ति है?

कुछ दिनों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बयान जारी कर कहा था, दुनिया के मुल्कों को भारत से शांति की शिक्षा लेनी चाहिए। ओबामा का मानना है कि यदि दक्षिण एशिया में भारत जैसा समझदार और शांतिप्रिय देश नहीं होता, तो यहां के हालात बद्तर हो सकते थे। ओबामा के इस कूटनीतिक बयान को भारत ने सकारात्मक रूप से लिया है। लेकिन क्या शांतिप्रिय बने रहना हमारे देश के लिए हमेशा फायदेमंद रहेगा? शायद नहीं।

अमेरिका जैसा देश अपने फायदे के लिए गधे को भी बाप मानने वालों में से है। यह वही देश है, जिसने ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को तैयार किया था, जो बाद में उसके लिए ही भस्मासुर साबित हुआ था। अब जबकि ओसामा का किस्सा ही खत्म हो चुका है, तब अमेरिका ने पाकिस्तान को यह समझाना शुरू कर दिया है कि वह भारत से दोस्ती बढ़ाए। उधर पाकिस्तान ने अपनी नीतियों में बदलाव करते हुए अपनी निष्ठा को चीन की तरफ दंडवत कर दिया है।

चीन ने भी कह दिया है कि पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई को वो बर्दाश्त नहीं करेगा। चीन का इशारा अमेरिकी सैन्य कार्रवाईयों एवं भारत की ओर से संभावित कार्रवाई है। हालांकि चीन भी यह जानता है कि भारत कभी भी हमले की पहल नहीं करेगा। यहां पर भारत और पाकिस्तान की स्थिति को महाभारत काल से भी जोड़ा जा सकता है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की मां को यह वचन दिया था कि वो शिशुपाल की सौ गलतियों को माफ कर देंगे। लेकिन 101वीं पर वो उसका वध करने के लिए मजबूर होंगे। यहां पर पाकिस्तान की स्थिति को शिशुपाल से जोड़ा तो जा सकता है, पर भारत को श्रीकृष्ण मानना हमारी भूल हो सकती है।

यदि कारगिल के बाद से लेकर अब तक की स्थितियों पर नजर दौड़ाएं तो आपको पता चलेगा कि हमारे देश का बूढ़ा नेतृत्व कितना मजबूर और इच्छाशक्ति विहीन है। कारगिल की घटना को गंभीरता से न लेने के चलते ही हमारी सेना को बड़ी संख्या में हानि उठानी पड़ी थी। उचित रणनीति के अभाव ने कई सैनिकों को जबरन काल के गाल में ढकेल दिया और उस पर भी घोटाले हुए सो अलग। देश के लोकतांत्रिक मंदिर संसद भवन पर पाकिस्तानी आतंकवादियों का हमला हुआ, तो ऐसा लगा मानो इस बार तो आरपार की लड़ाई होगी, लेकिन जो हुआ, उसे क्या संज्ञा दी जाए, समझ नहीं आता।

मुंबई में हमला हुआ तो हम पाकिस्तान से चिट्टी चिट्टी का खेल खेलने में लग गए। भारत उसे मना रहा है कि वो हमले में अपना हाथ होना कबूल कर ले। क्या चोर कभी कहेगा कि उसने चोरी की है। इतना ही नहीं, हद तो इस पर है कि अफजल गुरू नाम के षड्यंत्रकारी को, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुना रखी है, उसे भी हमारा देश दामाद की तरह पाल रहा है। यही हाल मुंबई हमले में पकड़े गए आमिर अजमल कसाब का भी है। उस पर मुकदमा करके उससे कबूल करवाने का प्रयत्न किया जा रहा है, ताकि वह 26/11 के हमले में अपना हाथ होना कबूल ले। इससे ज्यादा हास्यास्पद क्या होगा।

रही सही कसर आज 25 मई को पूरी हो गई, जब पाकिस्तान ने भारत द्वारा दी गई 50 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची को यह कहते हुए लौटा दिया कि पहले भारत यह जांच ले कि इनमें से कितने लोग भारत में रह रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार, नौकरशाह या फिर दोनों। अकर्मण्यता और आपसी समन्वय की कमी के चलते देश की नाक कहीं न कहीं कट ही जाती है। फिर चाहे वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी दूसरे देश का भाषण पढ़ देना हो या फिर इस तरह की सूची बनाना हो, जिसमें दिए गए नाम हमारे ही मोहल्ले में रह रहे हों।

बताइए, हम एक ऐसे विकासशील, मजबूत अर्थव्यवस्था एवं तेजी उभरती हुई महाशक्ति हैं, जिनकी मजबूती में दीमक लगी हुई है। भ्रष्टाचार की दीमक और कामचोरी की दीमक। देश में नौकरशाही अपनी ढपली बजाता है और नेता अपना राग आलापते हैं। कहीं कोई सुरताल नहीं, जिसे जो मर्जी वो कर रहा है। एक दो भ्रष्टाचारी हों तो गिनाएं भी जाएं। यहां इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि दो तीन भ्रष्टाचार नगर बसाए जा सकते हैं।

वैसे यह कभी न खत्म होने वाला विषय है। आप और हम इस पर लाखों पन्नों का महाकाव्य भी लिख सकते हैं। हालांकि यह किस्सा शायद तब भी खत्म न हो।

Wednesday, April 27, 2011

जेब-जंतु


गूगल खोज से साभार
आप सबको रामायण का वह वाकया तो याद होगा जिसमें हनुमान जी चालीस योजन समुद्र लांघकर लंका की ओर जा रहे थे और उनका सामना सुरसा से हुआ था। जी हां, वही सुरसा जो हनुमान जी के कद के बराबर अपना मुंह खोल रही थी। खैर यह तो बात एक असुर की थी, जो अपने शिकार के हिसाब से अपना मुंह बड़ा कर रही थी, लेकिन हमारे देश के नेताओं की भूख या कहें कि उनकी जेब कभी भर ही नहीं सकती है। उसने पूरी दुनिया का पैसा भर दें तब भी उनका लालच खत्म नहीं होगा।

अब उदाहरणों की बात करें, तो हमारे देश का हाल ऐसा है कि एक खोजेंगे तो हजार मिलेंगे। लेकिन अपन तो मध्यप्रदेश की बात करते हैं। लगता है यहां के मंत्रियों को मिलने वाले "अदृश्य भत्ते" कम लगने लगे हैं। यही वजह है कि राज्य शासन ने उनके दैनिक भत्ते बढ़ाने का फैसला लिया है। यह हाल तब है जबकि राज्य में पहले से ही माननीय जनप्रतिनिधियों के लिए पहले से ही काफी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

खास बात यह है कि राज्य के मंत्रियों को अभी मिलने वाला दैनिक भत्ता भी कमतर नहीं कहा जा सकता है। फिलहाल माननीयों को प्रदेश में रहने पर 750 रोजाना और प्रदेश के बाहर रहने पर 900 रुपए दैनिक के हिसाब से भत्ता मिलता है। माननीय विधायकों का भत्ता भी पिछले साल बढ़ चुका है।

विधायकों को राज्य में 600 रुपए और राज्य के बाहर 750 रुपए दैनिक भत्ता मिल रहा है। विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष को 800 रुपए दैनिक भत्ता मिलता है।

इतना ही नहीं इन माननीयों के विदेश दौरे के भत्ते भी रिवाइज़ किए जा रहे हैं। नए तय किए गए विदेश भत्ते में मंत्रियों को 19 डॉलर (845 रुपए) और विधायकों को 16 डॉलर (712 रुपए) दैनिक मिलेगा।

आइए अब आपको बताएं कि मध्यप्रदेश में माननीयों पर किस तरह से सरकार मेहरबान है। सबसे पहले बात करते हैं मंत्रियों कीः
  • सभी मंत्रियों को 62000 रुपए वेतन के अलावा, वाहन, बंगला, स्टाफ, मुफ्त रेल यात्रा, हवाई यात्रा, फोन, फर्नीचर, मुफ्त बिजली, लैपटॉप इत्यादि। पद में न रहने पर भी उन्हें मुफ्त रेल यात्रा तथा मेडिकल सुविधा आजीवन उपलबध रहती है।
  • ऐसी ही व्यवस्था विधायकों के लिए भी है। उन्हें भी मुफ्त आवास, रेल यात्रा, गैस कनेक्शन, वाटर प्यूरीफायर, टीवी, केबल कनेक्शन, फर्नीचर, बिजली, अलमारियां, टेलीफोन कनेक्शन और लैपटॉप इत्यादि दिया जाता है। विधायक न रहने पर भी उन्हें मुफ्त रेल यात्रा तथा मेडिकल सुविधा आजीवन दी जाती है।
सबसे ऊपर यह है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक और व्यवस्था कर दी थी, जिसके मुताबिक कोई भी मुख्यमंत्री जब पद में नहीं रहेगा तथा केवल विधायक रहेगा तब भी उसे सरकारी बंगला एवं लालबत्ती वाली गाड़ी की सुविधा मिली रहेगी। ऐसी ही सुविधा पूर्व विधानसभा अध्यक्षों के लिए भी है।

भत्तो सहित वेतन पर एक नजरः
  • मुख्यमंत्री: 65 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए दैनिक भत्ता
  • मंत्री: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते, प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए प्रतिदिन भत्ता।
  • राज्य मंत्री: 60 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए दैनिक भत्ता
  • विधायक: 50,252 रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते, प्रदेश में 600 और बाहर 750 रुपए दैनिक भत्ता
  • विधान सभा अध्यक्ष: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा 800 रुपए दैनिक भत्ता
  • नेता प्रतिपक्ष: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अतिरिक्त 800 रुपए प्रतिदिन भत्ता। कुल 86 हजार
  • विधान सभा उपाध्यक्ष: 60 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा 800 रुपए दैनिक भत्ता। कुल 84 हजार रुपए।

जेब-जंतु


गूगल खोज से साभार
आप सबको रामायण का वह वाकया तो याद होगा जिसमें हनुमान जी चालीस योजन समुद्र लांघकर लंका की ओर जा रहे थे और उनका सामना सुरसा से हुआ था। जी हां, वही सुरसा जो हनुमान जी के कद के बराबर अपना मुंह खोल रही थी। खैर यह तो बात एक असुर की थी, जो अपने शिकार के हिसाब से अपना मुंह बड़ा कर रही थी, लेकिन हमारे देश के नेताओं की भूख या कहें कि उनकी जेब कभी भर ही नहीं सकती है। उसने पूरी दुनिया का पैसा भर दें तब भी उनका लालच खत्म नहीं होगा।

अब उदाहरणों की बात करें, तो हमारे देश का हाल ऐसा है कि एक खोजेंगे तो हजार मिलेंगे। लेकिन अपन तो मध्यप्रदेश की बात करते हैं। लगता है यहां के मंत्रियों को मिलने वाले "अदृश्य भत्ते" कम लगने लगे हैं। यही वजह है कि राज्य शासन ने उनके दैनिक भत्ते बढ़ाने का फैसला लिया है। यह हाल तब है जबकि राज्य में पहले से ही माननीय जनप्रतिनिधियों के लिए पहले से ही काफी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

खास बात यह है कि राज्य के मंत्रियों को अभी मिलने वाला दैनिक भत्ता भी कमतर नहीं कहा जा सकता है। फिलहाल माननीयों को प्रदेश में रहने पर 750 रोजाना और प्रदेश के बाहर रहने पर 900 रुपए दैनिक के हिसाब से भत्ता मिलता है। माननीय विधायकों का भत्ता भी पिछले साल बढ़ चुका है।

विधायकों को राज्य में 600 रुपए और राज्य के बाहर 750 रुपए दैनिक भत्ता मिल रहा है। विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष को 800 रुपए दैनिक भत्ता मिलता है।

इतना ही नहीं इन माननीयों के विदेश दौरे के भत्ते भी रिवाइज़ किए जा रहे हैं। नए तय किए गए विदेश भत्ते में मंत्रियों को 19 डॉलर (845 रुपए) और विधायकों को 16 डॉलर (712 रुपए) दैनिक मिलेगा।

आइए अब आपको बताएं कि मध्यप्रदेश में माननीयों पर किस तरह से सरकार मेहरबान है। सबसे पहले बात करते हैं मंत्रियों कीः
  • सभी मंत्रियों को 62000 रुपए वेतन के अलावा, वाहन, बंगला, स्टाफ, मुफ्त रेल यात्रा, हवाई यात्रा, फोन, फर्नीचर, मुफ्त बिजली, लैपटॉप इत्यादि। पद में न रहने पर भी उन्हें मुफ्त रेल यात्रा तथा मेडिकल सुविधा आजीवन उपलबध रहती है।
  • ऐसी ही व्यवस्था विधायकों के लिए भी है। उन्हें भी मुफ्त आवास, रेल यात्रा, गैस कनेक्शन, वाटर प्यूरीफायर, टीवी, केबल कनेक्शन, फर्नीचर, बिजली, अलमारियां, टेलीफोन कनेक्शन और लैपटॉप इत्यादि दिया जाता है। विधायक न रहने पर भी उन्हें मुफ्त रेल यात्रा तथा मेडिकल सुविधा आजीवन दी जाती है।
सबसे ऊपर यह है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक और व्यवस्था कर दी थी, जिसके मुताबिक कोई भी मुख्यमंत्री जब पद में नहीं रहेगा तथा केवल विधायक रहेगा तब भी उसे सरकारी बंगला एवं लालबत्ती वाली गाड़ी की सुविधा मिली रहेगी। ऐसी ही सुविधा पूर्व विधानसभा अध्यक्षों के लिए भी है।

भत्तो सहित वेतन पर एक नजरः
  • मुख्यमंत्री: 65 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए दैनिक भत्ता
  • मंत्री: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते, प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए प्रतिदिन भत्ता।
  • राज्य मंत्री: 60 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा प्रदेश में 750 और बाहर 900 रुपए दैनिक भत्ता
  • विधायक: 50,252 रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते, प्रदेश में 600 और बाहर 750 रुपए दैनिक भत्ता
  • विधान सभा अध्यक्ष: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा 800 रुपए दैनिक भत्ता
  • नेता प्रतिपक्ष: 62 हजार वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अतिरिक्त 800 रुपए प्रतिदिन भत्ता। कुल 86 हजार
  • विधान सभा उपाध्यक्ष: 60 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते। इसके अलावा 800 रुपए दैनिक भत्ता। कुल 84 हजार रुपए।

Saturday, January 15, 2011

भ्रष्टाचार का नया मीटर

2010 के भ्रष्टाचार इंडेक्स के मुताबिक भारत आज भी वहीं है, जहां वह 15 वर्ष पहले था। तो क्या इसका यह मतलब निकलता है कि वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार ही हमारी पहचान है?

यह दुनियाभर में फैले भ्रष्टाचार का नक्शा है।

ऐसे देश जहां, भ्रष्टाचार नहीं है, उन्हें सुर्ख लाल रंग से दर्शाया गया है, जबकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए देशों को पीले रंग से दिखाया गया है। डेनमार्क को दुनिया के सबसे ज्यादा स्वच्छ छवि वाला या फिर यूं कहें कि भद्र राष्ट्र कहा गया है। सोमालिया को दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश कहा गया है। इस अफ्रीकी देश को भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में 178वां स्थान दिया गया है।

इस नक्शे को वर्ष 2010 के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक के आधार पर बनाया गया है, इसका मूल आधार ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट है। भ्रष्टाचारी देशों की सूची को दर्जनों सर्वेक्षण के बाद बनाया गया है। इसमें कई बड़े व्यापारियों की मदद ली गई है, जिन्हें इन देशों के साथ काम करने के दौरान वहां के भ्रष्टाचार के बारे में पता चला।

चीन को भी अत्यधिक भ्रष्ट देशों की फेहरिस्त में 78वां स्थान मिला है। हमारे देश यानी भारत का हाल चीन से भी ज्यादा खराब है। भारत को 87वां स्थान मिला है। हालांकि हम यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि हमारे पड़ोसी मुल्कों जैसेः श्रीलंका (91), बांग्लादेश (134), पाकिस्तान (143) एवं नेपाल (146) से हमारी स्थिति कुछ हद तक बेहतर दिखाई देती है। हमारे देश के लिए एक और खुशी की बात यह भी हो सकती है कि भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में हमारे पड़ोसी मुल्कों का स्थान शुरू से वही है, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पहली प्रकाशित रिपोर्ट में था। हालांकि ऐसा क्यों है इस बारे में आपको बाद में बताएंगे। फिलहाल नक्शे पर ही बात करते हैं।

यूरोप जैस धनी देशों को पीले रंग से दिखाया गया है, जबकि गरीब देशों को लाल रंग में। अफ्रीका तथा एशियाई देश भी इसी रंग से दिखाई गए हैं। क्या इससे मन में सवाल नहीं उठते हैं। इस नक्शे में प्रोटेस्टेंट एवं कैथोलिक देशों तथा अन्य देशों के बीच की रेखा साफ दिखाई देती है।

सारे प्रोटेस्टेंट देश इस सूची में शीर्ष पर हैं। डेनमार्क एवं न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से नंबर एक पर हैं। फिनलैंड तथा स्वीडन भी क्रमशः चार एवं पांच नंबर पर हैं। कनाडा नंबर छह पर है, जहां की आबादी का 40% हिस्सा कैथोलिक है। नीदरलैंड्स (7), ऑस्ट्रेलिया (8), स्विट्ज़रलैंड 9वें स्थान पर है और यहां की आबादी में 40% हिस्सा कैथोलिक्स का है तथा नॉर्वे 10वें स्थान पर है।

निचले पायदान पर मौजूद प्रोटेस्टेंट देशों का क्रम भी 22 पर आकर रुक जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका इस क्रम की शोभा बढ़ा रहा है। वहीं ब्रिटेन 20वें स्थान पर तथा जर्मन 15वें स्थान पर है। गैर प्रोटेस्टेंट देशों में से केवल सिंगापुर ही है जो शीर्षक्रम यानी 10वें स्थान पर है। 11वें नंबर पर लक्ज़मबर्ग है, जो कैथोलिक देश है।
दुनियाभर के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि कैथोलिक देश, प्रोटेस्टेंट देशों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट हैं। लातिन अमेरिका का चिली अपवाद स्वरूप दिखाई दे रहा है, जिसको सूची में 21वां स्थान दिया गया है। हालांकि इसके चारों तरफ लाल रंग वाले देशों की संख्या ज्यादा दिखाई दे रही है। ब्राज़ील (69), पनामा (73), कोलंबिया (78), मेक्सिको (98), अर्जेंटीना (105), बोलिविया (110), एक्वाडोर (127) एवं वेनेज़ुएला (164) नए प्रकार के कैथोलिक देशों का ज्यादा प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

लंबे चले संघर्ष एवं तीन हजार लोगों के बलिदान के बाद तानाशाही से आज़ाद होकर चिली ने संपन्नता हासिल की है। वर्तमान में यह दक्षिणी अमेरिका का सबसे कम भ्रष्ट तथा संपन्न देश है।

आज इस अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र तथा पूर्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं यानी जापान (17), दक्षिण कोरिया (39) तथा सिंगापुर के साथ गिना जाता है।

साभारः लेख वरिष्ठ स्तंभकार एवं पत्रकार श्री आकार पटेल जी के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है। उनका यह लेख अंग्रेजी बिजनेस अखबार मिंट के साप्ताहिक परिशिष्ठ लाउंज में छपा है।

भ्रष्टाचार का नया मीटर

2010 के भ्रष्टाचार इंडेक्स के मुताबिक भारत आज भी वहीं है, जहां वह 15 वर्ष पहले था। तो क्या इसका यह मतलब निकलता है कि वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार ही हमारी पहचान है?

यह दुनियाभर में फैले भ्रष्टाचार का नक्शा है।

ऐसे देश जहां, भ्रष्टाचार नहीं है, उन्हें सुर्ख लाल रंग से दर्शाया गया है, जबकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए देशों को पीले रंग से दिखाया गया है। डेनमार्क को दुनिया के सबसे ज्यादा स्वच्छ छवि वाला या फिर यूं कहें कि भद्र राष्ट्र कहा गया है। सोमालिया को दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश कहा गया है। इस अफ्रीकी देश को भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में 178वां स्थान दिया गया है।

इस नक्शे को वर्ष 2010 के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक के आधार पर बनाया गया है, इसका मूल आधार ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट है। भ्रष्टाचारी देशों की सूची को दर्जनों सर्वेक्षण के बाद बनाया गया है। इसमें कई बड़े व्यापारियों की मदद ली गई है, जिन्हें इन देशों के साथ काम करने के दौरान वहां के भ्रष्टाचार के बारे में पता चला।

चीन को भी अत्यधिक भ्रष्ट देशों की फेहरिस्त में 78वां स्थान मिला है। हमारे देश यानी भारत का हाल चीन से भी ज्यादा खराब है। भारत को 87वां स्थान मिला है। हालांकि हम यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि हमारे पड़ोसी मुल्कों जैसेः श्रीलंका (91), बांग्लादेश (134), पाकिस्तान (143) एवं नेपाल (146) से हमारी स्थिति कुछ हद तक बेहतर दिखाई देती है। हमारे देश के लिए एक और खुशी की बात यह भी हो सकती है कि भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में हमारे पड़ोसी मुल्कों का स्थान शुरू से वही है, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पहली प्रकाशित रिपोर्ट में था। हालांकि ऐसा क्यों है इस बारे में आपको बाद में बताएंगे। फिलहाल नक्शे पर ही बात करते हैं।

यूरोप जैस धनी देशों को पीले रंग से दिखाया गया है, जबकि गरीब देशों को लाल रंग में। अफ्रीका तथा एशियाई देश भी इसी रंग से दिखाई गए हैं। क्या इससे मन में सवाल नहीं उठते हैं। इस नक्शे में प्रोटेस्टेंट एवं कैथोलिक देशों तथा अन्य देशों के बीच की रेखा साफ दिखाई देती है।

सारे प्रोटेस्टेंट देश इस सूची में शीर्ष पर हैं। डेनमार्क एवं न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से नंबर एक पर हैं। फिनलैंड तथा स्वीडन भी क्रमशः चार एवं पांच नंबर पर हैं। कनाडा नंबर छह पर है, जहां की आबादी का 40% हिस्सा कैथोलिक है। नीदरलैंड्स (7), ऑस्ट्रेलिया (8), स्विट्ज़रलैंड 9वें स्थान पर है और यहां की आबादी में 40% हिस्सा कैथोलिक्स का है तथा नॉर्वे 10वें स्थान पर है।

निचले पायदान पर मौजूद प्रोटेस्टेंट देशों का क्रम भी 22 पर आकर रुक जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका इस क्रम की शोभा बढ़ा रहा है। वहीं ब्रिटेन 20वें स्थान पर तथा जर्मन 15वें स्थान पर है। गैर प्रोटेस्टेंट देशों में से केवल सिंगापुर ही है जो शीर्षक्रम यानी 10वें स्थान पर है। 11वें नंबर पर लक्ज़मबर्ग है, जो कैथोलिक देश है।
दुनियाभर के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि कैथोलिक देश, प्रोटेस्टेंट देशों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट हैं। लातिन अमेरिका का चिली अपवाद स्वरूप दिखाई दे रहा है, जिसको सूची में 21वां स्थान दिया गया है। हालांकि इसके चारों तरफ लाल रंग वाले देशों की संख्या ज्यादा दिखाई दे रही है। ब्राज़ील (69), पनामा (73), कोलंबिया (78), मेक्सिको (98), अर्जेंटीना (105), बोलिविया (110), एक्वाडोर (127) एवं वेनेज़ुएला (164) नए प्रकार के कैथोलिक देशों का ज्यादा प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

लंबे चले संघर्ष एवं तीन हजार लोगों के बलिदान के बाद तानाशाही से आज़ाद होकर चिली ने संपन्नता हासिल की है। वर्तमान में यह दक्षिणी अमेरिका का सबसे कम भ्रष्ट तथा संपन्न देश है।

आज इस अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र तथा पूर्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं यानी जापान (17), दक्षिण कोरिया (39) तथा सिंगापुर के साथ गिना जाता है।

साभारः लेख वरिष्ठ स्तंभकार एवं पत्रकार श्री आकार पटेल जी के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है। उनका यह लेख अंग्रेजी बिजनेस अखबार मिंट के साप्ताहिक परिशिष्ठ लाउंज में छपा है।

Sunday, August 8, 2010

खबरों से घबराता तंत्र

गिरीश मिश्र। आजकल कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दे सिर चढ़कर बोल रहे हैं. मीडिया के हर रोज के खुलासे फिलहाल आरोपों की शक्ल में सुर्खियां बन रहे हैं. आईपीएल के ललित मोदी जैसी हालत सुरेश कलमाडी की भी हो गई है. संभव है कि मीडिया टनयल में कुछ ज्यादा ही प्रचार-दुष्प्रचार हो रहा हो, लेकिन लाखों-करोड़ों के स्पष्ट घोटाले जिस तरह से सामने आए हैं, उनमें से अनेक में तो कुछ कहने को भी नहीं रह जाता. जैसे एक लाख का टेन्ड मिल 10 लाख में, और वो भी किराए पर. चार हजार में टिश्यू पेपर का रोल, 40 हजार का एसी दो लाख रुपए में किराए पर, छह हजार में छतरी. आखिर ये क्या है? केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़ी कुल सोलह परियोजनाओं की जांच की. पता चला है कि ज्यादातर में घटिया क्वालिटी का सामान लगा है. प्रोजेक्ट की लागत भी काफी बढाकर लगाई गई है. मजे की बात है कि पकड़े न जाएं, इसलिए परियोजना पूरी होने के जाली सर्टिफिकेट भी बनाए गए.

फर्जी विदेशी संस्थाओं को भी लाखों-करोड़ों का भुगतान किया गया है, जाहिर है नेता, नौकरशाह, दलाल, बिल्डर - सभी की विभिन्न स्तरों पर अनियमितता में मिलीभगत है. तो ये हालत है 50-55 दिनों बाद होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी की. मीडिया के खुलासे के बाद संसद में भी भारी हंगामा रहा. सरकार की ओर से सफाई पेश की जा रही है. शुक्रवार को जयपाल रेड्डी ने इसी क्रम में कहा कि वास्तविक खर्च साढे 11 हजार करोड़ का है, लाख या डेढ लाख का नहीं, जैसा कि मीडिया में प्रचारित किया जा रहा है. शुक्र है कि रेड्डी साहब ने ये भी कहा कि सरकार इन मामलों की सीबीआई से भी जांच करा सकती है.

उधर, कलमाडी भी जांच की बात कर रहे हैं, लेकिन वो खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष पद को छोड़ने को तैयार नहीं हैं. उनका तर्क है कि ''इस खेल के आयोजन को दुनिया के सामने मैंने बच्चे की तरह पेश किया है. इसे किसी और की गलती के कारण मैं अधर में कैसे छोड़ सकता हूं. यह आयोजन मेरे लिए चुनौती जैसा है.'' लेकिन कलमाडीजी का ये भी कहना है कि यदि उनसे प्रधानमंत्री या पार्टी हाईकमान पद छोड़ने को कहेगा तो वो जरूर अध्यक्ष पद से हट जाएंगे. सवाल है कि जिस तरह के खुलासे हर रोज नई मिसाइल दागे जाने की तरह सामने आए हैं, उसके बाद कहने को क्या रह जाता है. वैसे भी राजनीति हो या सार्वजनिक जीवन, उसमें नैतिक संदर्भ को कहने की नहीं, समझने की जरूरत होती है. यह अलग बात है कि कोई इसे कितना समझता है और न समझने पर जनता को भी कभी-कभी समझाने की पहल करनी पड़ती है.

यह तो रही खेल, कलमाडी और उनसे जुडे़ लोगों को लेकर उठती सुर्खियों की चर्चा. लेकिन यहां गौरतलब ये है कि मीडिया, नई टेक्नोलॉजी और नई लोकतांत्रिक चाहत में बढता खबरों का दायरा अब उस माहौल की बात कर रहा है, जिसमें अब कुछ भी छिपा कर रखना मुश्किल होता जा रहा है. इधर बीच राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह से भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग का लगातार खुलासा हुआ है, वह किसी से छुपा नहीं है.

करोड़ों-अरबों को पानी की तरह बहाने वाले ललित मोदी की सुर्खियों की स्याही सूखी भी न थी कि कर्नाटक-आंध्र में खनन माफिया रेड्डी बंधुओं और उनके सियासी, प्रशासनिक, व्यावसायिक गठजोड़ की परतें उघड़ने लगीं, लोग अभी दांतों तले उंगलियां दबा ही रहे थे कि राष्ट्रीय महिला हॉकी के कोच कौशिक का कच्चा चिट्ठा सामने आ गया. रुचिका कांड में राठौड की संलिप्तता और कानून के शासन को ठेंगा चिढाते उनके सियासी-प्रशासनिक गठजोड़ के तार भी जब एक-एक कर उघड़ने लगे तो लोग चौंके ही नहीं थे, बल्कि लोगों का विश्वास बढा था जम्हूरियत में और उसकी रगों में रुधिर के रूप में दौड़ते उस मीडिया की ताकत में, जिसे अनेक बार बातचीत में बेसिर-पैर की खबरों को प्रचारित-प्रसारित करने वाला भी मान लिया जाता है.

आप क्या कहेंगे पिछले दिनों वेबसाइट विकीलीक्स द्वारा उजागर किए गए लगभग नब्बे हजार अमेरिकी रक्षा विभाग के दस्तावेजों के खुलासे पर. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के तालिबानियों और दूसरे आतंकी संगठनों के रिश्तों की परतें तो उघड़ी ही है, साथ ही वाशिंगटन-इस्लामाबाद की उस गुप्त गठजोड़ की कलई भी खुली है, जिसकी ओर भारत लंबे समय से इशारा करता रहा है. दिलचस्प तो ये है कि इस खुलासे के बाद खुद राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बयान दिया कि विकीलीक्स ने कुछ ऐसा नया नहीं कहा है, जो लोग पहले से न जानते हों.

सवाल है कि यदि अमेरिका पहले से ये सब जानता था तो औरों की छोड़ें, उसने खुद अपने राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में इसे रोका क्यों नहीं और दुनिया के सामने आतंक से लड़ने और उसके खिलाफ एकजुट होने की थोथी घोषणाएं क्यों कर रहा था? और, यदि वाशिंगटन इस खुलासे से वाकई चिंतित नहीं है तो क्यों उन 15 हजार दस्तावेजों को पेंटागन और एफबीआई अब विकीलीक्स से वापस मांग रहे हैं, जिनका खुलासा विकीलीक्स ने खुद व्यापक सुरक्षा के मद्देनजर नहीं किया था?

तो ये है खबरों की दुनिया की ताकत और सत्ता का चरित्र. जब दुनिया भर के अखबारों और मीडिया जगत में विकीलीक्स के हजारों दस्तावेजी खुलासे की चर्चा हो रही थी तो सत्ता में बैठे लोग इसे झुठलाने और बेकार की चीज बताने पर आमादा थे. लेकिन बाद में वही तंत्र अब इसकी वापसी की मांग कर रहा है और तर्क है कि इसके खुलासे से अफगानी जनता, वहां मौजूद अमेरिकी सेना और बहुतों की जान को खतरा हो सकता है तथा और भी व्यापक स्तर पर क्षति हो सकती है.

गौर करने की बात ये भी है कि अमेरिकी सरकार विकीलीक्स को धमका भी रही है कि यदि उसने 15 हजार दस्तावेजों को वापस नहीं किया तो सरकार उसे हासिल करने के लिए दूसरे विकल्पों पर भी विचार करेगी. गौर करने की बात है कि सत्ता का चरित्र कभी भी ऐसे खुलासे को बर्दाश्त नहीं कर पाता, जिसमें उसकी किसी भी कमी को उजागर किया गया हो. पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि यह गलत है, मनगढंत है. लेकिन जब सच्चाई की ताकत जोर पकड़ती है, तो झूठी अकड़ को भीगी बिल्ली बनते भी देखा जा सकता है. चाहे वो ललित मोदी हों, राठौड़ हों, कौशिक हों या फिर अमेरिकी सरकार और उस तंत्र पर काबिज शीर्षस्थ लोग.

लेकिन ऐसा लिखने का तात्पर्य ये भी नहीं है कि मीडिया कभी तिल का ताड़ नहीं बनाता या फिर गलत खबरें निहित स्वार्थ में नहीं उछालता. इस संदर्भ में तो यही कहा जा सकता है कि मीडिया को खुद अपनी मर्यादा तय करनी होगी. विवेकजनित-संयम का परिचय भी देना होगा. और, यहां भी लोकतंत्र की अंतिम निर्णायक शक्ति जनता की चेतना को स्वीकार करना होगा, जो बहुत से मसलों पर अंतिम फैसले का हक रखने की तरह ही मीडिया पर भी मित्रवत नियंत्रण में सक्षम है. बात चूंकि मीडिया की हो रही है और हाल की खबरों के जरिए लोकतांत्रिक कलेवर की मजबूती की भी. ऐसे में एक और खबर का जिक्र करना चाहूंगा कि सेना में खराब राशन का मामला उजागर होने के तीन दिनों बाद ही नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने इसी शुक्रवार को तीन हजार करोड़ की अनियमितताओं का भी खुलासा किया है. यह घोटाला संवेदनशील हथियारों की खरीद में किया गया है.

तो बात चाहे सेना की हो या लाखों टन अनाज के गोदामों में सड़ने की, खेल की तैयारियों के नाम पर घोटालों की हो या फिर सत्ता मद में भ्रष्ट या किसी निर्दोष की जान से खेलने के आचरण की या फिर एक ध्रुवीय दुनिया के शिखर पर बैठे देश के झूठे प्रवचनों की कलई खोलने की - लोकतंत्र की जीवंतता के लिए खबरों की दुनिया का सचेत रहना उतना ही जरूरी है, जितना किसी भी जीव के लिए ऑक्सीजन की अपरिहार्यता. काश! इस तथ्य को सत्ता मद का चरित्र भी समझ पाता. लेकिन बढती लोकतांत्रिक समझ और जागरूकता में इतनी कामना तो हम कर ही सकते हैं कि सभ्य और सुशिक्षित होती दुनिया वक्त के साथ जहां उच्श्रृंखलत छोड़ थोड़ी मर्यादा और संयम की ओर बढेगी, वहीं मीडिया की आलोचना को सुधारात्मक दवा समझ फ्रेंडली लेना भी सीख जाएगी.

और अंत में-

इस वास्ते उठाई है
तेरी बुराइयां
डरता हूं कि और न
तुझसे बुरा मिले.
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लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं। उनका यह लेख  'लोकमत समाचार' से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीशजी से girishmisra@lokmat.com पर संपर्क किया जा सकता है। आपका पन्ना ने यह लेख भड़ास4मीडिया डॉट कॉम से साभार लिया है।

खबरों से घबराता तंत्र

गिरीश मिश्र। आजकल कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दे सिर चढ़कर बोल रहे हैं. मीडिया के हर रोज के खुलासे फिलहाल आरोपों की शक्ल में सुर्खियां बन रहे हैं. आईपीएल के ललित मोदी जैसी हालत सुरेश कलमाडी की भी हो गई है. संभव है कि मीडिया टनयल में कुछ ज्यादा ही प्रचार-दुष्प्रचार हो रहा हो, लेकिन लाखों-करोड़ों के स्पष्ट घोटाले जिस तरह से सामने आए हैं, उनमें से अनेक में तो कुछ कहने को भी नहीं रह जाता. जैसे एक लाख का टेन्ड मिल 10 लाख में, और वो भी किराए पर. चार हजार में टिश्यू पेपर का रोल, 40 हजार का एसी दो लाख रुपए में किराए पर, छह हजार में छतरी. आखिर ये क्या है? केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़ी कुल सोलह परियोजनाओं की जांच की. पता चला है कि ज्यादातर में घटिया क्वालिटी का सामान लगा है. प्रोजेक्ट की लागत भी काफी बढाकर लगाई गई है. मजे की बात है कि पकड़े न जाएं, इसलिए परियोजना पूरी होने के जाली सर्टिफिकेट भी बनाए गए.

फर्जी विदेशी संस्थाओं को भी लाखों-करोड़ों का भुगतान किया गया है, जाहिर है नेता, नौकरशाह, दलाल, बिल्डर - सभी की विभिन्न स्तरों पर अनियमितता में मिलीभगत है. तो ये हालत है 50-55 दिनों बाद होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी की. मीडिया के खुलासे के बाद संसद में भी भारी हंगामा रहा. सरकार की ओर से सफाई पेश की जा रही है. शुक्रवार को जयपाल रेड्डी ने इसी क्रम में कहा कि वास्तविक खर्च साढे 11 हजार करोड़ का है, लाख या डेढ लाख का नहीं, जैसा कि मीडिया में प्रचारित किया जा रहा है. शुक्र है कि रेड्डी साहब ने ये भी कहा कि सरकार इन मामलों की सीबीआई से भी जांच करा सकती है.

उधर, कलमाडी भी जांच की बात कर रहे हैं, लेकिन वो खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष पद को छोड़ने को तैयार नहीं हैं. उनका तर्क है कि ''इस खेल के आयोजन को दुनिया के सामने मैंने बच्चे की तरह पेश किया है. इसे किसी और की गलती के कारण मैं अधर में कैसे छोड़ सकता हूं. यह आयोजन मेरे लिए चुनौती जैसा है.'' लेकिन कलमाडीजी का ये भी कहना है कि यदि उनसे प्रधानमंत्री या पार्टी हाईकमान पद छोड़ने को कहेगा तो वो जरूर अध्यक्ष पद से हट जाएंगे. सवाल है कि जिस तरह के खुलासे हर रोज नई मिसाइल दागे जाने की तरह सामने आए हैं, उसके बाद कहने को क्या रह जाता है. वैसे भी राजनीति हो या सार्वजनिक जीवन, उसमें नैतिक संदर्भ को कहने की नहीं, समझने की जरूरत होती है. यह अलग बात है कि कोई इसे कितना समझता है और न समझने पर जनता को भी कभी-कभी समझाने की पहल करनी पड़ती है.

यह तो रही खेल, कलमाडी और उनसे जुडे़ लोगों को लेकर उठती सुर्खियों की चर्चा. लेकिन यहां गौरतलब ये है कि मीडिया, नई टेक्नोलॉजी और नई लोकतांत्रिक चाहत में बढता खबरों का दायरा अब उस माहौल की बात कर रहा है, जिसमें अब कुछ भी छिपा कर रखना मुश्किल होता जा रहा है. इधर बीच राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह से भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग का लगातार खुलासा हुआ है, वह किसी से छुपा नहीं है.

करोड़ों-अरबों को पानी की तरह बहाने वाले ललित मोदी की सुर्खियों की स्याही सूखी भी न थी कि कर्नाटक-आंध्र में खनन माफिया रेड्डी बंधुओं और उनके सियासी, प्रशासनिक, व्यावसायिक गठजोड़ की परतें उघड़ने लगीं, लोग अभी दांतों तले उंगलियां दबा ही रहे थे कि राष्ट्रीय महिला हॉकी के कोच कौशिक का कच्चा चिट्ठा सामने आ गया. रुचिका कांड में राठौड की संलिप्तता और कानून के शासन को ठेंगा चिढाते उनके सियासी-प्रशासनिक गठजोड़ के तार भी जब एक-एक कर उघड़ने लगे तो लोग चौंके ही नहीं थे, बल्कि लोगों का विश्वास बढा था जम्हूरियत में और उसकी रगों में रुधिर के रूप में दौड़ते उस मीडिया की ताकत में, जिसे अनेक बार बातचीत में बेसिर-पैर की खबरों को प्रचारित-प्रसारित करने वाला भी मान लिया जाता है.

आप क्या कहेंगे पिछले दिनों वेबसाइट विकीलीक्स द्वारा उजागर किए गए लगभग नब्बे हजार अमेरिकी रक्षा विभाग के दस्तावेजों के खुलासे पर. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के तालिबानियों और दूसरे आतंकी संगठनों के रिश्तों की परतें तो उघड़ी ही है, साथ ही वाशिंगटन-इस्लामाबाद की उस गुप्त गठजोड़ की कलई भी खुली है, जिसकी ओर भारत लंबे समय से इशारा करता रहा है. दिलचस्प तो ये है कि इस खुलासे के बाद खुद राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बयान दिया कि विकीलीक्स ने कुछ ऐसा नया नहीं कहा है, जो लोग पहले से न जानते हों.

सवाल है कि यदि अमेरिका पहले से ये सब जानता था तो औरों की छोड़ें, उसने खुद अपने राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में इसे रोका क्यों नहीं और दुनिया के सामने आतंक से लड़ने और उसके खिलाफ एकजुट होने की थोथी घोषणाएं क्यों कर रहा था? और, यदि वाशिंगटन इस खुलासे से वाकई चिंतित नहीं है तो क्यों उन 15 हजार दस्तावेजों को पेंटागन और एफबीआई अब विकीलीक्स से वापस मांग रहे हैं, जिनका खुलासा विकीलीक्स ने खुद व्यापक सुरक्षा के मद्देनजर नहीं किया था?

तो ये है खबरों की दुनिया की ताकत और सत्ता का चरित्र. जब दुनिया भर के अखबारों और मीडिया जगत में विकीलीक्स के हजारों दस्तावेजी खुलासे की चर्चा हो रही थी तो सत्ता में बैठे लोग इसे झुठलाने और बेकार की चीज बताने पर आमादा थे. लेकिन बाद में वही तंत्र अब इसकी वापसी की मांग कर रहा है और तर्क है कि इसके खुलासे से अफगानी जनता, वहां मौजूद अमेरिकी सेना और बहुतों की जान को खतरा हो सकता है तथा और भी व्यापक स्तर पर क्षति हो सकती है.

गौर करने की बात ये भी है कि अमेरिकी सरकार विकीलीक्स को धमका भी रही है कि यदि उसने 15 हजार दस्तावेजों को वापस नहीं किया तो सरकार उसे हासिल करने के लिए दूसरे विकल्पों पर भी विचार करेगी. गौर करने की बात है कि सत्ता का चरित्र कभी भी ऐसे खुलासे को बर्दाश्त नहीं कर पाता, जिसमें उसकी किसी भी कमी को उजागर किया गया हो. पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि यह गलत है, मनगढंत है. लेकिन जब सच्चाई की ताकत जोर पकड़ती है, तो झूठी अकड़ को भीगी बिल्ली बनते भी देखा जा सकता है. चाहे वो ललित मोदी हों, राठौड़ हों, कौशिक हों या फिर अमेरिकी सरकार और उस तंत्र पर काबिज शीर्षस्थ लोग.

लेकिन ऐसा लिखने का तात्पर्य ये भी नहीं है कि मीडिया कभी तिल का ताड़ नहीं बनाता या फिर गलत खबरें निहित स्वार्थ में नहीं उछालता. इस संदर्भ में तो यही कहा जा सकता है कि मीडिया को खुद अपनी मर्यादा तय करनी होगी. विवेकजनित-संयम का परिचय भी देना होगा. और, यहां भी लोकतंत्र की अंतिम निर्णायक शक्ति जनता की चेतना को स्वीकार करना होगा, जो बहुत से मसलों पर अंतिम फैसले का हक रखने की तरह ही मीडिया पर भी मित्रवत नियंत्रण में सक्षम है. बात चूंकि मीडिया की हो रही है और हाल की खबरों के जरिए लोकतांत्रिक कलेवर की मजबूती की भी. ऐसे में एक और खबर का जिक्र करना चाहूंगा कि सेना में खराब राशन का मामला उजागर होने के तीन दिनों बाद ही नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने इसी शुक्रवार को तीन हजार करोड़ की अनियमितताओं का भी खुलासा किया है. यह घोटाला संवेदनशील हथियारों की खरीद में किया गया है.

तो बात चाहे सेना की हो या लाखों टन अनाज के गोदामों में सड़ने की, खेल की तैयारियों के नाम पर घोटालों की हो या फिर सत्ता मद में भ्रष्ट या किसी निर्दोष की जान से खेलने के आचरण की या फिर एक ध्रुवीय दुनिया के शिखर पर बैठे देश के झूठे प्रवचनों की कलई खोलने की - लोकतंत्र की जीवंतता के लिए खबरों की दुनिया का सचेत रहना उतना ही जरूरी है, जितना किसी भी जीव के लिए ऑक्सीजन की अपरिहार्यता. काश! इस तथ्य को सत्ता मद का चरित्र भी समझ पाता. लेकिन बढती लोकतांत्रिक समझ और जागरूकता में इतनी कामना तो हम कर ही सकते हैं कि सभ्य और सुशिक्षित होती दुनिया वक्त के साथ जहां उच्श्रृंखलत छोड़ थोड़ी मर्यादा और संयम की ओर बढेगी, वहीं मीडिया की आलोचना को सुधारात्मक दवा समझ फ्रेंडली लेना भी सीख जाएगी.

और अंत में-

इस वास्ते उठाई है
तेरी बुराइयां
डरता हूं कि और न
तुझसे बुरा मिले.
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लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं। उनका यह लेख  'लोकमत समाचार' से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीशजी से girishmisra@lokmat.com पर संपर्क किया जा सकता है। आपका पन्ना ने यह लेख भड़ास4मीडिया डॉट कॉम से साभार लिया है।