Monday, July 6, 2009

क्या है पुलिस के मायने

सभी ब्लॉगर साथियों को नमस्कार।

काफी समय बाद कुछ लिख रहा हूं। मन तो रोज ही होता है पर इंसानी फितरत यानी आलस्य कि कल लिख लेंगे, की वजह से नहीं लिख पा रहा था। कई दिनों से मेरे मन में एक बात घूम रही है। हालांकि हम लोग हमेशा ही इस विषय पर बात करते रहते हैं, लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि पूरा मामला बातों पर ही खत्म हो जाता है। मुद्दा टीवी चैनलों की भाषा में तो काफी गंभीर कहा जा सकता है। लेकिन यहां भी बात किसी मुकाम तक नहीं पहुंच पाती है।

खैर, मैं शब्दों का इस्तेमाल आपको बोर करने के लिए नहीं करुंगा, क्योंकि जानता हूं कि वक्त कीमती होता है। मेरे मन में जो बात हलचल मचा रही है वह है हमारी सड़ी हुई पुलिस व्यवस्था की। एक ऐसी व्यवस्था जिसका खौफ अपराधियों में है ही नहीं। मैं आपका ध्यान कुछ हालिया घटनाऒं की ऒर दिलाना चाहता हूं।

बात है भोपाल में कुछ दिनों पहले हुए सामूहिक बलात्कार की। जब घटना हुई तो सबसे पहले पुलिस पर निशाना साधा गया। फिर शुरु हुई आनन फानन में होने वाली जांच। ऐसी जांच जिनके परिणाम विरली परिस्थियों में ही प्राप्त होते हैं। लेकिन आपको यह नहीं लगता है कि देश में बलात्कार और हत्याएं आम बात बनती जा रही हैं। लॉ एंड ऑर्डर जैसी व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी सी लगती है। नेताऒं को एक दूसरे पर कीचड़ उछालने भ्रष्टाचार मचाने और थोथी घोषणाएं करने से फुरसत ही नहीं है। वैसे इसके पीछे दोष किसका है। क्या सिर्फ नेताऒं और पुलिस का नहीं। समाज और जनता का भी है। सबकुछ एक दूसरे से बंधा हुआ है। यानी की सिस्टम ही सड़ा है। इसे ठीक करने के लिए कौन आगे आएगा।

अब एक और बात। भोपाल और इंदौर में पुलिस ने महत्वपूर्ण चौराहों पर पुलिस सहायता केंद्र बना रखे हैं। लेकिन इनमें पुलिसकर्मी तीज-त्योहार ही देखे जा सकते हैं। कई सहायता केंद्रों के तो ताले तक नहीं खुले। हां, वहीं कुछ ऐसे केंद्र जो शराब की दुकानों के आसपास बने हैं, वहां मुस्तैदी देखी जा सकती है। कहने में कोई गुरेज नहीं कि इस मुस्तैदी के पीछे सोमरस की ललक और मुद्रा दोनों ही होते हैं।

हमारी पुलिस की सारी ताकत कमजोरों पर ही दिखती है। मुझे हालिया वाकया याद आ रहा है, जिसमें भोपाल के साकेत नगर इलाके के रहवासियों ने शिकायत की थी, कि उनके मोहल्ले में रहने वाले सीएम साहब के भाई के यहां चोरी हुई तो पुलिस ने मामले को कुछ ही दिन में सुलझाकर आरोपियों को पकड़ भी लिया पर उसी इलाके के बाकी घरों में लगातार हो रही चोरी का कोई सुराग नहीं है।

है ना यह पुलिस की काबिलियत। केवल वही मामले सुलझते हैं जिनके पीछे वीआईपी जैसा कुछ हो।

अगर ऐसा नहीं होता तो भोपाल के भीड़भाड़ वाले बाजार विट्टन मार्केट में सरेआम गोलियां नहीं चलती। वो भी तब जबकि थाना वहां से महज इतना दूर है कि अगर कोई सामान्य व्यक्ति चिल्लाए तो थाने के अंदर बैठे लोग भी सुन सकते हैं। इस पर देशभक्ति जनसेवा लिखे बैच पहनने वाली पुलिस का कहना है कि वो हर किसी पर नजर नहीं रख सकती है।

तो हम कब कह रहे हैं कि एक एक बंदे पर नजर रखो पर कम से कम क्रिमिनल्स पर इतनी लगाम तो रखो कि वो गुनाह करने के पहले एक बार पुलिसिया खौफ के बारे में सोचें। हालांकि ऐसा संभव है इसकी उम्मीद नहीं के बराबर है।

आखिर में एक बात और कि अगर आपमें किसी को पुलिस का पूरा मतलब मालूम हो तो मुझे जरुर बताइएगा। क्योंकि जो मतलब मुझे पता है वो तो शायद हमारी पुलिस पर तो फिट नहीं बैठता है।

P for Polite =?
O for Obedient =?
L for Loyal =?
I for Intelligent =?
C for Courageous =?
E for Eager to help =?

अगर आप बोर हुए हों तो माफी चाहूंगा पर दिल में था सो शब्द बनकर बाहर आ गए।

अमूल्य वक्त देने का शुक्रिया।

3 comments:

  1. बोर नहीं हुए इसलिए माफी मांगना बेकार चला गया.

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  2. बेनामीJuly 8, 2009 at 7:47 AM

    Aapnae bhaut hadd tak sahi kaha hai. Par puri tarah se police administration ko dosh dena bhi sahi nahi hai. tehzi se badti abadi par police kitno so Suraksha de sakti hai. Bajaya ek durse ko dosh dene se accha ki phle hum apnae aap mai sudhar laye, tabhi ek thos samaj aur majboot desh khada hoga. Par sabse phale zarrori hai har ek nagrik ko zimaeddar banane ki.

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