Wednesday, January 11, 2012

सरकारी आशियानों पर पत्रकारों का कब्ज़ा

देश के नामी कॉरपोरेट मीडिया घरानों के भोपाल प्रतिनिधियों की हालत का खुलासा देश के ही एक नामी अखबार द हिंदू ने किया है। अखबार ने अपने सूत्रों के हवाले से जो खबर 9 जनवरी 2012 को प्रकाशित की, वह वाकई हिम्मत की बात है। खबर में बताया गया है कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रह रहे 187 वरिष्ठ पत्रकारों ने सरकारी बंगलों पर अवैध रूप से कब्जा जमा रखा है। इनमें से कई पत्रकार तो ऐसे भी हैं, जो वर्षों पहले अपने संस्थान से रिटायर हो चुके हैं पर बंगला मोह अभी तक नहीं त्यागा है।

ऐसे पत्रकारों की वजह से राज्य सरकार को करोड़ों रुपए के किराये का नुकसान हो रहा है। यही बंगले यदि सरकार अपने कर्मचारियों और अधिकारियों को आवंटित करती तो बदले में उनसे मकान का किराया भी लिया जाता, लेकिन पत्रकार बंधु ने तो किराया देते हैं और न ही घर खाली करते हैं। खबर में एक सूत्र के हवाले से बताया गया है कि ऐसे घरों पर लगभग १६ करोड़ रुपए किराया बकाया है।

खास बात यह है कि इन घरों में रहने वाले बड़े पत्रकारों का वेतन और पद दोनों ही बड़ा है। द हिंदू के मुताबिक सरकारी घरों में कब्जा किए हुए पत्रकार लोग पीटीआई, यूएनआई, स्टार न्यूज, जी न्यूज, ईटीवी, इंडियन एक्सप्रेस (पूर्व पत्रकार), हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन, हितवाद, इंडिया टीवी, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता, नईदुनिया, स्वदेश, लोकमत, देशबंधु, नवभारत टाइम्स, इकोनोमिक टाइम्स जैसे शीर्ष संस्थानों में कार्यरत हैं। इनके अलावा छुटभैया किस्म के अखबार, मैगजीन और पोर्टल चलाने वालों ने भी सरकारी घरों पर कब्जा कर रखा है।

मध्यप्रदेश सरकार यह कारनामा आज से नहीं लगभग 20 वर्ष से कर रही है। यह हालात तब हैं, जबकि 2006 में ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी घर पत्रकारों को न आवंटित करने के आदेश दे दिए थे। राज्य सरकार के कर्मचारियों को रहने के लिए घर नहीं मिल रहे हैं। 20-20 साल की वेटिंग चल रही है। कई अधिकारी/कर्मचारी को तो घर की आस लिए हुए ही रिटायर हो गए। कुछ ने हिम्मत करके जैसे-तैसे अपने घर बना लिए या फिर किराये के मकान में ही जिंदगी काट दी। ऐसे हालातों के बीच शहर के पॉश इलाकों अरेरा कॉलोनी, चार इमली, शिवाजी नगर, 45 बंगले और 74 बंगले के घरों पर पत्रकार भाईयों का कब्जा है।

सभी जानते हैं कि राज्य सरकारें पत्रकारों और मीडिया हाउसेस को मैनेज करने के लिए घर, जमीन आवंटित करने जैसे कृत्य करती रहती हैं। एक सच यह भी है कि सरकारी घर का मजा उन्हीं पत्रकारों को मिलता है, जो प्रभावशाली होते हैं और सत्ता के गलियारों में जिनकी पूछ होती है या फिर वो देश के बड़े मीडिया संस्थान के राज्य प्रतिनिधि हों।

इसी तरह से जमीनों के बंदरबाट की एक खबर हिंदू अखबार ने अक्टूबर 2009 में भी प्रकाशित की थी। अगर आपको ऐसे पत्रकारों के नामों की फेहरिस्त देखना हो तो मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्कविभाग की वेबसाइट एमपीइंफो डॉट ओआरजी पर उपलब्ध है।

Saturday, January 7, 2012

ये हैं अपने देश के हालात

भई 2011 तो गया। लेकिन जाते-जाते कुछ ऐसे कारनामे कर गया है, जिनका असर 2012 पर तो रहेगा। मसलन अण्णा ने सरकार को नाको ऐसे चने चबवाए जिससे उसे जनता की ताकत का अंदाजा तो हो ही गया है। यह अलग बात है कि नेता अपनी हरकतों से कभी बाज नहीं आते हैं। क्या करें, जात ही ऐसी है। खैर, अण्णा फैक्टर के अलावा भ्रस्टाचार और घोटालों के खुलासे का अजगर भी पूरे साल सरकार से लिपटा रहा। महंगाई भी आए-दिन डंक मारती रही। हालांकि इस डंक के दंश को केवल जनता ने ही झेला और उसकी कराह सुनने वाला भी कोई नहीं है।

देश में नए-नए चोर किस्म के धन-कुबेरों का खुलासा भी होता रहा। राजनीतिक उथल-पुथल पूरे देश में दिखी। कर्नाटक में येदियुरप्पा ने खुद को कुर्सी से ऐसा चिपकाया कि उन्हें घसीट कर उतारना पड़ा। देश का प्रमुख विपक्षी दल यानी भारतीय जनता पार्टी, जिसमें कार्यकर्ता के अलावा सभी पाए जाते हैं। मेरा कहने का मतलब है, जो भी नेतागण वहां हैं, वो सभी खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार ही मानते हैं। कोई उपवास रखने लगता है तो कोई डुगडुगी बजाता हुआ अपने रथ से देश की यात्रा पर निकल पड़ता है। एयरकंडीशन और सभी सुविधायुक्त रथ में बैठकर गरीबों के हित की बात करते हैं।

देश में एक प्रदेश है, मध्यप्रदेश। जहां के मुख्यमंत्री खुद को प्रदेश की महिलाओं का भाई कहते नहीं थकते हैं। यह अलग बात है कि सीएम भाई के होते हुए भी 2011 में कई बहनों को जला दिया गया, बलात्कार किया गया और तो और देश में सबसे ज्यादा बाल अपराध भी यहीं होते हैं। दूसरी तरफ हैं अपनी बहन जी। जी हां, सही समझे आप। देश के सबसे बड़े प्रदेश की मुखिया, जो अगले महीने जनता के दर से यूपी विधानसभा के दरवाजे तक पहुंचने के लिए रास्ता तलाशने की तैयारी कर रही हैं। पूर्ण बहुमत वाली बहिन जी की सरकार ने पांच साल ऐश ही किया। प्रदेश के हालात तो आपको टीवी चैनलों और अखबारों से मिल ही जाते हैं। ऐसा कोई अपराध नहीं है, जो यहां न होता हो। लूट, हत्या, अपहरण, बलात्कार, भ्रष्टाचार....सब यहां आराम से हो जाता है। पुलिस तो कहिए कि एक विभाग है, जिसका काम वर्दी पहनकर लूट करना है।

एक आंखो देखा किस्सा सुनाता हूं आपको। वैसे यूपी के एनसीआर में रहने वाले इससे वाकिफ होंगे। मैंने हॉट सिटी कहे जाने वाले गाजियाबाद में एक खास स्थान पर जबरदस्त जाम देखा। जाम एक पुलिया पर लगा हुआ था, और दोनों ओर पुलिस की जीपें भी खड़ी थीं। मजेदार बात यह कि वहां खड़े खाकीदारी पूरी गंभीरता के साथ अपनी हथेलियों के बीच तंबाकू घिस रहे थे, लगा कि बस इसे मुंह में दबाते ही जाम हटाने के लिए तत्पर हो जाएंगे। हुआ भी ऐसा ही। तंबाकू दबाकर दरोगा जी एक छोटा हाथी (टाटा ऐस को यहां इसी नाम से पुकारते हैं) के ड्रायवर के पास पहुंचे और पूछा कि सब्जी भरकर कहां जा रहे हो। निकालो 100 रुपये वरना जब्त कर लूंगा तुम्हारा हाथी। फिर उनकी नजर लोडिंग ऑटो पर पड़ी। वहां भी यही बात दोहराई गई। इसके बाद दरोगा जी वापस जाकर अपनी जीप में लेट गए। रही बात जाम की तो उसे छंटने में 45 मिनट लग गए। ऐसी मुस्तैदी आपने शायद ही देखी होगी कहीं।

खैर छोडि़ए, यह तो पूरे देश का ही हाल है। शायद बदलेगा नहीं।

हम महंगाई की बात कर रहे थे। तो इस साल हमारी केंद्र सरकार ने कई चुटकुले भी छोड़े। जैसे 32 रुपये रोजाना आमदनी वाले को गरीब न मानना। महंगाई को 100 दिन में काबू कर लेना। वैसे यह डायलॉग 2009 में यूपीए की दूसरी पारी के तुरंत बाद पहली बार सुनने को मिला था, तब से अब तक लगातार इसे रिवाइंड करके सुनाया जाता रहा है। पता नहीं 100 दिन का सरकारी पैमाना क्या है। कहीं वो भी 32 रुपये जैसा कुछ होगा, जो नामसझ आम आदमी होने की वजह से हम समझ नहीं पा रहे हैं।

चापलूसी के नए कीर्तिमान भी 2011 में बनाए गए। कोई मैडम को खुश करने के लिए बयान जारी करता रहा तो कोई बाबा को खुश करने के लिए। आम आदमी से तो किसी को कोई वास्ता ही नहीं है। किसी ने कहा कि आरटीआई सिरदर्द बन रहा है, इसे हटाओ। तो किसी को सोशल नेटवर्किंग साइट्‌स से ही परेशानी होने लगी।

2011 ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया को कई सबक सिखाए हैं। पहला सबक यह कि जनता ही जनार्दन है। जो शायद चार तानाशाह भी भूल चुके थे, जिनकी अक्ल ठिकाने लगा दी गई। अमेरिका जैसे सुपर पावर ही हालत जगजाहिर है। वहां आर्थिक तंगी है तो भारतवर्ष में सरकारी खजाने से ज्यादा पैसा स्विट्‌जरलैंड के बैंक खातों में जमा है।

नेता और अफसर करोड़ो-अरबों के नीचे का घोटाला नहीं करते हैं, मानो उनकी साख का सवाल है। उज्जैन और इंदौर में करोड़पति चपरासी और बाबू मिलते हैं तो भोपाल में अरबपति आईएएस पति-पत्नी। अंबानी साहब ने दुनिया का सबसे महंगा बंगला बना लिया फिर पता चला कि साहब उसमें तो वास्तुदोष है। अब उसमें रहे कौन। तो ये हैं अपने देश के हालात।

Wednesday, July 13, 2011

बंद करिए जनता को मूर्ख बनाना

1993 से लेकर 2011 तक देश की आर्थिक राजधानी मुंबई ने 9 बार इंसानियत को छलनी कर देने वाले धमाके देखे हैं। आज़ाद भारत के इतिहास को देखें तो किसी एक ही शहर ने इतने दंश नहीं झेले हैं, जितने इस जीवंत शहर ने झेले हैं। इन धमाकों का शिकार कोई देश, प्रांत या शहर नहीं बल्कि इंसानियत होती है। धमाकों का शोर और धुंआ छटने के बाद आंसू, दुख, रक्तरंजित लाशें और कभी न भुलाया जा सकने वाला दर्द बचता है। दर्द किसी को खोने का, असमय किसी के चले जाने का।

Cartoon courtsey: Hindustan Times tooningin
इन सबसे इतर एक कौम और है, जो इस दर्द पर नमक रूपी मरहम लगाती रहती है और वो है नेताओं की कौम। वो नेता जो सरकार चलाते हैं, जिनके मातहत प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां काम करती हैं, जो जनता को सुरक्षा का वादा देकर अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम कर लेते हैं। ऐसे धमाके और हमले उन्हें नहीं हमें हताहत करते हैं।

न जाने क्यों, पर जब कल (13 जुलाई 2011) शाम को मुंबई में फिर से सिलसिलेवार धमाकों की खबर मिली तो 2008 वाली घटना की याद ताजा हो गई। मन में दुख और गुस्सा दोनों उठा। दुख उन बेकसूरों के लिए जिन्होंने बिना वजह अपनी जानें गंवाईं और गुस्सा उस नकारा तंत्र के लिए, जो हर बार ऐसी घटना के बाद अपनी झूठी और मक्कार जुबान से एक ही बात दोहराने के लिए तैयार हो जाता है। चाहे एनडीए की सरकार रही हो या फिर यूपीए की, जनता ने हमेशा सुरक्षा और विकास के बारे में सोचा है। यह अलग बात है कि सरकार नाम का रथ जिसे भी हांकने को मिलता है, वो केवल अपनी जेब और राजनीतिक हित ही देख पाता है। इससे आगे की उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। शायद दिखाई भी न देता हो।

जिन्हें धमाका करना था, वो तो अपने मकसद में कामयाब हो गए, पीछे छोड़ गए नेताओं को, कुछ इस तरह के वक्तव्य देने के लिए मशहूर हैं “यह कायराना कदम है” “हम ऐसे हमले की निंदा करते हैं” “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा” “हम अंतरराष्ट्रीय मंच के द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाएंगे” “पाकिस्तान को आरोपियों की सूची और सबूत दिए जाएंगे” “ऐसी घटनाओं से भारत डरने वाला नहीं है और मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा” “हमारी फौज हर तरह के हमलों के लिए तैयार है….” वगैरह-वगैरह। ये अलग बात है कि होता कुछ नहीं है। अगर वाकई कुछ होना होता तो बार-बार ऐसी घटनाएं होती ही क्यों?

देश के नेताओं की यह आदत बन चुकी है कि घटना होते ही तुरंत एक संगठन या देश पर आरोप मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लो। बाकी जांच वांच के लिए तो दर्जनों एजेंसियां और विभाग हैं, जहां लोगों को कुर्सी तोड़ने और चापलूसी से फुरसत मिले तो शायद वो अपने काम के बारे में भी सोचें।

हमारा तंत्र “न कुछ करेंगे और न करने देंगे” की तर्ज पर काम करता है। संसद पर हमले के बाद सेना को हमले के लिए तैयार कर दिया गया, लेकिन आखिरी समय पर संयम का राग बजने लगा। इन हमलों के पीछे के चाहे पाकिस्तान आरोपी हो या फिर कोई पाक प्रायोजित आतंकी संगठन, वो अच्छी तरह जान चुके हैं कि भारत में कभी भी कहीं भी कुछ भी किया जा सकता है। इसलिए जब भी एजेंसियां और पुलिस पुख्ता व्यवस्थाओं का दंभ भरने लगते हैं, तभी इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं। शायद ये देशवासियों को आईना दिखाने के लिए।

बंद करिए जनता को मूर्ख बनाना

1993 से लेकर 2011 तक देश की आर्थिक राजधानी मुंबई ने 9 बार इंसानियत को छलनी कर देने वाले धमाके देखे हैं। आज़ाद भारत के इतिहास को देखें तो किसी एक ही शहर ने इतने दंश नहीं झेले हैं, जितने इस जीवंत शहर ने झेले हैं। इन धमाकों का शिकार कोई देश, प्रांत या शहर नहीं बल्कि इंसानियत होती है। धमाकों का शोर और धुंआ छटने के बाद आंसू, दुख, रक्तरंजित लाशें और कभी न भुलाया जा सकने वाला दर्द बचता है। दर्द किसी को खोने का, असमय किसी के चले जाने का।

Cartoon courtsey: Hindustan Times tooningin
इन सबसे इतर एक कौम और है, जो इस दर्द पर नमक रूपी मरहम लगाती रहती है और वो है नेताओं की कौम। वो नेता जो सरकार चलाते हैं, जिनके मातहत प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां काम करती हैं, जो जनता को सुरक्षा का वादा देकर अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम कर लेते हैं। ऐसे धमाके और हमले उन्हें नहीं हमें हताहत करते हैं।

न जाने क्यों, पर जब कल (13 जुलाई 2011) शाम को मुंबई में फिर से सिलसिलेवार धमाकों की खबर मिली तो 2008 वाली घटना की याद ताजा हो गई। मन में दुख और गुस्सा दोनों उठा। दुख उन बेकसूरों के लिए जिन्होंने बिना वजह अपनी जानें गंवाईं और गुस्सा उस नकारा तंत्र के लिए, जो हर बार ऐसी घटना के बाद अपनी झूठी और मक्कार जुबान से एक ही बात दोहराने के लिए तैयार हो जाता है। चाहे एनडीए की सरकार रही हो या फिर यूपीए की, जनता ने हमेशा सुरक्षा और विकास के बारे में सोचा है। यह अलग बात है कि सरकार नाम का रथ जिसे भी हांकने को मिलता है, वो केवल अपनी जेब और राजनीतिक हित ही देख पाता है। इससे आगे की उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। शायद दिखाई भी न देता हो।

जिन्हें धमाका करना था, वो तो अपने मकसद में कामयाब हो गए, पीछे छोड़ गए नेताओं को, कुछ इस तरह के वक्तव्य देने के लिए मशहूर हैं “यह कायराना कदम है” “हम ऐसे हमले की निंदा करते हैं” “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा” “हम अंतरराष्ट्रीय मंच के द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाएंगे” “पाकिस्तान को आरोपियों की सूची और सबूत दिए जाएंगे” “ऐसी घटनाओं से भारत डरने वाला नहीं है और मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा” “हमारी फौज हर तरह के हमलों के लिए तैयार है….” वगैरह-वगैरह। ये अलग बात है कि होता कुछ नहीं है। अगर वाकई कुछ होना होता तो बार-बार ऐसी घटनाएं होती ही क्यों?

देश के नेताओं की यह आदत बन चुकी है कि घटना होते ही तुरंत एक संगठन या देश पर आरोप मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लो। बाकी जांच वांच के लिए तो दर्जनों एजेंसियां और विभाग हैं, जहां लोगों को कुर्सी तोड़ने और चापलूसी से फुरसत मिले तो शायद वो अपने काम के बारे में भी सोचें।

हमारा तंत्र “न कुछ करेंगे और न करने देंगे” की तर्ज पर काम करता है। संसद पर हमले के बाद सेना को हमले के लिए तैयार कर दिया गया, लेकिन आखिरी समय पर संयम का राग बजने लगा। इन हमलों के पीछे के चाहे पाकिस्तान आरोपी हो या फिर कोई पाक प्रायोजित आतंकी संगठन, वो अच्छी तरह जान चुके हैं कि भारत में कभी भी कहीं भी कुछ भी किया जा सकता है। इसलिए जब भी एजेंसियां और पुलिस पुख्ता व्यवस्थाओं का दंभ भरने लगते हैं, तभी इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं। शायद ये देशवासियों को आईना दिखाने के लिए।

Monday, July 11, 2011

प्रीत नहीं थी जहां की रीत कभी…


चित्र: पोस्ट ऑन पॉलिटिक्स ब्लॉग से साभार
आज आपको एक ऐसे देश के बारे में बताना चाह रहा हूं, जिसके बारे में शायद आपको काफी कुछ पता होगा। मसलन यह बहुत ही महान देश है, विविधता में एकता इसकी खासियत रही है साथ ही शांति एवं संयम तो यहां की आबो-हवा में घुली हुई हैं। ये सब कुछ ऐसे तर्क हैं जो बचपन से ही किताबों तथा गाथाओं और किवदंतियों के माध्यम से हमें घुट्टी की तरह पिलाए गए हैं। तो ये कहानी है उस देश की जिसे, भारत, इंडिया और हिंदुस्तान जैसे नामों से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहां के लोग शांतिप्रिय, साफ दिल वाले तथा ईमानदार होते हैं।

ये तो रही वो बातें जो हम अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हुए खुद ही कहते हैं तथा इसकी सार्थकता बढ़ाने के लिए इन बातों को स्कूल व कॉलेजों के माध्यम में भी फैलाया जाता है। महाभारत जैसे महाकाव्य तथा रामायण को पूजते हैं। भगवतगीता की मिसालें देते हैं तथा केवल कर्म करने जैसी पाखंडी बातों को बोलते हुए हमारी जुबानें कभी नहीं थकती हैं। जबकि हकीकत में इन सब बातों से शायद ही लेना देना हो किसी का। अब ज़रा ज़मीनी हकीक़त पर नज़र दौड़ाते हैं।

पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सटे गुड़गांव के एक गांव में गांववालों ने एक शख्स को सरेआम जलाकर मार डाला। इस शख्स पर गांव के सरपंच की हत्या का आरोप था। यह घटना पुलिस के सामने ही घटित हुई थी। इस प्रकार की घटनाएं आए दिन देश में होती रहती हैं। जनता तो जनता कई बार पुलिस वाले भी आरोपी के साथ ऐसा कृत्य करते हैं, जिससे इंसानियत शर्मसार हो जाए। हरियाणा, यूपी और बिहार की पुलिस ने तो ऐसे कारनामों में रिकॉर्ड कायम कर रखा है। खुद को शांतिप्रिय कहने वाले ऐसी हरकतें करते हैं क्या?

ये हमारा ही देश है, जहां पर दुनिया के किसी भी अन्य मुल्क के मुकाबले सबसे ज्यादा कन्या भ्रूण हत्याएं की जाती हैं। इसके बाद इज्ज़त व मूंछ के नाम पर होने वाली ऑनर किलिंग इसमें चार चांद लगाती है। भ्रष्टाचार तो मानों एक लाइलाज बीमारी बन चुका है। सत्ता का मद नेताओं में कानून का भय कम कर चुका है। अनेकता में एकता जैसे शब्द बेमानी हो चुके हैं। यदि विश्वास न हो तो बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश तथा महाराष्ट्र जैसे राज्यों की स्थिति देखिए। यहां पर जाति तथा क्षेत्रवाद का बोलबाला है। यदि ऐसा न होता तो हम आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, जैसे राज्यों के रहवासियों को “साउथ इंडियन” नाम की संज्ञा न देते। यदि आप कभी ध्यान दें तो पाएंगे कि लोग दूसरे प्रदेश के लोगों का परिचय कुछ इस अंदाज में देते हैं, कि “मैं फलां बंदे को जानत हूं, वो मराठी है/ उडिया है/ मद्रासी या अन्ना है/ पंजाबी है” आदि।

देश की एकता में मतभेद के सैकड़ों छेद हैं। कुछ महीनों पहले महाराष्ट्र की दो पार्टियों महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना तथा शिवसेना ने उत्तर भारतीयों को “भैया” कहते हुए प्रदेश से खदेड़ने की मुहिम छेड़ रखी थी। एक बार तो दिल्ली की मुख्यमंत्री ने भी कह डाला था कि बाहर से आकर रहने वाले लोगों की वजह से दिल्ली में अपराध बढ़ रहे हैं। तो ये है हमारी एकता और अखंडता। देश में आम नागरिकों जिनमें गरीब भी शामिल हैं के अलावा कोई ऐसा नहीं है, जो कानून से डरता हो। खासकर के नेता, नौकरशाह और रसूखदार प्राणी। उनका यह मानना है कि वो सड़क पर चलकर और इस देश् में रहकर अहसान कर रहे हैं इसलिए उन्हें कुछ भी करने विशेषाधिकार प्राप्त है।

...और तो और कानून बनाने वालों ने कानून की देवी की आंखों में पट्टी इसलिए बांधी थी, ताकि वो शुद्ध न्याय कर सके, लेकिन वही पट्टी उसके लिए बाधा साबित हो रही है। इस पट्टी का फायदा उठाते हुए प्रभावशाली लोग कानून की पहुंच से बाहर चले जाते हैं। फंसते हैं तो कमजोर या फिर ऐसे लोग जिन्हें बचाना जरूरी न हो। मसलन राजनीतिक रूप से किसी को ठिकाने लगाना हो तब भी कानून का सहारा लिया जाता है। हालांकि ए. राजा, कनिमोझी और कुछ अपवाद भी कानून के शिकंजे में हैं। लेकिन मनु शर्मा और पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर जैसे लोग भी हैं, जो कानून के सहारे ही कानून से बचते रहे हैं।

हमारा समाज भी अत्यंत की दोहरे चरित्र वाला है। हो सकता है कि मेरी इस बात से गिनती के लोग ही सहमत हों, पर मैं तब भी अपनी बात पर अटल हूं कि हम दोहरे मापदंडों पर जीने वाले लोग हैं। या फिर कुछ ऐसे कहें कि हम चाहते तो सब हैं, पर खुद कुछ नहीं करना चाहते हैं। मसलन “भगत सिंह पैदा हों, पर हमारे नहीं पड़ोसी के घर पर…”। जी हां, यही है हमारी मानसिकता। हम में से अधिकांश लोग दिन में कम से कम दर्जनों बार दफ्तर के बाहर, सड़कों पर और बाजारों में अपशब्दों का प्रयोग करते हुए लोगों को सुनते ही होंगे। तो तरह-तरह के अलंकरणों के साथ बात करते हैं। बावजूद इसके सार्वजनिक रूप से ऐसी बातों को स्वीकारना हमें पसंद नहीं है। समाज की गंदगी जब किताबों में या पर्दे पर दिखाई जाती है तो आंदोलन करने के बेताब लोग झंडे-बैनर लेकर विरोध करने के लिए उतर जाते हैं।

ऐसे लोगों को क्या कहा जाए? खैर, ये जो भड़ास मैंने शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरी है, उसका सिर्फ एक ही मकसद है कि हम इस मुगालतों में जीना छोड़कर सच्चाई का सामना करें। आगे मर्जी आपकी। धन्यवाद….

Wednesday, June 1, 2011

बुरा मानो या भला, कटु सत्य यही है


अण्णा हजारे का आंदोलन

वो समय ही अलग था, जब एक दुबली पतली काठी वाला इनसान लाठी लेकर अनशन पर बैठा और फिरंगी हुकूमत की आंखों से रातों की नींद तक उड़ गई थी। नतीजा यह कि उन्हें यह देश छोड़कर जाना पड़ा। उस इनसान का नाम मोहनदास करमचंद गांधी था, जिसने यह कारनामा कर दिखाया था। इन्हीं गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी भी चल रही थी, पर कौन जानता था कि आज़ादी के बाद यही कांग्रेस पार्टी फिरंगियों की राह पर चलते हुए आम जनता का जीना मुहाल कर देगी।

आखिर कांग्रेस ऐसा क्यों न करें, जबकि उसकी स्थापना ही एक अंग्रेज ए.ओ. ह्यूम के नेतृत्व में हुई थी। खैर, आज के हालातों पर नज़र दौड़ाकर देखिए, और सोचिए कि क्या वाकई यह वही देश है, जिसे महाशक्ति और दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्था के तमगों से लादा जा रहा है। यह कहने में कम से कम मुझे तो कोई गुरेज़ नहीं हो रहा है कि हर वो भारतीय जो अपने पद एवं अधिकारों का दुरुपयोग कर सकता है, करता है। उदाहरण एक या दो नहीं बल्कि हजारों या कहें कि शायद लाखों में मिल सकते हैं।

हो सकता है कि समाज का बुद्धिजीवी टाइप का वर्ग मेरी बातों से सहमत न भी हो, लेकिन जो सच है वो तो सच ही है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह जी का कहना है कि आंदोलनों और अनशन से कुछ नहीं होता है। उनके इस बयान का क्या मतलब लगाया जा सकता है? क्या यह कि सरकार को लोगों की भावनाओं और आंदोलन से कोई वास्ता नहीं है। हालात तो इसी ओर इशारा कर रहे हैं। अण्णा हजारे ने अनशन किया तो पूरा देश खासकर के युवा उनके समर्थन में आगे आए और सरकार ने आनन फानन में उनकी मांगो को मानने का लॉलीपॉप टिका दिया। शायद सरकार और उसकी मशीनरी “जनता की याददाश्त कमजोर होती है और जल्दी ही सबकुछ भूल जाएगी” वाले फॉर्मूले का इस्तेमाल करना चाह रही है। तभी हमारे योग गुरू बाबा रामदेव आगे आए और उन्होंने कालेधन के मुद्दे पर सरकार को घेरने का काम शुरू कर दिया। साथ ही यह भी इशारा कर दिया कि हजारे साहब के आंदोलन से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

यहीं पर हमारी सरकार की अंगेजी चाल स्पष्ट दिखाई देने लगी। तुरंत बाबा को मनाने के लिए कबीना मंत्रियों के दल को भेजा गया। वीवीआईपी ट्रीटमेंट के साथ हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया गया। उनके पैरों के नीचे लाल कारपेट बिछा दिया गया। यह सब जुगत सिर्फ इसलिए ताकि बाबा अपना आंदोलन न करें और सरकार को अण्णा के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने का एक बहाना मिल जाए। इसे एक तीर से दो शिकार करना भी कह सकते हैं।

अब जरा बात करते हैं बाबाओं की। बाबाओं का हमारे देश और इसकी राजनीति से पुराना लगाव रहा है। कुछ बाबा टाइप के भगवाधारी तो बकायदा लोकसभा एवं राज्यसभा में भी जा चुके हैं। इसके अलावा राजनीतिक संकट के समय भी बाबा भी अपनी सेटिंग का भभूत फूंकते हैं। ऐसे ही एक बाबा थे तांत्रिक चंद्रास्वामी, जो राजनीतिक जोड़तोड़ और न जाने किन किन विधाओं के पारंगत थे। हालांकि आजकल वो गुमनामी में साधना कर रहे हैं। दक्षिण में भी इस तरह के कई बाबा पाए जाते हैं, जिन पर कभी यौनाचार तो भी भ्रष्टाचार के आरोपों का तिलक लगता रहा है। पर क्या करें, हम भारतीय धर्म और आस्था के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं।

हमारे देश का मुख्य विपक्षी दल भी हर बुरे वक्त पर धर्म का सहारा लेने के लिए प्रसिद्ध है। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि यहां पर न तो अच्छे नेता है और न ही अच्छा सिस्टम। विपक्षी पार्टी का एक सूत्रीय कार्यक्रम सरकारी की निंदा करना रह गया है। पेटोल हो या महंगाई वो केवल शोर करना जानता है। इससे निपटने का कोई हल उसके पास नहीं है। हल हो भी तो कैसे, आखिर हैं तो वो भी नेता ही। और जिस किसी ने भी यह कहावत “चोर-चोर मौसेरे भाई एवं एक ही थाली के चट्टे-बट्टे” कही थी, काफी दूरदर्शी था।

इसलिए चाहे बाबा आंदोलन करें या फिर हजारे अनशन करें, सरकार के कान में जूं भी नहीं रेंगने वाली है। क्योंकि यहां की सरकारें जनता के लिए नहीं, बल्कि पार्टी एवं व्यक्तियों के लिए बनती हैं। वाह रे लोकतंत्र।

जय हो।

Tuesday, May 24, 2011

यह कैसी महाशक्ति है?


शेर पर भौंकता हुआ कुत्ता। गूगल खोज से साभार
कुछ दिनों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बयान जारी कर कहा था, दुनिया के मुल्कों को भारत से शांति की शिक्षा लेनी चाहिए। ओबामा का मानना है कि यदि दक्षिण एशिया में भारत जैसा समझदार और शांतिप्रिय देश नहीं होता, तो यहां के हालात बद्तर हो सकते थे। ओबामा के इस कूटनीतिक बयान को भारत ने सकारात्मक रूप से लिया है। लेकिन क्या शांतिप्रिय बने रहना हमारे देश के लिए हमेशा फायदेमंद रहेगा? शायद नहीं।

अमेरिका जैसा देश अपने फायदे के लिए गधे को भी बाप मानने वालों में से है। यह वही देश है, जिसने ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को तैयार किया था, जो बाद में उसके लिए ही भस्मासुर साबित हुआ था। अब जबकि ओसामा का किस्सा ही खत्म हो चुका है, तब अमेरिका ने पाकिस्तान को यह समझाना शुरू कर दिया है कि वह भारत से दोस्ती बढ़ाए। उधर पाकिस्तान ने अपनी नीतियों में बदलाव करते हुए अपनी निष्ठा को चीन की तरफ दंडवत कर दिया है।

चीन ने भी कह दिया है कि पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई को वो बर्दाश्त नहीं करेगा। चीन का इशारा अमेरिकी सैन्य कार्रवाईयों एवं भारत की ओर से संभावित कार्रवाई है। हालांकि चीन भी यह जानता है कि भारत कभी भी हमले की पहल नहीं करेगा। यहां पर भारत और पाकिस्तान की स्थिति को महाभारत काल से भी जोड़ा जा सकता है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की मां को यह वचन दिया था कि वो शिशुपाल की सौ गलतियों को माफ कर देंगे। लेकिन 101वीं पर वो उसका वध करने के लिए मजबूर होंगे। यहां पर पाकिस्तान की स्थिति को शिशुपाल से जोड़ा तो जा सकता है, पर भारत को श्रीकृष्ण मानना हमारी भूल हो सकती है।

यदि कारगिल के बाद से लेकर अब तक की स्थितियों पर नजर दौड़ाएं तो आपको पता चलेगा कि हमारे देश का बूढ़ा नेतृत्व कितना मजबूर और इच्छाशक्ति विहीन है। कारगिल की घटना को गंभीरता से न लेने के चलते ही हमारी सेना को बड़ी संख्या में हानि उठानी पड़ी थी। उचित रणनीति के अभाव ने कई सैनिकों को जबरन काल के गाल में ढकेल दिया और उस पर भी घोटाले हुए सो अलग। देश के लोकतांत्रिक मंदिर संसद भवन पर पाकिस्तानी आतंकवादियों का हमला हुआ, तो ऐसा लगा मानो इस बार तो आरपार की लड़ाई होगी, लेकिन जो हुआ, उसे क्या संज्ञा दी जाए, समझ नहीं आता।

मुंबई में हमला हुआ तो हम पाकिस्तान से चिट्टी चिट्टी का खेल खेलने में लग गए। भारत उसे मना रहा है कि वो हमले में अपना हाथ होना कबूल कर ले। क्या चोर कभी कहेगा कि उसने चोरी की है। इतना ही नहीं, हद तो इस पर है कि अफजल गुरू नाम के षड्यंत्रकारी को, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुना रखी है, उसे भी हमारा देश दामाद की तरह पाल रहा है। यही हाल मुंबई हमले में पकड़े गए आमिर अजमल कसाब का भी है। उस पर मुकदमा करके उससे कबूल करवाने का प्रयत्न किया जा रहा है, ताकि वह 26/11 के हमले में अपना हाथ होना कबूल ले। इससे ज्यादा हास्यास्पद क्या होगा।

रही सही कसर आज 25 मई को पूरी हो गई, जब पाकिस्तान ने भारत द्वारा दी गई 50 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची को यह कहते हुए लौटा दिया कि पहले भारत यह जांच ले कि इनमें से कितने लोग भारत में रह रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार, नौकरशाह या फिर दोनों। अकर्मण्यता और आपसी समन्वय की कमी के चलते देश की नाक कहीं न कहीं कट ही जाती है। फिर चाहे वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी दूसरे देश का भाषण पढ़ देना हो या फिर इस तरह की सूची बनाना हो, जिसमें दिए गए नाम हमारे ही मोहल्ले में रह रहे हों।

बताइए, हम एक ऐसे विकासशील, मजबूत अर्थव्यवस्था एवं तेजी उभरती हुई महाशक्ति हैं, जिनकी मजबूती में दीमक लगी हुई है। भ्रष्टाचार की दीमक और कामचोरी की दीमक। देश में नौकरशाही अपनी ढपली बजाता है और नेता अपना राग आलापते हैं। कहीं कोई सुरताल नहीं, जिसे जो मर्जी वो कर रहा है। एक दो भ्रष्टाचारी हों तो गिनाएं भी जाएं। यहां इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि दो तीन भ्रष्टाचार नगर बसाए जा सकते हैं।

वैसे यह कभी न खत्म होने वाला विषय है। आप और हम इस पर लाखों पन्नों का महाकाव्य भी लिख सकते हैं। हालांकि यह किस्सा शायद तब भी खत्म न हो।