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Saturday, January 7, 2012

ये हैं अपने देश के हालात

भई 2011 तो गया। लेकिन जाते-जाते कुछ ऐसे कारनामे कर गया है, जिनका असर 2012 पर तो रहेगा। मसलन अण्णा ने सरकार को नाको ऐसे चने चबवाए जिससे उसे जनता की ताकत का अंदाजा तो हो ही गया है। यह अलग बात है कि नेता अपनी हरकतों से कभी बाज नहीं आते हैं। क्या करें, जात ही ऐसी है। खैर, अण्णा फैक्टर के अलावा भ्रस्टाचार और घोटालों के खुलासे का अजगर भी पूरे साल सरकार से लिपटा रहा। महंगाई भी आए-दिन डंक मारती रही। हालांकि इस डंक के दंश को केवल जनता ने ही झेला और उसकी कराह सुनने वाला भी कोई नहीं है।

देश में नए-नए चोर किस्म के धन-कुबेरों का खुलासा भी होता रहा। राजनीतिक उथल-पुथल पूरे देश में दिखी। कर्नाटक में येदियुरप्पा ने खुद को कुर्सी से ऐसा चिपकाया कि उन्हें घसीट कर उतारना पड़ा। देश का प्रमुख विपक्षी दल यानी भारतीय जनता पार्टी, जिसमें कार्यकर्ता के अलावा सभी पाए जाते हैं। मेरा कहने का मतलब है, जो भी नेतागण वहां हैं, वो सभी खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार ही मानते हैं। कोई उपवास रखने लगता है तो कोई डुगडुगी बजाता हुआ अपने रथ से देश की यात्रा पर निकल पड़ता है। एयरकंडीशन और सभी सुविधायुक्त रथ में बैठकर गरीबों के हित की बात करते हैं।

देश में एक प्रदेश है, मध्यप्रदेश। जहां के मुख्यमंत्री खुद को प्रदेश की महिलाओं का भाई कहते नहीं थकते हैं। यह अलग बात है कि सीएम भाई के होते हुए भी 2011 में कई बहनों को जला दिया गया, बलात्कार किया गया और तो और देश में सबसे ज्यादा बाल अपराध भी यहीं होते हैं। दूसरी तरफ हैं अपनी बहन जी। जी हां, सही समझे आप। देश के सबसे बड़े प्रदेश की मुखिया, जो अगले महीने जनता के दर से यूपी विधानसभा के दरवाजे तक पहुंचने के लिए रास्ता तलाशने की तैयारी कर रही हैं। पूर्ण बहुमत वाली बहिन जी की सरकार ने पांच साल ऐश ही किया। प्रदेश के हालात तो आपको टीवी चैनलों और अखबारों से मिल ही जाते हैं। ऐसा कोई अपराध नहीं है, जो यहां न होता हो। लूट, हत्या, अपहरण, बलात्कार, भ्रष्टाचार....सब यहां आराम से हो जाता है। पुलिस तो कहिए कि एक विभाग है, जिसका काम वर्दी पहनकर लूट करना है।

एक आंखो देखा किस्सा सुनाता हूं आपको। वैसे यूपी के एनसीआर में रहने वाले इससे वाकिफ होंगे। मैंने हॉट सिटी कहे जाने वाले गाजियाबाद में एक खास स्थान पर जबरदस्त जाम देखा। जाम एक पुलिया पर लगा हुआ था, और दोनों ओर पुलिस की जीपें भी खड़ी थीं। मजेदार बात यह कि वहां खड़े खाकीदारी पूरी गंभीरता के साथ अपनी हथेलियों के बीच तंबाकू घिस रहे थे, लगा कि बस इसे मुंह में दबाते ही जाम हटाने के लिए तत्पर हो जाएंगे। हुआ भी ऐसा ही। तंबाकू दबाकर दरोगा जी एक छोटा हाथी (टाटा ऐस को यहां इसी नाम से पुकारते हैं) के ड्रायवर के पास पहुंचे और पूछा कि सब्जी भरकर कहां जा रहे हो। निकालो 100 रुपये वरना जब्त कर लूंगा तुम्हारा हाथी। फिर उनकी नजर लोडिंग ऑटो पर पड़ी। वहां भी यही बात दोहराई गई। इसके बाद दरोगा जी वापस जाकर अपनी जीप में लेट गए। रही बात जाम की तो उसे छंटने में 45 मिनट लग गए। ऐसी मुस्तैदी आपने शायद ही देखी होगी कहीं।

खैर छोडि़ए, यह तो पूरे देश का ही हाल है। शायद बदलेगा नहीं।

हम महंगाई की बात कर रहे थे। तो इस साल हमारी केंद्र सरकार ने कई चुटकुले भी छोड़े। जैसे 32 रुपये रोजाना आमदनी वाले को गरीब न मानना। महंगाई को 100 दिन में काबू कर लेना। वैसे यह डायलॉग 2009 में यूपीए की दूसरी पारी के तुरंत बाद पहली बार सुनने को मिला था, तब से अब तक लगातार इसे रिवाइंड करके सुनाया जाता रहा है। पता नहीं 100 दिन का सरकारी पैमाना क्या है। कहीं वो भी 32 रुपये जैसा कुछ होगा, जो नामसझ आम आदमी होने की वजह से हम समझ नहीं पा रहे हैं।

चापलूसी के नए कीर्तिमान भी 2011 में बनाए गए। कोई मैडम को खुश करने के लिए बयान जारी करता रहा तो कोई बाबा को खुश करने के लिए। आम आदमी से तो किसी को कोई वास्ता ही नहीं है। किसी ने कहा कि आरटीआई सिरदर्द बन रहा है, इसे हटाओ। तो किसी को सोशल नेटवर्किंग साइट्‌स से ही परेशानी होने लगी।

2011 ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया को कई सबक सिखाए हैं। पहला सबक यह कि जनता ही जनार्दन है। जो शायद चार तानाशाह भी भूल चुके थे, जिनकी अक्ल ठिकाने लगा दी गई। अमेरिका जैसे सुपर पावर ही हालत जगजाहिर है। वहां आर्थिक तंगी है तो भारतवर्ष में सरकारी खजाने से ज्यादा पैसा स्विट्‌जरलैंड के बैंक खातों में जमा है।

नेता और अफसर करोड़ो-अरबों के नीचे का घोटाला नहीं करते हैं, मानो उनकी साख का सवाल है। उज्जैन और इंदौर में करोड़पति चपरासी और बाबू मिलते हैं तो भोपाल में अरबपति आईएएस पति-पत्नी। अंबानी साहब ने दुनिया का सबसे महंगा बंगला बना लिया फिर पता चला कि साहब उसमें तो वास्तुदोष है। अब उसमें रहे कौन। तो ये हैं अपने देश के हालात।

Thursday, December 9, 2010

देश बड़ा या नेता

आप सबने यह खबर तो जरूर देखी, सुनी और पढ़ी ही होगी कि अमेरिका में भारत की राजदूत के साथ पैट डाउन सुरक्षा जांच की गई। जब यह खबर मीडिया के जरिए आई तो तुरंत प्रतिक्रियाएं आना शुरू हो गईं। लगभग सभी ने इसे देश की आन-बान-शान और न जाने किस-किस से इसे जोड़कर रख दिया साथ ही अमेरिका की आलोचना भी की। हमारे विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने यहां तक कह डाला कि इस तरह से भारतीय अधिकारियों की बेइज्जती को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और वो अमेरिका से अपनी नाराजगी जरूर जताएंगे।

लेकिन असल मुद्दा यह है कि जैसे हम हैं क्या वैसा दूसरों का होना जरूरी है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हम खुद को कानून से ऊपर मानते हैं, लेकिन दूसरे देशों में भी ऐसा हो यह जरूरी तो नहीं है। बड़े बुजुर्गों ने ऐसे ही नहीं फरमाया था कि "जैसा देश वैसा भेष"। यदि उनकी इस बात को अमल में लाते तो ऐसी परेशानी ही नहीं आती। यही कारण है कि अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था को हमने आन पर ले लिया है। अधिकांश यह सुनने को मिल रहा है कि अमेरिका जिनिवा समझौते को दरकिनार करता रहता है। लेकिन सोचने वाली बात यह भी है कि इसी सुरक्षा व्यवस्था का फायदा उसे आज मिल रहा है, जबकि इसकी कमी का खामियाजा हम भुगत ही रहे हैं। हमारे देश में सरकारी अंगरक्षक तथा लाल पीली बत्तियों का काफिला लेकर शान समझा जाता है। यही वजह है कि कानून के रखवाले इन रंगों की बत्ती वाले वाहन में बैठे हुए लोगों को बिना किसी और पूछताछ के कहीं भी जाने देते हैं।

आपको याद ही होगा कि जब भी कोई नेता जेल जाता है, तो उसके लिए वहां पर हर तरफ की वीआईपी सुरक्षा मौजूद रहती है। मसलन, वो जेल जाते ही बीमार हो जाता है और तुरंत उसे किसी अस्पताल में प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाता है। जहां वो पूरी अय्याशी के साथ अपना इलाज करवाता है।

एक सच यह भी है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे या फिर उनसे सांठगांठ रखने वालों पर कानून के लंबे हाथ कभी पहुंच ही नहीं पाते हैं। यदा कदा किसी मोहरे को यदि कानून ने सजा दे दी तो उसका गुणगान ऐसे किया जाता है, जैसे स्वयं धर्मराज ने इंसाफ किया हो, तथा इसके बाद कोई अपराधी बनेगा ही नहीं। यहां पर मुझे विनोद दुआ (वरिष्ठ पत्रकार, एनडीटीवी समाचार चैनल) जी की कही हुई बात एकदम सही लगती है कि हमारे देश में सबसे पहले नेता हैं उसके बाद देश की बारी आती है। जबकि अमेरिका और यूरोप जैसे देश में कानून और देश शीर्ष पर हैं, नेता या आम आदमी एक समान हैं। मगर अफसोस कि यह समानता हमारे देश के लिए शायद दिवा स्वप्न है।

असल हमारे देश में देश जैसा कंसेप्ट तो बचा ही नहीं है। यहां हम नहीं बल्कि मैं का प्रभाव ज्यादा बड़ा हो गया है। यही वजह है कि नेता या आला अफसर हमारे लिए नहीं बल्कि अपने लिए काम करते हैं। यदि उदाहरण गिनाने बैंठूं तो महीनों लग जाएंगे गिनती पूरी होने में।

हमारे देश में, क्षमा चाहूंगा, मेरे देश में नेता और अफसर सिर्फ पैसे के लिए काम करते हैं। यहां पर मैं तनख्वाह की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि टेबल के ऊपर और नीचे से आने वाले लिफाफों और सूटकेसों का जिक्र कर रहा हूं। हो सकता है कि कई लोग मेरी बातों से सहमत न भी हों, पर सच तो यही है कि हमारा देश तरक्की तो कर रहा है लेकिन इस तरक्की का फायदा किसे मिल रहा है, यह तो आप सभी लोग ने देख, सुन और पढ़ रहे होंगे। कहीं कोई राजा बन रहा है तो कोई भ्रष्टाचार के नए आदर्श स्थापित कर रहा है।

खैर यह तो हमारे देश के लिए आम बात हो चुकी है।

वैसे हमारे देश के नेता आजकल अपने प्रोटोकॉल को लेकर भी काफी परेशान हो रहे हैं। उनका मानना है कि जिस तरह से भारत में उनकी मेहमान नवाजी होती है, वैसी अमेरिका में नही होती है। लेकिन उनको कौन समझाए कि हर देश में भारत की तरह व्यवस्था नहीं है। हमारे देश में नेताओं और बड़े अधिकारियों को कई अलिखित अधिकार भी प्राप्त हैं। जिनमें सुरक्षा जांच न करवाना सबसे बड़ा अधिकार है। यदि गलती से किसी के साथ जांच जैसा कुछ हुआ तो जांच करने वाली की शामत आना अटल है। वहीं अगर अमेरिका में कोई जांच अधिकारी अपनी ड्यूटी से चूक जाए तो उसकी शामत आ जाती है। यही वजह है कि अमेरिका में 26/11 के बाद कोई आतंकी घटना नहीं हो पाई है। जबकि हमारे देश में नेता, अफसर और सुरक्षा एजेंसियां कुंभकरण से भी गहरी नींद में सोती हैं या फिर शायद कान में तेल डालकर बैठी हैं।

यही वजह है कि पहले कारगिल के रास्ते हमला किया गया उसके बाद संसद भवन में घुसकर हमला किया गया। इतने से भी संतुष्टि नहीं मिली तो मुंबई में 26 नवंबर का हमला किया गया। वैसे भी मुंबई में हुए हमलों को तारीख से ही याद किया जा सकता है क्योंकि वहां हर एक दो वर्ष में कोई न कोई आतंकवादी घटना होती ही रहती है और सबको याद रखने के लिए तारीख याद रखना जरूरी है। क्योंकि आतंकवादियों के लिए हमारे देश में आतंकी हमला करना किसी बच्चे के खेल से ज्यादा कठिन नहीं है।

और जहां तक बात है भ्रष्टाचार की, तो उसमें हम नोबेल के हकदार हैं। साल दर साल हम इसमें अपने अंक बढ़ाते जा रहे हैं। यहां तक कि इस वर्ष की रिपोर्ट में तो हमारे देश को दुनिया का सबसे ज्यादा भ्रष्ट देश होने का खिताब भी हासिल हो गया है। हमारा देश भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और लचर कानून व्यवस्था के मामले पर टॉप में है। यदि विश्वास न हो तो इस वर्ष और पिछले कई वर्षों की ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट्स को देख सकते हैं।

लेकिन इन सबके लिए जिम्मेदार हैं हमारे नेता, अफसर और जनता भी। व्यवस्थाएं इतनी सड़ चुकी हैं कि जनता को इन पर भरोसा बचा ही नहीं है। रही सही कसर पूरा कर देते हैं ये हमारे माननीय टाइप के लोग। जो इन्हें धता बताकर अपना हर काम कर लेते हैं।

देश बड़ा या नेता

आप सबने यह खबर तो जरूर देखी, सुनी और पढ़ी ही होगी कि अमेरिका में भारत की राजदूत के साथ पैट डाउन सुरक्षा जांच की गई। जब यह खबर मीडिया के जरिए आई तो तुरंत प्रतिक्रियाएं आना शुरू हो गईं। लगभग सभी ने इसे देश की आन-बान-शान और न जाने किस-किस से इसे जोड़कर रख दिया साथ ही अमेरिका की आलोचना भी की। हमारे विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने यहां तक कह डाला कि इस तरह से भारतीय अधिकारियों की बेइज्जती को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और वो अमेरिका से अपनी नाराजगी जरूर जताएंगे।

लेकिन असल मुद्दा यह है कि जैसे हम हैं क्या वैसा दूसरों का होना जरूरी है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हम खुद को कानून से ऊपर मानते हैं, लेकिन दूसरे देशों में भी ऐसा हो यह जरूरी तो नहीं है। बड़े बुजुर्गों ने ऐसे ही नहीं फरमाया था कि "जैसा देश वैसा भेष"। यदि उनकी इस बात को अमल में लाते तो ऐसी परेशानी ही नहीं आती। यही कारण है कि अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था को हमने आन पर ले लिया है। अधिकांश यह सुनने को मिल रहा है कि अमेरिका जिनिवा समझौते को दरकिनार करता रहता है। लेकिन सोचने वाली बात यह भी है कि इसी सुरक्षा व्यवस्था का फायदा उसे आज मिल रहा है, जबकि इसकी कमी का खामियाजा हम भुगत ही रहे हैं। हमारे देश में सरकारी अंगरक्षक तथा लाल पीली बत्तियों का काफिला लेकर शान समझा जाता है। यही वजह है कि कानून के रखवाले इन रंगों की बत्ती वाले वाहन में बैठे हुए लोगों को बिना किसी और पूछताछ के कहीं भी जाने देते हैं।

आपको याद ही होगा कि जब भी कोई नेता जेल जाता है, तो उसके लिए वहां पर हर तरफ की वीआईपी सुरक्षा मौजूद रहती है। मसलन, वो जेल जाते ही बीमार हो जाता है और तुरंत उसे किसी अस्पताल में प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाता है। जहां वो पूरी अय्याशी के साथ अपना इलाज करवाता है।

एक सच यह भी है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे या फिर उनसे सांठगांठ रखने वालों पर कानून के लंबे हाथ कभी पहुंच ही नहीं पाते हैं। यदा कदा किसी मोहरे को यदि कानून ने सजा दे दी तो उसका गुणगान ऐसे किया जाता है, जैसे स्वयं धर्मराज ने इंसाफ किया हो, तथा इसके बाद कोई अपराधी बनेगा ही नहीं। यहां पर मुझे विनोद दुआ (वरिष्ठ पत्रकार, एनडीटीवी समाचार चैनल) जी की कही हुई बात एकदम सही लगती है कि हमारे देश में सबसे पहले नेता हैं उसके बाद देश की बारी आती है। जबकि अमेरिका और यूरोप जैसे देश में कानून और देश शीर्ष पर हैं, नेता या आम आदमी एक समान हैं। मगर अफसोस कि यह समानता हमारे देश के लिए शायद दिवा स्वप्न है।

असल हमारे देश में देश जैसा कंसेप्ट तो बचा ही नहीं है। यहां हम नहीं बल्कि मैं का प्रभाव ज्यादा बड़ा हो गया है। यही वजह है कि नेता या आला अफसर हमारे लिए नहीं बल्कि अपने लिए काम करते हैं। यदि उदाहरण गिनाने बैंठूं तो महीनों लग जाएंगे गिनती पूरी होने में।

हमारे देश में, क्षमा चाहूंगा, मेरे देश में नेता और अफसर सिर्फ पैसे के लिए काम करते हैं। यहां पर मैं तनख्वाह की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि टेबल के ऊपर और नीचे से आने वाले लिफाफों और सूटकेसों का जिक्र कर रहा हूं। हो सकता है कि कई लोग मेरी बातों से सहमत न भी हों, पर सच तो यही है कि हमारा देश तरक्की तो कर रहा है लेकिन इस तरक्की का फायदा किसे मिल रहा है, यह तो आप सभी लोग ने देख, सुन और पढ़ रहे होंगे। कहीं कोई राजा बन रहा है तो कोई भ्रष्टाचार के नए आदर्श स्थापित कर रहा है।

खैर यह तो हमारे देश के लिए आम बात हो चुकी है।

वैसे हमारे देश के नेता आजकल अपने प्रोटोकॉल को लेकर भी काफी परेशान हो रहे हैं। उनका मानना है कि जिस तरह से भारत में उनकी मेहमान नवाजी होती है, वैसी अमेरिका में नही होती है। लेकिन उनको कौन समझाए कि हर देश में भारत की तरह व्यवस्था नहीं है। हमारे देश में नेताओं और बड़े अधिकारियों को कई अलिखित अधिकार भी प्राप्त हैं। जिनमें सुरक्षा जांच न करवाना सबसे बड़ा अधिकार है। यदि गलती से किसी के साथ जांच जैसा कुछ हुआ तो जांच करने वाली की शामत आना अटल है। वहीं अगर अमेरिका में कोई जांच अधिकारी अपनी ड्यूटी से चूक जाए तो उसकी शामत आ जाती है। यही वजह है कि अमेरिका में 26/11 के बाद कोई आतंकी घटना नहीं हो पाई है। जबकि हमारे देश में नेता, अफसर और सुरक्षा एजेंसियां कुंभकरण से भी गहरी नींद में सोती हैं या फिर शायद कान में तेल डालकर बैठी हैं।

यही वजह है कि पहले कारगिल के रास्ते हमला किया गया उसके बाद संसद भवन में घुसकर हमला किया गया। इतने से भी संतुष्टि नहीं मिली तो मुंबई में 26 नवंबर का हमला किया गया। वैसे भी मुंबई में हुए हमलों को तारीख से ही याद किया जा सकता है क्योंकि वहां हर एक दो वर्ष में कोई न कोई आतंकवादी घटना होती ही रहती है और सबको याद रखने के लिए तारीख याद रखना जरूरी है। क्योंकि आतंकवादियों के लिए हमारे देश में आतंकी हमला करना किसी बच्चे के खेल से ज्यादा कठिन नहीं है।

और जहां तक बात है भ्रष्टाचार की, तो उसमें हम नोबेल के हकदार हैं। साल दर साल हम इसमें अपने अंक बढ़ाते जा रहे हैं। यहां तक कि इस वर्ष की रिपोर्ट में तो हमारे देश को दुनिया का सबसे ज्यादा भ्रष्ट देश होने का खिताब भी हासिल हो गया है। हमारा देश भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और लचर कानून व्यवस्था के मामले पर टॉप में है। यदि विश्वास न हो तो इस वर्ष और पिछले कई वर्षों की ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट्स को देख सकते हैं।

लेकिन इन सबके लिए जिम्मेदार हैं हमारे नेता, अफसर और जनता भी। व्यवस्थाएं इतनी सड़ चुकी हैं कि जनता को इन पर भरोसा बचा ही नहीं है। रही सही कसर पूरा कर देते हैं ये हमारे माननीय टाइप के लोग। जो इन्हें धता बताकर अपना हर काम कर लेते हैं।

Monday, October 1, 2007

यह भी सच है


संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि दुनियाभर में आज भी एक अरब से अधिक लोग शहरी स्लम बस्तियों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यदि सरकारों ने समय रहते इन्हें नियंत्रित नहीं किया तथा इनके पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की तो अगले 30 साल में इनकी संख्या दोगुनी हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र एक अक्टूबर को विश्व आवास दिवस के रूप में मनाता है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार इन शहरी बस्तियों में रहने वाले लोग भय, असुरक्षा, गरीबी और मानवाधिकारों से वंचित जीवन जी रहे हैं जहां मूलभूत आवश्यकताओं का भारी अभाव है तथा हिंसा व अपराध एक गंभीर समस्या बनती जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र ने इस साल विश्व आवास दिवस का विषय या थीम एक सुरक्षित शहर ही वास्तविक शहर' चुना है। वास्तव में यह विषय मानव बस्तियों की हालत पर नजर डालता है। संयुक्त राष्ट्र ने शहरी सुरक्षा, सामाजिक न्याय खासतौर पर शहरी अपराध और हिंसा, बलात् निष्कासन, असुरक्षित शहरी निवास के साथ साथ प्रकृति व मनुष्यजन्य आपदाओं के प्रति जागरूकता और इस बारे में प्रयासों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ही एक 'सुरक्षित शहर ही वास्तविक शहर' विषय चुना है।
वर्तमान समय और परिस्थितियों में अधिकतर शहरों में भय और असुरक्षा का एक प्रमुख कारण अपराध और हिंसा है। संयुक्त राष्ट्र ने इस साल विश्व आवास दिवस-2007 के अंतरराष्ट्रीय आयोजन का नेतृत्व नीदरलैंड की राजधानी हेग शहर को सौंपा है। इस अवसर पर वहां एक सम्मेलन का आयोजन किया गया है, जिसमें सभी स्तर के पेशेवर लोगों को आमंत्रित किया गया है जो विकसित और विकासशील देशों में शहरी सुरक्षा और बचाव में आ रही चुनौतियों पर अपने विचार रखेंगे।


अब आप ही बताइए देश कैसी तरक्की कर रहा है।

यह भी सच है


संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि दुनियाभर में आज भी एक अरब से अधिक लोग शहरी स्लम बस्तियों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यदि सरकारों ने समय रहते इन्हें नियंत्रित नहीं किया तथा इनके पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की तो अगले 30 साल में इनकी संख्या दोगुनी हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र एक अक्टूबर को विश्व आवास दिवस के रूप में मनाता है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार इन शहरी बस्तियों में रहने वाले लोग भय, असुरक्षा, गरीबी और मानवाधिकारों से वंचित जीवन जी रहे हैं जहां मूलभूत आवश्यकताओं का भारी अभाव है तथा हिंसा व अपराध एक गंभीर समस्या बनती जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र ने इस साल विश्व आवास दिवस का विषय या थीम एक सुरक्षित शहर ही वास्तविक शहर' चुना है। वास्तव में यह विषय मानव बस्तियों की हालत पर नजर डालता है। संयुक्त राष्ट्र ने शहरी सुरक्षा, सामाजिक न्याय खासतौर पर शहरी अपराध और हिंसा, बलात् निष्कासन, असुरक्षित शहरी निवास के साथ साथ प्रकृति व मनुष्यजन्य आपदाओं के प्रति जागरूकता और इस बारे में प्रयासों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ही एक 'सुरक्षित शहर ही वास्तविक शहर' विषय चुना है।
वर्तमान समय और परिस्थितियों में अधिकतर शहरों में भय और असुरक्षा का एक प्रमुख कारण अपराध और हिंसा है। संयुक्त राष्ट्र ने इस साल विश्व आवास दिवस-2007 के अंतरराष्ट्रीय आयोजन का नेतृत्व नीदरलैंड की राजधानी हेग शहर को सौंपा है। इस अवसर पर वहां एक सम्मेलन का आयोजन किया गया है, जिसमें सभी स्तर के पेशेवर लोगों को आमंत्रित किया गया है जो विकसित और विकासशील देशों में शहरी सुरक्षा और बचाव में आ रही चुनौतियों पर अपने विचार रखेंगे।


अब आप ही बताइए देश कैसी तरक्की कर रहा है।