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Saturday, January 7, 2012

ये हैं अपने देश के हालात

भई 2011 तो गया। लेकिन जाते-जाते कुछ ऐसे कारनामे कर गया है, जिनका असर 2012 पर तो रहेगा। मसलन अण्णा ने सरकार को नाको ऐसे चने चबवाए जिससे उसे जनता की ताकत का अंदाजा तो हो ही गया है। यह अलग बात है कि नेता अपनी हरकतों से कभी बाज नहीं आते हैं। क्या करें, जात ही ऐसी है। खैर, अण्णा फैक्टर के अलावा भ्रस्टाचार और घोटालों के खुलासे का अजगर भी पूरे साल सरकार से लिपटा रहा। महंगाई भी आए-दिन डंक मारती रही। हालांकि इस डंक के दंश को केवल जनता ने ही झेला और उसकी कराह सुनने वाला भी कोई नहीं है।

देश में नए-नए चोर किस्म के धन-कुबेरों का खुलासा भी होता रहा। राजनीतिक उथल-पुथल पूरे देश में दिखी। कर्नाटक में येदियुरप्पा ने खुद को कुर्सी से ऐसा चिपकाया कि उन्हें घसीट कर उतारना पड़ा। देश का प्रमुख विपक्षी दल यानी भारतीय जनता पार्टी, जिसमें कार्यकर्ता के अलावा सभी पाए जाते हैं। मेरा कहने का मतलब है, जो भी नेतागण वहां हैं, वो सभी खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार ही मानते हैं। कोई उपवास रखने लगता है तो कोई डुगडुगी बजाता हुआ अपने रथ से देश की यात्रा पर निकल पड़ता है। एयरकंडीशन और सभी सुविधायुक्त रथ में बैठकर गरीबों के हित की बात करते हैं।

देश में एक प्रदेश है, मध्यप्रदेश। जहां के मुख्यमंत्री खुद को प्रदेश की महिलाओं का भाई कहते नहीं थकते हैं। यह अलग बात है कि सीएम भाई के होते हुए भी 2011 में कई बहनों को जला दिया गया, बलात्कार किया गया और तो और देश में सबसे ज्यादा बाल अपराध भी यहीं होते हैं। दूसरी तरफ हैं अपनी बहन जी। जी हां, सही समझे आप। देश के सबसे बड़े प्रदेश की मुखिया, जो अगले महीने जनता के दर से यूपी विधानसभा के दरवाजे तक पहुंचने के लिए रास्ता तलाशने की तैयारी कर रही हैं। पूर्ण बहुमत वाली बहिन जी की सरकार ने पांच साल ऐश ही किया। प्रदेश के हालात तो आपको टीवी चैनलों और अखबारों से मिल ही जाते हैं। ऐसा कोई अपराध नहीं है, जो यहां न होता हो। लूट, हत्या, अपहरण, बलात्कार, भ्रष्टाचार....सब यहां आराम से हो जाता है। पुलिस तो कहिए कि एक विभाग है, जिसका काम वर्दी पहनकर लूट करना है।

एक आंखो देखा किस्सा सुनाता हूं आपको। वैसे यूपी के एनसीआर में रहने वाले इससे वाकिफ होंगे। मैंने हॉट सिटी कहे जाने वाले गाजियाबाद में एक खास स्थान पर जबरदस्त जाम देखा। जाम एक पुलिया पर लगा हुआ था, और दोनों ओर पुलिस की जीपें भी खड़ी थीं। मजेदार बात यह कि वहां खड़े खाकीदारी पूरी गंभीरता के साथ अपनी हथेलियों के बीच तंबाकू घिस रहे थे, लगा कि बस इसे मुंह में दबाते ही जाम हटाने के लिए तत्पर हो जाएंगे। हुआ भी ऐसा ही। तंबाकू दबाकर दरोगा जी एक छोटा हाथी (टाटा ऐस को यहां इसी नाम से पुकारते हैं) के ड्रायवर के पास पहुंचे और पूछा कि सब्जी भरकर कहां जा रहे हो। निकालो 100 रुपये वरना जब्त कर लूंगा तुम्हारा हाथी। फिर उनकी नजर लोडिंग ऑटो पर पड़ी। वहां भी यही बात दोहराई गई। इसके बाद दरोगा जी वापस जाकर अपनी जीप में लेट गए। रही बात जाम की तो उसे छंटने में 45 मिनट लग गए। ऐसी मुस्तैदी आपने शायद ही देखी होगी कहीं।

खैर छोडि़ए, यह तो पूरे देश का ही हाल है। शायद बदलेगा नहीं।

हम महंगाई की बात कर रहे थे। तो इस साल हमारी केंद्र सरकार ने कई चुटकुले भी छोड़े। जैसे 32 रुपये रोजाना आमदनी वाले को गरीब न मानना। महंगाई को 100 दिन में काबू कर लेना। वैसे यह डायलॉग 2009 में यूपीए की दूसरी पारी के तुरंत बाद पहली बार सुनने को मिला था, तब से अब तक लगातार इसे रिवाइंड करके सुनाया जाता रहा है। पता नहीं 100 दिन का सरकारी पैमाना क्या है। कहीं वो भी 32 रुपये जैसा कुछ होगा, जो नामसझ आम आदमी होने की वजह से हम समझ नहीं पा रहे हैं।

चापलूसी के नए कीर्तिमान भी 2011 में बनाए गए। कोई मैडम को खुश करने के लिए बयान जारी करता रहा तो कोई बाबा को खुश करने के लिए। आम आदमी से तो किसी को कोई वास्ता ही नहीं है। किसी ने कहा कि आरटीआई सिरदर्द बन रहा है, इसे हटाओ। तो किसी को सोशल नेटवर्किंग साइट्‌स से ही परेशानी होने लगी।

2011 ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया को कई सबक सिखाए हैं। पहला सबक यह कि जनता ही जनार्दन है। जो शायद चार तानाशाह भी भूल चुके थे, जिनकी अक्ल ठिकाने लगा दी गई। अमेरिका जैसे सुपर पावर ही हालत जगजाहिर है। वहां आर्थिक तंगी है तो भारतवर्ष में सरकारी खजाने से ज्यादा पैसा स्विट्‌जरलैंड के बैंक खातों में जमा है।

नेता और अफसर करोड़ो-अरबों के नीचे का घोटाला नहीं करते हैं, मानो उनकी साख का सवाल है। उज्जैन और इंदौर में करोड़पति चपरासी और बाबू मिलते हैं तो भोपाल में अरबपति आईएएस पति-पत्नी। अंबानी साहब ने दुनिया का सबसे महंगा बंगला बना लिया फिर पता चला कि साहब उसमें तो वास्तुदोष है। अब उसमें रहे कौन। तो ये हैं अपने देश के हालात।

Saturday, January 29, 2011

दिल्ली सबसे असुरक्षित महानगर


दिल्ली के खाते में एक और बदनुमा दाग जुड़ गया है और यह देश का सबसे असुरक्षित महानगर बन गया है। चाहे अपराध हो या महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार की गिनती, राष्ट्रीय राजधानी इन सबमें अव्वल हो गई है।

सरकार के ताजातरीन आँकड़ों के मुताबिक 2009 में देश के बड़े 35 नगरों में हुए 343749 अपराधों में दिल्ली का हिस्सा सबसे ज्यादा 13.2 फीसदी रहा। इसके बाद बेंगलुरु (9.4 फीसदी) और मुंबई (9.1 फीसदी) का स्थान रहा।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में बताया गया कि इन शहरों में बलात्कार के कुल 1696 मामलों में केवल दिल्ली में 404 मामले हुए। महिलाओं के अपहरण में भी दिल्ली का हिस्सा सबसे अधिक रहा। फिरौती 3544 मामलों में राजधानी का हिस्सा 38.9 फीसदी रहा।

2009 में दिल्ली में दहेज के दानवों ने कई नववधुओं को लील लिया। देश के बड़े 35 शहरों में दहेज हत्या के 684 मामलों में अकेली दिल्ली में 104 मामले सामने आए। छेड़छाड़ के मामलों में भी दिल्ली पीछे नहीं रही। कुल 3477 मामलों में यहाँ 14.1 फीसदी यानी 491 मामले हुए।

दिल्ली सबसे असुरक्षित महानगर


दिल्ली के खाते में एक और बदनुमा दाग जुड़ गया है और यह देश का सबसे असुरक्षित महानगर बन गया है। चाहे अपराध हो या महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार की गिनती, राष्ट्रीय राजधानी इन सबमें अव्वल हो गई है।

सरकार के ताजातरीन आँकड़ों के मुताबिक 2009 में देश के बड़े 35 नगरों में हुए 343749 अपराधों में दिल्ली का हिस्सा सबसे ज्यादा 13.2 फीसदी रहा। इसके बाद बेंगलुरु (9.4 फीसदी) और मुंबई (9.1 फीसदी) का स्थान रहा।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में बताया गया कि इन शहरों में बलात्कार के कुल 1696 मामलों में केवल दिल्ली में 404 मामले हुए। महिलाओं के अपहरण में भी दिल्ली का हिस्सा सबसे अधिक रहा। फिरौती 3544 मामलों में राजधानी का हिस्सा 38.9 फीसदी रहा।

2009 में दिल्ली में दहेज के दानवों ने कई नववधुओं को लील लिया। देश के बड़े 35 शहरों में दहेज हत्या के 684 मामलों में अकेली दिल्ली में 104 मामले सामने आए। छेड़छाड़ के मामलों में भी दिल्ली पीछे नहीं रही। कुल 3477 मामलों में यहाँ 14.1 फीसदी यानी 491 मामले हुए।

Saturday, January 15, 2011

भ्रष्टाचार का नया मीटर

2010 के भ्रष्टाचार इंडेक्स के मुताबिक भारत आज भी वहीं है, जहां वह 15 वर्ष पहले था। तो क्या इसका यह मतलब निकलता है कि वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार ही हमारी पहचान है?

यह दुनियाभर में फैले भ्रष्टाचार का नक्शा है।

ऐसे देश जहां, भ्रष्टाचार नहीं है, उन्हें सुर्ख लाल रंग से दर्शाया गया है, जबकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए देशों को पीले रंग से दिखाया गया है। डेनमार्क को दुनिया के सबसे ज्यादा स्वच्छ छवि वाला या फिर यूं कहें कि भद्र राष्ट्र कहा गया है। सोमालिया को दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश कहा गया है। इस अफ्रीकी देश को भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में 178वां स्थान दिया गया है।

इस नक्शे को वर्ष 2010 के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक के आधार पर बनाया गया है, इसका मूल आधार ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट है। भ्रष्टाचारी देशों की सूची को दर्जनों सर्वेक्षण के बाद बनाया गया है। इसमें कई बड़े व्यापारियों की मदद ली गई है, जिन्हें इन देशों के साथ काम करने के दौरान वहां के भ्रष्टाचार के बारे में पता चला।

चीन को भी अत्यधिक भ्रष्ट देशों की फेहरिस्त में 78वां स्थान मिला है। हमारे देश यानी भारत का हाल चीन से भी ज्यादा खराब है। भारत को 87वां स्थान मिला है। हालांकि हम यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि हमारे पड़ोसी मुल्कों जैसेः श्रीलंका (91), बांग्लादेश (134), पाकिस्तान (143) एवं नेपाल (146) से हमारी स्थिति कुछ हद तक बेहतर दिखाई देती है। हमारे देश के लिए एक और खुशी की बात यह भी हो सकती है कि भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में हमारे पड़ोसी मुल्कों का स्थान शुरू से वही है, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पहली प्रकाशित रिपोर्ट में था। हालांकि ऐसा क्यों है इस बारे में आपको बाद में बताएंगे। फिलहाल नक्शे पर ही बात करते हैं।

यूरोप जैस धनी देशों को पीले रंग से दिखाया गया है, जबकि गरीब देशों को लाल रंग में। अफ्रीका तथा एशियाई देश भी इसी रंग से दिखाई गए हैं। क्या इससे मन में सवाल नहीं उठते हैं। इस नक्शे में प्रोटेस्टेंट एवं कैथोलिक देशों तथा अन्य देशों के बीच की रेखा साफ दिखाई देती है।

सारे प्रोटेस्टेंट देश इस सूची में शीर्ष पर हैं। डेनमार्क एवं न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से नंबर एक पर हैं। फिनलैंड तथा स्वीडन भी क्रमशः चार एवं पांच नंबर पर हैं। कनाडा नंबर छह पर है, जहां की आबादी का 40% हिस्सा कैथोलिक है। नीदरलैंड्स (7), ऑस्ट्रेलिया (8), स्विट्ज़रलैंड 9वें स्थान पर है और यहां की आबादी में 40% हिस्सा कैथोलिक्स का है तथा नॉर्वे 10वें स्थान पर है।

निचले पायदान पर मौजूद प्रोटेस्टेंट देशों का क्रम भी 22 पर आकर रुक जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका इस क्रम की शोभा बढ़ा रहा है। वहीं ब्रिटेन 20वें स्थान पर तथा जर्मन 15वें स्थान पर है। गैर प्रोटेस्टेंट देशों में से केवल सिंगापुर ही है जो शीर्षक्रम यानी 10वें स्थान पर है। 11वें नंबर पर लक्ज़मबर्ग है, जो कैथोलिक देश है।
दुनियाभर के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि कैथोलिक देश, प्रोटेस्टेंट देशों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट हैं। लातिन अमेरिका का चिली अपवाद स्वरूप दिखाई दे रहा है, जिसको सूची में 21वां स्थान दिया गया है। हालांकि इसके चारों तरफ लाल रंग वाले देशों की संख्या ज्यादा दिखाई दे रही है। ब्राज़ील (69), पनामा (73), कोलंबिया (78), मेक्सिको (98), अर्जेंटीना (105), बोलिविया (110), एक्वाडोर (127) एवं वेनेज़ुएला (164) नए प्रकार के कैथोलिक देशों का ज्यादा प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

लंबे चले संघर्ष एवं तीन हजार लोगों के बलिदान के बाद तानाशाही से आज़ाद होकर चिली ने संपन्नता हासिल की है। वर्तमान में यह दक्षिणी अमेरिका का सबसे कम भ्रष्ट तथा संपन्न देश है।

आज इस अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र तथा पूर्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं यानी जापान (17), दक्षिण कोरिया (39) तथा सिंगापुर के साथ गिना जाता है।

साभारः लेख वरिष्ठ स्तंभकार एवं पत्रकार श्री आकार पटेल जी के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है। उनका यह लेख अंग्रेजी बिजनेस अखबार मिंट के साप्ताहिक परिशिष्ठ लाउंज में छपा है।

भ्रष्टाचार का नया मीटर

2010 के भ्रष्टाचार इंडेक्स के मुताबिक भारत आज भी वहीं है, जहां वह 15 वर्ष पहले था। तो क्या इसका यह मतलब निकलता है कि वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार ही हमारी पहचान है?

यह दुनियाभर में फैले भ्रष्टाचार का नक्शा है।

ऐसे देश जहां, भ्रष्टाचार नहीं है, उन्हें सुर्ख लाल रंग से दर्शाया गया है, जबकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए देशों को पीले रंग से दिखाया गया है। डेनमार्क को दुनिया के सबसे ज्यादा स्वच्छ छवि वाला या फिर यूं कहें कि भद्र राष्ट्र कहा गया है। सोमालिया को दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश कहा गया है। इस अफ्रीकी देश को भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में 178वां स्थान दिया गया है।

इस नक्शे को वर्ष 2010 के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक के आधार पर बनाया गया है, इसका मूल आधार ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट है। भ्रष्टाचारी देशों की सूची को दर्जनों सर्वेक्षण के बाद बनाया गया है। इसमें कई बड़े व्यापारियों की मदद ली गई है, जिन्हें इन देशों के साथ काम करने के दौरान वहां के भ्रष्टाचार के बारे में पता चला।

चीन को भी अत्यधिक भ्रष्ट देशों की फेहरिस्त में 78वां स्थान मिला है। हमारे देश यानी भारत का हाल चीन से भी ज्यादा खराब है। भारत को 87वां स्थान मिला है। हालांकि हम यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि हमारे पड़ोसी मुल्कों जैसेः श्रीलंका (91), बांग्लादेश (134), पाकिस्तान (143) एवं नेपाल (146) से हमारी स्थिति कुछ हद तक बेहतर दिखाई देती है। हमारे देश के लिए एक और खुशी की बात यह भी हो सकती है कि भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में हमारे पड़ोसी मुल्कों का स्थान शुरू से वही है, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पहली प्रकाशित रिपोर्ट में था। हालांकि ऐसा क्यों है इस बारे में आपको बाद में बताएंगे। फिलहाल नक्शे पर ही बात करते हैं।

यूरोप जैस धनी देशों को पीले रंग से दिखाया गया है, जबकि गरीब देशों को लाल रंग में। अफ्रीका तथा एशियाई देश भी इसी रंग से दिखाई गए हैं। क्या इससे मन में सवाल नहीं उठते हैं। इस नक्शे में प्रोटेस्टेंट एवं कैथोलिक देशों तथा अन्य देशों के बीच की रेखा साफ दिखाई देती है।

सारे प्रोटेस्टेंट देश इस सूची में शीर्ष पर हैं। डेनमार्क एवं न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से नंबर एक पर हैं। फिनलैंड तथा स्वीडन भी क्रमशः चार एवं पांच नंबर पर हैं। कनाडा नंबर छह पर है, जहां की आबादी का 40% हिस्सा कैथोलिक है। नीदरलैंड्स (7), ऑस्ट्रेलिया (8), स्विट्ज़रलैंड 9वें स्थान पर है और यहां की आबादी में 40% हिस्सा कैथोलिक्स का है तथा नॉर्वे 10वें स्थान पर है।

निचले पायदान पर मौजूद प्रोटेस्टेंट देशों का क्रम भी 22 पर आकर रुक जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका इस क्रम की शोभा बढ़ा रहा है। वहीं ब्रिटेन 20वें स्थान पर तथा जर्मन 15वें स्थान पर है। गैर प्रोटेस्टेंट देशों में से केवल सिंगापुर ही है जो शीर्षक्रम यानी 10वें स्थान पर है। 11वें नंबर पर लक्ज़मबर्ग है, जो कैथोलिक देश है।
दुनियाभर के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि कैथोलिक देश, प्रोटेस्टेंट देशों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट हैं। लातिन अमेरिका का चिली अपवाद स्वरूप दिखाई दे रहा है, जिसको सूची में 21वां स्थान दिया गया है। हालांकि इसके चारों तरफ लाल रंग वाले देशों की संख्या ज्यादा दिखाई दे रही है। ब्राज़ील (69), पनामा (73), कोलंबिया (78), मेक्सिको (98), अर्जेंटीना (105), बोलिविया (110), एक्वाडोर (127) एवं वेनेज़ुएला (164) नए प्रकार के कैथोलिक देशों का ज्यादा प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

लंबे चले संघर्ष एवं तीन हजार लोगों के बलिदान के बाद तानाशाही से आज़ाद होकर चिली ने संपन्नता हासिल की है। वर्तमान में यह दक्षिणी अमेरिका का सबसे कम भ्रष्ट तथा संपन्न देश है।

आज इस अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र तथा पूर्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं यानी जापान (17), दक्षिण कोरिया (39) तथा सिंगापुर के साथ गिना जाता है।

साभारः लेख वरिष्ठ स्तंभकार एवं पत्रकार श्री आकार पटेल जी के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है। उनका यह लेख अंग्रेजी बिजनेस अखबार मिंट के साप्ताहिक परिशिष्ठ लाउंज में छपा है।