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Wednesday, April 15, 2015

वोट के लिए तो जनहित किया ही जा सकता है

गूगल सर्च से साभार
देश में एक दशक तक एक ऐसी सरकार का राज रहा, जिसने योजनाएं तो खूब बनाईं, पर अमल तो चुनिंदा पर ही हो सका। हां, घोटाले जरूर एक से बढ़कर एक हुए। लाखों और करोड़ों लूटना तो अब पुरानी और शर्मनाक बात बन चुकी है। जब तक आंकड़ा 100 करोड़ से ऊपर न हो, इज्‍जत ही नहीं बनती है। सरकार बदली तो उम्‍मीद जगी कि शायद अब व्‍यवस्‍थाएं बदलें। लेकिन यह भी कोरी कल्‍पना साबित होती जा रही हैं।

भ्रष्‍टाचार अब भी बेलगाम है, हां यह कह सकते हैं कि अपनी पीठ थपथपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। विश्‍व की सबसे तेज उभरती हुई अर्थव्‍यवस्‍था की एक सचाई यह भी है कि यहां अब भी करोड़ों लोग गरीब और भूखे हैं। अशिक्षित और बेरोजगार हैं। जिनके पास पेट भरने को नहीं है। उनको सरकारों से मतलब नहीं होता है, उन्‍हें तो दो वक्‍त की रोटी की चिंता होती है।

बड़े बुजुर्गों में कहा है, 'भूखे भजन न होई गोपाला'। गलत नही है। मौसम की मार ने किसानों के सामने मुसीबत खड़ी कर दी है। देश के कई राज्‍यों में हजारों एकड़ फसल खेत में ही नष्‍ट हो गई है। न जाने कितने किसानों ने आत्‍महत्‍या कर ली है। सरकारों ने उनके जख्‍मों पर राहत का मरहम लगाने के स्‍थान पर महज कुछ सौ रुपए या कुछ हजार रुपए का मुआवजा रूपी झुनझुना थमा दिया है। एक राज्‍य में तो जिला कलेक्‍टर ने किसान की आत्‍महत्‍या का मजाक ही बना दिया।

अजब-गजब मध्‍यप्रदेश की तो बात ही क्‍या है। यहां की राजधानी भोपाल में वीआईपी क्षेत्रों में रहने वालों के लिए विशेष वाटर ट्रीटमेंट प्‍लांट लगाया गया है, ताकि मंत्री और नौकरशाह आरओ क्‍वालिटी का पानी नल से ही पी सकें। लेकिन उन लोगों की सुध कोई नहीं ले रहा है जो नदी में खड़े रहकर आंदोलन कर रहे हैं। एक तरफ खबरें छपती हैं कि राज्‍य का खजाना सस्‍ता हो चुका है और तनख्‍वाहों के अलावा कोई और भुगतान नहीं किया जा सकता है। तो दूसरी ओर रोज नई-नई घोषणाएं हो रही हैं। मजे की बात यह है कि घोषणाएं करने और पूरी होने का अनुपात अपने आप में एक शोध का विषय बन सकता है।

भ्रष्‍टाचार में तो सब एक से बढ़कर एक हैं। यदि फलाने ने ढिमाके पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लगाए तो ढिमाके ने उस पर कार्रवाई करने के बजाय फलाने के पाप गिनाना शुरू कर दिया। यानी लब्‍बोलुआब यह कि तुम्‍हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय।

सारा का सारा ध्‍यान केवल इस ओर है कि किस धर्म को कोसें और किसे अच्‍छा कहें। केंद्र में सत्‍ता परिवर्तन होते ही बचनवीर बुलंद हो गए हैं। आए दिन घर वापसी, लव जेहाद और नसबंदी जैसी बातें होने लगी हैं। क्‍या ऐसा करने से गरीब का पेट भर जाएगा। यदि कोई ईसाई अपना धर्म बदलकर हिंदू हो जाएगा, तो उसे रोजगार, रोटी और छत नसीब होगी। मेरी छोटी बुद्धि तो कहती है कि ऐसा शायद नहीं हो सकेगा।

हालांकि देवतातुल्‍य नेताओं की दृष्टि में ऐसा संभव हो सकता है, जो मेरी समझ में न आ रहा हो। लेकिन क्‍या करूं। आम इंसान जो ठहरा।

मेरे विचार से (शायद अधिकांश लोग इससे सहमत न हों) राजनीति को धर्म या पार्टी केंद्रित न होकर, जनकेंद्रित होना चाहिए। योजनाएं केवल बनाई न जाएं, उनको अमल में लाना भी सुनिश्चित किया जाए। शिक्षा की बात भर न की जाए, वाकई देश के अंतिम नागरिक तक उसे उपलब्‍ध कराया जाए। स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के लिए घोषणाएं भर न की जाएं, बल्कि उसे ऐसा बनाया जाए कि लोगों को सचमुच लाभ मिल सके।

चलिए एक विकल्‍प और बताता हूं। जनहित को यह सोचकर मत करिए कि इससे जनता का भला होगा। क्‍योंकि ऐसा सोचना भारत की राजनीतिज्ञों को शोभा नहीं देता है शायद। नेतागण यह सोचकर यह सब करें कि इससे उनका वोट बैंक मजबूत होगा। हां, शायद इस लालच में तो जनहित किया ही जा सकता है। बाकि देश और अभागी जनता का भाग्‍य। 

Sunday, September 29, 2013

जैसी जनता वैसी व्यवस्था और सरकार

देश के किसी भी कोने में चले जाइए, किसी भी पान की दुकान पर या शाम को बाजार या मोहल्लों में होने वाली पटियेबाजी पर। आपको देश की राजनीति और देश की दुर्दशा पर टिप्पणी करते विशेषज्ञ जरूर मिल जाएंगे। घोटालों से लेकर सियासी दांवपेच के बारे में उनका विश्लेषण सुनने लायक होता है। सभी यह मानते हैं कि हमारा देश भ्रष्टाचार और गंदी राजनीति का शिकार है। लेकिन क्या सारा दोष नेताओं पर मढना जायज है। जरा सोचिए।

नेता मंगल ग्रह से तो आए नहीं हैं जो हम पर राज कर रहे हैं। हमारे और आपके बीच में से ही चुनकर भेजे गए है। हम ही उनको भेजते हैं और फिर कोसते हैं। व्यवस्था पर दोष भी मढते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में चुनाव में नकारने का अधिकार देने की बात कही है। इससे पहले दोषियों को संसद और विधानसभाओं से दूर रखने का आदेश भी दिया था, जिसके खिलाफ केंद्र सरकार ने अध्यादेश पारित कर दिया था।

हम यानि आम जनता का मानस यह है कि तंत्र की बेकार है, उसे सुधारना होगा। इस तरह जिम्मेदारी टालने से बात नहीं बनने वाली है। व्यवस्था को सुधारना हमारे हाथों में ही है। इसके लिए सरकार या सुप्रीम कोर्ट का मुंह ताकने की कतई जरूरत नहीं पडे अगर थोडी समझदारी से काम लिया जाए। मसलन, आपको चुनावों में कोई पसंद नहीं है तो राइट टू रिजेक्ट के अलावा वोट न डालने का निर्णय भी तो कानून में दिया गया है। बस आपको पोल बूथ जाकर यह बताना होगा कि आपको किसी को भी वोट नहीं देना है।

इसी तरह से अगर आप अपने जनप्रतिनिधि से संतुष्ट नहीं हैं तो उसका सामाजिक बहिष्कार शुरू करिए, क्योंकि जनता ही उनकी ताकत है और जनता ही उनकी कमजोरी भी है।

लेकिन इससे भी जरूरी है खुद को बदलना। खुद सोचिए कि ईमानदार व्यवस्था की चाह रखने वाले आप और हम खुद कितने ईमानदार हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे काम होते हैं जहां आप भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं। चाहे वो सामान की खरीदारी हो या फिर​ किसी सरकारी दफ्तर से काम करवाना।

अगर लाइसेंस बनवाना हो तो एजेंट खोजते हैं। कोई सर्टिफिकेट बनवाना हो तो जुगाड निकालते हैं। जान पहचान के दम पर काम करवाना मानो शान की बात समझा जाता है। कोई नेता से पहचान का रौब दिखाता है तो कोई सरकारी अधिकारी का। पुलिस वालों से दोस्ती का भी इस्तेमाल किया जाता है। ट्रैफिक पुलिस पकड ले तो तुरंत जेब से फोन निकालकर किसी से बात करवाने लगते है। सडक पर रेड लाइट हो तब भी उसे क्रॉस करना मानो शान की बात है।

अगर हम अपना सिविक सेंस सुधारेंगे तो व्यवस्था भी सुधरने लगेगी और नेता भी लाइन पर आ जाएंगे। आखिर व्यवस्था हमारे लिए हैं, तो उसे बनाए रखना भी हमारी जिम्मेदारी ही तो है।

जैसी जनता वैसी व्यवस्था और सरकार

देश के किसी भी कोने में चले जाइए, किसी भी पान की दुकान पर या शाम को बाजार या मोहल्लों में होने वाली पटियेबाजी पर। आपको देश की राजनीति और देश की दुर्दशा पर टिप्पणी करते विशेषज्ञ जरूर मिल जाएंगे। घोटालों से लेकर सियासी दांवपेच के बारे में उनका विश्लेषण सुनने लायक होता है। सभी यह मानते हैं कि हमारा देश भ्रष्टाचार और गंदी राजनीति का शिकार है। लेकिन क्या सारा दोष नेताओं पर मढना जायज है। जरा सोचिए।

नेता मंगल ग्रह से तो आए नहीं हैं जो हम पर राज कर रहे हैं। हमारे और आपके बीच में से ही चुनकर भेजे गए है। हम ही उनको भेजते हैं और फिर कोसते हैं। व्यवस्था पर दोष भी मढते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में चुनाव में नकारने का अधिकार देने की बात कही है। इससे पहले दोषियों को संसद और विधानसभाओं से दूर रखने का आदेश भी दिया था, जिसके खिलाफ केंद्र सरकार ने अध्यादेश पारित कर दिया था।

हम यानि आम जनता का मानस यह है कि तंत्र की बेकार है, उसे सुधारना होगा। इस तरह जिम्मेदारी टालने से बात नहीं बनने वाली है। व्यवस्था को सुधारना हमारे हाथों में ही है। इसके लिए सरकार या सुप्रीम कोर्ट का मुंह ताकने की कतई जरूरत नहीं पडे अगर थोडी समझदारी से काम लिया जाए। मसलन, आपको चुनावों में कोई पसंद नहीं है तो राइट टू रिजेक्ट के अलावा वोट न डालने का निर्णय भी तो कानून में दिया गया है। बस आपको पोल बूथ जाकर यह बताना होगा कि आपको किसी को भी वोट नहीं देना है।

इसी तरह से अगर आप अपने जनप्रतिनिधि से संतुष्ट नहीं हैं तो उसका सामाजिक बहिष्कार शुरू करिए, क्योंकि जनता ही उनकी ताकत है और जनता ही उनकी कमजोरी भी है।

लेकिन इससे भी जरूरी है खुद को बदलना। खुद सोचिए कि ईमानदार व्यवस्था की चाह रखने वाले आप और हम खुद कितने ईमानदार हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे काम होते हैं जहां आप भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं। चाहे वो सामान की खरीदारी हो या फिर​ किसी सरकारी दफ्तर से काम करवाना।

अगर लाइसेंस बनवाना हो तो एजेंट खोजते हैं। कोई सर्टिफिकेट बनवाना हो तो जुगाड निकालते हैं। जान पहचान के दम पर काम करवाना मानो शान की बात समझा जाता है। कोई नेता से पहचान का रौब दिखाता है तो कोई सरकारी अधिकारी का। पुलिस वालों से दोस्ती का भी इस्तेमाल किया जाता है। ट्रैफिक पुलिस पकड ले तो तुरंत जेब से फोन निकालकर किसी से बात करवाने लगते है। सडक पर रेड लाइट हो तब भी उसे क्रॉस करना मानो शान की बात है।

अगर हम अपना सिविक सेंस सुधारेंगे तो व्यवस्था भी सुधरने लगेगी और नेता भी लाइन पर आ जाएंगे। आखिर व्यवस्था हमारे लिए हैं, तो उसे बनाए रखना भी हमारी जिम्मेदारी ही तो है।

Friday, May 17, 2013

हेलीकॉप्टर डील : खेल के खिलाड़ी


Google searched image
इटली से हुए 3600 करोड़ रुपए के वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में 362 करोड़ रुपए की दलाली  के मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोमवार को कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है और वह संसद में हर मुद्दे पर बहस कराने को तैयार हैं। गौरतलब है कि इटली की अगस्ता वेस्टलैंड से 12 वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की खरीद में रिश्वतखोरी के मुद्दे को विपक्ष संसद के सत्र में जोरशोर से उठाने की तैयारी कर रहा है। दूसरी ओर रक्षा मंत्री एके एंटनी भी विपक्ष के तीखे सवालों का जवाब देने के लिए पूरा होमवर्क करने में जुटे हैं। वहीं एके एंटनी पर मुख्य आरोप यह है कि इटली में हेलीकॉप्टर कंपनी के प्रमुख के गिरफ्तार होने के बाद सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे।

3,546 करोड़ रुपए के हेलीकॉप्टर सौदे में दलाली का मामला उजागर होने के बाद इस रक्षा खरीद समझौते की जांच में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी का नाम आया है। इस घोटाले के तार दुनिया के कई देशों तक पहुंच रहे हैं। दलाली के इस पूरे खेल में शामिल प्रमुख खिलाडिय़ों पर एक नजर:

गियुसिपी ओरसी : फिनमैकेनिका कंपनी का सीईओ और चेयरमैन था इसे इटली में गिरफ्तार किया जा चुका है। आरोप है कि उसने 12 अगस्त को वेस्टलैंड हेलीकॉप्टरों की डील हासिल करने के लिए बिचौलियों की मदद ली और इसके लिए उनको 51 मिलियन यूरो (करीब 350 करोड़ रुपए) दिए।

गुइडो राल्फ हाशके : भारत में दलाली पहुंचाने के मामले में मुख्य सूत्रधार है। इस मामले में पिछले साल गिरफ्तार हुआ था। हाशके के पास स्विट्जरलैंड के अलावा अमेरिका की भी नागरिकता है। भारतीय रक्षा बिजनेस सर्किल में उसकी जबरदस्त पकड़ है। वह निर्बाध रूप से भारत आता रहता था और यहां के रक्षा सेक्टर की कार्यशैली से भलीभांति वाकिफ है। सेबी रिकॉर्ड के अनुसार वह 2009 तक एमजीएफ एमार के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में भी शामिल था।

कार्लो गेरोसा : हाशके का बिजनेस पार्टनर है। हेलीकॉप्टर डील के बारे में हाशके और पार्टनर कार्लो गेरोसा की बातचीत को गुप्त तरीके से रिकॉर्ड किया गया है।

क्रिस्टीन माइकल : ब्रिटेन का नागरिक है। भारत में शक्तिशाली राजनीतिक संपर्क हैं। कई बड़े नेताओं तक पहुंच। पिता वोल्फगांग रिचर्ड मैक्स माइकल के भी जबरदस्त भारतीय संपर्क हैं। माइकल, गियुसिपी ओरसी का विश्वासपात्र है। फिनमैकेनिका ने उसको 31 मिलियन यूरो की दलाली पहुंचाने का जिम्मा सौंपा। उसने रकम को इटली के राजनीतिज्ञों और यूरोप में अन्य लोगों तक पहुंचाया। स्विट्जरलैंड में जारी गिरफ्तारी वारंट से बचने के लिए दुबई में है।

गौतम खेतान : दिल्ली का वकील है और हाशके का बिजनेस पार्टनर है। हाशके और गेरोसा का कानूनी सलाहकार है। वह और हाशके चंडीगढ़ स्थित फर्म ऐरोमेट्रिक्स के प्रमोटर हैं। हाशके और गेरोसा की बातचीत में इसका नाम बार-बार आया है।

त्यागी बंधु : संजीव (जूली), डोक्सा और संदीप त्यागी पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी के करीबी रिश्तेदार हैं। पेशे से बिजनेसमैन हैं। नई दिल्ली के बाहरी इलाके में इनका फार्म हाउस है। पूर्व वायु सेना प्रमुख से हाशके की मुलाकात इन्हीं लोगों ने कराई।

एसपी त्यागी : 2005-07 के दौरान वायुसेना प्रमुख रहे। हाशके ने कहा है कि एडब्ल्यू 101 हेलीकॉप्टर के तकनीकी पहलुओं पर उसने त्यागी से विस्तृत बातचीत की थी। उसी आधार पर अगस्ता वेस्टलैंड ने एक तकनीकी रूप से मजबूत बेहतरीन दस्तावेज तैयार किया। जो कि होड़ में मौजूद प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले बेहतर था। त्यागी ने उस दस्तावेज का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद अगस्ता वेस्टलैंड को वापस देते हुए कहा कि इसको आधिकारिक रूप से भारतीय वायु सेना के पास भेज दो। त्यागी ने माना है कि उनकी बिचौलिए हाशके से मुलाकात हुई थी, लेकिन भ्रष्टाचार के किसी भी मामले का उन्होंने खंडन किया है।

दलाली
हाशके ने इटली अधिकारियों के सामने स्वीकार किया है कि उसने एसपी त्यागी से छह-सात बार मुलाकात की थी। उस दौरान उसने हेलीकॉप्टर के तकनीकी पहलुओं पर बातचीत की थी।
  • नवंबर, 2012 में अपने बयान में उसने स्वीकार किया है कि दलाली के रूप में उसको सौदे का 3.5 प्रतिशत यानी 20 मिलियन यूरो (144 करोड़ रुपए) मिले थे।
  • इसका 60 प्रतिशत यानी करीब 12 मिलियन यूरो उसने त्यागी बंधुओं को पहुंचा दिया।
  • बाकी बचे आठ मिलियन यूरो हाशके और कार्लो गेरोसा ने आपस में बांट लिए।
  • किसी भी जांच एजेंसी की निगाह से बचने के लिए भारत में वह रकम सॉफ्टवेयर निर्यात के फर्जी इंजीनियरिंग कॉन्ट्रेक्ट के जरिए ट्यूनीशिया के रास्ते भारत पहुंचाई गई।
लेन-देन में शामिल लोग
  • क्रिस्टीन
  • हाशके
  • हाशके कार्लो
  • त्यागी बंधु
समझौता

  • प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति समेत वीवीआईपी लोगों के इस्तेमाल के लिए फरवरी, 2010 में 12 अगस्त को वेस्टलैंड 101 हेलीकॉप्टर का समझौता सरकार और इटली की दिग्गज रक्षा कंपनी फिनमैकेनिका के बीच हुआ था।
  • फिनमैकेनिका की ब्रिटेन स्थित सहयोगी हेलीकॉप्टर निर्माता कंपनी का नाम अगस्त को वेस्टलैंड है। इस कंपनी पर भारत में सौदा हथियाने के लिए दलाली देने का आरोप है।

रक्षा घोटाले जिनसे हिली दुनिया..
रूस, चीन, इजरायल, इटली, फ्रांस जैसे हथियार बनाने वाले प्रमुख देशों के साथ-साथ दुनिया के दो तिहाई देशों में रक्षा सौदे में दलाली और भ्रष्टाचार आम बात है। बड़े रक्षा सौदों के ठेके हासिल करने के लिए रिश्वतखोरी का सहारा लेना कंपनियों की आदत-सी बन गई है। पूरी दुनिया में इस तरह के भ्रष्टाचार के मामले उजागर हो चुके हैं, जिनमें कुछ में से कुछ में तो आरोपी पर कार्रवाई भी हुई। पिछले कुछ सालों में दुनिया के विभिन्न देशों में हुए रक्षा घोटाले और उसमें हुई कार्रवाई पर डालते हैं एक नजर :
  1. रूस ने रक्षा मंत्री को हटाया : वैसे तो रक्षा घोटाले में अधिकारियों पर कार्रवाई आम बात मानी जाती है, लेकिन रूस में तो घोटाले में रक्षा मंत्री को ही अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। दुनिया के प्रमुख हथियार डीलर वाले देशों में शुमार रूस में कुछ महीने पहले राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने पिछले साल नवंबर में रक्षा मंत्री अनातोली सेरद्युकोव को विभाग में 95 मिलियन डॉलर के घोटाले के आरोप में पद से हटा दिया था। उन पर आरोप था कि रक्षा मंत्रालय की संपत्तियों को तीन अरब रूबल के घाटे में उन्होंने एक व्यावसायिक फर्म को बेचा। इस कदम से पुतिन ने यह संदेश देने की कोशिश की कि रक्षा विभाग में भ्रष्टाचार को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
  2. कनाडा में लड़ाकू विमान का घोटाला : हाल में अमेरिका से एफ-35 लड़ाकू विमानों की खरीद पर कनाडा में खूब हंगामा मचा। अप्रैल 2012 में कनाडा के ऑडिटर जनरल ने भी खरीद पर सवाल खड़े किए। इस रक्षा सौदे को देश के आर्थिक हितों के खिलाफ बताया गया। कनाडा के मीडिया की सुर्खियों में रहे इस सौदे को पूरी तरह से गलत करार दिया गया।
  3. फ्रांस का पनडुब्बी घोटाला : पनडुब्बी और लड़ाकू जहाज बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी डीएनएसएस और मलेशिया सरकार के बीच दो स्कॉर्पियन पनडुब्बी को लेकर समझौता हुआ। लेकिन समझौते पर उंगली उठने के बाद 2010 में फ्रांस सरकार ने मामले की जांच का आदेश दिया। बाद में खुलासा हुआ कि इस सौदे में मलेशिया के तत्कालीन रक्षा मंत्री के दोस्त की कंपनी ने भूमिका निभाई और उसने फ्रांस और मलेशिया के कई अधिकारियों को रिश्वत दी।
  4. ताइवान का युद्धपोत घोटाला : फ्रांस की कंपनी थेल्स और ताइवान के बीच युद्धपोत के लिए समझौता हुआ। इस सौदे को लेकर आरोप लगा कि थेल्स ने इस ठेके को हासिल करने के लिए पांच लाख डॉलर से ज्यादा की रिश्वत दोनों देशों के अधिकारियों को दी, जबकि ये युद्धपोत ताइवान की जरूरतों के लिए भी फिट नही बैठते थे। बाद में जब जांच शुरू हुई तो सौदों में शामिल रहे आठ अधिकारियों की संदिग्ध हालत में मौत हो गई। जांच के दौरान स्विस बैंक के 60 खातों में जमा साढ़े सात करोड़ डॉलर से ज्याद की रकम को सीज कर लिया गया। जून 2007 में इस रकम में से 34 लाख डॉलर की रकम स्विस बैंक ने ताइवान को लौटा दी, जबकि फ्रांस की अदालत ने थेल्स कंपनी पर जून 2011 में छह करोड़ तीस लाख यूरो का जुर्माना लगाया।
  5. श्रीलंका में घोटाला : श्रीलंका के पूर्व सेनाध्यक्ष सरत फोंसेका को हथियार सौदे में भ्रष्टाचार को लेकर कोर्ट मार्शल किया गया, जिसमें उन्हें तीन साल की सजा की सिफारिश की गई। इसके साथ ही उनका दर्जा, पेंशन और पदक वापस लेने के आदेश दिए गए थे। फोंसेका पर आरोप था कि सेनाध्यक्ष रहते हुए हथियार सौदों में अपने दामाद कंपनी का उन्होंने पक्ष लिया था।
  6. इराक में रक्षा सौदा घोटाला : इराक और रूस के बीच अक्टूबर 2009 में 4.2 अरब डॉलर से अधिक का हथियार सप्लाई का सौदा हुआ था। लेकिन इस सौदे को लेकर मीडिया रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी के बेटे तथा कुछ सांसद इस डील के पीछे थे और इसमें उन्होंने रिश्वत भी ली। इसकी जांच जारी है।

अरबों रुपए के घोटाले
यूपीए सरकार में लगातार सामने आ रहे घोटाले उसके लिए परेशानी का सबब बन गए हैं। इनकी वजह से देश की साख को भी बट्टा लगा है। टूजी घोटाला हो या सीडब्ल्यूजी घोटाला या फिर कोयला घोटाला, सभी का आंकड़ा लाख करोड़ तक पहुंच जाता है। विपक्ष का आरोप है कि संप्रग सरकार के यदि सभी घोटालों को मिला लिया जाए किसी संपन्न देश के सालाना बजट से ज्यादा के तो यहां घोटाले ही हुए हैं।

2जी घोटाला संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में ही हुआ था, लेकिन वह सामने आया दूसरे कार्यकाल में। किसानों की कर्ज माफी योजना में घोटाला तो नजर भी आने लगा है। संप्रग सरकार की बदनामी का कारण बनने वाले कुछ प्रमुख घोटाले इस प्रकार हैं :
  • 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला : 2008 में जारी कैग की रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री ए राजा के मनमाने रवैये और नीतियों के चलते 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन से देश को 1.76 लाख करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। बोली प्रक्रिया की जगह पहले आओ पहले पाओ नीति पर अमल किया गया। यह घोटाला 1.76 लाख करोड़ रुपए का निकला।
  • राष्ट्रमंडल खेल घोटाला : 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान कई प्रोजेक्टों में धांधली पाई गई। निविदाओं से लेकर मनमाने तरीके से ऊंचे दामों पर सामानों को खरीदा गया। कई ऐसी कंपनियों को भुगतान किया गया जो अस्तित्व में ही नहीं थीं। यह घोटाला करीब 70 हजार करोड़ रुपए का है।
  • कोयला घोटाला : 2009-2012 के बीच सरकार द्वारा निजी कंपनियों को आवेदन के आधार पर कोयले के 57 ब्लॉक आवंटित करने से इन कंपनियों को लाभ हुआ। बोली की प्रक्रिया से खजाने को नुकसान नहीं होता। कैग ने इस घोटाले में 1.86 लाख करोड़ रुपए के नुकसान का आकलन किया है।
बिजनेस का अनिवार्य हिस्सा है रिश्वत : बर्लुस्कोनी
इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिलवियो बर्लुस्कोनी ने रिश्वत मामले में जेल में बंद फिनमेकानिका एसपीए के पूर्व मुखिया ग्यूसेप ओर्सी का बचाव करते हुए गुरुवार को कहा है कि रिश्वत दुनिया भर में कारोबार का अनिवार्य हिस्सा है। भारत व इटली के बीच वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले पर बर्लुस्कोनी के इस बयान से विवाद पैदा हो गया है।

तीन बार इटली के प्रधानमंत्री रहे बलरुस्कोनी ने एक टेलीविजन को दिए अपने साक्षात्कार के दौरान कहा, रिश्वत सच्चाई है जो मौजूद है और इस तरह की अनिवार्य हालात से इनकार करने का कोई मतलब नहीं है। बर्लुस्कोनी ने कहा कि यह कोई अपराध नहीं है। उन्होंने कहा कि हम उस देश में किसी को कमीशन के भुगतान के बारे में बात कर रहे हैं क्योंकि उस देश में इस तरह के नियम हैं।

Tuesday, February 12, 2013

शहरी विकास का खेल


कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया (सीएजी) की पिछले साल जारी की आखिरी रिपोर्ट में देश में शहरी विकास के नाम पर हो रहे घपले की पोल खोली गई थी। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने देश के कई शहरों में विकास के लिए जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिनुवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) नाम की योजना चला रखी है। आम बजट में इसके लिए फंड का प्रावधान भी किया गया है। लेकिन असली खेल फंड की राशि को लेकर ही खेला जा रहा है। सीएजी का कहना है कि इस मिशन के तहत जारी फंड को दूसरी योजनाओं में उपयोग किया जा रहा है और कुछ राज्यों में इसे इस्तेमाल ही नहीं किया गया है। जिस वजह से राशि लैप्स हो गई है।

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक शहरी विकास के लिए शुरू किया गया यह मिशन अपने उद्देश्य से भटककर फ्लॉप हो चुका है। साथ ही इससे जुड़े नोडल मंत्रालयों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी विकास, शहरी गरीबी उन्मूलन और आवास मंत्रालय के बीच आपसी समन्वय की कमी के साथ ही विशेषज्ञता की कमी के चलते यह मिशन विफल हुआ है।

सक्षम नहीं थे मंत्रालय
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस स्तर की वृहद योजना को लागू करने और उसकी मॉनिटरिंग करने की विशेषज्ञता मंत्रालयों के पास न होने की वजह से योजना सफल नहीं हो पाई। इन्हीं कमियों के चलते जेएनएनयूआरएम के लिए जारी फंड को डाइवर्ट करके अन्य योजनाओं में लगा दिया गया।

एक लाख करोड़ का मिशन
गौरतलब है कि इस मिशन को शहरी गरीबों के उत्थान के लिए शुरू किया गया था। योजना आयोग की पहल पर शुरू की गई इस योजना के तहत पूरे देश में एक लाख करोड़ रुपए खर्च करके विकास किया जाना था। जिसमें केंद्र सरकार ने 66084.65 करोड़ रुपए अपनी ओर से दिए थे। लेकिन अब तक इसके लिए 45066.23 करोड़ रुपए ही बजट द्वारा आवंटित किए गए हैं और इसमें से भी 40584.21 रिलीज किए गए हैं।

अधूरे हैं काम
दिल्ली, भोपाल, इंदौर, रायपुर और बिलासपुर जैसे कई शहर इस योजना की जद में हैं। लेकिन कहीं भी यह पूरी नहीं हो सकी है। यहां तक कि राष्ट्रीय राजधानी में भी जेएनएनयूआरएम के कई कार्य अधूरे पड़े हैं। जबकि मिशन का पहला चरण मार्च 2012 में ही खत्म हो जाना तय किया गया था।

आवासीय योजनाएं भी विफल
सीएजी के मुताबिक जेएनएनयूआरएम के तहत देश के कई शहरों को झुग्गी मुक्त बनाने की योजना थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि 82 आवासीय परियोजनाओं में से 73 अब तक अधूरी हैं। और तो और सात शहरों में तो इसे शुरू भी नहीं किया जा सका है।

मनचाहा इस्तेमाल
सबसे ज्यादा अनियमितता जेएनएनयूआरएम के फंड प्रबंधन में बताई गई है। सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया है कि 114.68 करोड़ रुपए का फंड अन्य योजनाओं में खर्च कर दिया गया है। इसी तरह से मई 2010 में आंध्रप्रदेश हाउसिंग बोर्ड को 72.72 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, जिसे बोर्ड ने राज्य सरकार की राजीव गृहकल्प योजना में उपयोग कर लिया है।

क्या है जेएनएनयूआरएम
दिसंबर 2005 में जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिनुवल मिशन की शुरुआत की गई थी। इसका उद्देश्य देश के शहरों में अधोसंरचना विकास और गरीबी उन्मूलन करना था। इस योजना के तहत स्थानीय प्रशासन को विकास कार्य योजनाएं तय समय में पूरी करना था।

  • 2005 से 2012 के बीच इस योजना में एक लाख करोड़ रुपए खर्च किया जाना था। इसके लिए केंद्र सरकार ने 66.09 हजार करोड़ रुपए दिए।
  • शुरुआत में इस मिशन को देश के 65 शहरों में लागू किया गया था।
  • जेएनएनयूआरएम के अंतर्गत दो उप-मिशन भी बनाए गए थे, जिसमें शहरी अधोसंरचना और शहरी गरीबों के लिए आधारभूत सुविधाएं मुहैया कराना था।
  • शहरी विकास, शहरी गरीबी उन्मूलन और आवास मंत्रालय को इसके लिए बतौर नोडल एजेंसी काम करना था।

हार्ड फैक्ट्स

  • 16.07 लाख रुपए ड्वेलिंग यूनिट्स के लिए जारी किए गए, जिसमें से 4.18 लाख के काम मार्च 2011 तक पूरा होना था। जबकि खर्च हुए केवल 2.21 लाख।
  • 56 सीवरेज और पाइपलाइन प्रोजेक्ट अप्रूव किए गए थे, जिसमें से केवल चार ही पूरे हुए हैं।
  • 19 सड़कें और फ्लाइओवर बनाए जाने थे, लेकिन चार ही बन सके।
  • 37 वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट्स में से तीन ही पूरे हुए हैं।

फेल हुए रिफॉर्म्स

  • शहरी विकास मंत्रालय ने जेएनएनयूआरएम की मॉनिटरिंग के लिए वेब आधारित ऑनलाइन सिस्टम विकसित किया था। हालांकि उसने भी दम तोड़ दिया।
  • केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी रही।
  • अधिकतर डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोट्र्स में पर्यावरण एवं सामाजिक प्रभावों का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।

Monday, February 11, 2013

कितना मोटा हाथी


पहले प्रियंका वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा, फिर नितिन गडकरी और अब मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार। इन सभी का संबंध कंपनियों और उनमें किए गए निवेश से जुड़ा हुआ है। इधर मायावती तीसरी बार उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और उधर, उनके छोटे भाई आनंद कुमार का रियल एस्टेट बिजनेस अभूतपूर्व तरक्की करने लगा। 2007 से 2012 तक मायावती राज्य की मुख्यमंत्री रहीं और इसी दौरान आनंद की कंपनी लगातार मुनाफे पर मुनाफ कमाती रही। गुरुवार को एक अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक आनंद कुमार की कंपनी का नोएडा में काम कर रही कई कंपनियों के साथ संबंध है। मायावती के खास सहयोगी और राज्यसभा सदस्य सतीश चंद्र मिश्र के बेटे की कंपनी भी इसमें शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बिजनेस कर रही जेपी, यूनीटेक और डीएलएफ के साथ आनंद की कंपनी के व्यावसायिक हित जुड़े हुए हैं। खास बात यह है उत्तरप्रदेश में चल रहे अधिकांश रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में यह तीनों कंपनियां शामिल हैं।

750 करोड़ की कंपनी
2007 में मायावती के सीएम बनने के बाद आनंद कुमार ने 49 नई कंपनियां बनाईं जिनके कारोबार के बारे में बहुत कम लोगों को ही पता है। लेकिन पांच साल बाद मार्च 2012 में उनके पास 750 करोड़ रुपए थे। अखबार के मुताबिक कारनॉस्टी नाम की कंपनी के जरिए आनंद कुमार की कंपनी और बाकी रियल एस्टेट कंपनियां आपस में जुड़ी हुई हैं। आनंद कुमार के साथ कारोबारी सहयोगी या उनकी कंपनियों के निदेशक 2006 में बनी कारनॉस्टी मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी से जुड़े हुए हैं। कारनॉस्टी कंपनी रियल एस्टेट, स्पोट्र्स मैनेजमेंट, सिक्योरिटी, हॉस्पिटलिटी के कारोबार में हैं और उसकी कुल 14 सब्सिडियरी कंपनियां हैं। मार्च 2012 में कंपनी की वैल्यू 620 करोड़ रुपए की थी।

कारनॉस्टी का किस कंपनी में कितना निवेश?
आनंद के सहयोगियों के जरिए बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने कारनॉस्टी में 376 करोड़ का भारी-भरकम निवेश 2010 से 2012 के बीच किया है। कारनॉस्टी मैनेजमेंट में 2010 से 2012 के बीच डीएलएफ ने 6 करोड़ और यूनिटेक ने 335 करोड़ का निवेश किया था।

लेन-देन पर सवाल!
आनंद कुमार की सात और कंपनियां सवालों के घेरे में आ गई है। अंग्रेजी के ही एक अन्य अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक इन कंपनियों को 757 करोड़ रुपए नकद मिले हैं। इसके बाद ईडी की नजर इस बात पर है कि इन कंपनियों के पास इतना पैसा कहां से आया। आनंद कुमार की सबसे पुरानी 1987 में बनी कंपनी होटल लाइब्रेरी क्लब प्राइवेट लिमिटेड को ही पिछले पांच वर्षों के दौरान 346 करोड़ रुपए मिले हैं। ये पैसा कंपनी को निवेश की बिक्री से मिला है लेकिन न तो ये साफ है कि ये निवेश क्या था और किसे बेचा गया। इन सातों कंपनियों के डायरेक्टर आनंद कुमार हैं।

अखबार के मुताबिक रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास आनंद कुमार की कंपनियों ने जो दस्तावेज दिए हैं उनकी जांच से पता चलता है कि 7 में से 6 कंपनियां 2007 के बाद स्थापित की गई। कंपनियों के दस्तावेज से पता चलता है कि सिर्फ एक कंपनी का कारोबार बड़ा है और बाकी छह कंपनियों का कारोबार बहुत ही कम है। अखबार के मुताबिक मायावती के नजदीकी नेता और राज्यसभा सदस्य सतीश चंद्र मिश्रा के बेटे कपिल मिश्रा भी आनंद कुमार की एक कंपनी के निदेशक हैं।

क्लर्क से कंपनी के मालिक
आनंद कुमार की इन कंपनियों को ज्यादातर पैसा या तो बहुत ज्यादा प्रीमियम पर शेयर बेचने से मिला या इन कंपनियों ने थर्ड पार्टी से मिले एडवांस को जब्त किया या फिर ऐसे निवेश को बेचा जिसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। गौरतलब है कि सात कंपनियों के मालिक आनंद कुमार ने अपना करियर नोएडा अथॉरिटी में बतौर क्लर्क शुरू किया था। मायावती के छोटे भाई 37 साल के आनंद कुमार के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। वो बीएसपी कार्यकर्ताओं से बहुत कम ही मेलजोल रखते हैं। मायावती ने साल 2011 में एक चुनावी रैली में कहा था कि उनके भाई हमेशा उनके साथ खड़े रहे हैं।

ताज कॉरिडोर मामला
मायावती की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उनको बड़ा झटका देते हुए ताज कॉरिडोर मामले में केस चलाने की अनुमति नहीं देने के राज्यपाल के फैसले को चुनौती देने वाली अर्जी पर नोटिस जारी किया है। अदालत ने मायावती के साथ उनकी सरकार में पर्यावरण मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दकी, सीबीआई और केंद्र सरकार को नोटिस दिया है। कोर्ट ने इनसे 4 हफ्ते में जवाब भी मांगा है। इसके ठीक पहले उनके छोटे भाई के नियंत्रण वाली कुछ कंपनियों से हुए अरबों रुपए के लेन-देन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

बे-हिसाब लेनदेन
अंग्रेजी अखबार के मुताबिक आनंद कुमार की कंपनियों में करोड़ों रुपए का लेन-देन हुआ है और कंपनी के पास इसका कोई हिसाब नहीं है। होटल लाइब्रेरी क्लब प्राइवेट लिमिटेड में हुए निवेश के मामले में रियल एस्टेट की अन्य बड़ी कंपनियों जेपी, यूनिटेक और डीएलएफ का नाम भी सामने आ रहा है। हालांकि डीएलएफ ने इसे सामान्य बिजनेस करार दिया है। डीएलएफ ने कहा है यह बिजनेस पूरी तरह से पारदर्शी है और इसके लिए कोई राजनीतिक फायदा नहीं लिया गया। आनंद पर आरोप है कि उन्होंने मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद रसूख का इस्तेमाल किया।

पत्नी के नाम बेनामी कंपनियां
भाजपा नेता किरीट सौमेया ने दावा किया था  कि मायावती के भाई आनंद कुमार और उनकी पत्नी के नाम 26 बेनामी कंपनियां बनाई गई हैं और इसमें हजारों करोड़ रुपए का लेन-देन हुआ है। बकौल किरीट सोमाया उनके पास मायावती की सारी काली कमाई के सबूत मौजूद हैं और आने वाले दिनों में वो इस बारे में और भी बड़े खुलासे करेंगे।

5 साल में 10 हजार करोड़ रुपए किरीट सोमैया ने कहा कि मायावती के भाई ने पांच साल के भीतर 10,000 करोड़ रुपए की संपत्ति कैसे बनाई, इसकी जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मायावती का कार्यकाल शुरू होने से पहले जिस आनंद कुमार के पास एक जनवरी 2007 तक केवल पांच कंपनियां थीं, पांच साल बाद एक जनवरी 2012 को उनके पास 300 से अधिक कंपनियां हो गईं।

Monday, July 11, 2011

प्रीत नहीं थी जहां की रीत कभी…


चित्र: पोस्ट ऑन पॉलिटिक्स ब्लॉग से साभार
आज आपको एक ऐसे देश के बारे में बताना चाह रहा हूं, जिसके बारे में शायद आपको काफी कुछ पता होगा। मसलन यह बहुत ही महान देश है, विविधता में एकता इसकी खासियत रही है साथ ही शांति एवं संयम तो यहां की आबो-हवा में घुली हुई हैं। ये सब कुछ ऐसे तर्क हैं जो बचपन से ही किताबों तथा गाथाओं और किवदंतियों के माध्यम से हमें घुट्टी की तरह पिलाए गए हैं। तो ये कहानी है उस देश की जिसे, भारत, इंडिया और हिंदुस्तान जैसे नामों से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहां के लोग शांतिप्रिय, साफ दिल वाले तथा ईमानदार होते हैं।

ये तो रही वो बातें जो हम अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हुए खुद ही कहते हैं तथा इसकी सार्थकता बढ़ाने के लिए इन बातों को स्कूल व कॉलेजों के माध्यम में भी फैलाया जाता है। महाभारत जैसे महाकाव्य तथा रामायण को पूजते हैं। भगवतगीता की मिसालें देते हैं तथा केवल कर्म करने जैसी पाखंडी बातों को बोलते हुए हमारी जुबानें कभी नहीं थकती हैं। जबकि हकीकत में इन सब बातों से शायद ही लेना देना हो किसी का। अब ज़रा ज़मीनी हकीक़त पर नज़र दौड़ाते हैं।

पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सटे गुड़गांव के एक गांव में गांववालों ने एक शख्स को सरेआम जलाकर मार डाला। इस शख्स पर गांव के सरपंच की हत्या का आरोप था। यह घटना पुलिस के सामने ही घटित हुई थी। इस प्रकार की घटनाएं आए दिन देश में होती रहती हैं। जनता तो जनता कई बार पुलिस वाले भी आरोपी के साथ ऐसा कृत्य करते हैं, जिससे इंसानियत शर्मसार हो जाए। हरियाणा, यूपी और बिहार की पुलिस ने तो ऐसे कारनामों में रिकॉर्ड कायम कर रखा है। खुद को शांतिप्रिय कहने वाले ऐसी हरकतें करते हैं क्या?

ये हमारा ही देश है, जहां पर दुनिया के किसी भी अन्य मुल्क के मुकाबले सबसे ज्यादा कन्या भ्रूण हत्याएं की जाती हैं। इसके बाद इज्ज़त व मूंछ के नाम पर होने वाली ऑनर किलिंग इसमें चार चांद लगाती है। भ्रष्टाचार तो मानों एक लाइलाज बीमारी बन चुका है। सत्ता का मद नेताओं में कानून का भय कम कर चुका है। अनेकता में एकता जैसे शब्द बेमानी हो चुके हैं। यदि विश्वास न हो तो बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश तथा महाराष्ट्र जैसे राज्यों की स्थिति देखिए। यहां पर जाति तथा क्षेत्रवाद का बोलबाला है। यदि ऐसा न होता तो हम आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, जैसे राज्यों के रहवासियों को “साउथ इंडियन” नाम की संज्ञा न देते। यदि आप कभी ध्यान दें तो पाएंगे कि लोग दूसरे प्रदेश के लोगों का परिचय कुछ इस अंदाज में देते हैं, कि “मैं फलां बंदे को जानत हूं, वो मराठी है/ उडिया है/ मद्रासी या अन्ना है/ पंजाबी है” आदि।

देश की एकता में मतभेद के सैकड़ों छेद हैं। कुछ महीनों पहले महाराष्ट्र की दो पार्टियों महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना तथा शिवसेना ने उत्तर भारतीयों को “भैया” कहते हुए प्रदेश से खदेड़ने की मुहिम छेड़ रखी थी। एक बार तो दिल्ली की मुख्यमंत्री ने भी कह डाला था कि बाहर से आकर रहने वाले लोगों की वजह से दिल्ली में अपराध बढ़ रहे हैं। तो ये है हमारी एकता और अखंडता। देश में आम नागरिकों जिनमें गरीब भी शामिल हैं के अलावा कोई ऐसा नहीं है, जो कानून से डरता हो। खासकर के नेता, नौकरशाह और रसूखदार प्राणी। उनका यह मानना है कि वो सड़क पर चलकर और इस देश् में रहकर अहसान कर रहे हैं इसलिए उन्हें कुछ भी करने विशेषाधिकार प्राप्त है।

...और तो और कानून बनाने वालों ने कानून की देवी की आंखों में पट्टी इसलिए बांधी थी, ताकि वो शुद्ध न्याय कर सके, लेकिन वही पट्टी उसके लिए बाधा साबित हो रही है। इस पट्टी का फायदा उठाते हुए प्रभावशाली लोग कानून की पहुंच से बाहर चले जाते हैं। फंसते हैं तो कमजोर या फिर ऐसे लोग जिन्हें बचाना जरूरी न हो। मसलन राजनीतिक रूप से किसी को ठिकाने लगाना हो तब भी कानून का सहारा लिया जाता है। हालांकि ए. राजा, कनिमोझी और कुछ अपवाद भी कानून के शिकंजे में हैं। लेकिन मनु शर्मा और पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर जैसे लोग भी हैं, जो कानून के सहारे ही कानून से बचते रहे हैं।

हमारा समाज भी अत्यंत की दोहरे चरित्र वाला है। हो सकता है कि मेरी इस बात से गिनती के लोग ही सहमत हों, पर मैं तब भी अपनी बात पर अटल हूं कि हम दोहरे मापदंडों पर जीने वाले लोग हैं। या फिर कुछ ऐसे कहें कि हम चाहते तो सब हैं, पर खुद कुछ नहीं करना चाहते हैं। मसलन “भगत सिंह पैदा हों, पर हमारे नहीं पड़ोसी के घर पर…”। जी हां, यही है हमारी मानसिकता। हम में से अधिकांश लोग दिन में कम से कम दर्जनों बार दफ्तर के बाहर, सड़कों पर और बाजारों में अपशब्दों का प्रयोग करते हुए लोगों को सुनते ही होंगे। तो तरह-तरह के अलंकरणों के साथ बात करते हैं। बावजूद इसके सार्वजनिक रूप से ऐसी बातों को स्वीकारना हमें पसंद नहीं है। समाज की गंदगी जब किताबों में या पर्दे पर दिखाई जाती है तो आंदोलन करने के बेताब लोग झंडे-बैनर लेकर विरोध करने के लिए उतर जाते हैं।

ऐसे लोगों को क्या कहा जाए? खैर, ये जो भड़ास मैंने शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरी है, उसका सिर्फ एक ही मकसद है कि हम इस मुगालतों में जीना छोड़कर सच्चाई का सामना करें। आगे मर्जी आपकी। धन्यवाद….