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Wednesday, April 15, 2015

वोट के लिए तो जनहित किया ही जा सकता है

गूगल सर्च से साभार
देश में एक दशक तक एक ऐसी सरकार का राज रहा, जिसने योजनाएं तो खूब बनाईं, पर अमल तो चुनिंदा पर ही हो सका। हां, घोटाले जरूर एक से बढ़कर एक हुए। लाखों और करोड़ों लूटना तो अब पुरानी और शर्मनाक बात बन चुकी है। जब तक आंकड़ा 100 करोड़ से ऊपर न हो, इज्‍जत ही नहीं बनती है। सरकार बदली तो उम्‍मीद जगी कि शायद अब व्‍यवस्‍थाएं बदलें। लेकिन यह भी कोरी कल्‍पना साबित होती जा रही हैं।

भ्रष्‍टाचार अब भी बेलगाम है, हां यह कह सकते हैं कि अपनी पीठ थपथपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। विश्‍व की सबसे तेज उभरती हुई अर्थव्‍यवस्‍था की एक सचाई यह भी है कि यहां अब भी करोड़ों लोग गरीब और भूखे हैं। अशिक्षित और बेरोजगार हैं। जिनके पास पेट भरने को नहीं है। उनको सरकारों से मतलब नहीं होता है, उन्‍हें तो दो वक्‍त की रोटी की चिंता होती है।

बड़े बुजुर्गों में कहा है, 'भूखे भजन न होई गोपाला'। गलत नही है। मौसम की मार ने किसानों के सामने मुसीबत खड़ी कर दी है। देश के कई राज्‍यों में हजारों एकड़ फसल खेत में ही नष्‍ट हो गई है। न जाने कितने किसानों ने आत्‍महत्‍या कर ली है। सरकारों ने उनके जख्‍मों पर राहत का मरहम लगाने के स्‍थान पर महज कुछ सौ रुपए या कुछ हजार रुपए का मुआवजा रूपी झुनझुना थमा दिया है। एक राज्‍य में तो जिला कलेक्‍टर ने किसान की आत्‍महत्‍या का मजाक ही बना दिया।

अजब-गजब मध्‍यप्रदेश की तो बात ही क्‍या है। यहां की राजधानी भोपाल में वीआईपी क्षेत्रों में रहने वालों के लिए विशेष वाटर ट्रीटमेंट प्‍लांट लगाया गया है, ताकि मंत्री और नौकरशाह आरओ क्‍वालिटी का पानी नल से ही पी सकें। लेकिन उन लोगों की सुध कोई नहीं ले रहा है जो नदी में खड़े रहकर आंदोलन कर रहे हैं। एक तरफ खबरें छपती हैं कि राज्‍य का खजाना सस्‍ता हो चुका है और तनख्‍वाहों के अलावा कोई और भुगतान नहीं किया जा सकता है। तो दूसरी ओर रोज नई-नई घोषणाएं हो रही हैं। मजे की बात यह है कि घोषणाएं करने और पूरी होने का अनुपात अपने आप में एक शोध का विषय बन सकता है।

भ्रष्‍टाचार में तो सब एक से बढ़कर एक हैं। यदि फलाने ने ढिमाके पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लगाए तो ढिमाके ने उस पर कार्रवाई करने के बजाय फलाने के पाप गिनाना शुरू कर दिया। यानी लब्‍बोलुआब यह कि तुम्‍हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय।

सारा का सारा ध्‍यान केवल इस ओर है कि किस धर्म को कोसें और किसे अच्‍छा कहें। केंद्र में सत्‍ता परिवर्तन होते ही बचनवीर बुलंद हो गए हैं। आए दिन घर वापसी, लव जेहाद और नसबंदी जैसी बातें होने लगी हैं। क्‍या ऐसा करने से गरीब का पेट भर जाएगा। यदि कोई ईसाई अपना धर्म बदलकर हिंदू हो जाएगा, तो उसे रोजगार, रोटी और छत नसीब होगी। मेरी छोटी बुद्धि तो कहती है कि ऐसा शायद नहीं हो सकेगा।

हालांकि देवतातुल्‍य नेताओं की दृष्टि में ऐसा संभव हो सकता है, जो मेरी समझ में न आ रहा हो। लेकिन क्‍या करूं। आम इंसान जो ठहरा।

मेरे विचार से (शायद अधिकांश लोग इससे सहमत न हों) राजनीति को धर्म या पार्टी केंद्रित न होकर, जनकेंद्रित होना चाहिए। योजनाएं केवल बनाई न जाएं, उनको अमल में लाना भी सुनिश्चित किया जाए। शिक्षा की बात भर न की जाए, वाकई देश के अंतिम नागरिक तक उसे उपलब्‍ध कराया जाए। स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के लिए घोषणाएं भर न की जाएं, बल्कि उसे ऐसा बनाया जाए कि लोगों को सचमुच लाभ मिल सके।

चलिए एक विकल्‍प और बताता हूं। जनहित को यह सोचकर मत करिए कि इससे जनता का भला होगा। क्‍योंकि ऐसा सोचना भारत की राजनीतिज्ञों को शोभा नहीं देता है शायद। नेतागण यह सोचकर यह सब करें कि इससे उनका वोट बैंक मजबूत होगा। हां, शायद इस लालच में तो जनहित किया ही जा सकता है। बाकि देश और अभागी जनता का भाग्‍य। 

Friday, May 17, 2013

हेलीकॉप्टर डील : खेल के खिलाड़ी


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इटली से हुए 3600 करोड़ रुपए के वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में 362 करोड़ रुपए की दलाली  के मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोमवार को कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है और वह संसद में हर मुद्दे पर बहस कराने को तैयार हैं। गौरतलब है कि इटली की अगस्ता वेस्टलैंड से 12 वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की खरीद में रिश्वतखोरी के मुद्दे को विपक्ष संसद के सत्र में जोरशोर से उठाने की तैयारी कर रहा है। दूसरी ओर रक्षा मंत्री एके एंटनी भी विपक्ष के तीखे सवालों का जवाब देने के लिए पूरा होमवर्क करने में जुटे हैं। वहीं एके एंटनी पर मुख्य आरोप यह है कि इटली में हेलीकॉप्टर कंपनी के प्रमुख के गिरफ्तार होने के बाद सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे।

3,546 करोड़ रुपए के हेलीकॉप्टर सौदे में दलाली का मामला उजागर होने के बाद इस रक्षा खरीद समझौते की जांच में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी का नाम आया है। इस घोटाले के तार दुनिया के कई देशों तक पहुंच रहे हैं। दलाली के इस पूरे खेल में शामिल प्रमुख खिलाडिय़ों पर एक नजर:

गियुसिपी ओरसी : फिनमैकेनिका कंपनी का सीईओ और चेयरमैन था इसे इटली में गिरफ्तार किया जा चुका है। आरोप है कि उसने 12 अगस्त को वेस्टलैंड हेलीकॉप्टरों की डील हासिल करने के लिए बिचौलियों की मदद ली और इसके लिए उनको 51 मिलियन यूरो (करीब 350 करोड़ रुपए) दिए।

गुइडो राल्फ हाशके : भारत में दलाली पहुंचाने के मामले में मुख्य सूत्रधार है। इस मामले में पिछले साल गिरफ्तार हुआ था। हाशके के पास स्विट्जरलैंड के अलावा अमेरिका की भी नागरिकता है। भारतीय रक्षा बिजनेस सर्किल में उसकी जबरदस्त पकड़ है। वह निर्बाध रूप से भारत आता रहता था और यहां के रक्षा सेक्टर की कार्यशैली से भलीभांति वाकिफ है। सेबी रिकॉर्ड के अनुसार वह 2009 तक एमजीएफ एमार के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में भी शामिल था।

कार्लो गेरोसा : हाशके का बिजनेस पार्टनर है। हेलीकॉप्टर डील के बारे में हाशके और पार्टनर कार्लो गेरोसा की बातचीत को गुप्त तरीके से रिकॉर्ड किया गया है।

क्रिस्टीन माइकल : ब्रिटेन का नागरिक है। भारत में शक्तिशाली राजनीतिक संपर्क हैं। कई बड़े नेताओं तक पहुंच। पिता वोल्फगांग रिचर्ड मैक्स माइकल के भी जबरदस्त भारतीय संपर्क हैं। माइकल, गियुसिपी ओरसी का विश्वासपात्र है। फिनमैकेनिका ने उसको 31 मिलियन यूरो की दलाली पहुंचाने का जिम्मा सौंपा। उसने रकम को इटली के राजनीतिज्ञों और यूरोप में अन्य लोगों तक पहुंचाया। स्विट्जरलैंड में जारी गिरफ्तारी वारंट से बचने के लिए दुबई में है।

गौतम खेतान : दिल्ली का वकील है और हाशके का बिजनेस पार्टनर है। हाशके और गेरोसा का कानूनी सलाहकार है। वह और हाशके चंडीगढ़ स्थित फर्म ऐरोमेट्रिक्स के प्रमोटर हैं। हाशके और गेरोसा की बातचीत में इसका नाम बार-बार आया है।

त्यागी बंधु : संजीव (जूली), डोक्सा और संदीप त्यागी पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी के करीबी रिश्तेदार हैं। पेशे से बिजनेसमैन हैं। नई दिल्ली के बाहरी इलाके में इनका फार्म हाउस है। पूर्व वायु सेना प्रमुख से हाशके की मुलाकात इन्हीं लोगों ने कराई।

एसपी त्यागी : 2005-07 के दौरान वायुसेना प्रमुख रहे। हाशके ने कहा है कि एडब्ल्यू 101 हेलीकॉप्टर के तकनीकी पहलुओं पर उसने त्यागी से विस्तृत बातचीत की थी। उसी आधार पर अगस्ता वेस्टलैंड ने एक तकनीकी रूप से मजबूत बेहतरीन दस्तावेज तैयार किया। जो कि होड़ में मौजूद प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले बेहतर था। त्यागी ने उस दस्तावेज का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद अगस्ता वेस्टलैंड को वापस देते हुए कहा कि इसको आधिकारिक रूप से भारतीय वायु सेना के पास भेज दो। त्यागी ने माना है कि उनकी बिचौलिए हाशके से मुलाकात हुई थी, लेकिन भ्रष्टाचार के किसी भी मामले का उन्होंने खंडन किया है।

दलाली
हाशके ने इटली अधिकारियों के सामने स्वीकार किया है कि उसने एसपी त्यागी से छह-सात बार मुलाकात की थी। उस दौरान उसने हेलीकॉप्टर के तकनीकी पहलुओं पर बातचीत की थी।
  • नवंबर, 2012 में अपने बयान में उसने स्वीकार किया है कि दलाली के रूप में उसको सौदे का 3.5 प्रतिशत यानी 20 मिलियन यूरो (144 करोड़ रुपए) मिले थे।
  • इसका 60 प्रतिशत यानी करीब 12 मिलियन यूरो उसने त्यागी बंधुओं को पहुंचा दिया।
  • बाकी बचे आठ मिलियन यूरो हाशके और कार्लो गेरोसा ने आपस में बांट लिए।
  • किसी भी जांच एजेंसी की निगाह से बचने के लिए भारत में वह रकम सॉफ्टवेयर निर्यात के फर्जी इंजीनियरिंग कॉन्ट्रेक्ट के जरिए ट्यूनीशिया के रास्ते भारत पहुंचाई गई।
लेन-देन में शामिल लोग
  • क्रिस्टीन
  • हाशके
  • हाशके कार्लो
  • त्यागी बंधु
समझौता

  • प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति समेत वीवीआईपी लोगों के इस्तेमाल के लिए फरवरी, 2010 में 12 अगस्त को वेस्टलैंड 101 हेलीकॉप्टर का समझौता सरकार और इटली की दिग्गज रक्षा कंपनी फिनमैकेनिका के बीच हुआ था।
  • फिनमैकेनिका की ब्रिटेन स्थित सहयोगी हेलीकॉप्टर निर्माता कंपनी का नाम अगस्त को वेस्टलैंड है। इस कंपनी पर भारत में सौदा हथियाने के लिए दलाली देने का आरोप है।

रक्षा घोटाले जिनसे हिली दुनिया..
रूस, चीन, इजरायल, इटली, फ्रांस जैसे हथियार बनाने वाले प्रमुख देशों के साथ-साथ दुनिया के दो तिहाई देशों में रक्षा सौदे में दलाली और भ्रष्टाचार आम बात है। बड़े रक्षा सौदों के ठेके हासिल करने के लिए रिश्वतखोरी का सहारा लेना कंपनियों की आदत-सी बन गई है। पूरी दुनिया में इस तरह के भ्रष्टाचार के मामले उजागर हो चुके हैं, जिनमें कुछ में से कुछ में तो आरोपी पर कार्रवाई भी हुई। पिछले कुछ सालों में दुनिया के विभिन्न देशों में हुए रक्षा घोटाले और उसमें हुई कार्रवाई पर डालते हैं एक नजर :
  1. रूस ने रक्षा मंत्री को हटाया : वैसे तो रक्षा घोटाले में अधिकारियों पर कार्रवाई आम बात मानी जाती है, लेकिन रूस में तो घोटाले में रक्षा मंत्री को ही अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। दुनिया के प्रमुख हथियार डीलर वाले देशों में शुमार रूस में कुछ महीने पहले राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने पिछले साल नवंबर में रक्षा मंत्री अनातोली सेरद्युकोव को विभाग में 95 मिलियन डॉलर के घोटाले के आरोप में पद से हटा दिया था। उन पर आरोप था कि रक्षा मंत्रालय की संपत्तियों को तीन अरब रूबल के घाटे में उन्होंने एक व्यावसायिक फर्म को बेचा। इस कदम से पुतिन ने यह संदेश देने की कोशिश की कि रक्षा विभाग में भ्रष्टाचार को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
  2. कनाडा में लड़ाकू विमान का घोटाला : हाल में अमेरिका से एफ-35 लड़ाकू विमानों की खरीद पर कनाडा में खूब हंगामा मचा। अप्रैल 2012 में कनाडा के ऑडिटर जनरल ने भी खरीद पर सवाल खड़े किए। इस रक्षा सौदे को देश के आर्थिक हितों के खिलाफ बताया गया। कनाडा के मीडिया की सुर्खियों में रहे इस सौदे को पूरी तरह से गलत करार दिया गया।
  3. फ्रांस का पनडुब्बी घोटाला : पनडुब्बी और लड़ाकू जहाज बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी डीएनएसएस और मलेशिया सरकार के बीच दो स्कॉर्पियन पनडुब्बी को लेकर समझौता हुआ। लेकिन समझौते पर उंगली उठने के बाद 2010 में फ्रांस सरकार ने मामले की जांच का आदेश दिया। बाद में खुलासा हुआ कि इस सौदे में मलेशिया के तत्कालीन रक्षा मंत्री के दोस्त की कंपनी ने भूमिका निभाई और उसने फ्रांस और मलेशिया के कई अधिकारियों को रिश्वत दी।
  4. ताइवान का युद्धपोत घोटाला : फ्रांस की कंपनी थेल्स और ताइवान के बीच युद्धपोत के लिए समझौता हुआ। इस सौदे को लेकर आरोप लगा कि थेल्स ने इस ठेके को हासिल करने के लिए पांच लाख डॉलर से ज्यादा की रिश्वत दोनों देशों के अधिकारियों को दी, जबकि ये युद्धपोत ताइवान की जरूरतों के लिए भी फिट नही बैठते थे। बाद में जब जांच शुरू हुई तो सौदों में शामिल रहे आठ अधिकारियों की संदिग्ध हालत में मौत हो गई। जांच के दौरान स्विस बैंक के 60 खातों में जमा साढ़े सात करोड़ डॉलर से ज्याद की रकम को सीज कर लिया गया। जून 2007 में इस रकम में से 34 लाख डॉलर की रकम स्विस बैंक ने ताइवान को लौटा दी, जबकि फ्रांस की अदालत ने थेल्स कंपनी पर जून 2011 में छह करोड़ तीस लाख यूरो का जुर्माना लगाया।
  5. श्रीलंका में घोटाला : श्रीलंका के पूर्व सेनाध्यक्ष सरत फोंसेका को हथियार सौदे में भ्रष्टाचार को लेकर कोर्ट मार्शल किया गया, जिसमें उन्हें तीन साल की सजा की सिफारिश की गई। इसके साथ ही उनका दर्जा, पेंशन और पदक वापस लेने के आदेश दिए गए थे। फोंसेका पर आरोप था कि सेनाध्यक्ष रहते हुए हथियार सौदों में अपने दामाद कंपनी का उन्होंने पक्ष लिया था।
  6. इराक में रक्षा सौदा घोटाला : इराक और रूस के बीच अक्टूबर 2009 में 4.2 अरब डॉलर से अधिक का हथियार सप्लाई का सौदा हुआ था। लेकिन इस सौदे को लेकर मीडिया रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी के बेटे तथा कुछ सांसद इस डील के पीछे थे और इसमें उन्होंने रिश्वत भी ली। इसकी जांच जारी है।

अरबों रुपए के घोटाले
यूपीए सरकार में लगातार सामने आ रहे घोटाले उसके लिए परेशानी का सबब बन गए हैं। इनकी वजह से देश की साख को भी बट्टा लगा है। टूजी घोटाला हो या सीडब्ल्यूजी घोटाला या फिर कोयला घोटाला, सभी का आंकड़ा लाख करोड़ तक पहुंच जाता है। विपक्ष का आरोप है कि संप्रग सरकार के यदि सभी घोटालों को मिला लिया जाए किसी संपन्न देश के सालाना बजट से ज्यादा के तो यहां घोटाले ही हुए हैं।

2जी घोटाला संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में ही हुआ था, लेकिन वह सामने आया दूसरे कार्यकाल में। किसानों की कर्ज माफी योजना में घोटाला तो नजर भी आने लगा है। संप्रग सरकार की बदनामी का कारण बनने वाले कुछ प्रमुख घोटाले इस प्रकार हैं :
  • 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला : 2008 में जारी कैग की रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री ए राजा के मनमाने रवैये और नीतियों के चलते 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन से देश को 1.76 लाख करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। बोली प्रक्रिया की जगह पहले आओ पहले पाओ नीति पर अमल किया गया। यह घोटाला 1.76 लाख करोड़ रुपए का निकला।
  • राष्ट्रमंडल खेल घोटाला : 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान कई प्रोजेक्टों में धांधली पाई गई। निविदाओं से लेकर मनमाने तरीके से ऊंचे दामों पर सामानों को खरीदा गया। कई ऐसी कंपनियों को भुगतान किया गया जो अस्तित्व में ही नहीं थीं। यह घोटाला करीब 70 हजार करोड़ रुपए का है।
  • कोयला घोटाला : 2009-2012 के बीच सरकार द्वारा निजी कंपनियों को आवेदन के आधार पर कोयले के 57 ब्लॉक आवंटित करने से इन कंपनियों को लाभ हुआ। बोली की प्रक्रिया से खजाने को नुकसान नहीं होता। कैग ने इस घोटाले में 1.86 लाख करोड़ रुपए के नुकसान का आकलन किया है।
बिजनेस का अनिवार्य हिस्सा है रिश्वत : बर्लुस्कोनी
इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिलवियो बर्लुस्कोनी ने रिश्वत मामले में जेल में बंद फिनमेकानिका एसपीए के पूर्व मुखिया ग्यूसेप ओर्सी का बचाव करते हुए गुरुवार को कहा है कि रिश्वत दुनिया भर में कारोबार का अनिवार्य हिस्सा है। भारत व इटली के बीच वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले पर बर्लुस्कोनी के इस बयान से विवाद पैदा हो गया है।

तीन बार इटली के प्रधानमंत्री रहे बलरुस्कोनी ने एक टेलीविजन को दिए अपने साक्षात्कार के दौरान कहा, रिश्वत सच्चाई है जो मौजूद है और इस तरह की अनिवार्य हालात से इनकार करने का कोई मतलब नहीं है। बर्लुस्कोनी ने कहा कि यह कोई अपराध नहीं है। उन्होंने कहा कि हम उस देश में किसी को कमीशन के भुगतान के बारे में बात कर रहे हैं क्योंकि उस देश में इस तरह के नियम हैं।

Wednesday, February 13, 2013

चार राज्यों के 42 विधायकों पर दर्ज हैं बलात्कार के मामले

असम में कांग्रेसी विधायक बिक्रम सिंह ब्रह्म को
महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से पीटा

दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश है। लोग दोषियों को फांसी और महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर कड़े कानून की मांग कर रहे हैं। लेकिन यदि सरकार में ही बैठे कई नेता बलात्कार के आरोपी हों तो फिर क्या उम्मीद की जा सकती है। उधर, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह बलात्कार के मामले में चार्जशीटेड विधायक व सांसदों को निलंबित करने का निर्देश नहीं दे सकता है। यह मामला विधायिका का है और वह उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा बलात्कारियों के नाम, फोटो और पता वेबसाइट पर सार्वजनिक करने की तैयारी बीच यह बात सामने आई है कि देशभर में 42 ऐसे विधायक हैं जिन पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज हैं, जिनमें छह ऐसे हैं जिन पर सीधे बलात्कार का आरोप है।

नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू) और एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है। यह रिपोर्ट जनप्रतिनिधियों द्वारा चुनाव में नामांकन के दौरान दायर शपथ पत्र के आधार पर तैयार की गई है। इन संस्थानों ने माना है कि कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी ऐसे नेताओं को टिकट देती है जिन पर रेप के आरोप लगे हुए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, जिन छह विधायकों पर बलात्कार के आरोप हैं उनमें से तीन उत्तर प्रदेश के हैं। ये विधायक सपा से हैं और इनके नाम श्रीभगवान शर्मा, अनूप संदा और मनोज कुमार पारस हैं। वहीं बाकी के तीन का नाम मो. अलीम खान (उप्र, भाजपा), जेठाभाई जी अहिर (गुजरात, भाजपा), कंडीकुंता वेकांता प्रसाद (तेलगू देशम पार्टी, आंध्र प्रदेश) है।

दूसरी ओर, जिन 36 विधायकों का नाम महिलाओं के शोषण के मामले में सामने आए आए हैं उनमें से छह कांग्रेस, पांच भाजपा और तीन सपा के हैं।

राज्यवार बात करें तो महिलाओं का शोषण करने वाले सबसे ज्यादा विधायक उत्तर प्रदेश से हैं। इनकी संख्या सर्वाधिक आठ हैं। इसके बाद उड़ीसा और पश्चिम बंगाल का नाम आता है, जहां के सात-सात विधायक हैं। वहीं बलात्कार के आरोपी 27 उम्मीदवारों ने पिछले साल में अलग-अलग जगह से चुनाव लड़े हैं।

एनईडब्ल्यू और एडीआर के मुताबिक अन्नाद्रमुक के सांसद एस सेममाल और तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुवेंदु अधिकारी ने यह माना है कि उन पर महिला का अपमान और उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करने का आरोप लगाया गया है। ऐसे जनप्रतिनिधियों से भला और क्या उम्मीद की जा सकती है।

विभिन्न राज्यों में महिला के खिलाफ अपराध करने वाले आरोपी विधायकों की सूची इस प्रकार है:

उत्तर प्रदेश : श्रीभगवान शर्मा, मोहम्मद अलीम खान, अनूप संदा, मनोज कुमार पारस, डॉ. रीता जोशी, रामवीर सिंह, उदय राज राजाराम
ओडिशा : डॉ. एनरुसिंहा साहू, माहेश्वरी मोहंती, शिबाजी माझी, प्रदीप महारथा, भीमसेन चौधरी, समीर रंजन दास, प्रताप चंद्र
पश्चिम बंगाल : बेचराम मन्ना, विल्सन चंप्रामरी, दीपक कुमार हल्दर, भूपेंद्रनाथ हल्दर, विश्वजीत दास, डॉ. हरका बहादुर छत्री, अशोक मल
महाराष्ट्र : अतुल देशकर, भूसे दादाजी दागादू, हर्षवर्धन जाधव, प्रकाश सावंत
झारखंड : चमरा लिंडा, बंधु तिर्की, बन्ना गुप्ता
दिल्ली : मोहन सिंह विष्ट, शोएब इकबाल
राजस्थान : नवल किशोर, भरोसी लाल
आंध्र प्रदेश : कांडीकुंता वी प्रसाद, प्रभाकर चिंतामनेनी
पंजाब : रंजीत सिंह ढिल्लन
बिहार : राम बालक सिंह
तमिलनाडु : सेंथी बालाजी
असम : अबुल कलाम आजाद
गुजरात : जेठाभाई जी अहिर
मध्य प्रदेश : मोती कश्यप
कर्नाटक : मंजू ए

Monday, June 14, 2010

लालची नेता ही हैं जिम्मेदार

जहां तक मुझे याद है, (दिसंबर 1984 और उसके बाद के अखबारों और पत्रिकाओं को पढ़कर) भोपाल गैस त्रासदी की घटना के समय जो हो-हल्ला हुआ था, उसके बाद यदि कुछ हो रहा है; तो वो अब हो रहा है। क्या अखबार और क्या टीवी चैनल, सभी के बीच आगे बढ़कर खबर देने की होड़ मची है। कुछ दिन तो खबरों का केंद्र वारेन एंडरसन ही था। हालांकि मोती सिंह और स्वराज पुरी के मुंह खोलने के बाद फोकस में अर्जुन सिंह भी आ गए हैं। खैर, इसे देर से आए पर दुरुस्त आए कहा जा सकता है। लेकिन एक सवाल और है कि आखिर इतने वर्षों तक ये नौकरशाह क्यों अपनी जुबान पर ताला लगाए बैठे रहे। इस समय जो कुछ भी हो रहा है उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि मानो हम सांप निकल जाने के बाद लाठी ही पीट रहे हैं।

देश के नेता जो आदत से मजबूर हैं, एक ही काम करने में लगे हैं। आरोपों का गोबर एक-दूसरे पर फेंक रहे हैं और जता रहे हैं कि उनके ज्यादा पाक साफ तो कोई है ही नहीं। क्या कांग्रेस और क्या भाजपा। सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। दरअसल यह देश की बदकिस्मती ही है कि यहां का नेता जनता को मूर्ख मानकर चलता है और अपने हित साधता रहता है।

तभी तो हर पांच वर्ष बाद बेशर्मी के साथ झूठे वादों का पुलिंदा लिए हर दरवाजे पर वोट के लिए विनती करता है। लेकिन हमारी जनता करे भी तो क्या करे। वोट न देना या फिर 49 (ओ) का प्रयोग कोई स्थायी हल तो नहीं है ना। भ्रष्टाचार हमेशा ऊपर से नीचे आता है। इसलिए अगर तंत्र को सुधारना है और लोगों को इसमें शामिल करना है तो सुधार भी ऊपर से ही शुरू करना होगा।

एक और बात, मेरे मन में हमेशा से एक सवाल सिर उठाता रहा है, कि आखिर कोई भी शख्स जब नेता बनता है तो उसके पास दौलत कहां से आ जाती है। जब बारी आती है संपत्ति के खुलासे की तो बताते हैं कि वो तो “बे”कार, “बे”घर हैं। तो फिर जिन कारों में वो पूरी शानो शौकत से घूमते हैं वो क्या दान में मिली होती है। जब इन नेताओं के पास घर ही नहीं होता है तो ये रहते कहां है। फुटपाथ पर तो कोई नेता दिखाई नहीं देता है। ऐसा झूठ यह साबित करता है कि वाकई हमारे देश के कानून की आंखों पर पट्टी बंधी है।

अचानक मुझे एक बात और याद आई है कि अगर कहीं भूलवश गैस त्रासदी वाले मुद्दे पर किसी नेता या अफसर से पूछताछ की भी गई तो वो शख्स बीमार तो जरूर पड़ जाएगा। क्योंकि यह तो इन लोगों का विशेषाधिकार है। और हां, सबसे पहले चेस्ट पेन ही होता है और फिर कमजोरी आ जाती है। इसलिए इन त्रासदी से जुड़े लोगों से पूछताछ करते समय डॉक्टरों को तो वहां जरूर रखना चाहिए। वरना मामला अगले एक दशक और खिंच सकता है।

ऐसा मत सोचिएगा कि मैं विषय से भटक गया हूं। यह सब याद भी गैस त्रासदी के समान ही जरूरी भी है और कहीं न कहीं जुड़ा भी है। खैर, एंडरसन तो कमर तक कब्र में लटका हुआ है और भारत लाकर भी ना जाने क्या कर लेंगे उसका। जबकि सारे सबूत चीख-चीख कर कह रहे हैं कि एंडरसन इतना ताकतवर नहीं था कि भोपाल से बाहर भाग जाता और सकुशल भारत से निकल पाता। यह बिना राजनीतिक प्रश्रय से हो ही नहीं सकता था।

हालांकि जिम्मेदारी तय होने में अभी वक्त लगेगा, क्योंकि अभी तक इसी पर विचार मंथन हो रहा है कि कैसे तत्कालीन केंद्र सरकार और उसके मुखिया का नाम इस मामले से हटाकर उस समय के एमपी के सीएम पर ही सारी जिम्मेदारी मढ़ दी जाए। वैसे इसकी नौबत आने के आसार अभी थोड़ी दूर हैं क्योंकि फिलहाल तो सब लोग आरोप की गंदगी एक-दूसरे पर फेंकने पर आमादा हैं। कोई कह रहा है कि कांग्रेस जिम्मेदार है। तो कांग्रेस कह रही है कि अर्जुन सिंह जिम्मेदार हैं। कुल मिलाकर किसी एक को बलि का बकरा बनाने की तैयारी की जा रही हे। जबकि दोषी एक नहीं कई हैं।

चाहे उस समय की केंद्र की सरकार रही हो या फिर राज्य की भोपाल गैस त्रासदी के लिए दोनों ही जिम्मेदार हैं। साथ ही जिम्मेदार वो अफसरान भी हैं, जिन्होंने चुपचाप इस पाप में साथ दिया। यदि दस्तावेजों को देखा जाए तो पता चलता है कि एंडरसन को भगाने में एक नहीं कई महान लोग शामिल थे।

कार्टूनः मंजुल जी का है और दैनिक भास्कर से साभार लिया गया है

लालची नेता ही हैं जिम्मेदार

जहां तक मुझे याद है, (दिसंबर 1984 और उसके बाद के अखबारों और पत्रिकाओं को पढ़कर) भोपाल गैस त्रासदी की घटना के समय जो हो-हल्ला हुआ था, उसके बाद यदि कुछ हो रहा है; तो वो अब हो रहा है। क्या अखबार और क्या टीवी चैनल, सभी के बीच आगे बढ़कर खबर देने की होड़ मची है। कुछ दिन तो खबरों का केंद्र वारेन एंडरसन ही था। हालांकि मोती सिंह और स्वराज पुरी के मुंह खोलने के बाद फोकस में अर्जुन सिंह भी आ गए हैं। खैर, इसे देर से आए पर दुरुस्त आए कहा जा सकता है। लेकिन एक सवाल और है कि आखिर इतने वर्षों तक ये नौकरशाह क्यों अपनी जुबान पर ताला लगाए बैठे रहे। इस समय जो कुछ भी हो रहा है उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि मानो हम सांप निकल जाने के बाद लाठी ही पीट रहे हैं।

देश के नेता जो आदत से मजबूर हैं, एक ही काम करने में लगे हैं। आरोपों का गोबर एक-दूसरे पर फेंक रहे हैं और जता रहे हैं कि उनके ज्यादा पाक साफ तो कोई है ही नहीं। क्या कांग्रेस और क्या भाजपा। सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। दरअसल यह देश की बदकिस्मती ही है कि यहां का नेता जनता को मूर्ख मानकर चलता है और अपने हित साधता रहता है।

तभी तो हर पांच वर्ष बाद बेशर्मी के साथ झूठे वादों का पुलिंदा लिए हर दरवाजे पर वोट के लिए विनती करता है। लेकिन हमारी जनता करे भी तो क्या करे। वोट न देना या फिर 49 (ओ) का प्रयोग कोई स्थायी हल तो नहीं है ना। भ्रष्टाचार हमेशा ऊपर से नीचे आता है। इसलिए अगर तंत्र को सुधारना है और लोगों को इसमें शामिल करना है तो सुधार भी ऊपर से ही शुरू करना होगा।

एक और बात, मेरे मन में हमेशा से एक सवाल सिर उठाता रहा है, कि आखिर कोई भी शख्स जब नेता बनता है तो उसके पास दौलत कहां से आ जाती है। जब बारी आती है संपत्ति के खुलासे की तो बताते हैं कि वो तो “बे”कार, “बे”घर हैं। तो फिर जिन कारों में वो पूरी शानो शौकत से घूमते हैं वो क्या दान में मिली होती है। जब इन नेताओं के पास घर ही नहीं होता है तो ये रहते कहां है। फुटपाथ पर तो कोई नेता दिखाई नहीं देता है। ऐसा झूठ यह साबित करता है कि वाकई हमारे देश के कानून की आंखों पर पट्टी बंधी है।

अचानक मुझे एक बात और याद आई है कि अगर कहीं भूलवश गैस त्रासदी वाले मुद्दे पर किसी नेता या अफसर से पूछताछ की भी गई तो वो शख्स बीमार तो जरूर पड़ जाएगा। क्योंकि यह तो इन लोगों का विशेषाधिकार है। और हां, सबसे पहले चेस्ट पेन ही होता है और फिर कमजोरी आ जाती है। इसलिए इन त्रासदी से जुड़े लोगों से पूछताछ करते समय डॉक्टरों को तो वहां जरूर रखना चाहिए। वरना मामला अगले एक दशक और खिंच सकता है।

ऐसा मत सोचिएगा कि मैं विषय से भटक गया हूं। यह सब याद भी गैस त्रासदी के समान ही जरूरी भी है और कहीं न कहीं जुड़ा भी है। खैर, एंडरसन तो कमर तक कब्र में लटका हुआ है और भारत लाकर भी ना जाने क्या कर लेंगे उसका। जबकि सारे सबूत चीख-चीख कर कह रहे हैं कि एंडरसन इतना ताकतवर नहीं था कि भोपाल से बाहर भाग जाता और सकुशल भारत से निकल पाता। यह बिना राजनीतिक प्रश्रय से हो ही नहीं सकता था।

हालांकि जिम्मेदारी तय होने में अभी वक्त लगेगा, क्योंकि अभी तक इसी पर विचार मंथन हो रहा है कि कैसे तत्कालीन केंद्र सरकार और उसके मुखिया का नाम इस मामले से हटाकर उस समय के एमपी के सीएम पर ही सारी जिम्मेदारी मढ़ दी जाए। वैसे इसकी नौबत आने के आसार अभी थोड़ी दूर हैं क्योंकि फिलहाल तो सब लोग आरोप की गंदगी एक-दूसरे पर फेंकने पर आमादा हैं। कोई कह रहा है कि कांग्रेस जिम्मेदार है। तो कांग्रेस कह रही है कि अर्जुन सिंह जिम्मेदार हैं। कुल मिलाकर किसी एक को बलि का बकरा बनाने की तैयारी की जा रही हे। जबकि दोषी एक नहीं कई हैं।

चाहे उस समय की केंद्र की सरकार रही हो या फिर राज्य की भोपाल गैस त्रासदी के लिए दोनों ही जिम्मेदार हैं। साथ ही जिम्मेदार वो अफसरान भी हैं, जिन्होंने चुपचाप इस पाप में साथ दिया। यदि दस्तावेजों को देखा जाए तो पता चलता है कि एंडरसन को भगाने में एक नहीं कई महान लोग शामिल थे।

कार्टूनः मंजुल जी का है और दैनिक भास्कर से साभार लिया गया है