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Wednesday, July 13, 2011

बंद करिए जनता को मूर्ख बनाना

1993 से लेकर 2011 तक देश की आर्थिक राजधानी मुंबई ने 9 बार इंसानियत को छलनी कर देने वाले धमाके देखे हैं। आज़ाद भारत के इतिहास को देखें तो किसी एक ही शहर ने इतने दंश नहीं झेले हैं, जितने इस जीवंत शहर ने झेले हैं। इन धमाकों का शिकार कोई देश, प्रांत या शहर नहीं बल्कि इंसानियत होती है। धमाकों का शोर और धुंआ छटने के बाद आंसू, दुख, रक्तरंजित लाशें और कभी न भुलाया जा सकने वाला दर्द बचता है। दर्द किसी को खोने का, असमय किसी के चले जाने का।

Cartoon courtsey: Hindustan Times tooningin
इन सबसे इतर एक कौम और है, जो इस दर्द पर नमक रूपी मरहम लगाती रहती है और वो है नेताओं की कौम। वो नेता जो सरकार चलाते हैं, जिनके मातहत प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां काम करती हैं, जो जनता को सुरक्षा का वादा देकर अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम कर लेते हैं। ऐसे धमाके और हमले उन्हें नहीं हमें हताहत करते हैं।

न जाने क्यों, पर जब कल (13 जुलाई 2011) शाम को मुंबई में फिर से सिलसिलेवार धमाकों की खबर मिली तो 2008 वाली घटना की याद ताजा हो गई। मन में दुख और गुस्सा दोनों उठा। दुख उन बेकसूरों के लिए जिन्होंने बिना वजह अपनी जानें गंवाईं और गुस्सा उस नकारा तंत्र के लिए, जो हर बार ऐसी घटना के बाद अपनी झूठी और मक्कार जुबान से एक ही बात दोहराने के लिए तैयार हो जाता है। चाहे एनडीए की सरकार रही हो या फिर यूपीए की, जनता ने हमेशा सुरक्षा और विकास के बारे में सोचा है। यह अलग बात है कि सरकार नाम का रथ जिसे भी हांकने को मिलता है, वो केवल अपनी जेब और राजनीतिक हित ही देख पाता है। इससे आगे की उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। शायद दिखाई भी न देता हो।

जिन्हें धमाका करना था, वो तो अपने मकसद में कामयाब हो गए, पीछे छोड़ गए नेताओं को, कुछ इस तरह के वक्तव्य देने के लिए मशहूर हैं “यह कायराना कदम है” “हम ऐसे हमले की निंदा करते हैं” “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा” “हम अंतरराष्ट्रीय मंच के द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाएंगे” “पाकिस्तान को आरोपियों की सूची और सबूत दिए जाएंगे” “ऐसी घटनाओं से भारत डरने वाला नहीं है और मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा” “हमारी फौज हर तरह के हमलों के लिए तैयार है….” वगैरह-वगैरह। ये अलग बात है कि होता कुछ नहीं है। अगर वाकई कुछ होना होता तो बार-बार ऐसी घटनाएं होती ही क्यों?

देश के नेताओं की यह आदत बन चुकी है कि घटना होते ही तुरंत एक संगठन या देश पर आरोप मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लो। बाकी जांच वांच के लिए तो दर्जनों एजेंसियां और विभाग हैं, जहां लोगों को कुर्सी तोड़ने और चापलूसी से फुरसत मिले तो शायद वो अपने काम के बारे में भी सोचें।

हमारा तंत्र “न कुछ करेंगे और न करने देंगे” की तर्ज पर काम करता है। संसद पर हमले के बाद सेना को हमले के लिए तैयार कर दिया गया, लेकिन आखिरी समय पर संयम का राग बजने लगा। इन हमलों के पीछे के चाहे पाकिस्तान आरोपी हो या फिर कोई पाक प्रायोजित आतंकी संगठन, वो अच्छी तरह जान चुके हैं कि भारत में कभी भी कहीं भी कुछ भी किया जा सकता है। इसलिए जब भी एजेंसियां और पुलिस पुख्ता व्यवस्थाओं का दंभ भरने लगते हैं, तभी इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं। शायद ये देशवासियों को आईना दिखाने के लिए।

बंद करिए जनता को मूर्ख बनाना

1993 से लेकर 2011 तक देश की आर्थिक राजधानी मुंबई ने 9 बार इंसानियत को छलनी कर देने वाले धमाके देखे हैं। आज़ाद भारत के इतिहास को देखें तो किसी एक ही शहर ने इतने दंश नहीं झेले हैं, जितने इस जीवंत शहर ने झेले हैं। इन धमाकों का शिकार कोई देश, प्रांत या शहर नहीं बल्कि इंसानियत होती है। धमाकों का शोर और धुंआ छटने के बाद आंसू, दुख, रक्तरंजित लाशें और कभी न भुलाया जा सकने वाला दर्द बचता है। दर्द किसी को खोने का, असमय किसी के चले जाने का।

Cartoon courtsey: Hindustan Times tooningin
इन सबसे इतर एक कौम और है, जो इस दर्द पर नमक रूपी मरहम लगाती रहती है और वो है नेताओं की कौम। वो नेता जो सरकार चलाते हैं, जिनके मातहत प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां काम करती हैं, जो जनता को सुरक्षा का वादा देकर अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम कर लेते हैं। ऐसे धमाके और हमले उन्हें नहीं हमें हताहत करते हैं।

न जाने क्यों, पर जब कल (13 जुलाई 2011) शाम को मुंबई में फिर से सिलसिलेवार धमाकों की खबर मिली तो 2008 वाली घटना की याद ताजा हो गई। मन में दुख और गुस्सा दोनों उठा। दुख उन बेकसूरों के लिए जिन्होंने बिना वजह अपनी जानें गंवाईं और गुस्सा उस नकारा तंत्र के लिए, जो हर बार ऐसी घटना के बाद अपनी झूठी और मक्कार जुबान से एक ही बात दोहराने के लिए तैयार हो जाता है। चाहे एनडीए की सरकार रही हो या फिर यूपीए की, जनता ने हमेशा सुरक्षा और विकास के बारे में सोचा है। यह अलग बात है कि सरकार नाम का रथ जिसे भी हांकने को मिलता है, वो केवल अपनी जेब और राजनीतिक हित ही देख पाता है। इससे आगे की उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। शायद दिखाई भी न देता हो।

जिन्हें धमाका करना था, वो तो अपने मकसद में कामयाब हो गए, पीछे छोड़ गए नेताओं को, कुछ इस तरह के वक्तव्य देने के लिए मशहूर हैं “यह कायराना कदम है” “हम ऐसे हमले की निंदा करते हैं” “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा” “हम अंतरराष्ट्रीय मंच के द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाएंगे” “पाकिस्तान को आरोपियों की सूची और सबूत दिए जाएंगे” “ऐसी घटनाओं से भारत डरने वाला नहीं है और मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा” “हमारी फौज हर तरह के हमलों के लिए तैयार है….” वगैरह-वगैरह। ये अलग बात है कि होता कुछ नहीं है। अगर वाकई कुछ होना होता तो बार-बार ऐसी घटनाएं होती ही क्यों?

देश के नेताओं की यह आदत बन चुकी है कि घटना होते ही तुरंत एक संगठन या देश पर आरोप मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लो। बाकी जांच वांच के लिए तो दर्जनों एजेंसियां और विभाग हैं, जहां लोगों को कुर्सी तोड़ने और चापलूसी से फुरसत मिले तो शायद वो अपने काम के बारे में भी सोचें।

हमारा तंत्र “न कुछ करेंगे और न करने देंगे” की तर्ज पर काम करता है। संसद पर हमले के बाद सेना को हमले के लिए तैयार कर दिया गया, लेकिन आखिरी समय पर संयम का राग बजने लगा। इन हमलों के पीछे के चाहे पाकिस्तान आरोपी हो या फिर कोई पाक प्रायोजित आतंकी संगठन, वो अच्छी तरह जान चुके हैं कि भारत में कभी भी कहीं भी कुछ भी किया जा सकता है। इसलिए जब भी एजेंसियां और पुलिस पुख्ता व्यवस्थाओं का दंभ भरने लगते हैं, तभी इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं। शायद ये देशवासियों को आईना दिखाने के लिए।

Tuesday, May 24, 2011

यह कैसी महाशक्ति है?


शेर पर भौंकता हुआ कुत्ता। गूगल खोज से साभार
कुछ दिनों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बयान जारी कर कहा था, दुनिया के मुल्कों को भारत से शांति की शिक्षा लेनी चाहिए। ओबामा का मानना है कि यदि दक्षिण एशिया में भारत जैसा समझदार और शांतिप्रिय देश नहीं होता, तो यहां के हालात बद्तर हो सकते थे। ओबामा के इस कूटनीतिक बयान को भारत ने सकारात्मक रूप से लिया है। लेकिन क्या शांतिप्रिय बने रहना हमारे देश के लिए हमेशा फायदेमंद रहेगा? शायद नहीं।

अमेरिका जैसा देश अपने फायदे के लिए गधे को भी बाप मानने वालों में से है। यह वही देश है, जिसने ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को तैयार किया था, जो बाद में उसके लिए ही भस्मासुर साबित हुआ था। अब जबकि ओसामा का किस्सा ही खत्म हो चुका है, तब अमेरिका ने पाकिस्तान को यह समझाना शुरू कर दिया है कि वह भारत से दोस्ती बढ़ाए। उधर पाकिस्तान ने अपनी नीतियों में बदलाव करते हुए अपनी निष्ठा को चीन की तरफ दंडवत कर दिया है।

चीन ने भी कह दिया है कि पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई को वो बर्दाश्त नहीं करेगा। चीन का इशारा अमेरिकी सैन्य कार्रवाईयों एवं भारत की ओर से संभावित कार्रवाई है। हालांकि चीन भी यह जानता है कि भारत कभी भी हमले की पहल नहीं करेगा। यहां पर भारत और पाकिस्तान की स्थिति को महाभारत काल से भी जोड़ा जा सकता है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की मां को यह वचन दिया था कि वो शिशुपाल की सौ गलतियों को माफ कर देंगे। लेकिन 101वीं पर वो उसका वध करने के लिए मजबूर होंगे। यहां पर पाकिस्तान की स्थिति को शिशुपाल से जोड़ा तो जा सकता है, पर भारत को श्रीकृष्ण मानना हमारी भूल हो सकती है।

यदि कारगिल के बाद से लेकर अब तक की स्थितियों पर नजर दौड़ाएं तो आपको पता चलेगा कि हमारे देश का बूढ़ा नेतृत्व कितना मजबूर और इच्छाशक्ति विहीन है। कारगिल की घटना को गंभीरता से न लेने के चलते ही हमारी सेना को बड़ी संख्या में हानि उठानी पड़ी थी। उचित रणनीति के अभाव ने कई सैनिकों को जबरन काल के गाल में ढकेल दिया और उस पर भी घोटाले हुए सो अलग। देश के लोकतांत्रिक मंदिर संसद भवन पर पाकिस्तानी आतंकवादियों का हमला हुआ, तो ऐसा लगा मानो इस बार तो आरपार की लड़ाई होगी, लेकिन जो हुआ, उसे क्या संज्ञा दी जाए, समझ नहीं आता।

मुंबई में हमला हुआ तो हम पाकिस्तान से चिट्टी चिट्टी का खेल खेलने में लग गए। भारत उसे मना रहा है कि वो हमले में अपना हाथ होना कबूल कर ले। क्या चोर कभी कहेगा कि उसने चोरी की है। इतना ही नहीं, हद तो इस पर है कि अफजल गुरू नाम के षड्यंत्रकारी को, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुना रखी है, उसे भी हमारा देश दामाद की तरह पाल रहा है। यही हाल मुंबई हमले में पकड़े गए आमिर अजमल कसाब का भी है। उस पर मुकदमा करके उससे कबूल करवाने का प्रयत्न किया जा रहा है, ताकि वह 26/11 के हमले में अपना हाथ होना कबूल ले। इससे ज्यादा हास्यास्पद क्या होगा।

रही सही कसर आज 25 मई को पूरी हो गई, जब पाकिस्तान ने भारत द्वारा दी गई 50 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची को यह कहते हुए लौटा दिया कि पहले भारत यह जांच ले कि इनमें से कितने लोग भारत में रह रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार, नौकरशाह या फिर दोनों। अकर्मण्यता और आपसी समन्वय की कमी के चलते देश की नाक कहीं न कहीं कट ही जाती है। फिर चाहे वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी दूसरे देश का भाषण पढ़ देना हो या फिर इस तरह की सूची बनाना हो, जिसमें दिए गए नाम हमारे ही मोहल्ले में रह रहे हों।

बताइए, हम एक ऐसे विकासशील, मजबूत अर्थव्यवस्था एवं तेजी उभरती हुई महाशक्ति हैं, जिनकी मजबूती में दीमक लगी हुई है। भ्रष्टाचार की दीमक और कामचोरी की दीमक। देश में नौकरशाही अपनी ढपली बजाता है और नेता अपना राग आलापते हैं। कहीं कोई सुरताल नहीं, जिसे जो मर्जी वो कर रहा है। एक दो भ्रष्टाचारी हों तो गिनाएं भी जाएं। यहां इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि दो तीन भ्रष्टाचार नगर बसाए जा सकते हैं।

वैसे यह कभी न खत्म होने वाला विषय है। आप और हम इस पर लाखों पन्नों का महाकाव्य भी लिख सकते हैं। हालांकि यह किस्सा शायद तब भी खत्म न हो।

Wednesday, March 30, 2011

सबसे भ्रष्ट देशों की टॉप-5 फेहरिस्त में हमारा देश


दुनिया के अमीरों या तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के मामले में किसी सूची में भारत को शीर्ष पर देखकर भले ही सभी भारतीयों को गर्व होता है, लेकिन यह ऐसी सूची है जिसमें कभी भी भारतीय अपने को शीर्ष पर नहीं देखना चाहेंगे। भारत को एशिया प्रशांत के सबसे भ्रष्ट देशों की सूची में शामिल किया गया है। हांगकांग स्थित कारोबार सलाहकार फर्म पीईआरसी ने एशिया क्षेत्र के सर्वे में भारत को फिलीपींस और कंबोडिया के साथ एशिया के सबसे भ्रष्ट 16 देशों की सूची में शामिल किया है।

पॉलिटिकल एंड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी (पीईआरसी) ने भ्रष्टाचार के मामले में भारत को 8.67 की रेटिंग दी है। शून्य से 10 तक के स्केल में ज्यादा रेटिंग का मतलब है ज्यादा भ्रष्ट। सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार वाले देशों में कंबोडिया (9.27), इंडोनेशिया (9.25) और फिलीपींस (8.9) शामिल रहे। चीन की रेंकिंग 7.93 और वियतनाम की 8.3 रही है।भ्रष्ट देशों के मामले में थाईलैंड 7.55 अंकों के साथ 11वें स्थान पर है। तुलनात्मक रूप से सिंगापुर 0.37 रेटिंग के साथ सबसे कम भ्रष्ट देश रहा है। इसके बाद हांगकांग (1.10), ऑस्ट्रेलिया (1.39) जापान (1.90) और अमेरिका (2.39) सबसे कम भ्रष्टाचार वाले देश रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्थानीय निकाय और स्थानीय स्तर के राजनेता राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट पाए गए। स्थानीय नेताओं को सूची में 9.25 अंक मिले हैं, जबकि राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व 8.97 फीसदी के साथ थोड़ा कम भ्रष्ट रहा। शहर स्तर के नौकरशाह भी केंद्रीय नौकरशाहों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट पाए गए।एशियन इंटेलिजेंस रिपोर्ट में पीईआरसी ने कहा है कि भारत में भ्रष्टाचार बढ़ा है और मनमोहन ङ्क्षसह के नेतृत्व वाले यूपीए के दूसरे कार्यकाल में यह काफी भारी पड़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि टेलीकॉम लाइसेंस वितरण, राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी, सैन्य भूमि घोटाले और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण वितरण में घोटालों के कारण सरकार की नींद उड़ी हुई है।हालांकि एजेंसियां इन मामलों जांच कर रही हैं, लेकिन भारतीय जनता लगातार यह सवाल कर रही है कि प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार को रोक पाने में समर्थ भी हैं या नहीं। संसद में विपक्ष ने भी इस मामले पर सरकार को घेर रखा है। विकीलीक्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु करार पर संसद की स्वीकृत में सरकार ने सांसदों को रिश्वत दी। इसके बाद सरकार और घिर चुकी है।

हिंदी अखबार दैनिक हिंदुस्तान एवं बिज़नेस भास्कर में प्रकाशित खबरों से साभार

सबसे भ्रष्ट देशों की टॉप-5 फेहरिस्त में हमारा देश


दुनिया के अमीरों या तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के मामले में किसी सूची में भारत को शीर्ष पर देखकर भले ही सभी भारतीयों को गर्व होता है, लेकिन यह ऐसी सूची है जिसमें कभी भी भारतीय अपने को शीर्ष पर नहीं देखना चाहेंगे। भारत को एशिया प्रशांत के सबसे भ्रष्ट देशों की सूची में शामिल किया गया है। हांगकांग स्थित कारोबार सलाहकार फर्म पीईआरसी ने एशिया क्षेत्र के सर्वे में भारत को फिलीपींस और कंबोडिया के साथ एशिया के सबसे भ्रष्ट 16 देशों की सूची में शामिल किया है।

पॉलिटिकल एंड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी (पीईआरसी) ने भ्रष्टाचार के मामले में भारत को 8.67 की रेटिंग दी है। शून्य से 10 तक के स्केल में ज्यादा रेटिंग का मतलब है ज्यादा भ्रष्ट। सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार वाले देशों में कंबोडिया (9.27), इंडोनेशिया (9.25) और फिलीपींस (8.9) शामिल रहे। चीन की रेंकिंग 7.93 और वियतनाम की 8.3 रही है।भ्रष्ट देशों के मामले में थाईलैंड 7.55 अंकों के साथ 11वें स्थान पर है। तुलनात्मक रूप से सिंगापुर 0.37 रेटिंग के साथ सबसे कम भ्रष्ट देश रहा है। इसके बाद हांगकांग (1.10), ऑस्ट्रेलिया (1.39) जापान (1.90) और अमेरिका (2.39) सबसे कम भ्रष्टाचार वाले देश रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्थानीय निकाय और स्थानीय स्तर के राजनेता राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट पाए गए। स्थानीय नेताओं को सूची में 9.25 अंक मिले हैं, जबकि राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व 8.97 फीसदी के साथ थोड़ा कम भ्रष्ट रहा। शहर स्तर के नौकरशाह भी केंद्रीय नौकरशाहों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट पाए गए।एशियन इंटेलिजेंस रिपोर्ट में पीईआरसी ने कहा है कि भारत में भ्रष्टाचार बढ़ा है और मनमोहन ङ्क्षसह के नेतृत्व वाले यूपीए के दूसरे कार्यकाल में यह काफी भारी पड़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि टेलीकॉम लाइसेंस वितरण, राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी, सैन्य भूमि घोटाले और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण वितरण में घोटालों के कारण सरकार की नींद उड़ी हुई है।हालांकि एजेंसियां इन मामलों जांच कर रही हैं, लेकिन भारतीय जनता लगातार यह सवाल कर रही है कि प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार को रोक पाने में समर्थ भी हैं या नहीं। संसद में विपक्ष ने भी इस मामले पर सरकार को घेर रखा है। विकीलीक्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु करार पर संसद की स्वीकृत में सरकार ने सांसदों को रिश्वत दी। इसके बाद सरकार और घिर चुकी है।

हिंदी अखबार दैनिक हिंदुस्तान एवं बिज़नेस भास्कर में प्रकाशित खबरों से साभार

Sunday, February 20, 2011

हाल-ए-वतन


लगता है कुशासन, भ्रष्टाचार, चोरी, कामचोरी और लूट जैसी नियति हमारे देश यानी भारत की किस्मत में उकेर कर लिखे गए हैं। कभी सोने की चिडिया था, इसलिए लोगों ने इसे लूटा। फिर बारी आई अपने ही घर के वाशिंदो की। उन्होंने भी लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं। लेकिन क्या कभी इस बात का भी घमंड कर पाएंगे कि हमारे देश में गरीबी, बेरोजगारी, अराजकता, भ्रष्टाचार और लूट न हो। शायद नहीं। हो सकता है कि आप इसे नकारात्मक मानें, लेकिन अफसोस कि और कुछ दिख भी तो नहीं रहा है।

आजादी के पहले की बात को अगर भूल भी जाएं, तो भला आजादी के बाद ऐसे कौन से महानतम काम किए गए हैं, जिन पर सीना चौड़ा किया जा सके। लोगों की गाढ़ी कमाई में से लिए जाने वाले कर की राशि को नेता और अफसर अपनी अय्याशी में उड़ा लेते हैं। करों की फेहरिस्त ऐसी कि देखने वाला चकरा ही जाए। लेकिन इन करों से प्राप्त राशि का इस्तेमाल कितनी जगह होता है। सरकार टीवी पर विज्ञापन देती है कि जनता से लिया जाने वाल कर विकास में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि साठ साल से ज्यादा हो गए हैं, आखिर विकास नाम की चिडिया किस बागीचे में दाना चुग रही है।

शुरुआत देश की राजधानी से ही करें तो सारी पोल खुलती हुई दिखाई देगी। यहां पर कानून व्यवस्था का हाल यह है कि बहू-बेटियों को राह चलते ही अगवा कर लिया जाता है और पुलिस जांच की ऐसी राह पकड़ती है, जिसका कोई अंत ही नहीं होता है। सड़क पर चलने वाला या फिर वाहन चलाने वाला नहीं जानता है कि कब उसके नीचे की सड़क धंस जाएगी और वह जमींदोज़ हो जाएगा। एनसीआर कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश से लगा हिस्सा तो अपनी अलग ही कहानी बयान करता है। यहां पर न तो कानून है और न ही प्रशासन। हाल ही में बहन मायावती ने गाजियाबाद और नौएडा का दौरा किया। लेकिन मजे की बात तो यह कि जनता से मिलने के नाम पर शहर-दर-शहर उड़नखटोला लिए जा रही बहिन से कोई मिला ही नहीं है। मिले भी कैसे, बहिनजी जिस भी शहर पहुंचती हैं, उनके पुलिस वाले वहां पर अघोषित कर्फ्यू लगा देते हैं और किसी को भी मैडम से मिलने नहीं दिया जाता है।

मैडम जी को दिखाने के लिए सड़कों के किनारे गमले सजा दिए जाते हैं। शहर में लाइट कटना बंद हो जाती है, लेकिन जैसे ही उनका उड़नखटोला यहां से निकला वहीं हालात दोबारा आ गए। क्या हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि जनता को मूर्ख मानते हैं। या उनका शायद ऐसा मानना है कि अगर उनके बंगले में पीने का साफ पानी आ रहा है, तो आम लोगों को भी ऐसा ही मिल रहा होगा। या अगर उनकी कोठी बिजली से रोशन है तो गरीब की झोपड़ी में भी बिजली होगी।

लेकिन ऐसा नहीं है। वो जानते हैं कि आम जनता चारों ओर से बेहाल है। तभी तो चुनावी बादल छाते ही मेंढक की तरह विकास, बिजली और पानी दिलवाने का राग टर्राने लगते हैं।

खैर, असल बात पर लौटते हैं। खेलों के नाम पर आम आदमी के पैसों का खेल किया जाता है और कोई राजा बनता है तो कोई बेबस। यहां बेबस से आशय हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री का है। अर्थशास्त्र के प्रकांड ज्ञानी हैं, पर न जाने क्यों जनता के अर्थशास्त्र के अलावा सारे शास्त्र समझते हैं। अमीरों के फायदे के लिए तो इनके पास योजनाओं का भंडार है, लेकिन आम जनता के लिए वो बैठकें करते हैं और सोचते हैं। हालांकि इस सोच के परिमाण अभी तक दिखाई नहीं दे पाए हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर स्कूल के बच्चों की तरह स्वयं को निर्दोष बताते हैं। जनता ने इन्हे सबसे शक्तिशाली पद पर इसलिए तो नहीं बैठाया था कि जब जनहित की बात आए तो ये गठबंधन का रोना रोएं या कहें कि उन्हें कुछ पता ही नहीं है।

सोचिए कि अगर देश का प्रधानमंत्री ही कहे कि वो मजबूर है तो फिर किसके सामने गुहार लगाई जाए।

हाल-ए-वतन


लगता है कुशासन, भ्रष्टाचार, चोरी, कामचोरी और लूट जैसी नियति हमारे देश यानी भारत की किस्मत में उकेर कर लिखे गए हैं। कभी सोने की चिडिया था, इसलिए लोगों ने इसे लूटा। फिर बारी आई अपने ही घर के वाशिंदो की। उन्होंने भी लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं। लेकिन क्या कभी इस बात का भी घमंड कर पाएंगे कि हमारे देश में गरीबी, बेरोजगारी, अराजकता, भ्रष्टाचार और लूट न हो। शायद नहीं। हो सकता है कि आप इसे नकारात्मक मानें, लेकिन अफसोस कि और कुछ दिख भी तो नहीं रहा है।

आजादी के पहले की बात को अगर भूल भी जाएं, तो भला आजादी के बाद ऐसे कौन से महानतम काम किए गए हैं, जिन पर सीना चौड़ा किया जा सके। लोगों की गाढ़ी कमाई में से लिए जाने वाले कर की राशि को नेता और अफसर अपनी अय्याशी में उड़ा लेते हैं। करों की फेहरिस्त ऐसी कि देखने वाला चकरा ही जाए। लेकिन इन करों से प्राप्त राशि का इस्तेमाल कितनी जगह होता है। सरकार टीवी पर विज्ञापन देती है कि जनता से लिया जाने वाल कर विकास में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि साठ साल से ज्यादा हो गए हैं, आखिर विकास नाम की चिडिया किस बागीचे में दाना चुग रही है।

शुरुआत देश की राजधानी से ही करें तो सारी पोल खुलती हुई दिखाई देगी। यहां पर कानून व्यवस्था का हाल यह है कि बहू-बेटियों को राह चलते ही अगवा कर लिया जाता है और पुलिस जांच की ऐसी राह पकड़ती है, जिसका कोई अंत ही नहीं होता है। सड़क पर चलने वाला या फिर वाहन चलाने वाला नहीं जानता है कि कब उसके नीचे की सड़क धंस जाएगी और वह जमींदोज़ हो जाएगा। एनसीआर कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश से लगा हिस्सा तो अपनी अलग ही कहानी बयान करता है। यहां पर न तो कानून है और न ही प्रशासन। हाल ही में बहन मायावती ने गाजियाबाद और नौएडा का दौरा किया। लेकिन मजे की बात तो यह कि जनता से मिलने के नाम पर शहर-दर-शहर उड़नखटोला लिए जा रही बहिन से कोई मिला ही नहीं है। मिले भी कैसे, बहिनजी जिस भी शहर पहुंचती हैं, उनके पुलिस वाले वहां पर अघोषित कर्फ्यू लगा देते हैं और किसी को भी मैडम से मिलने नहीं दिया जाता है।

मैडम जी को दिखाने के लिए सड़कों के किनारे गमले सजा दिए जाते हैं। शहर में लाइट कटना बंद हो जाती है, लेकिन जैसे ही उनका उड़नखटोला यहां से निकला वहीं हालात दोबारा आ गए। क्या हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि जनता को मूर्ख मानते हैं। या उनका शायद ऐसा मानना है कि अगर उनके बंगले में पीने का साफ पानी आ रहा है, तो आम लोगों को भी ऐसा ही मिल रहा होगा। या अगर उनकी कोठी बिजली से रोशन है तो गरीब की झोपड़ी में भी बिजली होगी।

लेकिन ऐसा नहीं है। वो जानते हैं कि आम जनता चारों ओर से बेहाल है। तभी तो चुनावी बादल छाते ही मेंढक की तरह विकास, बिजली और पानी दिलवाने का राग टर्राने लगते हैं।

खैर, असल बात पर लौटते हैं। खेलों के नाम पर आम आदमी के पैसों का खेल किया जाता है और कोई राजा बनता है तो कोई बेबस। यहां बेबस से आशय हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री का है। अर्थशास्त्र के प्रकांड ज्ञानी हैं, पर न जाने क्यों जनता के अर्थशास्त्र के अलावा सारे शास्त्र समझते हैं। अमीरों के फायदे के लिए तो इनके पास योजनाओं का भंडार है, लेकिन आम जनता के लिए वो बैठकें करते हैं और सोचते हैं। हालांकि इस सोच के परिमाण अभी तक दिखाई नहीं दे पाए हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर स्कूल के बच्चों की तरह स्वयं को निर्दोष बताते हैं। जनता ने इन्हे सबसे शक्तिशाली पद पर इसलिए तो नहीं बैठाया था कि जब जनहित की बात आए तो ये गठबंधन का रोना रोएं या कहें कि उन्हें कुछ पता ही नहीं है।

सोचिए कि अगर देश का प्रधानमंत्री ही कहे कि वो मजबूर है तो फिर किसके सामने गुहार लगाई जाए।

Thursday, June 17, 2010

आओ भोपालः बदल दें इस घटिया सिस्टम को

जरा अब्राहिम लिंकन साहब के इस कथन पर गौर करिएगा कि "Any people anywhere, being inclined and having the power, have the right to rise up, and shake off the existing government, and form a new one that suits them better. This is a most valuable - a most sacred right - a right, which we hope and believe, is to liberate the world." यह भोपाल मामले और खासकर कि हमारे देश के लिए सटीक बैठता है।


घोर अफसोस और शर्म की बात है कि भोपाल गैस त्रासदी को “सिस्टम” की कारसतानी बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की जा रही है। जी हां दोस्तों, कांग्रेस पार्टी का कहना है कि एंडरसन के बच निकलने में न तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जिम्मेदार थे और ही मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री। जिम्मेदार तो सिस्टम था।

अब जरा इन स्वयंभू समझदार और जनता को मूर्ख समझने वाले नेताओं से यह भी पूछा जाए कि आखिर वो ‘सिस्टम’ का क्या मतलब समझते हैं। जहां तक हमारी गैर राजनीतिक बुद्धि समझ पा रही है, सरकार ही सिस्टम है और उसे चलाती है। तो फिर यह कौन सा सिस्टम था, जिसने एंडरसन को भारत छोड़ने दिया और तो और सिस्टम का ही इसी हिस्सा लोगों को इसकी खबर लगने में 26 साल लग गए।


एक कहावत मैंने सुनी थी कि “12 साल में घूरे के दिन भी फिर जाते हैं।“ लेकिन कमबख्त नेतागिरी ने तो इस कहावत को भी झुठला दिया है। यूनियन कार्बाइड कारखाना भी वहीं का वहीं है और बाकी जिंदा बचे लोग भी। कारखाने में पड़ा जहरीला कचरा भोपाल की फिजा में जहर घोल रहा है। न तो कोई उसे साफ करने वाला है और न ही कोई उस हादसे के जिम्मेदार लोगों को पकड़ने वाला।

क्या कोतवाल और क्या चोर। सबने मिलकर भोपाल के साथ धोखा किया है। आज जब पोल खुल रही है और जनता सवाल पूछ रही है तो उसे सिस्टम का झुनझुना सुनाया जा रहा है। यदि आप उस समय के जिम्मेदार लोगों के बयानात पर गौर करेंगे तो अपनी हंसी और गुस्से दोनों को ही रोक नहीं पाएंगे। लेकिन इससे पहले जरा इस पर गौर करिए और बताइएगा कि क्या ऐसा संभव है।

मान लीजिए, 26/11 को हुए मुंबई हमले एकमात्र जीवित बचा आरोपी अजमल आमिर कसाब यह कहे कि उसे एक बार उसके घर जाने दिया जाए। वो परिजनों से मिलकर जल्द ही वापस आए जाएगा। तो क्या हमारा सिस्टम ऐसा करेगा। शायद नहीं। तो फिर एंडरसन के मामले में ऐसा कैसे होने दिया गया। क्योंकि एंडरसन को इसी मूर्खतापूर्ण वायदे के आधार पर जाने दिया गया था। हालांकि यह बात गले के नीचे उतर नहीं पा रही है।

तत्कालीन पुलिस अधीक्षक और बाद में डीजीपी पद से रिटायर हुए स्वराज पुरी को दी जा रही सभी सुविधाएं इसलिए हटा ली गई हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी सरकारी कार से एंडरसन को स्टेट हैंगर तक पहुंचाया था। अब अगर कार से स्टेट हैंगर तक छोड़ना इतना बड़ा गुनाह है तो फिर राज्य सरकार के शासकीय विमान का पायलट भी दोषी रहा होगा, जिसने एंडरसन को दिल्ली तक पहुंचाया था।

तो क्या वो “लोग” दोषी नहीं हैं, जिन्होंने इनको “सिस्टम” के नाम पर आदेश दिया हो। उठो भोपाल अब वक्त आ गया है। धोखेबाजों को सबक सिखाने का और अपना हक मांगने का। वरना किसी दिन सिस्टम की आड़ में राहत राशि को भी हजम कर जाएंगे।


उठो भोपाल, दलालों को कुचल दो और अपना हक छीन लो।

आओ भोपालः बदल दें इस घटिया सिस्टम को

जरा अब्राहिम लिंकन साहब के इस कथन पर गौर करिएगा कि "Any people anywhere, being inclined and having the power, have the right to rise up, and shake off the existing government, and form a new one that suits them better. This is a most valuable - a most sacred right - a right, which we hope and believe, is to liberate the world." यह भोपाल मामले और खासकर कि हमारे देश के लिए सटीक बैठता है।


घोर अफसोस और शर्म की बात है कि भोपाल गैस त्रासदी को “सिस्टम” की कारसतानी बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की जा रही है। जी हां दोस्तों, कांग्रेस पार्टी का कहना है कि एंडरसन के बच निकलने में न तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जिम्मेदार थे और ही मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री। जिम्मेदार तो सिस्टम था।

अब जरा इन स्वयंभू समझदार और जनता को मूर्ख समझने वाले नेताओं से यह भी पूछा जाए कि आखिर वो ‘सिस्टम’ का क्या मतलब समझते हैं। जहां तक हमारी गैर राजनीतिक बुद्धि समझ पा रही है, सरकार ही सिस्टम है और उसे चलाती है। तो फिर यह कौन सा सिस्टम था, जिसने एंडरसन को भारत छोड़ने दिया और तो और सिस्टम का ही इसी हिस्सा लोगों को इसकी खबर लगने में 26 साल लग गए।


एक कहावत मैंने सुनी थी कि “12 साल में घूरे के दिन भी फिर जाते हैं।“ लेकिन कमबख्त नेतागिरी ने तो इस कहावत को भी झुठला दिया है। यूनियन कार्बाइड कारखाना भी वहीं का वहीं है और बाकी जिंदा बचे लोग भी। कारखाने में पड़ा जहरीला कचरा भोपाल की फिजा में जहर घोल रहा है। न तो कोई उसे साफ करने वाला है और न ही कोई उस हादसे के जिम्मेदार लोगों को पकड़ने वाला।

क्या कोतवाल और क्या चोर। सबने मिलकर भोपाल के साथ धोखा किया है। आज जब पोल खुल रही है और जनता सवाल पूछ रही है तो उसे सिस्टम का झुनझुना सुनाया जा रहा है। यदि आप उस समय के जिम्मेदार लोगों के बयानात पर गौर करेंगे तो अपनी हंसी और गुस्से दोनों को ही रोक नहीं पाएंगे। लेकिन इससे पहले जरा इस पर गौर करिए और बताइएगा कि क्या ऐसा संभव है।

मान लीजिए, 26/11 को हुए मुंबई हमले एकमात्र जीवित बचा आरोपी अजमल आमिर कसाब यह कहे कि उसे एक बार उसके घर जाने दिया जाए। वो परिजनों से मिलकर जल्द ही वापस आए जाएगा। तो क्या हमारा सिस्टम ऐसा करेगा। शायद नहीं। तो फिर एंडरसन के मामले में ऐसा कैसे होने दिया गया। क्योंकि एंडरसन को इसी मूर्खतापूर्ण वायदे के आधार पर जाने दिया गया था। हालांकि यह बात गले के नीचे उतर नहीं पा रही है।

तत्कालीन पुलिस अधीक्षक और बाद में डीजीपी पद से रिटायर हुए स्वराज पुरी को दी जा रही सभी सुविधाएं इसलिए हटा ली गई हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी सरकारी कार से एंडरसन को स्टेट हैंगर तक पहुंचाया था। अब अगर कार से स्टेट हैंगर तक छोड़ना इतना बड़ा गुनाह है तो फिर राज्य सरकार के शासकीय विमान का पायलट भी दोषी रहा होगा, जिसने एंडरसन को दिल्ली तक पहुंचाया था।

तो क्या वो “लोग” दोषी नहीं हैं, जिन्होंने इनको “सिस्टम” के नाम पर आदेश दिया हो। उठो भोपाल अब वक्त आ गया है। धोखेबाजों को सबक सिखाने का और अपना हक मांगने का। वरना किसी दिन सिस्टम की आड़ में राहत राशि को भी हजम कर जाएंगे।


उठो भोपाल, दलालों को कुचल दो और अपना हक छीन लो।