Monday, February 11, 2013

2014 की राह पर राजनाथ-मोदी



राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी
दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी के बीच रविवार को मुलाकात हुई। कहने के लिए मोदी राजनाथ सिंह को बधाई देने आए थे, लेकिन मुलाकात के बाद दोनों ने साफ कर दिया कि उनके बीच लोकसभा चुनाव को लेकर लंबी चर्चा भी हुई। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी भाजपा को लोकसभा चुनाव जीता पाएगी?

इस सवाल का सटीक जवाब लोकसभा चुनाव के नतीजे के बाद ही पता चलेगा। सूत्रों के मुताबिक भाजपा में अंदरखाने नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार की कमान सौंपने की तैयारी चल रही है। यह सारी कवायदराहुल गांधी को टक्कर देने के लिए की जा रही है। खास बात यह है कि इस जोड़ी की नजर यूपी पर भी है।

दरअसल 80 लोकसभा सीट वाला उत्तरप्रदेश केंद्र में सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फिलहाल वहां पर भाजपा के खाते में केवल 10 सीटे हैं। लिहाजा पार्टी का एक वर्ग चाहता है कि नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी की सीट लखनऊ से चुनाव लड़ें ताकि यूपी में भाजपा का कुम्हलाया कमल फिर से खिल सके। मतलब पहली नजर में राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी के बीच ऑल इज वेल नजर आ रहा है, लेकिन क्या वाकई जिस तरह दोनों गले मिले उसी तरह दोनों के दिल मिल चुके हैं।

इस सवाल की शुरुआत तब हुई जब राजनाथ सिंह पहली बार भाजपा के अध्यक्ष बने थे। तब राजनाथ सिंह ने मोदी को केंद्रीय संसदीय बोर्ड से हटा दिया था। इसके अलावा मोदी के करीबी अरुण जेटली को प्रवक्ता पद से हटा दिया था, जिसके बाद दोनों के रिश्तों में जबरदस्त खटास आ गई थी।

हालांकि, हाल के दिनों में मोदी और राजनाथ सिंह के रिश्तों में सुधार आया है। मोदी ने चुनाव से पहले स्वामी विवेकानंद विकास यात्रा निकाली थी और उसके उद्घाटन में उन्होंने राजनाथ सिंह को ही मुख्य अतिथि बनाया था। बाद में चुनाव प्रचार में भी राजनाथ सिंह ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।

इसके बदले मोदी ने भाजपा अध्यक्ष के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खबर है कि जब गडकरी के नाम पर विवाद हो गया था तब मोदी ने अपनी पहली पसंद राजनाथ सिंह को बताया और उनकी सहमति मिलने के बाद राजनाथ सिंह का अध्यक्ष बनना तय हो गया। इससे यह तो जाहिर है मौजूदा समय में राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी की दूरियां काफी हद तक मिट चुकी हैं।

मोदी के नाम पर विरोध
नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के मुद्दे पर भाजपा के नेता सार्वजनिक तौर पर साफ-साफ कहने से बचते रहे हैं। लेकिन यशवंत सिन्हा उनके समर्थन में पूरी तरह से सामने आ गए हैं। उनका कहना है कि मोदी की प्रधानमंत्री उम्मीदवारी का समर्थन कर वह देश और पार्टी के कार्यकर्ताओं की भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं। सिन्हा ने अपनी राय ऐसे वक्त जाहिर की, जबकि पार्टी के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी इस मुद्दे पर खुल कर बोलने से बचते रहे हैं।

मोदी का मिशन 2014
उधर, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में आने के संकेत दे दिए हैं। भाजपा के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह को बधाई देने के लिए मोदी दिल्ली गए थे। गौरतलब है कि हाल ही में एक सर्वे में इस बात का खुलासा किया गया है कि नरेंद्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में सबसे चहेते राजनेता हैं और उन्हें देश के करीब 57 प्रतिशत लोग प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहते हैं। इस सर्वे के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह है और इसको लेकर पार्टी के आला नेताओं में भी सुगबुगाहट है कि अगर मिशन-2014 को कामयाबी की मंजिल तक पहुंचाना है तो नरेंद्र मोदी को आगे लाना होगा।

लोकसभा चुनावों की तैयारी
घमासान से उबरने की कोशिश कर भाजपा अब अगले लोकसभा चुनाव की रणनीति बनाने में जुट गई है।
वहीं संघ की मंशा है कि राजनाथ-मोदी-गडकरी तीनों ही अहम भूमिका में रहकर पार्टी के अन्य बड़े नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री या उस पद के दावेदारों को भी साथ लेकर चलें।

इनकी बदौलत राज'नाथ
मोहन भागवत : नितिन गडकरी की कंपनी पूर्ति समूह पर दोबारा छापे की कार्रवाई के बाद भाजपा के अंदर ही उनके नाम पर विरोध शुरू हो गया। राजनाथ का नाम आगे किया गया, जिस पर अंतिम समय में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी हामी भर दी।

लालकृष्ण आडवाणी : गडकरी को दूसरा कार्यकाल दिए जाने के पक्ष में नही थे। राजनाथ के नाम पर उनकी सहमति भी भारी साबित हुई।

सुषमा स्वराज : सुषमा को राजनाथ के काफी करीब माना जाता है। इसलिए सिंह के नाम पर उनकी सहमति तो पहले से ही थी। आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर भी वो संगठन की जिम्मेदारी नहीं चाह रही थीं।

अरुण जेटली : राजनाथ और जेटली के बीच संबंधों को इतिहास खटास भरा रहा है। लेकिन मोदी से नजदीकी के चलते जेटली को राजनाथ का समर्थन करना पड़ा।

नितिन गडकरी : भाजपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद गडकरी चाहते थे कि कुर्सी राजनाथ को ही मिले। संघ की वजह से दोनों के बीच समीकच्रण अच्छे रहे हैं।

लव-हेट रिलेशनशिप
जनवरी 2007: तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को पार्टी के संसदीय बोर्ड से हटा दिया था। मोदी समर्थक अरुण जेटली को भी उन्होंने राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से हटा दिया था।

दिसंबर 2007: गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान राजनाथ ने मोदी के पक्ष में कुछ नहीं किया। नतीजतन रिश्तों में खाई बढ़ती चली गई।

2009 लोकसभा चुनाव: इन चुनावों में राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी ने एक साथ चुनाव प्रचार किया था, लेकिन दोनों के बीच लगभग संवादहीनता बनी हुई थी।

दिसंबर 2012 : गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान राजनाथ सिंह ने भी प्रचार में हिस्सा लिया था। यहां उन्होंने मोदी की खूब तारीफ की थी।

23 जनवरी 2013: राजनाथ सिंह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया और मोदी सबसे पहले उन्हें बधाई देने पहुंचे थे।

27 जनवरी : मोदी, राजनाथ से मिलने उनके दिल्ली स्थित निवास पर गए थे। इसके बाद सिंह ने कहा था कि वो मोदी को संगठन में और अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपना चाहते हैं।

पिघलते ग्लेशियर्स : आशंका से अधिक विकराल होंगे महासागर



भविष्य में ग्रीनलैंड और अंटाकर्टिक की बर्फ पिघलने से आईपीसीसी की अनुमानित आशंका से कहीं अधिक विकराल हो जाएंगे महासागर। आने वाले वर्षों में समुद्र का जलस्तर अपेक्षा से कहीं अधिक बढ़ जाएगा। मंगलवार को खबर आई कि आर्कटिक क्षेत्र का मैजेस्टिक ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहा है। वहां गए वैज्ञानिकों ने दल जो तस्वीरें जारी की हैं, उसमें ग्लेशियर्स कम और पानी ज्यादा दिखाई दे रहा है। पर्यावरणविद इसके लिए इंसानों को जिम्मेदार मान रहे हैं। दरअसल ग्लेशियर्स का मामूली रूप से पिघलना और उनका आकार बदलना कुदरती प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन जिस तेजी से पिछले एक दशक में यह पिघल रहे हैं, वो पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी के समान है। साल-दर-साल यह पिघलते जा रहे हैं, लेकिन उनके स्थान पर नए ग्लेशियर्स का निर्माण नहीं हो पा रहा है।

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के अनुसंधानकर्ताओं ने अपने शोध में पाया है कि इंटर-गवर्नमेंट पैनल ऑन क्लाइमेटचेंज (आइपीसीसी) की चौथी मूल्यांकन रिपोर्ट में जो आंकड़े बताए गए हैं। समुद्री जलस्तर उससे कहीं ज्यादा बढऩे की उम्मीद है। यह शोध अपने आप में अनूठा है क्योंकि बर्फ पिघलने पर संगठित विशेषज्ञों के आंकड़ों को एकसाथ लेकर उसका विश्लेषण किया गया है। इसे गणितीय आधार पर बर्फ को पानी में तब्दील होने के फैलाव के आधार पर आंका गया है। अंर्टाकटिक और ग्रीनलैंड पर बिछी बर्फ की चादर पृथ्वी पर मौजूद ग्लेशियरों का 99.5 फीसदी है। इसके पूरा पिघलने से वैश्विक समुद्र का स्तर कमोबेश 63 मीटर तक ऊंचा हो जाएगा। चूंकि बर्फ की यह चादर ही समुद्र के जलस्तर को बढ़ाने में सबसे बड़ा योगदान देती है। इसी कारण भविष्य अनिश्चितता से भरा हुआ माना जा रहा है। ऐसे ही एक शोध में प्रोफेसर जानेथन बामबर और प्रोफेसर विली एस्पिनल ने बताया कि बर्फ पिघलने की स्थिति पर खासी अनिश्चितता है। उन्होंने बताया कि निकाले गए मीडियन के अनुसार वर्ष 2100 तक बर्फ की चादर पिघलकर समुद्र स्तर बढ़ाने में 29 सेंमंी बढ़ाने का काम कर सकती है। इसमें 5 फीसदी की संभावना यह भी है कि समुद्र स्तर अधिकतम 84 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। कुछ अन्य सूत्रों से मिले आकड़ों के अनुसार सन् 2100 तक समुद्रस्तर एक मीटर तक बढऩा संभव है। महासागर का इतना विकराल रूप निश्चित रूप से मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरा साबित हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि आइपीसीसी की रिपोर्ट में समुद्र स्तर में छह संभावित स्थितियों में 18 सेंटीमीटर से 59 सेंटीमीटर तक की ही बढ़ोतरी हो सकती है। शोध में यह बात भी सामने आई है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक समूह इस बात को भी किसी एक कारण से स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं कि हाल के वर्षों में सैटेलाइट से मिले चित्रों और अन्य आंकड़ों के मुताबिक बर्फ की चादर में  कमी क्यों आई है। हालांकि, यह भी स्पष्ट नहीं है कि एक लंबे समय के परिवर्तन का नतीजा है या मौसम प्रणाली में अचानक आए परिवर्तनों का असर है। यह शोध विज्ञान पत्रिका नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित किया गया है।

बर्फ में दबे बदलाव के राज
हमारी धरती का दस फीसदी हिस्सा बर्फ से ढंका हुआ है। लेकिन अब यह बर्फ तेजी से पिघल रही है। फिनलैंड के ग्लेशियर की 2,000 साल पुरानी परतें भी बढ़ते तापमान की गवाही दे रही हैं। हिमालय के ग्लेशियर भी पिछले तीस सालों में काफी प्रभावित हुए हैं। गंगोत्री जैसी जगहों पर हिमनदों का पीछे खिसकना साफ देखा जा रहा है। यूरोप का सबसे बड़ा ग्लेशियर फिनलैंड में है, इसकी बर्फ की कुछ परतें तो दो हजार साल पुरानी है। लेकिन बढ़ता तापमान इस पूरे हिस्से को तहस-नहस कर सकता है। पर्यावरण विज्ञानी इस खतरे को रोकने के लिए ग्लेशियर की गहराई में झांक रहे हैं। बर्फ की परतें बता रही हैं कि बीती दो शताब्दियों में समय के साथ धरती ने तापमान में कैसे उतार चढ़ाव देखे।

बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की वजह से पूरा पर्यावरण चक्र गड़बड़ा रहा है। नदियां लबालब हो रही है, हल्की सी बारिश होने पर भी बाढ़ की नौबत आ रही है। कई इलाके सूखे का सामना कर रहे हैं। समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। इससे बांग्लादेश, मालदीव और पापुआ न्यू गिनी जैसे कई देशों के डूबने का खतरा खड़ा हो रहा है। हालात बड़े खतरे की तरफ इशारा कर रहे हैं।

बीते एक दशक में यह चेतावनी लगातार दी जा रही है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए हो सकता है। भारत में हर व्यक्ति प्रति दिन औसतन 125 लीटर पानी इस्तेमाल करता है। अमेरिका में यह मात्रा करीब 550 लीटर है जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा है। भारत दुनिया का वह देश है जो सबसे ज्यादा पानी जमीन से निकालता है। देश में करीब दो करोड़ कुएं हैं।

तापमान बढऩा है हिमपात की वजह!
इराक के लोगों ने पिछले एक सौ वर्षों में पहली बार बर्फगोलों का खेल खेलकर आनंद लिया है। लेकिन जापान में एक डाकिया बर्फ पर ऐसा फिसला कि उसकी जान ही चली गई। उत्तरी कोरिया में बर्फ इतनी ज्यादा गिरने लगी है कि जलाशयों में जल की सतह पर बर्फ की इतनी मोटी परत जमने लगी है। अब इस देश में बर्फ के नीचे मछली पकडऩे के तरीकों के बारे में सोचा जा रहा है।

सवाल यह है कि इतनी ज्यादा बर्फ का गिरना अच्छे लक्षण हैं या बुरे। यह बड़ी अजीब बात है कि वायुमंडल का तापमान बढऩे की वजह से दुनिया में पहले की तुलना में आजकल अधिक हिमपात हो रहा है। यह बात हाल ही में रूसी शहर नोवोसिबिस्र्क में आयोजित एक सेमिनार में रूस के भूगोल संस्थान के निदेशक व्लादिमीर कॉत्लियकोव ने कही थी। वैज्ञानिक ने समझाया कि आजकल पृथ्वी पर तापमान बढऩे के कारण हवामंडल में नमी की मात्रा भी बढ़ गई है जिसके परिणामस्वरूप दुनिया के ठंडे जलवायु वाले क्षेत्रों में पहले से अधिक बर्फबारी हो रही है।

तापमान का असर
तापमान बढऩे से पृथ्वी के ध्रुवों पर और ऊंचे पर्वतों की चोटियों पर सदियों से जमे हुए ग्लेशियर बड़ी तेजी से पिघलने लगे हैं। लेकिन इसके साथ ही सर्दियों में पहले की तुलना में अधिक मात्रा में बर्फ गिरने लगी है। नए वर्ष, 2013 में यूरेशिया का अधिकांश भाग बर्फ से ढका हुआ था।

हमारी पृथ्वी पर इस 'सफेद चादर' की भूमिका बड़ी अहम है। यदि पृथ्वी पर बर्फ नहीं होती तो यहां अत्यधिक गर्मी पड़ती। दरअसल, यही बर्फ सूर्य की किरणों को परावर्तित करती है। इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि अंटार्कटिका की बर्फ हमारी पृथ्वी तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा का 90 प्रतिशत तक हिस्सा परावर्तित कर देती है।

रंजिश का शिकार तो नहीं हो गई विश्वरूपम



विश्वरूपम के एक दृश्य में कमल हासन
कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम पर लगे प्रतिबंध के कारणों पर पूरे देश में बहस तेज हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे संप्रदाय विशेष के आहत होने से ज्यादा बड़ा कारण व्यावसायिक और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता है। कहा जा रहा है कि विश्वरूपम पर लगा प्रतिबंध तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता, डीएमके अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि और केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिंदंबरम की आपसी राजनीतिक उठापटक का नतीजा है।

तमिल राजनीति के इन तीनों महारथियों के बीच संतुलन न रख पाने का नुकसान कमल हासन को उठाना पड़ रहा है। जिस राजनीतिक खेल की ओर कमल हासन ने इशारा किया था वह यही है। विश्वरूपम पर लगे प्रतिबंधों के पीछे तमिलनाडु की थिएटर लॉबी और फिल्म के सैटेलाइट राइट्स भी एक वजह बताए जा रहे हैं।

'धोती वाला' प्रधानमंत्री बना पहली मुसीबत
कमल ने दरअसल दिसंबर के अंत में एक कार्यक्रम में किसी 'धोती वाले' के प्रधानमंत्री बनने की हिमायत की थी। धोती वाला ये तमिल राजनीतिज्ञ कोई और नहीं बल्कि पी. चिदंबरम हैं। इस कार्यक्रम में उन्होंने करुणानिधि की भी तारीफ की। चिदंबरम और करुणानिधि तमिलनाडु की राजनीति में जयललिता के लिए दु:स्वप्न जैसे हैं। वे न जया के प्रतिद्वंद्वी हैं बल्कि विश्लेषकों के अनुसार वे उनके दुश्मन जैसे हैं।
जाहिर है कि एक साथ दो दुश्मनों की तारीफ कोई भी राजनीतिज्ञ पसंद नहीं करेगा। करुणानिधि और चिदंबरम से कमल हासन की नजदीकी जयललिता को नागवार गुजर रही है और ऐसे में बेबाक बयानी ने रहा-सहा खेल बिगाड़ दिया।

जया टीवी को नहीं मिले सैटेलाइट राइट्स
विश्वरूपम पर लगे प्रतिबंध के पीछे व्यावसयिक वजहें भी बताई जा रही हैं। दरअसल फिल्म की मुसीबतें उसी दिन शुरु हो गई थीं, जिस दिन कमल हासन ने इसे डीटीएच पर रिलीज करने का ऐलान किया था। इस ऐलान से पहले कमल की फिल्म के सैटेलाइट राइट्स का समझौता जया टीवी से कर चुके थे। जया टीवी का संबंध जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके से है। जया टीवी ने फिल्म का ऑडियो भी रिलीज किया था। लेकिन जैसे ही कमल हासन ने फिल्म के डीटीएच पर रिलीज की घोषणा की, जया टीवी ने सैटेलाइट टीवी के अधिकार खरीदने से मना कर दिया। नतीजतन कमल ने सैटेलाइट टीवी के राइट्स स्टार विजय को बेच दिए।
हालांकि डीएमके अध्यक्ष करुणानिधि का कहना है कि जया टीवी, विश्वरूपम के सैटेलाइट अधिकार औने-पौने दामों में खरीदना चाहता था, जो कमल के व्यावसायिक हित में नहीं था।

डीटीएच राइट्स से थिएटर लॉबी खफा
विश्वरूपम के डीटीएच पर रिलीज के मसले पर तमिलनाडु की थिएटर मालिकों की लॉबी भी कमल हासन के खिलाफ हो गई थी। उन्हें डर है कि कमल एक ऐसी परंपरा न शुरू कर दें जिससे भविष्य में उनका धंधा ही चौपट हो जाए। थिएटर लॉबी का दबाव भी इस फिल्म पर प्रतिबंध के पीछे एक वजह बताया जा रहा है।

क्रिएटिव अबॉर्शन
विश्वरूपम को लेकर विवाद और उस पर तमिलनाडु सरकार के बैन से दुखी दक्षिण के सुपर स्टार कमल हासन ने इस पूरे प्रकरण को 'क्रिएटिव अबॉर्शन' करार देते हुए कहा कि 'लग रहा है वे मेरे बच्चे को जन्म लेने से पहले ही मार देना चाहते हैं।' उन्होंने कहा है कि वे (तमिलनाडु सरकार) तब तक आराम से नहीं बैठेंगे जब तक फिल्म को खत्म न कर दें और मुझे वित्तीय रूप से बर्बाद न कर दें। मैं वित्तीय बर्बादी का सामना करने के लिए तैयार हूं, लेकिन दबाव में झुकूंगा नहीं। हासन ने कहा कि वे मुझे आर्थिक रूप से तोड़ सकते हैं लेकिन मेरी आत्मा को नहीं तोड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि वह फिल्म के तमिल वर्जन के प्रिंट को मुख्यमंत्री जयललिता के कार्यालय के सामने जलाएंगे।

इनटोलरेंट इंडिया
कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम पर संकट के बादल छाए हुए हैं। तमिलनाडु सरकार ने फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया है। फिल्म रिलीज कराने के लिए कमल हासन न्यायालय का दरवाजा खटखटा रहे हैं। बॉलीवुड में फिल्मों के साथ विवाद का एक गहरा नाता है। आजकल तो फिल्म हिट कराने में विवाद अहम भूमिका निभा रहे हैं। आपको बॉलीवुड की कुछ ऐसी फिल्मों के बारे में बताते हैं, जिनके साथ विवाद साए की तरह जुड़े हैं:

चक्रव्यूह: नक्सली विषय पर बनी इस फिल्म का एक गाना काफी विवादित रहा। सलीम-सुलेमान ने बताया कि जिस गाने पर विवाद खड़ा हुआ है उसमें समाज की असमानता को गीत के जरिए बताया गया है। यह मामला भी अदालत तक पहुंचा था, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने वैधानिक स्पष्टीकरण के साथ गाना दिखाने की अनुमति दे दी थी।

रॉकस्टार: फिल्म के एक गाने 'साडा हक' के दौरान फ्री तिब्बत लिखे झंडे फहराते हुए दिख रहे थे। सेंसर बोर्ड को इस पर आपत्ति हुई और उसने निर्देशक इम्तियाज अली को वह दृश्य हटाने के लिए कहा। आखिरकार फिल्म के गाने के दौरान उन झंडों को ब्लर करके दिखाया गया।

आरक्षण: साल 2011 में आरक्षण फिल्म को उत्तर प्रदेश और पंजाब में प्रतिबंधित किया गया था। फिल्म के संवाद को लेकर वर्ग विशेष में नाराजगी थी। फिल्म रिलीज होने से पहले तक अधिकतर लोगों को लगता था कि फिल्म आरक्षण में रिजर्वेशन के समर्थन और विरोध की कहानी होगी। फिल्म रिलीज होने के बाद कई लोगों की शंकाएं खत्म हुईं। लेकिन इस फिल्म के कुछ डायलॉग की वजह से यूपी और पंजाब में इस पर बैन लगा दिया गया।

माय नेम इज खान: माय नेम इज खान की रिलीज के दौरान भी ऐसी ही कुछ बातें कही गई थीं कि इस फिल्म में कुछ ऐसे नाम और दृश्य हैं जो एक समुदाय के विरोध में हैं। इतना ही नहीं शिवसेना ने मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में इस फिल्म के विरोध में काफी हंगामा किया। कई सिनेमा घरों में तोडफ़ोड़ की।

बिल्लू: फिल्म बिल्लू पर भी जातिसूचक शब्द का उपयोग करने की वजह से काफी हंगामा हुआ। अंत में सैलून और पार्लर एसोसिएशन के विरोध के बाद फिल्म के नाम से बार्बर शब्द हटाया गया।

वाटर: 2005 में आई फिल्म वाटर, विधवाओं की जिंदगी पर बनी थी। कुछ साल पहले वाराणसी में इसकी शूटिंग की कोशिश की गई थी। लेकिन वहां के पुजारियों ने इसका इतना विरोध किया कि प्रशासन भी यूनिट को सुरक्षा देने में असफल हो गई थी। बाद में इसकी स्टारकास्ट बदलकर श्रीलंका में इसकी शूटिंग की गई थी।

परजानिया: 2007 में राहुल ढोलकिया ने गुजरात दंगों पर परजानिया नाम की फिल्म बनाई थी। कई कट्टर हिंदू संगठनों ने इसका जमकर विरोध किया था। इसके बाद गुजरात में इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगी।

कितना मोटा हाथी


पहले प्रियंका वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा, फिर नितिन गडकरी और अब मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार। इन सभी का संबंध कंपनियों और उनमें किए गए निवेश से जुड़ा हुआ है। इधर मायावती तीसरी बार उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और उधर, उनके छोटे भाई आनंद कुमार का रियल एस्टेट बिजनेस अभूतपूर्व तरक्की करने लगा। 2007 से 2012 तक मायावती राज्य की मुख्यमंत्री रहीं और इसी दौरान आनंद की कंपनी लगातार मुनाफे पर मुनाफ कमाती रही। गुरुवार को एक अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक आनंद कुमार की कंपनी का नोएडा में काम कर रही कई कंपनियों के साथ संबंध है। मायावती के खास सहयोगी और राज्यसभा सदस्य सतीश चंद्र मिश्र के बेटे की कंपनी भी इसमें शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बिजनेस कर रही जेपी, यूनीटेक और डीएलएफ के साथ आनंद की कंपनी के व्यावसायिक हित जुड़े हुए हैं। खास बात यह है उत्तरप्रदेश में चल रहे अधिकांश रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में यह तीनों कंपनियां शामिल हैं।

750 करोड़ की कंपनी
2007 में मायावती के सीएम बनने के बाद आनंद कुमार ने 49 नई कंपनियां बनाईं जिनके कारोबार के बारे में बहुत कम लोगों को ही पता है। लेकिन पांच साल बाद मार्च 2012 में उनके पास 750 करोड़ रुपए थे। अखबार के मुताबिक कारनॉस्टी नाम की कंपनी के जरिए आनंद कुमार की कंपनी और बाकी रियल एस्टेट कंपनियां आपस में जुड़ी हुई हैं। आनंद कुमार के साथ कारोबारी सहयोगी या उनकी कंपनियों के निदेशक 2006 में बनी कारनॉस्टी मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी से जुड़े हुए हैं। कारनॉस्टी कंपनी रियल एस्टेट, स्पोट्र्स मैनेजमेंट, सिक्योरिटी, हॉस्पिटलिटी के कारोबार में हैं और उसकी कुल 14 सब्सिडियरी कंपनियां हैं। मार्च 2012 में कंपनी की वैल्यू 620 करोड़ रुपए की थी।

कारनॉस्टी का किस कंपनी में कितना निवेश?
आनंद के सहयोगियों के जरिए बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने कारनॉस्टी में 376 करोड़ का भारी-भरकम निवेश 2010 से 2012 के बीच किया है। कारनॉस्टी मैनेजमेंट में 2010 से 2012 के बीच डीएलएफ ने 6 करोड़ और यूनिटेक ने 335 करोड़ का निवेश किया था।

लेन-देन पर सवाल!
आनंद कुमार की सात और कंपनियां सवालों के घेरे में आ गई है। अंग्रेजी के ही एक अन्य अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक इन कंपनियों को 757 करोड़ रुपए नकद मिले हैं। इसके बाद ईडी की नजर इस बात पर है कि इन कंपनियों के पास इतना पैसा कहां से आया। आनंद कुमार की सबसे पुरानी 1987 में बनी कंपनी होटल लाइब्रेरी क्लब प्राइवेट लिमिटेड को ही पिछले पांच वर्षों के दौरान 346 करोड़ रुपए मिले हैं। ये पैसा कंपनी को निवेश की बिक्री से मिला है लेकिन न तो ये साफ है कि ये निवेश क्या था और किसे बेचा गया। इन सातों कंपनियों के डायरेक्टर आनंद कुमार हैं।

अखबार के मुताबिक रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास आनंद कुमार की कंपनियों ने जो दस्तावेज दिए हैं उनकी जांच से पता चलता है कि 7 में से 6 कंपनियां 2007 के बाद स्थापित की गई। कंपनियों के दस्तावेज से पता चलता है कि सिर्फ एक कंपनी का कारोबार बड़ा है और बाकी छह कंपनियों का कारोबार बहुत ही कम है। अखबार के मुताबिक मायावती के नजदीकी नेता और राज्यसभा सदस्य सतीश चंद्र मिश्रा के बेटे कपिल मिश्रा भी आनंद कुमार की एक कंपनी के निदेशक हैं।

क्लर्क से कंपनी के मालिक
आनंद कुमार की इन कंपनियों को ज्यादातर पैसा या तो बहुत ज्यादा प्रीमियम पर शेयर बेचने से मिला या इन कंपनियों ने थर्ड पार्टी से मिले एडवांस को जब्त किया या फिर ऐसे निवेश को बेचा जिसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। गौरतलब है कि सात कंपनियों के मालिक आनंद कुमार ने अपना करियर नोएडा अथॉरिटी में बतौर क्लर्क शुरू किया था। मायावती के छोटे भाई 37 साल के आनंद कुमार के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। वो बीएसपी कार्यकर्ताओं से बहुत कम ही मेलजोल रखते हैं। मायावती ने साल 2011 में एक चुनावी रैली में कहा था कि उनके भाई हमेशा उनके साथ खड़े रहे हैं।

ताज कॉरिडोर मामला
मायावती की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उनको बड़ा झटका देते हुए ताज कॉरिडोर मामले में केस चलाने की अनुमति नहीं देने के राज्यपाल के फैसले को चुनौती देने वाली अर्जी पर नोटिस जारी किया है। अदालत ने मायावती के साथ उनकी सरकार में पर्यावरण मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दकी, सीबीआई और केंद्र सरकार को नोटिस दिया है। कोर्ट ने इनसे 4 हफ्ते में जवाब भी मांगा है। इसके ठीक पहले उनके छोटे भाई के नियंत्रण वाली कुछ कंपनियों से हुए अरबों रुपए के लेन-देन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

बे-हिसाब लेनदेन
अंग्रेजी अखबार के मुताबिक आनंद कुमार की कंपनियों में करोड़ों रुपए का लेन-देन हुआ है और कंपनी के पास इसका कोई हिसाब नहीं है। होटल लाइब्रेरी क्लब प्राइवेट लिमिटेड में हुए निवेश के मामले में रियल एस्टेट की अन्य बड़ी कंपनियों जेपी, यूनिटेक और डीएलएफ का नाम भी सामने आ रहा है। हालांकि डीएलएफ ने इसे सामान्य बिजनेस करार दिया है। डीएलएफ ने कहा है यह बिजनेस पूरी तरह से पारदर्शी है और इसके लिए कोई राजनीतिक फायदा नहीं लिया गया। आनंद पर आरोप है कि उन्होंने मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद रसूख का इस्तेमाल किया।

पत्नी के नाम बेनामी कंपनियां
भाजपा नेता किरीट सौमेया ने दावा किया था  कि मायावती के भाई आनंद कुमार और उनकी पत्नी के नाम 26 बेनामी कंपनियां बनाई गई हैं और इसमें हजारों करोड़ रुपए का लेन-देन हुआ है। बकौल किरीट सोमाया उनके पास मायावती की सारी काली कमाई के सबूत मौजूद हैं और आने वाले दिनों में वो इस बारे में और भी बड़े खुलासे करेंगे।

5 साल में 10 हजार करोड़ रुपए किरीट सोमैया ने कहा कि मायावती के भाई ने पांच साल के भीतर 10,000 करोड़ रुपए की संपत्ति कैसे बनाई, इसकी जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मायावती का कार्यकाल शुरू होने से पहले जिस आनंद कुमार के पास एक जनवरी 2007 तक केवल पांच कंपनियां थीं, पांच साल बाद एक जनवरी 2012 को उनके पास 300 से अधिक कंपनियां हो गईं।

Tuesday, January 29, 2013

यादें 2012


नईदुनिया के सभी संस्करणों में 16 पेज की यह मैगजीन बांटी गयी थी। 











Wednesday, January 11, 2012

सरकारी आशियानों पर पत्रकारों का कब्ज़ा

देश के नामी कॉरपोरेट मीडिया घरानों के भोपाल प्रतिनिधियों की हालत का खुलासा देश के ही एक नामी अखबार द हिंदू ने किया है। अखबार ने अपने सूत्रों के हवाले से जो खबर 9 जनवरी 2012 को प्रकाशित की, वह वाकई हिम्मत की बात है। खबर में बताया गया है कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रह रहे 187 वरिष्ठ पत्रकारों ने सरकारी बंगलों पर अवैध रूप से कब्जा जमा रखा है। इनमें से कई पत्रकार तो ऐसे भी हैं, जो वर्षों पहले अपने संस्थान से रिटायर हो चुके हैं पर बंगला मोह अभी तक नहीं त्यागा है।

ऐसे पत्रकारों की वजह से राज्य सरकार को करोड़ों रुपए के किराये का नुकसान हो रहा है। यही बंगले यदि सरकार अपने कर्मचारियों और अधिकारियों को आवंटित करती तो बदले में उनसे मकान का किराया भी लिया जाता, लेकिन पत्रकार बंधु ने तो किराया देते हैं और न ही घर खाली करते हैं। खबर में एक सूत्र के हवाले से बताया गया है कि ऐसे घरों पर लगभग १६ करोड़ रुपए किराया बकाया है।

खास बात यह है कि इन घरों में रहने वाले बड़े पत्रकारों का वेतन और पद दोनों ही बड़ा है। द हिंदू के मुताबिक सरकारी घरों में कब्जा किए हुए पत्रकार लोग पीटीआई, यूएनआई, स्टार न्यूज, जी न्यूज, ईटीवी, इंडियन एक्सप्रेस (पूर्व पत्रकार), हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन, हितवाद, इंडिया टीवी, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता, नईदुनिया, स्वदेश, लोकमत, देशबंधु, नवभारत टाइम्स, इकोनोमिक टाइम्स जैसे शीर्ष संस्थानों में कार्यरत हैं। इनके अलावा छुटभैया किस्म के अखबार, मैगजीन और पोर्टल चलाने वालों ने भी सरकारी घरों पर कब्जा कर रखा है।

मध्यप्रदेश सरकार यह कारनामा आज से नहीं लगभग 20 वर्ष से कर रही है। यह हालात तब हैं, जबकि 2006 में ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी घर पत्रकारों को न आवंटित करने के आदेश दे दिए थे। राज्य सरकार के कर्मचारियों को रहने के लिए घर नहीं मिल रहे हैं। 20-20 साल की वेटिंग चल रही है। कई अधिकारी/कर्मचारी को तो घर की आस लिए हुए ही रिटायर हो गए। कुछ ने हिम्मत करके जैसे-तैसे अपने घर बना लिए या फिर किराये के मकान में ही जिंदगी काट दी। ऐसे हालातों के बीच शहर के पॉश इलाकों अरेरा कॉलोनी, चार इमली, शिवाजी नगर, 45 बंगले और 74 बंगले के घरों पर पत्रकार भाईयों का कब्जा है।

सभी जानते हैं कि राज्य सरकारें पत्रकारों और मीडिया हाउसेस को मैनेज करने के लिए घर, जमीन आवंटित करने जैसे कृत्य करती रहती हैं। एक सच यह भी है कि सरकारी घर का मजा उन्हीं पत्रकारों को मिलता है, जो प्रभावशाली होते हैं और सत्ता के गलियारों में जिनकी पूछ होती है या फिर वो देश के बड़े मीडिया संस्थान के राज्य प्रतिनिधि हों।

इसी तरह से जमीनों के बंदरबाट की एक खबर हिंदू अखबार ने अक्टूबर 2009 में भी प्रकाशित की थी। अगर आपको ऐसे पत्रकारों के नामों की फेहरिस्त देखना हो तो मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्कविभाग की वेबसाइट एमपीइंफो डॉट ओआरजी पर उपलब्ध है।

Saturday, January 7, 2012

ये हैं अपने देश के हालात

भई 2011 तो गया। लेकिन जाते-जाते कुछ ऐसे कारनामे कर गया है, जिनका असर 2012 पर तो रहेगा। मसलन अण्णा ने सरकार को नाको ऐसे चने चबवाए जिससे उसे जनता की ताकत का अंदाजा तो हो ही गया है। यह अलग बात है कि नेता अपनी हरकतों से कभी बाज नहीं आते हैं। क्या करें, जात ही ऐसी है। खैर, अण्णा फैक्टर के अलावा भ्रस्टाचार और घोटालों के खुलासे का अजगर भी पूरे साल सरकार से लिपटा रहा। महंगाई भी आए-दिन डंक मारती रही। हालांकि इस डंक के दंश को केवल जनता ने ही झेला और उसकी कराह सुनने वाला भी कोई नहीं है।

देश में नए-नए चोर किस्म के धन-कुबेरों का खुलासा भी होता रहा। राजनीतिक उथल-पुथल पूरे देश में दिखी। कर्नाटक में येदियुरप्पा ने खुद को कुर्सी से ऐसा चिपकाया कि उन्हें घसीट कर उतारना पड़ा। देश का प्रमुख विपक्षी दल यानी भारतीय जनता पार्टी, जिसमें कार्यकर्ता के अलावा सभी पाए जाते हैं। मेरा कहने का मतलब है, जो भी नेतागण वहां हैं, वो सभी खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार ही मानते हैं। कोई उपवास रखने लगता है तो कोई डुगडुगी बजाता हुआ अपने रथ से देश की यात्रा पर निकल पड़ता है। एयरकंडीशन और सभी सुविधायुक्त रथ में बैठकर गरीबों के हित की बात करते हैं।

देश में एक प्रदेश है, मध्यप्रदेश। जहां के मुख्यमंत्री खुद को प्रदेश की महिलाओं का भाई कहते नहीं थकते हैं। यह अलग बात है कि सीएम भाई के होते हुए भी 2011 में कई बहनों को जला दिया गया, बलात्कार किया गया और तो और देश में सबसे ज्यादा बाल अपराध भी यहीं होते हैं। दूसरी तरफ हैं अपनी बहन जी। जी हां, सही समझे आप। देश के सबसे बड़े प्रदेश की मुखिया, जो अगले महीने जनता के दर से यूपी विधानसभा के दरवाजे तक पहुंचने के लिए रास्ता तलाशने की तैयारी कर रही हैं। पूर्ण बहुमत वाली बहिन जी की सरकार ने पांच साल ऐश ही किया। प्रदेश के हालात तो आपको टीवी चैनलों और अखबारों से मिल ही जाते हैं। ऐसा कोई अपराध नहीं है, जो यहां न होता हो। लूट, हत्या, अपहरण, बलात्कार, भ्रष्टाचार....सब यहां आराम से हो जाता है। पुलिस तो कहिए कि एक विभाग है, जिसका काम वर्दी पहनकर लूट करना है।

एक आंखो देखा किस्सा सुनाता हूं आपको। वैसे यूपी के एनसीआर में रहने वाले इससे वाकिफ होंगे। मैंने हॉट सिटी कहे जाने वाले गाजियाबाद में एक खास स्थान पर जबरदस्त जाम देखा। जाम एक पुलिया पर लगा हुआ था, और दोनों ओर पुलिस की जीपें भी खड़ी थीं। मजेदार बात यह कि वहां खड़े खाकीदारी पूरी गंभीरता के साथ अपनी हथेलियों के बीच तंबाकू घिस रहे थे, लगा कि बस इसे मुंह में दबाते ही जाम हटाने के लिए तत्पर हो जाएंगे। हुआ भी ऐसा ही। तंबाकू दबाकर दरोगा जी एक छोटा हाथी (टाटा ऐस को यहां इसी नाम से पुकारते हैं) के ड्रायवर के पास पहुंचे और पूछा कि सब्जी भरकर कहां जा रहे हो। निकालो 100 रुपये वरना जब्त कर लूंगा तुम्हारा हाथी। फिर उनकी नजर लोडिंग ऑटो पर पड़ी। वहां भी यही बात दोहराई गई। इसके बाद दरोगा जी वापस जाकर अपनी जीप में लेट गए। रही बात जाम की तो उसे छंटने में 45 मिनट लग गए। ऐसी मुस्तैदी आपने शायद ही देखी होगी कहीं।

खैर छोडि़ए, यह तो पूरे देश का ही हाल है। शायद बदलेगा नहीं।

हम महंगाई की बात कर रहे थे। तो इस साल हमारी केंद्र सरकार ने कई चुटकुले भी छोड़े। जैसे 32 रुपये रोजाना आमदनी वाले को गरीब न मानना। महंगाई को 100 दिन में काबू कर लेना। वैसे यह डायलॉग 2009 में यूपीए की दूसरी पारी के तुरंत बाद पहली बार सुनने को मिला था, तब से अब तक लगातार इसे रिवाइंड करके सुनाया जाता रहा है। पता नहीं 100 दिन का सरकारी पैमाना क्या है। कहीं वो भी 32 रुपये जैसा कुछ होगा, जो नामसझ आम आदमी होने की वजह से हम समझ नहीं पा रहे हैं।

चापलूसी के नए कीर्तिमान भी 2011 में बनाए गए। कोई मैडम को खुश करने के लिए बयान जारी करता रहा तो कोई बाबा को खुश करने के लिए। आम आदमी से तो किसी को कोई वास्ता ही नहीं है। किसी ने कहा कि आरटीआई सिरदर्द बन रहा है, इसे हटाओ। तो किसी को सोशल नेटवर्किंग साइट्‌स से ही परेशानी होने लगी।

2011 ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया को कई सबक सिखाए हैं। पहला सबक यह कि जनता ही जनार्दन है। जो शायद चार तानाशाह भी भूल चुके थे, जिनकी अक्ल ठिकाने लगा दी गई। अमेरिका जैसे सुपर पावर ही हालत जगजाहिर है। वहां आर्थिक तंगी है तो भारतवर्ष में सरकारी खजाने से ज्यादा पैसा स्विट्‌जरलैंड के बैंक खातों में जमा है।

नेता और अफसर करोड़ो-अरबों के नीचे का घोटाला नहीं करते हैं, मानो उनकी साख का सवाल है। उज्जैन और इंदौर में करोड़पति चपरासी और बाबू मिलते हैं तो भोपाल में अरबपति आईएएस पति-पत्नी। अंबानी साहब ने दुनिया का सबसे महंगा बंगला बना लिया फिर पता चला कि साहब उसमें तो वास्तुदोष है। अब उसमें रहे कौन। तो ये हैं अपने देश के हालात।