Friday, January 28, 2011

वृक्ष

जीवन का आधार दिया है
सुयोग्य तुम्हे विकास दिया है
हरियाली ही जीवन है यह मंत्रोच्चार दिया है

कांटों का दुख सहकर
फूल तुमपर बरसाए हैं
समान दृष्टि डाली सबपर
और समानता का नया आयाम दिया है

पर तुमने हमसे सब छीना है
चोट पर चोट करते रहे सदियों से तुम
क्रूरता की सीमा भी लांघी तुमने
दर्द की विभीषिका को मौन रहकर
स्वीकार हमनें किया है

अब वक्त हमारा आया है
जीवन का अधिकार हम भी छीनेंगे
हद की सीमाएं लांघी तुमने
तो हम भी हर सीमाएं तोड़ेंगे।

नीहारिका जी की रचना

वृक्ष

जीवन का आधार दिया है
सुयोग्य तुम्हे विकास दिया है
हरियाली ही जीवन है यह मंत्रोच्चार दिया है

कांटों का दुख सहकर
फूल तुमपर बरसाए हैं
समान दृष्टि डाली सबपर
और समानता का नया आयाम दिया है

पर तुमने हमसे सब छीना है
चोट पर चोट करते रहे सदियों से तुम
क्रूरता की सीमा भी लांघी तुमने
दर्द की विभीषिका को मौन रहकर
स्वीकार हमनें किया है

अब वक्त हमारा आया है
जीवन का अधिकार हम भी छीनेंगे
हद की सीमाएं लांघी तुमने
तो हम भी हर सीमाएं तोड़ेंगे।

नीहारिका जी की रचना

Saturday, January 15, 2011

नहीं शुरू होगा फाइनेंशियल वर्ल्ड

तहलका की प्रकाशक कंपनी अनंत मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ने अपना बहुप्रतीक्षित बिजनेस अखबार शुरू करने से पहले ही बंद करने का ऐलान कर दिया है। कंपनी सूत्रों की मानें तो, आर्थिक कारणों के चलते कंपनी को यह फैसला लेना पड़ा।

तहलका के प्रमुख संपादक तथा अनंत मीडिया के प्रवर्तक तरुण जे. तेजपाल ने शुक्रवार (14 जनवरी 2011) को बुलाई एक बैठक में कर्मचारियों को इसकी सूचना दी। बैठक में सभी को सूचित किया गया कि फाइनेंशियल वर्ल्ड नाम से आने वाला यह अखबार अब नहीं निकाला जाएगा।

अनंत मीडिया कंपनी के प्रमुख स्टेकहोल्डर एवं फाइनेंशियल वर्ल्ड शीर्षक के मालिक केडी सिंह भी इस प्रोजेक्ट से अलग हो चुके हैं। सिंह चंडीगढ़ स्थित अलकेमिस्ट ग्रुप के अध्यक्ष भी हैं।

अखबार के साथ जुड़े वरिष्ट पत्रकारों ने पहले ही संस्थान से इस्तीफा दे दिया था।

वहीं टिकरप्लांट लिमिटेड ने भी अपने ऑपरेशंस बंद करने का ऐलान कर दिया है। बिजनेस समाचार देने वाली यह सेवा फाइनेशिंयल टेक्नोलॉजीस समूह द्वारा संचालित की जा रही थी।

नहीं शुरू होगा फाइनेंशियल वर्ल्ड

तहलका की प्रकाशक कंपनी अनंत मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ने अपना बहुप्रतीक्षित बिजनेस अखबार शुरू करने से पहले ही बंद करने का ऐलान कर दिया है। कंपनी सूत्रों की मानें तो, आर्थिक कारणों के चलते कंपनी को यह फैसला लेना पड़ा।

तहलका के प्रमुख संपादक तथा अनंत मीडिया के प्रवर्तक तरुण जे. तेजपाल ने शुक्रवार (14 जनवरी 2011) को बुलाई एक बैठक में कर्मचारियों को इसकी सूचना दी। बैठक में सभी को सूचित किया गया कि फाइनेंशियल वर्ल्ड नाम से आने वाला यह अखबार अब नहीं निकाला जाएगा।

अनंत मीडिया कंपनी के प्रमुख स्टेकहोल्डर एवं फाइनेंशियल वर्ल्ड शीर्षक के मालिक केडी सिंह भी इस प्रोजेक्ट से अलग हो चुके हैं। सिंह चंडीगढ़ स्थित अलकेमिस्ट ग्रुप के अध्यक्ष भी हैं।

अखबार के साथ जुड़े वरिष्ट पत्रकारों ने पहले ही संस्थान से इस्तीफा दे दिया था।

वहीं टिकरप्लांट लिमिटेड ने भी अपने ऑपरेशंस बंद करने का ऐलान कर दिया है। बिजनेस समाचार देने वाली यह सेवा फाइनेशिंयल टेक्नोलॉजीस समूह द्वारा संचालित की जा रही थी।

भ्रष्टाचार का नया मीटर

2010 के भ्रष्टाचार इंडेक्स के मुताबिक भारत आज भी वहीं है, जहां वह 15 वर्ष पहले था। तो क्या इसका यह मतलब निकलता है कि वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार ही हमारी पहचान है?

यह दुनियाभर में फैले भ्रष्टाचार का नक्शा है।

ऐसे देश जहां, भ्रष्टाचार नहीं है, उन्हें सुर्ख लाल रंग से दर्शाया गया है, जबकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए देशों को पीले रंग से दिखाया गया है। डेनमार्क को दुनिया के सबसे ज्यादा स्वच्छ छवि वाला या फिर यूं कहें कि भद्र राष्ट्र कहा गया है। सोमालिया को दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश कहा गया है। इस अफ्रीकी देश को भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में 178वां स्थान दिया गया है।

इस नक्शे को वर्ष 2010 के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक के आधार पर बनाया गया है, इसका मूल आधार ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट है। भ्रष्टाचारी देशों की सूची को दर्जनों सर्वेक्षण के बाद बनाया गया है। इसमें कई बड़े व्यापारियों की मदद ली गई है, जिन्हें इन देशों के साथ काम करने के दौरान वहां के भ्रष्टाचार के बारे में पता चला।

चीन को भी अत्यधिक भ्रष्ट देशों की फेहरिस्त में 78वां स्थान मिला है। हमारे देश यानी भारत का हाल चीन से भी ज्यादा खराब है। भारत को 87वां स्थान मिला है। हालांकि हम यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि हमारे पड़ोसी मुल्कों जैसेः श्रीलंका (91), बांग्लादेश (134), पाकिस्तान (143) एवं नेपाल (146) से हमारी स्थिति कुछ हद तक बेहतर दिखाई देती है। हमारे देश के लिए एक और खुशी की बात यह भी हो सकती है कि भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में हमारे पड़ोसी मुल्कों का स्थान शुरू से वही है, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पहली प्रकाशित रिपोर्ट में था। हालांकि ऐसा क्यों है इस बारे में आपको बाद में बताएंगे। फिलहाल नक्शे पर ही बात करते हैं।

यूरोप जैस धनी देशों को पीले रंग से दिखाया गया है, जबकि गरीब देशों को लाल रंग में। अफ्रीका तथा एशियाई देश भी इसी रंग से दिखाई गए हैं। क्या इससे मन में सवाल नहीं उठते हैं। इस नक्शे में प्रोटेस्टेंट एवं कैथोलिक देशों तथा अन्य देशों के बीच की रेखा साफ दिखाई देती है।

सारे प्रोटेस्टेंट देश इस सूची में शीर्ष पर हैं। डेनमार्क एवं न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से नंबर एक पर हैं। फिनलैंड तथा स्वीडन भी क्रमशः चार एवं पांच नंबर पर हैं। कनाडा नंबर छह पर है, जहां की आबादी का 40% हिस्सा कैथोलिक है। नीदरलैंड्स (7), ऑस्ट्रेलिया (8), स्विट्ज़रलैंड 9वें स्थान पर है और यहां की आबादी में 40% हिस्सा कैथोलिक्स का है तथा नॉर्वे 10वें स्थान पर है।

निचले पायदान पर मौजूद प्रोटेस्टेंट देशों का क्रम भी 22 पर आकर रुक जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका इस क्रम की शोभा बढ़ा रहा है। वहीं ब्रिटेन 20वें स्थान पर तथा जर्मन 15वें स्थान पर है। गैर प्रोटेस्टेंट देशों में से केवल सिंगापुर ही है जो शीर्षक्रम यानी 10वें स्थान पर है। 11वें नंबर पर लक्ज़मबर्ग है, जो कैथोलिक देश है।
दुनियाभर के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि कैथोलिक देश, प्रोटेस्टेंट देशों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट हैं। लातिन अमेरिका का चिली अपवाद स्वरूप दिखाई दे रहा है, जिसको सूची में 21वां स्थान दिया गया है। हालांकि इसके चारों तरफ लाल रंग वाले देशों की संख्या ज्यादा दिखाई दे रही है। ब्राज़ील (69), पनामा (73), कोलंबिया (78), मेक्सिको (98), अर्जेंटीना (105), बोलिविया (110), एक्वाडोर (127) एवं वेनेज़ुएला (164) नए प्रकार के कैथोलिक देशों का ज्यादा प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

लंबे चले संघर्ष एवं तीन हजार लोगों के बलिदान के बाद तानाशाही से आज़ाद होकर चिली ने संपन्नता हासिल की है। वर्तमान में यह दक्षिणी अमेरिका का सबसे कम भ्रष्ट तथा संपन्न देश है।

आज इस अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र तथा पूर्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं यानी जापान (17), दक्षिण कोरिया (39) तथा सिंगापुर के साथ गिना जाता है।

साभारः लेख वरिष्ठ स्तंभकार एवं पत्रकार श्री आकार पटेल जी के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है। उनका यह लेख अंग्रेजी बिजनेस अखबार मिंट के साप्ताहिक परिशिष्ठ लाउंज में छपा है।

भ्रष्टाचार का नया मीटर

2010 के भ्रष्टाचार इंडेक्स के मुताबिक भारत आज भी वहीं है, जहां वह 15 वर्ष पहले था। तो क्या इसका यह मतलब निकलता है कि वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार ही हमारी पहचान है?

यह दुनियाभर में फैले भ्रष्टाचार का नक्शा है।

ऐसे देश जहां, भ्रष्टाचार नहीं है, उन्हें सुर्ख लाल रंग से दर्शाया गया है, जबकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए देशों को पीले रंग से दिखाया गया है। डेनमार्क को दुनिया के सबसे ज्यादा स्वच्छ छवि वाला या फिर यूं कहें कि भद्र राष्ट्र कहा गया है। सोमालिया को दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश कहा गया है। इस अफ्रीकी देश को भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में 178वां स्थान दिया गया है।

इस नक्शे को वर्ष 2010 के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक के आधार पर बनाया गया है, इसका मूल आधार ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट है। भ्रष्टाचारी देशों की सूची को दर्जनों सर्वेक्षण के बाद बनाया गया है। इसमें कई बड़े व्यापारियों की मदद ली गई है, जिन्हें इन देशों के साथ काम करने के दौरान वहां के भ्रष्टाचार के बारे में पता चला।

चीन को भी अत्यधिक भ्रष्ट देशों की फेहरिस्त में 78वां स्थान मिला है। हमारे देश यानी भारत का हाल चीन से भी ज्यादा खराब है। भारत को 87वां स्थान मिला है। हालांकि हम यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि हमारे पड़ोसी मुल्कों जैसेः श्रीलंका (91), बांग्लादेश (134), पाकिस्तान (143) एवं नेपाल (146) से हमारी स्थिति कुछ हद तक बेहतर दिखाई देती है। हमारे देश के लिए एक और खुशी की बात यह भी हो सकती है कि भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में हमारे पड़ोसी मुल्कों का स्थान शुरू से वही है, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पहली प्रकाशित रिपोर्ट में था। हालांकि ऐसा क्यों है इस बारे में आपको बाद में बताएंगे। फिलहाल नक्शे पर ही बात करते हैं।

यूरोप जैस धनी देशों को पीले रंग से दिखाया गया है, जबकि गरीब देशों को लाल रंग में। अफ्रीका तथा एशियाई देश भी इसी रंग से दिखाई गए हैं। क्या इससे मन में सवाल नहीं उठते हैं। इस नक्शे में प्रोटेस्टेंट एवं कैथोलिक देशों तथा अन्य देशों के बीच की रेखा साफ दिखाई देती है।

सारे प्रोटेस्टेंट देश इस सूची में शीर्ष पर हैं। डेनमार्क एवं न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से नंबर एक पर हैं। फिनलैंड तथा स्वीडन भी क्रमशः चार एवं पांच नंबर पर हैं। कनाडा नंबर छह पर है, जहां की आबादी का 40% हिस्सा कैथोलिक है। नीदरलैंड्स (7), ऑस्ट्रेलिया (8), स्विट्ज़रलैंड 9वें स्थान पर है और यहां की आबादी में 40% हिस्सा कैथोलिक्स का है तथा नॉर्वे 10वें स्थान पर है।

निचले पायदान पर मौजूद प्रोटेस्टेंट देशों का क्रम भी 22 पर आकर रुक जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका इस क्रम की शोभा बढ़ा रहा है। वहीं ब्रिटेन 20वें स्थान पर तथा जर्मन 15वें स्थान पर है। गैर प्रोटेस्टेंट देशों में से केवल सिंगापुर ही है जो शीर्षक्रम यानी 10वें स्थान पर है। 11वें नंबर पर लक्ज़मबर्ग है, जो कैथोलिक देश है।
दुनियाभर के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि कैथोलिक देश, प्रोटेस्टेंट देशों के मुकाबले ज्यादा भ्रष्ट हैं। लातिन अमेरिका का चिली अपवाद स्वरूप दिखाई दे रहा है, जिसको सूची में 21वां स्थान दिया गया है। हालांकि इसके चारों तरफ लाल रंग वाले देशों की संख्या ज्यादा दिखाई दे रही है। ब्राज़ील (69), पनामा (73), कोलंबिया (78), मेक्सिको (98), अर्जेंटीना (105), बोलिविया (110), एक्वाडोर (127) एवं वेनेज़ुएला (164) नए प्रकार के कैथोलिक देशों का ज्यादा प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

लंबे चले संघर्ष एवं तीन हजार लोगों के बलिदान के बाद तानाशाही से आज़ाद होकर चिली ने संपन्नता हासिल की है। वर्तमान में यह दक्षिणी अमेरिका का सबसे कम भ्रष्ट तथा संपन्न देश है।

आज इस अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र तथा पूर्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं यानी जापान (17), दक्षिण कोरिया (39) तथा सिंगापुर के साथ गिना जाता है।

साभारः लेख वरिष्ठ स्तंभकार एवं पत्रकार श्री आकार पटेल जी के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है। उनका यह लेख अंग्रेजी बिजनेस अखबार मिंट के साप्ताहिक परिशिष्ठ लाउंज में छपा है।

Wednesday, December 22, 2010

BHARAsTachar

BHARAsTachar

मंदी और महंगाई से जूझते हुए यह वर्ष 2010 भी नए साल के स्वागत के लिए तैयार हो चुका है। बीते वर्ष यानी 2008, 2009 और यह 2010 भी इतिहास में कई कारणों में याद रखे जाएंगे। विश्व खाद्यान्न संकट और तेल के बढ़ते दामों के बाद आई मंदी ने अच्छे से अच्छे देश और लोगों की कमर में लचक ला दी थी।

भारत के परिपेक्ष्य में तो यह वर्ष काफी महत्वपूर्ण भी रहे। दो वर्ष पहले हमारे देश के एक माननीय केंद्रीय मंत्री ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि भारत में लोग ज्यादा खाना खाने लगे हैं, इसलिए खाद्यान्न संकट पैदा हो गया है। हकीकत यह है कि आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी भुखमरी का शिकार है। उनके लिए आवंटित अनाज को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।

भ्रष्टाचार से याद आया कि इस वर्ष यानी 2010 को भ्रष्टाचार वर्ष के रूप में याद रखा जाएगा। वजह से तो आप सभी वाकिफ हैं। इस वर्ष हमारे देश में भ्रष्टाचार में कई नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला, अनाज घोटाला, कर्नाटक भूमि घोटाला, आईपीएल मैच में घोटाला, सेना में अनाज से लेकर कंबल आपूर्ति तक में घोटाला।

अब तो सुप्रीम कोर्ट भी मान चुकी है कि हमारे देश में बिना “खर्चा” किए कोई काम नहीं करवाया जा सकता है। वैसे भी घोटले और हमारे देश के बीच लंगोटिया याराना है। ऐसा कोई साल नहीं होता है जब यहां घोटाला न हुआ हो। आजादी के तुरंत बाद ही शुरु हुआ घोटालों का दौर आज तक बदस्तूर जारी है। नेताओं और सरकारी प्रणाली में घोटाला प्राणवायु यानी ऑक्सीजन की तरह है।

हर वर्ष आने वाली ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में बड़े शान के साथ भारत का नाम भी सबसे भ्रष्ट देशों की फेहरिस्त में जगमगाता है।

कार्टन साभार: हरिओम तिवारी जी के ब्लॉग कार्टून कमंडल से