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Saturday, February 5, 2011

माँ-बाप होते हैं सच्चे दोस्त

लेखकः  नीहारिका झा पांडेय
नन्हे पैर लड़खड़ाते हुए कब खुद सँभलना सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता। माँ-बाप के लिए यह एक सुखद अहसास होता है। अपने बच्चों को यूँ ‍आत्मनिर्भर होते देखना, लेकिन समय के साथ-साथ उनकी मानसिक जरूरतें भी तेजी से बढ़ने लगती हैं। उनके मन में कई तरह के सवाल पैदा होते, जिनको जानना उनके लिए जरूरी होता है। ऐसे में माँ-बाप ही अपने बच्चों के सच्चे दोस्त और मार्गदर्शक बनकर उन्हें अच्छे-बुरे की पहचान करा सकते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि बेटा माँ का लाडला होता है और बेटियाँ पिता की लाडली। लेकिन सच तो ये है कि बढ़ती बेटियाँ अपने माँ की सबसे अच्छी सहेली होती है और एक पिता अपने बेटे के बेस्ट फ्रेंड। बेटियाँ जब बड़ी होने लगती हैं तो अपने पिता से उनकी झिझक बढ़ने लगती है और वहाँ एक लिहाज और दूरी का भाव आने लगता है। वहीं बेटा बड़ा होने लगे तो अपनी माँ से कटने लगता है और ज्यादातर वक्त अपने दोस्तों के साथ बिताना पसंद करता है। कभी-कभी यह लड़कों में भटकाव और तनाव की स्थिति पैदा कर देती है। ऐसे में एक समझदार पिता एक दोस्त की तरह उसकी सारी जिज्ञासाओं को जानने की कोशिश करता है, जिसे उसे अपनी माँ से बताने में झिझक महसूस होती है। बेटियाँ अपने मन में उठते अजीबोगरीब सवालों को सुलझाने के लिए सीधे अपनी माँ के पास ही जाती हैं। ये सवाल उनके लिए अजीबोगरीब होते हैं, लेकिन एक माँ अपनी बेटी के उन सवालों को उतनी ही गंभीरता और प्यार से हल करती है, क्योंकि वो भी कभी उस दौर गुजरी होती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये विचार, ये सवाल हमेशा उठते रहे हैं, लेकिन उनका हल हर पीढ़ी ने उतनी आसानी से नहीं निकाला है, लेकिन हर दौर के साथ माँ-बाप का रवैया अपने बच्चों के प्रति बदलता रहा है। अब वैसे माँ-बाप कम ही मिलते हैं, जो दिन भर अनुशासन का हंटर लिए उनके सिर पर सवार रहते हों। वो अब एक दोस्त और सच्चे हमराज की तरह उनका सुख-दु:ख और उनकी समस्याएँ बाँटने लगे हैं।

जब किसी घर में एक वयस्क होती बेटी और माँ को हँसी-ठिठोली करते हुए देखते हैं तो ऐसा महसूस होता है कि जब ऐसा दोस्त घर पर आपके साथ है, तो फिर बाहर दोस्तों की तलाश करने की क्या आवश्यकता है? बेटी जिस जागरूकता के साथ अपने सौंदर्य की देखभाल करती है, उसी प्यार और दुलार से अपनी माँ पर भी कोई-न-कोई नुस्खा आजमाती रहती है। नए-नए व्यंजन बनाकर उन्हें खुश करने की कोशिश या फिर पर्व-त्योहार के मौके पर दौड़-दौड़कर उनके काम को आसान करने का प्रयास करना, ऐसी भावना और ऐसा दोस्ताना रिश्ता माँ-बेटी से इतर और कहाँ देखने को मिल सकता है। माँ भी अपने दिल के सारे दर्द खुलकर अपनी बेटी के साथ बाँटती है। इससे न केवल उनका मन हल्का होता, बल्कि उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनके इतने करीब है, जिससे वो अपने मन की सारी बातें खुलकर बता सकती हैं।

बेटा जब कॉलेज जाने की उम्र में पहुँचता है तो पिता उसकी भावनाएँ बेहतर समझ पाते हैं। बहुत से पिता अपने बेटे को बतौर सरप्राइज गाड़ी गिफ्ट करते हैं। कॉलेज का पहला दिन और अपना मनचाहा गिफ्ट पाकर अपने पिता के प्रति उसका प्यार और विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है। वह जब चहकते हूए घर लौटता है तो सबसे पहले अपने पिता को ही कॉलेज के पहले दिन के अनुभव के बारे में बताता है, क्योंकि उसे आभास हो जाता है कि उसके पिता से बेहतर उसे कोई और नहीं समझ सकता।

पिता का बेटे के साथ और माँ का अपनी बेटी के साथ यह दोस्ताना रवैया जहाँ एक ओर सुखद अहसास का अनुभव कराता है, वहीं यह परिवार का दृढ़ आधार-स्तंभ भी है।

**वेबदुनिया पोर्टल में प्रकाशित नीहारिका झा पांडेय का लेख, वहीं से साभार

माँ-बाप होते हैं सच्चे दोस्त

लेखकः  नीहारिका झा पांडेय
नन्हे पैर लड़खड़ाते हुए कब खुद सँभलना सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता। माँ-बाप के लिए यह एक सुखद अहसास होता है। अपने बच्चों को यूँ ‍आत्मनिर्भर होते देखना, लेकिन समय के साथ-साथ उनकी मानसिक जरूरतें भी तेजी से बढ़ने लगती हैं। उनके मन में कई तरह के सवाल पैदा होते, जिनको जानना उनके लिए जरूरी होता है। ऐसे में माँ-बाप ही अपने बच्चों के सच्चे दोस्त और मार्गदर्शक बनकर उन्हें अच्छे-बुरे की पहचान करा सकते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि बेटा माँ का लाडला होता है और बेटियाँ पिता की लाडली। लेकिन सच तो ये है कि बढ़ती बेटियाँ अपने माँ की सबसे अच्छी सहेली होती है और एक पिता अपने बेटे के बेस्ट फ्रेंड। बेटियाँ जब बड़ी होने लगती हैं तो अपने पिता से उनकी झिझक बढ़ने लगती है और वहाँ एक लिहाज और दूरी का भाव आने लगता है। वहीं बेटा बड़ा होने लगे तो अपनी माँ से कटने लगता है और ज्यादातर वक्त अपने दोस्तों के साथ बिताना पसंद करता है। कभी-कभी यह लड़कों में भटकाव और तनाव की स्थिति पैदा कर देती है। ऐसे में एक समझदार पिता एक दोस्त की तरह उसकी सारी जिज्ञासाओं को जानने की कोशिश करता है, जिसे उसे अपनी माँ से बताने में झिझक महसूस होती है। बेटियाँ अपने मन में उठते अजीबोगरीब सवालों को सुलझाने के लिए सीधे अपनी माँ के पास ही जाती हैं। ये सवाल उनके लिए अजीबोगरीब होते हैं, लेकिन एक माँ अपनी बेटी के उन सवालों को उतनी ही गंभीरता और प्यार से हल करती है, क्योंकि वो भी कभी उस दौर गुजरी होती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये विचार, ये सवाल हमेशा उठते रहे हैं, लेकिन उनका हल हर पीढ़ी ने उतनी आसानी से नहीं निकाला है, लेकिन हर दौर के साथ माँ-बाप का रवैया अपने बच्चों के प्रति बदलता रहा है। अब वैसे माँ-बाप कम ही मिलते हैं, जो दिन भर अनुशासन का हंटर लिए उनके सिर पर सवार रहते हों। वो अब एक दोस्त और सच्चे हमराज की तरह उनका सुख-दु:ख और उनकी समस्याएँ बाँटने लगे हैं।

जब किसी घर में एक वयस्क होती बेटी और माँ को हँसी-ठिठोली करते हुए देखते हैं तो ऐसा महसूस होता है कि जब ऐसा दोस्त घर पर आपके साथ है, तो फिर बाहर दोस्तों की तलाश करने की क्या आवश्यकता है? बेटी जिस जागरूकता के साथ अपने सौंदर्य की देखभाल करती है, उसी प्यार और दुलार से अपनी माँ पर भी कोई-न-कोई नुस्खा आजमाती रहती है। नए-नए व्यंजन बनाकर उन्हें खुश करने की कोशिश या फिर पर्व-त्योहार के मौके पर दौड़-दौड़कर उनके काम को आसान करने का प्रयास करना, ऐसी भावना और ऐसा दोस्ताना रिश्ता माँ-बेटी से इतर और कहाँ देखने को मिल सकता है। माँ भी अपने दिल के सारे दर्द खुलकर अपनी बेटी के साथ बाँटती है। इससे न केवल उनका मन हल्का होता, बल्कि उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनके इतने करीब है, जिससे वो अपने मन की सारी बातें खुलकर बता सकती हैं।

बेटा जब कॉलेज जाने की उम्र में पहुँचता है तो पिता उसकी भावनाएँ बेहतर समझ पाते हैं। बहुत से पिता अपने बेटे को बतौर सरप्राइज गाड़ी गिफ्ट करते हैं। कॉलेज का पहला दिन और अपना मनचाहा गिफ्ट पाकर अपने पिता के प्रति उसका प्यार और विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है। वह जब चहकते हूए घर लौटता है तो सबसे पहले अपने पिता को ही कॉलेज के पहले दिन के अनुभव के बारे में बताता है, क्योंकि उसे आभास हो जाता है कि उसके पिता से बेहतर उसे कोई और नहीं समझ सकता।

पिता का बेटे के साथ और माँ का अपनी बेटी के साथ यह दोस्ताना रवैया जहाँ एक ओर सुखद अहसास का अनुभव कराता है, वहीं यह परिवार का दृढ़ आधार-स्तंभ भी है।

**वेबदुनिया पोर्टल में प्रकाशित नीहारिका झा पांडेय का लेख, वहीं से साभार

शेष यादें...

लेखकः  नीहारिका झा पांडेय

बचपन के वो बेफिक्र दिन, जहाँ न खाने की चिंता और न ही कमाने की। अपनी ही दुनिया होती है, जिसमें बड़ों के लिए रत्‍तीभर जगह नहीं होती। वैसी बेफिक्री चाहकर भी हम दुबारा हासिल नहीं कर सकते। आज जब उन दिनों को याद करती हूँ तो मन एक अनजाने बोझ से दबने लगता है। स्‍कूल छोड़े तो एक अरसा हो गया, लेकिन आज भी वो यादें जेहन में ताजा हैं, क्‍योंकि जिस बेफिक्री की मैं बात कर रही हूँ, वो मेरे हिस्‍से कभी नहीं आई।

आज भी वो शोर मेरे कानों में गूँजते हैं। मैं पढ़ाई में विशेष तो नहीं थी, लेकिन हाँ अपनी मेहनत से खुद को पिछड़ने भी नहीं देती थी। शिक्षक की लाडली होने के लिए यही पर्याप्‍त नहीं था। कक्षा में प्रथम आना ही उसकी पहली कसोटी थी। जो कमजोर थे, उन्‍हें गिनता ही कौन था। वो तो संख्‍या बढ़ाने वाले धरती के बोझ थे, उनकी क्‍या बिसात। परीक्षाएँ होती रहीं, और मैं कक्षा-दर-कक्षा पास होती रही, लेकिन इस दौरान मैं कभी खास नहीं बन पाई। आखिरकार स्‍कूल में हमारी विदाई का दिन भी आ गया, प्रथम आने वाली वो 'खास' शिष्‍याएँ, उन्‍हें खासतौर से भविष्‍य निर्माण की घुटि्टयाँ पिलाई जा रही थीं।

कॉलेज आते-आते सबने अपनी-अपनी राह चुन ली। कोई डॉक्‍टरी करने के सपने सँजोने लगी, तो किसी ने मास्‍टरी को ही अपना लक्ष्‍य मान लिया। मैं स्‍नातक करने मुंबई चली गई, कॉलेज में स्‍कॉरशिप मिली और ऑस्‍ट्रेलिया के एक विश्‍वविद्यालय में पढ़ने का मौका मिला।

अब पूरे परिवार के साथ कनाडा में हूँ, यहीं कॉलेज में मुझे लेक्‍चररशिप मिल गई। मेरी इच्‍छा हुई कि उन खास लोगों के बारे में कुछ जानकारी मिले, क्‍योंकि जीवन में उन्‍हें खास ही मिला होगा। लेकिन यह जानकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ कि एक की शादी हो गई और उसने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी और एक उसी शहर में स्‍कूल टीचर हो गई है। यह जानकर थोड़ा सुकून भी हुआ, लेकिन स्‍कूल के दिनों की वो टीस आज भी ताजा हो उठती है।

एक टीस...."मैं पढ़ाई में विशेष तो नहीं थी, लेकिन हाँ अपनी मेहनत से खुद को पिछड़ने भी नहीं देती थी। शिक्षक की लाडली होने के लिए यही पर्याप्‍त नहीं था। कक्षा में प्रथम आना ही उसकी पहली कसोटी थी। जो कमजोर थे, उन्‍हें गिनता ही कौन था।"

शेष यादें...

लेखकः  नीहारिका झा पांडेय

बचपन के वो बेफिक्र दिन, जहाँ न खाने की चिंता और न ही कमाने की। अपनी ही दुनिया होती है, जिसमें बड़ों के लिए रत्‍तीभर जगह नहीं होती। वैसी बेफिक्री चाहकर भी हम दुबारा हासिल नहीं कर सकते। आज जब उन दिनों को याद करती हूँ तो मन एक अनजाने बोझ से दबने लगता है। स्‍कूल छोड़े तो एक अरसा हो गया, लेकिन आज भी वो यादें जेहन में ताजा हैं, क्‍योंकि जिस बेफिक्री की मैं बात कर रही हूँ, वो मेरे हिस्‍से कभी नहीं आई।

आज भी वो शोर मेरे कानों में गूँजते हैं। मैं पढ़ाई में विशेष तो नहीं थी, लेकिन हाँ अपनी मेहनत से खुद को पिछड़ने भी नहीं देती थी। शिक्षक की लाडली होने के लिए यही पर्याप्‍त नहीं था। कक्षा में प्रथम आना ही उसकी पहली कसोटी थी। जो कमजोर थे, उन्‍हें गिनता ही कौन था। वो तो संख्‍या बढ़ाने वाले धरती के बोझ थे, उनकी क्‍या बिसात। परीक्षाएँ होती रहीं, और मैं कक्षा-दर-कक्षा पास होती रही, लेकिन इस दौरान मैं कभी खास नहीं बन पाई। आखिरकार स्‍कूल में हमारी विदाई का दिन भी आ गया, प्रथम आने वाली वो 'खास' शिष्‍याएँ, उन्‍हें खासतौर से भविष्‍य निर्माण की घुटि्टयाँ पिलाई जा रही थीं।

कॉलेज आते-आते सबने अपनी-अपनी राह चुन ली। कोई डॉक्‍टरी करने के सपने सँजोने लगी, तो किसी ने मास्‍टरी को ही अपना लक्ष्‍य मान लिया। मैं स्‍नातक करने मुंबई चली गई, कॉलेज में स्‍कॉरशिप मिली और ऑस्‍ट्रेलिया के एक विश्‍वविद्यालय में पढ़ने का मौका मिला।

अब पूरे परिवार के साथ कनाडा में हूँ, यहीं कॉलेज में मुझे लेक्‍चररशिप मिल गई। मेरी इच्‍छा हुई कि उन खास लोगों के बारे में कुछ जानकारी मिले, क्‍योंकि जीवन में उन्‍हें खास ही मिला होगा। लेकिन यह जानकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ कि एक की शादी हो गई और उसने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी और एक उसी शहर में स्‍कूल टीचर हो गई है। यह जानकर थोड़ा सुकून भी हुआ, लेकिन स्‍कूल के दिनों की वो टीस आज भी ताजा हो उठती है।

एक टीस...."मैं पढ़ाई में विशेष तो नहीं थी, लेकिन हाँ अपनी मेहनत से खुद को पिछड़ने भी नहीं देती थी। शिक्षक की लाडली होने के लिए यही पर्याप्‍त नहीं था। कक्षा में प्रथम आना ही उसकी पहली कसोटी थी। जो कमजोर थे, उन्‍हें गिनता ही कौन था।"

Friday, February 4, 2011

मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे


लेख्नकः नीहारिका झा पांडेय


मीडिया का भविष्य और युवाऒं की भूमिका
मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे। समय की मांग युवा शक्ति है। जिस क्षेत्र में युवा काम करते हैं उसकी तरक्की देखकर आप मेरे तर्क को जान सकते हैं। इंजीनियरिंग आईटी और मैजेजमेंट तीनों की क्षेत्रों में युवा शक्ति ही काम कर रही है। उनसे काम लेने का सबसे बड़ा फायदा है ऊर्जा। कहने का मतलब यह कि युवा तेजी से काम करते हैं। इसका मतलब यह भी नहीं है कि उम्रदराज लोगों की क्षमताऒं को नकारा जा रहा है। उनका उपयोग अनुभवी के रूप में लिया जा सकता है। मसलन आप मीडिया में नजर डालें तो टीवी मीडिया तो युवा शक्ति पर ही टिका है। अधिकांश रिपोर्टर युवा हैं और ३०-३५ की उम्र के हैं। मीडिया जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है उसके पीछे युवाऒं का हाथ ही है। चाहे वो संपादकीय विभाग के हों या फिर प्रबंधन से जुड़े हुए हों।

करियर 
मैंने मीडिया को सिर्फ एक पेशा मानती हूं। समय की मांग भी यही है कि बजाय किसी मिशन की बात करने के अगर हम अपने काम को ईमानदारी से अंजाम दें तो ज्यादा अच्छा होगा। मीडिया में काम करने का मेरा उद्देश्य अच्छा करियर बनाना है। इस पेशे से मैं अपनी जीविकोपार्जन करती हूं। साथ ही अपने काम को पूरी ईमानदारी से पूरा करना मेरी पहली प्राथमिकता हमेशा से रही है। चाहे कोई भी संस्थान हो। करियर को ध्यान में रखते हुए ही मैंने एक महीने पहले अपनी जॉब चेंज की है। यहां मेरे पास ज्यादा जिम्मेदारियां हैं।

मीडिया में अंतर
जब मैंने मीडिया को एक पेशे के रुप में चुना था उस वक्त कहा जाता था कि इस फील्ड में पैसे नहीं मिलते हैं। परिवार के लिए वक्त नहीं मिलता है। हालांकि शुरु के डेढ़ साल तो मैंने भी ऐसे ही काटे थे जब तनख्वाह आज के मुकाबले आधे से भी काफी कम थी। पर आज परिदृश्य काफी बदल गया है। अब इस क्षेत्र में पैसे बढ़ गए हैं। तकनीक में भी बदलाव आए हैं।

ब्लॉगिंग का भविष्य
ब्लागिंग अपनी भावनाऒं को जताने और मुद्दों पर चर्चा करने का सबसे अच्छा जरिया साबित हो रहा है। इसका भविष्य किसी पोर्टल और अखबार से ज्यादा उज्जवल है। यहां से लोग कम से कम बिना किसी डर के अपनी बात रख सकते हैं। मीडिय कहने को तो अभिव्यक्ति जताने का माध्यम है पर यहां मालिक की मर्जी और कंपनी की पॉलिसी के इतर काम करना यानि नौकरी से हाथ धोना। ऐसे में ब्लॉग वह जरिया है जिससे अपनी मन की बात और उन मुद्दों पर भी चर्चा और बहस की जा सकती है जो प्रोफेशनली नहीं की जा सकती है।

जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही हर चीज के दो पक्ष होते हैं एक तो पॉजिटिव और दूसरा नेगेटिव। ऐसा ही ब्लॉगिंग के साथ भी है। लोग इसका सदुपयोग करने के साथ ही दुरुपयोग भी करते हैं। मसलन दूसरों पर कीचड़ उछालना और अभद्र शब्दों का प्रयोग करना। अभिव्क्ति के इस माध्यम को ऐसी गंदगी से बचाना चाहिए। इस बातचीत के अंत में मैं एक बात कहना चाहूंगी कि कुछ लोग ब्लॉगिंग को अपनी ख्याति बढ़ाने के लिए उपयोग कर रहे हैं। हालांकि यह उनकी अपनी रुचि है कि वो अपने ब्लॉग पर क्या लिखें पर कम से कम इससे मानवता के मुद्दो को रोमांटीसाइज न किया जाए तो भी अच्छी तरह से ब्लॉगिंग की जा सकती है। मसलन आजकल स्त्री मुद्दों पर बड़ी शिद्दत के साथ लिखा जाता है कमेंट भी काबिले तारीफ आते हैं। पर कितने लोग ऐसे हैं जो वाकई वैसे ही हैं जैसा वो अपने आपको प्रोजेक्ट करते हैं।

मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे


लेख्नकः नीहारिका झा पांडेय


मीडिया का भविष्य और युवाऒं की भूमिका
मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे। समय की मांग युवा शक्ति है। जिस क्षेत्र में युवा काम करते हैं उसकी तरक्की देखकर आप मेरे तर्क को जान सकते हैं। इंजीनियरिंग आईटी और मैजेजमेंट तीनों की क्षेत्रों में युवा शक्ति ही काम कर रही है। उनसे काम लेने का सबसे बड़ा फायदा है ऊर्जा। कहने का मतलब यह कि युवा तेजी से काम करते हैं। इसका मतलब यह भी नहीं है कि उम्रदराज लोगों की क्षमताऒं को नकारा जा रहा है। उनका उपयोग अनुभवी के रूप में लिया जा सकता है। मसलन आप मीडिया में नजर डालें तो टीवी मीडिया तो युवा शक्ति पर ही टिका है। अधिकांश रिपोर्टर युवा हैं और ३०-३५ की उम्र के हैं। मीडिया जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है उसके पीछे युवाऒं का हाथ ही है। चाहे वो संपादकीय विभाग के हों या फिर प्रबंधन से जुड़े हुए हों।

करियर 
मैंने मीडिया को सिर्फ एक पेशा मानती हूं। समय की मांग भी यही है कि बजाय किसी मिशन की बात करने के अगर हम अपने काम को ईमानदारी से अंजाम दें तो ज्यादा अच्छा होगा। मीडिया में काम करने का मेरा उद्देश्य अच्छा करियर बनाना है। इस पेशे से मैं अपनी जीविकोपार्जन करती हूं। साथ ही अपने काम को पूरी ईमानदारी से पूरा करना मेरी पहली प्राथमिकता हमेशा से रही है। चाहे कोई भी संस्थान हो। करियर को ध्यान में रखते हुए ही मैंने एक महीने पहले अपनी जॉब चेंज की है। यहां मेरे पास ज्यादा जिम्मेदारियां हैं।

मीडिया में अंतर
जब मैंने मीडिया को एक पेशे के रुप में चुना था उस वक्त कहा जाता था कि इस फील्ड में पैसे नहीं मिलते हैं। परिवार के लिए वक्त नहीं मिलता है। हालांकि शुरु के डेढ़ साल तो मैंने भी ऐसे ही काटे थे जब तनख्वाह आज के मुकाबले आधे से भी काफी कम थी। पर आज परिदृश्य काफी बदल गया है। अब इस क्षेत्र में पैसे बढ़ गए हैं। तकनीक में भी बदलाव आए हैं।

ब्लॉगिंग का भविष्य
ब्लागिंग अपनी भावनाऒं को जताने और मुद्दों पर चर्चा करने का सबसे अच्छा जरिया साबित हो रहा है। इसका भविष्य किसी पोर्टल और अखबार से ज्यादा उज्जवल है। यहां से लोग कम से कम बिना किसी डर के अपनी बात रख सकते हैं। मीडिय कहने को तो अभिव्यक्ति जताने का माध्यम है पर यहां मालिक की मर्जी और कंपनी की पॉलिसी के इतर काम करना यानि नौकरी से हाथ धोना। ऐसे में ब्लॉग वह जरिया है जिससे अपनी मन की बात और उन मुद्दों पर भी चर्चा और बहस की जा सकती है जो प्रोफेशनली नहीं की जा सकती है।

जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही हर चीज के दो पक्ष होते हैं एक तो पॉजिटिव और दूसरा नेगेटिव। ऐसा ही ब्लॉगिंग के साथ भी है। लोग इसका सदुपयोग करने के साथ ही दुरुपयोग भी करते हैं। मसलन दूसरों पर कीचड़ उछालना और अभद्र शब्दों का प्रयोग करना। अभिव्क्ति के इस माध्यम को ऐसी गंदगी से बचाना चाहिए। इस बातचीत के अंत में मैं एक बात कहना चाहूंगी कि कुछ लोग ब्लॉगिंग को अपनी ख्याति बढ़ाने के लिए उपयोग कर रहे हैं। हालांकि यह उनकी अपनी रुचि है कि वो अपने ब्लॉग पर क्या लिखें पर कम से कम इससे मानवता के मुद्दो को रोमांटीसाइज न किया जाए तो भी अच्छी तरह से ब्लॉगिंग की जा सकती है। मसलन आजकल स्त्री मुद्दों पर बड़ी शिद्दत के साथ लिखा जाता है कमेंट भी काबिले तारीफ आते हैं। पर कितने लोग ऐसे हैं जो वाकई वैसे ही हैं जैसा वो अपने आपको प्रोजेक्ट करते हैं।

Friday, January 28, 2011

ज्वलंत विषय

ज्वलंत विषय ढूंढ़ा ताकि उस पर कुछ लिखूं
पाया हर चीज़ ज्वलनशील है

कभी देश तो कभी जनता जलती है
कभी शांति तो कभी नैतिकता धधकती है

सर पर टोपी हाथ में सीधी छड़ी वाला
वह युग बीत गया
तन पर सूट, हाथ में बंदूक लिए
शासक वह युग लूट गया

पाठकों ने कहा
यह तो घिसा पिटा विषय है
इस पर न लिखने को कुछ शेष है

लेकिन उन्हें न यह पता
यह तो अवशेष है
मूल बातें हैं लापता

भव्य समारोह की तैयारी थी
गोरी काली कन्याओं की सभा लगाई थी
आपस में गिट पिट कर
सुंदरी का खिताब किसी ने जीत लिया

सारी जनता बौखलाई सी
उमड़ी भीड़ देने बधाई
क्या पता उसे यह ताज किसलिए दिया गया
संस्कृति अपनी मर चुकी
उसी के शोक पर मनाई जा रही खुशी।

कहीं देश फैशन परस्त, तो कहीं पस्त है
कहीं नेताओं की तानाशाही
तो कहीं जनता की किस्मत अस्त है
इसी उलझन में फंसा
ज्वलंत विषय न ढूंढ़ सका।

नीहारिका जी की रचना

ज्वलंत विषय

ज्वलंत विषय ढूंढ़ा ताकि उस पर कुछ लिखूं
पाया हर चीज़ ज्वलनशील है

कभी देश तो कभी जनता जलती है
कभी शांति तो कभी नैतिकता धधकती है

सर पर टोपी हाथ में सीधी छड़ी वाला
वह युग बीत गया
तन पर सूट, हाथ में बंदूक लिए
शासक वह युग लूट गया

पाठकों ने कहा
यह तो घिसा पिटा विषय है
इस पर न लिखने को कुछ शेष है

लेकिन उन्हें न यह पता
यह तो अवशेष है
मूल बातें हैं लापता

भव्य समारोह की तैयारी थी
गोरी काली कन्याओं की सभा लगाई थी
आपस में गिट पिट कर
सुंदरी का खिताब किसी ने जीत लिया

सारी जनता बौखलाई सी
उमड़ी भीड़ देने बधाई
क्या पता उसे यह ताज किसलिए दिया गया
संस्कृति अपनी मर चुकी
उसी के शोक पर मनाई जा रही खुशी।

कहीं देश फैशन परस्त, तो कहीं पस्त है
कहीं नेताओं की तानाशाही
तो कहीं जनता की किस्मत अस्त है
इसी उलझन में फंसा
ज्वलंत विषय न ढूंढ़ सका।

नीहारिका जी की रचना

मैं मनुष्य हूं

पूछो नहीं नाम मेरा
मैं बड़ा अभागा हूं
मैं लक्ष्यहीन पंथहीन
राहों की छाया हूं

मैंने कितने अनर्थ किए
कार्य कितने व्यर्थ किए

स्वार्थ अपने पूर्ण करने को
औरों के हक छीनने को
मनुष्य जन्म लेकर मैं आया हूं
विकट संकट की प्रतिछाया हूं

निद्रा मेरी अब टूटी है
जब जीर्ण शीर्ण संस्कृति बची है

चारों ओर अशांति मची है
देश अब इन भूतों के लिए खंडहर शेष
यह देश का अब चिन्ह विशेष
कुरूप अब एक काया हूं
क्योंकि मैं मनुष्य जन्म लेकर आया हूं।

नीहारिका जी की रचना

मैं मनुष्य हूं

पूछो नहीं नाम मेरा
मैं बड़ा अभागा हूं
मैं लक्ष्यहीन पंथहीन
राहों की छाया हूं

मैंने कितने अनर्थ किए
कार्य कितने व्यर्थ किए

स्वार्थ अपने पूर्ण करने को
औरों के हक छीनने को
मनुष्य जन्म लेकर मैं आया हूं
विकट संकट की प्रतिछाया हूं

निद्रा मेरी अब टूटी है
जब जीर्ण शीर्ण संस्कृति बची है

चारों ओर अशांति मची है
देश अब इन भूतों के लिए खंडहर शेष
यह देश का अब चिन्ह विशेष
कुरूप अब एक काया हूं
क्योंकि मैं मनुष्य जन्म लेकर आया हूं।

नीहारिका जी की रचना

बदल गया है


दो मिट्टी इन हाथों में
यह मिट्टी मेरे भारत की है
होती थी जो कभी वीरों का तिलक
वो धूल अब आंखों की किरकिरी बनकर पड़ती है
सुगंध से जिसके लोग न अघाते थे
अब उस मिट्टी को ढंककर लोग पक्की सड़कें बनवाते हैं
और दौड़ लगाते हैं इस छोर से उस छोर तक
जहां न मिट्टी की झलक न हरियाली है
केवल भारत के इतिहास पर
मिट्टी पड़ी नज़र आती है।

नीहारिका जी की रचना

बदल गया है


दो मिट्टी इन हाथों में
यह मिट्टी मेरे भारत की है
होती थी जो कभी वीरों का तिलक
वो धूल अब आंखों की किरकिरी बनकर पड़ती है
सुगंध से जिसके लोग न अघाते थे
अब उस मिट्टी को ढंककर लोग पक्की सड़कें बनवाते हैं
और दौड़ लगाते हैं इस छोर से उस छोर तक
जहां न मिट्टी की झलक न हरियाली है
केवल भारत के इतिहास पर
मिट्टी पड़ी नज़र आती है।

नीहारिका जी की रचना

वृक्ष

जीवन का आधार दिया है
सुयोग्य तुम्हे विकास दिया है
हरियाली ही जीवन है यह मंत्रोच्चार दिया है

कांटों का दुख सहकर
फूल तुमपर बरसाए हैं
समान दृष्टि डाली सबपर
और समानता का नया आयाम दिया है

पर तुमने हमसे सब छीना है
चोट पर चोट करते रहे सदियों से तुम
क्रूरता की सीमा भी लांघी तुमने
दर्द की विभीषिका को मौन रहकर
स्वीकार हमनें किया है

अब वक्त हमारा आया है
जीवन का अधिकार हम भी छीनेंगे
हद की सीमाएं लांघी तुमने
तो हम भी हर सीमाएं तोड़ेंगे।

नीहारिका जी की रचना

वृक्ष

जीवन का आधार दिया है
सुयोग्य तुम्हे विकास दिया है
हरियाली ही जीवन है यह मंत्रोच्चार दिया है

कांटों का दुख सहकर
फूल तुमपर बरसाए हैं
समान दृष्टि डाली सबपर
और समानता का नया आयाम दिया है

पर तुमने हमसे सब छीना है
चोट पर चोट करते रहे सदियों से तुम
क्रूरता की सीमा भी लांघी तुमने
दर्द की विभीषिका को मौन रहकर
स्वीकार हमनें किया है

अब वक्त हमारा आया है
जीवन का अधिकार हम भी छीनेंगे
हद की सीमाएं लांघी तुमने
तो हम भी हर सीमाएं तोड़ेंगे।

नीहारिका जी की रचना

Sunday, November 11, 2007

पिता


मेरी बिटिया रानी गढ़ूंगा तेरे लिए अलग कहानी
सफलता, खुशियां, ममता तेरी झोली में डालूंगा,
पिता हूं तेरे सारे दु:ख हरूंगा।
पकड़कर ऊंगली जब सीखा तूने चलना,
मन पुलकित और हर्षित हुआ ,
तुझे ले जाऊंगा बादलों के भी पार,
सपना यह संजोता रहा।


तेरी हर इच्‍छा पूरी करूं,
मैं संभालूं, मैं संजोऊं तेरे सपनों का घरौंदा।
यह जाने बिना कि तू पंछी है किसी और डाल की
तेरा दाना-पानी नहीं हमारे अंगान का,
तू बादल है उमड़ता-घुमड़ता,
जो बरसेगा किसी और की बगिया में।


घर में शहनाई, मेहमानों का शोर है
तेरी किलकारियां अब खामोश हैं
ना तूने थामी है मेरी ऊंगली अब,
शर्माई, सकुचाई-सी एक मूरत, आंसुओं की बहती धार,
मैं भी हूं एक असहाय पिता
जो केवल संजो सकता है सपने अपनी बिटिया के,
आकार पाते हैं वो सपने दूर कहीं, दूर कहीं....।

पिता


मेरी बिटिया रानी गढ़ूंगा तेरे लिए अलग कहानी
सफलता, खुशियां, ममता तेरी झोली में डालूंगा,
पिता हूं तेरे सारे दु:ख हरूंगा।
पकड़कर ऊंगली जब सीखा तूने चलना,
मन पुलकित और हर्षित हुआ ,
तुझे ले जाऊंगा बादलों के भी पार,
सपना यह संजोता रहा।


तेरी हर इच्‍छा पूरी करूं,
मैं संभालूं, मैं संजोऊं तेरे सपनों का घरौंदा।
यह जाने बिना कि तू पंछी है किसी और डाल की
तेरा दाना-पानी नहीं हमारे अंगान का,
तू बादल है उमड़ता-घुमड़ता,
जो बरसेगा किसी और की बगिया में।


घर में शहनाई, मेहमानों का शोर है
तेरी किलकारियां अब खामोश हैं
ना तूने थामी है मेरी ऊंगली अब,
शर्माई, सकुचाई-सी एक मूरत, आंसुओं की बहती धार,
मैं भी हूं एक असहाय पिता
जो केवल संजो सकता है सपने अपनी बिटिया के,
आकार पाते हैं वो सपने दूर कहीं, दूर कहीं....।

Wednesday, October 10, 2007

मैं मांगती हूं

मांगने वाला भिखारी और
देने वाला दानवीर है,
तो आजादी, खुशी और
जीने की एक अदद वजह मांगती हूं।

मां कहलाने के लिए भी तो मांगना होता है
अपनी पहचान, जो तुमसे शुरू होकर तुमपर खत्‍म होती है
क्‍योंकि बिना पहचान के कुल्‍टा हूं और पहचान के साथ भी बेनाम,
ऐसी जिंदगी के संग जीने की अदद वजह मांगती हूं।

- नीहारिका

मैं मांगती हूं

मांगने वाला भिखारी और
देने वाला दानवीर है,
तो आजादी, खुशी और
जीने की एक अदद वजह मांगती हूं।

मां कहलाने के लिए भी तो मांगना होता है
अपनी पहचान, जो तुमसे शुरू होकर तुमपर खत्‍म होती है
क्‍योंकि बिना पहचान के कुल्‍टा हूं और पहचान के साथ भी बेनाम,
ऐसी जिंदगी के संग जीने की अदद वजह मांगती हूं।

- नीहारिका