Friday, February 4, 2011

मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे


लेख्नकः नीहारिका झा पांडेय


मीडिया का भविष्य और युवाऒं की भूमिका
मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे। समय की मांग युवा शक्ति है। जिस क्षेत्र में युवा काम करते हैं उसकी तरक्की देखकर आप मेरे तर्क को जान सकते हैं। इंजीनियरिंग आईटी और मैजेजमेंट तीनों की क्षेत्रों में युवा शक्ति ही काम कर रही है। उनसे काम लेने का सबसे बड़ा फायदा है ऊर्जा। कहने का मतलब यह कि युवा तेजी से काम करते हैं। इसका मतलब यह भी नहीं है कि उम्रदराज लोगों की क्षमताऒं को नकारा जा रहा है। उनका उपयोग अनुभवी के रूप में लिया जा सकता है। मसलन आप मीडिया में नजर डालें तो टीवी मीडिया तो युवा शक्ति पर ही टिका है। अधिकांश रिपोर्टर युवा हैं और ३०-३५ की उम्र के हैं। मीडिया जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है उसके पीछे युवाऒं का हाथ ही है। चाहे वो संपादकीय विभाग के हों या फिर प्रबंधन से जुड़े हुए हों।

करियर 
मैंने मीडिया को सिर्फ एक पेशा मानती हूं। समय की मांग भी यही है कि बजाय किसी मिशन की बात करने के अगर हम अपने काम को ईमानदारी से अंजाम दें तो ज्यादा अच्छा होगा। मीडिया में काम करने का मेरा उद्देश्य अच्छा करियर बनाना है। इस पेशे से मैं अपनी जीविकोपार्जन करती हूं। साथ ही अपने काम को पूरी ईमानदारी से पूरा करना मेरी पहली प्राथमिकता हमेशा से रही है। चाहे कोई भी संस्थान हो। करियर को ध्यान में रखते हुए ही मैंने एक महीने पहले अपनी जॉब चेंज की है। यहां मेरे पास ज्यादा जिम्मेदारियां हैं।

मीडिया में अंतर
जब मैंने मीडिया को एक पेशे के रुप में चुना था उस वक्त कहा जाता था कि इस फील्ड में पैसे नहीं मिलते हैं। परिवार के लिए वक्त नहीं मिलता है। हालांकि शुरु के डेढ़ साल तो मैंने भी ऐसे ही काटे थे जब तनख्वाह आज के मुकाबले आधे से भी काफी कम थी। पर आज परिदृश्य काफी बदल गया है। अब इस क्षेत्र में पैसे बढ़ गए हैं। तकनीक में भी बदलाव आए हैं।

ब्लॉगिंग का भविष्य
ब्लागिंग अपनी भावनाऒं को जताने और मुद्दों पर चर्चा करने का सबसे अच्छा जरिया साबित हो रहा है। इसका भविष्य किसी पोर्टल और अखबार से ज्यादा उज्जवल है। यहां से लोग कम से कम बिना किसी डर के अपनी बात रख सकते हैं। मीडिय कहने को तो अभिव्यक्ति जताने का माध्यम है पर यहां मालिक की मर्जी और कंपनी की पॉलिसी के इतर काम करना यानि नौकरी से हाथ धोना। ऐसे में ब्लॉग वह जरिया है जिससे अपनी मन की बात और उन मुद्दों पर भी चर्चा और बहस की जा सकती है जो प्रोफेशनली नहीं की जा सकती है।

जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही हर चीज के दो पक्ष होते हैं एक तो पॉजिटिव और दूसरा नेगेटिव। ऐसा ही ब्लॉगिंग के साथ भी है। लोग इसका सदुपयोग करने के साथ ही दुरुपयोग भी करते हैं। मसलन दूसरों पर कीचड़ उछालना और अभद्र शब्दों का प्रयोग करना। अभिव्क्ति के इस माध्यम को ऐसी गंदगी से बचाना चाहिए। इस बातचीत के अंत में मैं एक बात कहना चाहूंगी कि कुछ लोग ब्लॉगिंग को अपनी ख्याति बढ़ाने के लिए उपयोग कर रहे हैं। हालांकि यह उनकी अपनी रुचि है कि वो अपने ब्लॉग पर क्या लिखें पर कम से कम इससे मानवता के मुद्दो को रोमांटीसाइज न किया जाए तो भी अच्छी तरह से ब्लॉगिंग की जा सकती है। मसलन आजकल स्त्री मुद्दों पर बड़ी शिद्दत के साथ लिखा जाता है कमेंट भी काबिले तारीफ आते हैं। पर कितने लोग ऐसे हैं जो वाकई वैसे ही हैं जैसा वो अपने आपको प्रोजेक्ट करते हैं।

मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे


लेख्नकः नीहारिका झा पांडेय


मीडिया का भविष्य और युवाऒं की भूमिका
मीडिया का भविष्य युवा ही तय करेंगे। समय की मांग युवा शक्ति है। जिस क्षेत्र में युवा काम करते हैं उसकी तरक्की देखकर आप मेरे तर्क को जान सकते हैं। इंजीनियरिंग आईटी और मैजेजमेंट तीनों की क्षेत्रों में युवा शक्ति ही काम कर रही है। उनसे काम लेने का सबसे बड़ा फायदा है ऊर्जा। कहने का मतलब यह कि युवा तेजी से काम करते हैं। इसका मतलब यह भी नहीं है कि उम्रदराज लोगों की क्षमताऒं को नकारा जा रहा है। उनका उपयोग अनुभवी के रूप में लिया जा सकता है। मसलन आप मीडिया में नजर डालें तो टीवी मीडिया तो युवा शक्ति पर ही टिका है। अधिकांश रिपोर्टर युवा हैं और ३०-३५ की उम्र के हैं। मीडिया जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है उसके पीछे युवाऒं का हाथ ही है। चाहे वो संपादकीय विभाग के हों या फिर प्रबंधन से जुड़े हुए हों।

करियर 
मैंने मीडिया को सिर्फ एक पेशा मानती हूं। समय की मांग भी यही है कि बजाय किसी मिशन की बात करने के अगर हम अपने काम को ईमानदारी से अंजाम दें तो ज्यादा अच्छा होगा। मीडिया में काम करने का मेरा उद्देश्य अच्छा करियर बनाना है। इस पेशे से मैं अपनी जीविकोपार्जन करती हूं। साथ ही अपने काम को पूरी ईमानदारी से पूरा करना मेरी पहली प्राथमिकता हमेशा से रही है। चाहे कोई भी संस्थान हो। करियर को ध्यान में रखते हुए ही मैंने एक महीने पहले अपनी जॉब चेंज की है। यहां मेरे पास ज्यादा जिम्मेदारियां हैं।

मीडिया में अंतर
जब मैंने मीडिया को एक पेशे के रुप में चुना था उस वक्त कहा जाता था कि इस फील्ड में पैसे नहीं मिलते हैं। परिवार के लिए वक्त नहीं मिलता है। हालांकि शुरु के डेढ़ साल तो मैंने भी ऐसे ही काटे थे जब तनख्वाह आज के मुकाबले आधे से भी काफी कम थी। पर आज परिदृश्य काफी बदल गया है। अब इस क्षेत्र में पैसे बढ़ गए हैं। तकनीक में भी बदलाव आए हैं।

ब्लॉगिंग का भविष्य
ब्लागिंग अपनी भावनाऒं को जताने और मुद्दों पर चर्चा करने का सबसे अच्छा जरिया साबित हो रहा है। इसका भविष्य किसी पोर्टल और अखबार से ज्यादा उज्जवल है। यहां से लोग कम से कम बिना किसी डर के अपनी बात रख सकते हैं। मीडिय कहने को तो अभिव्यक्ति जताने का माध्यम है पर यहां मालिक की मर्जी और कंपनी की पॉलिसी के इतर काम करना यानि नौकरी से हाथ धोना। ऐसे में ब्लॉग वह जरिया है जिससे अपनी मन की बात और उन मुद्दों पर भी चर्चा और बहस की जा सकती है जो प्रोफेशनली नहीं की जा सकती है।

जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही हर चीज के दो पक्ष होते हैं एक तो पॉजिटिव और दूसरा नेगेटिव। ऐसा ही ब्लॉगिंग के साथ भी है। लोग इसका सदुपयोग करने के साथ ही दुरुपयोग भी करते हैं। मसलन दूसरों पर कीचड़ उछालना और अभद्र शब्दों का प्रयोग करना। अभिव्क्ति के इस माध्यम को ऐसी गंदगी से बचाना चाहिए। इस बातचीत के अंत में मैं एक बात कहना चाहूंगी कि कुछ लोग ब्लॉगिंग को अपनी ख्याति बढ़ाने के लिए उपयोग कर रहे हैं। हालांकि यह उनकी अपनी रुचि है कि वो अपने ब्लॉग पर क्या लिखें पर कम से कम इससे मानवता के मुद्दो को रोमांटीसाइज न किया जाए तो भी अच्छी तरह से ब्लॉगिंग की जा सकती है। मसलन आजकल स्त्री मुद्दों पर बड़ी शिद्दत के साथ लिखा जाता है कमेंट भी काबिले तारीफ आते हैं। पर कितने लोग ऐसे हैं जो वाकई वैसे ही हैं जैसा वो अपने आपको प्रोजेक्ट करते हैं।

हिन्‍दी दिवस क्‍यों मनाएँ हम?


नीहारिका झा पांडेय। तालियों की गड़गड़ाहट, शुद्ध हिन्‍दी में कविता पाठ, हिन्‍दी के भविष्‍य को लेकर लंबी-लंबी परिचर्चाएँ, हर वर्ष हिन्‍दी दिवस के दिन पूरे देश का लगभग यही माहौल रहता है। स्‍कूल-कॉलेजों में बच्‍चों के हाथों में लिखी तख्तियाँ मिल जाती हैं, जिस पर हिन्‍दी को सिरमौर भाषा साबित करने की पूरी जुगत होती है-'हिन्‍दी श्रेष्‍ठ है', 'हिन्‍दी को आगे लाएँ हम', 'हिन्‍दी देश का गौरव है' और न जाने कितने ऐसे ही संदेशों से स्‍कूल-कॉलेज अटे पड़े रहते हैं। देश में अब हिन्‍दी, हिन्‍दी अधिकारी के पदों को भरने और सरकारी स्‍कूलों की चहारदीवारी तक ही घुटकर रह गई।

विविधता वाले इस देश की सबसे बड़ी समस्‍या है- भाषायी एकता की। आजादी के इतने वर्षों बाद भी मिजोरम, नगालैड जैसे उत्‍तर-पूर्वी राज्‍य खुद को हिन्‍दी से नहीं जोड़ पाए हैं। वहाँ समय-समय पर हिन्‍दी विरोधी स्‍वर उठते रहते हैं।

विविधता वाले इस देश की सबसे बड़ी समस्‍या है- भाषायी एकता की। आजादी के इतने वर्षों बाद भी मिजोरम, नगालैड जैसे उत्‍तर-पूर्वी राज्‍य खुद को हिन्‍दी से नहीं जोड़ पाए हैं। वहाँ समय-समय पर हिन्‍दी विरोधी स्‍वर उठते रहते हैं। हम भले ही उनकी आवाज को अनसुना कर दें, लेकिन भाषा के स्‍तर पर आज भी देश एकमत नहीं है। उन्‍होंने कथित रूप से यह आवाज उठाई है कि- वे हिन्‍दी नहीं पढ़ना चाहते। अगर देखा जाए, तो यह विरोध निराधार भी नहीं। हिन्‍दी भाषी क्षेत्रों के साथ जिस तरह के दोयम दर्जे का व्‍यवहार होता है, उससे इंकार नहीं किया जा सकता। आए दिन उन पर हमले होते हैं, कई राज्‍यों में उन्‍हें हिन्‍दी भाषी क्षेत्र का निवासी होने का दंश झेलना पड़ता है। अपने ही देश में उनसे प्रवासियों जैसा बर्ताव किया जाता है।

आज देश में हजारों हिन्‍दी अखबार छपते हैं, उनकी पहुँच भी करोड़ों लोगों तक है, लेकिन ये चाय की गुमटियों की शोभा बढ़ाते हैं या खोमचे वालों के काम आते हैं। ये मुट्‍ठीभर अँगरेजी पढ़ने और समझने वाले देश की दशा और दिशा तय करते हैं।

हिन्‍दी को कामकाज की भाषा बनाने की कितनी ही दलीलें क्‍यों न दी जाएँ, आज क्रीमीलेयर मानी जाने वाली नौकरियों में प्राथमिकता अँग्रेजी बोलने और जानने वालों को दी जाती है। उन सरकारी स्‍कूलों के छात्रों को नहीं, जहाँ उनकी किताबों से लेकर बातची‍त का माध्‍यम भी हिन्‍दी हो। उनकी आँखों में भी सपने दमकते हैं, लेकिन उन आँखों को हक नहीं होता उन्‍हें साकार करने का।

आज देश में हजारों हिन्‍दी अखबार छपते हैं, उनकी पहुँच भी करोड़ों लोगों तक है, लेकिन ये चाय की गुमटियों की शोभा बढ़ाते हैं या खोमचे वालों के काम आते हैं। ये मुट्‍ठीभर अँगरेजी पढ़ने और समझने वाले देश की दशा और दिशा तय करते हैं। मैनेजमेंट की डिग्री चाहिए या मेडिकल की, कानून की पढ़ाई करनी हो या फैशन की दुनिया में चमकना हो अँगरेजी की बैसाखी के बिना आप एक कदम नहीं चल सकते। कई कोर्सों की पहली शर्त ही अँगरेजी होती है। भले ही देश के हमारे प्रतिनिधि देश के बाहर हिन्‍दी में भाषण देते हों, लेकिन देश के अंदर हिन्‍दी आज भी अपनी पहचान तलाश रही है। ऐसे में हिन्‍दी दिवस का औचित्‍य बेमानी जान पड़ता है।

**वेबदुनिया पोर्टल में प्रकाशित नीहारिका झा पांडेय का लेख, वहीं से साभार

हिन्‍दी दिवस क्‍यों मनाएँ हम?


नीहारिका झा पांडेय। तालियों की गड़गड़ाहट, शुद्ध हिन्‍दी में कविता पाठ, हिन्‍दी के भविष्‍य को लेकर लंबी-लंबी परिचर्चाएँ, हर वर्ष हिन्‍दी दिवस के दिन पूरे देश का लगभग यही माहौल रहता है। स्‍कूल-कॉलेजों में बच्‍चों के हाथों में लिखी तख्तियाँ मिल जाती हैं, जिस पर हिन्‍दी को सिरमौर भाषा साबित करने की पूरी जुगत होती है-'हिन्‍दी श्रेष्‍ठ है', 'हिन्‍दी को आगे लाएँ हम', 'हिन्‍दी देश का गौरव है' और न जाने कितने ऐसे ही संदेशों से स्‍कूल-कॉलेज अटे पड़े रहते हैं। देश में अब हिन्‍दी, हिन्‍दी अधिकारी के पदों को भरने और सरकारी स्‍कूलों की चहारदीवारी तक ही घुटकर रह गई।

विविधता वाले इस देश की सबसे बड़ी समस्‍या है- भाषायी एकता की। आजादी के इतने वर्षों बाद भी मिजोरम, नगालैड जैसे उत्‍तर-पूर्वी राज्‍य खुद को हिन्‍दी से नहीं जोड़ पाए हैं। वहाँ समय-समय पर हिन्‍दी विरोधी स्‍वर उठते रहते हैं।

विविधता वाले इस देश की सबसे बड़ी समस्‍या है- भाषायी एकता की। आजादी के इतने वर्षों बाद भी मिजोरम, नगालैड जैसे उत्‍तर-पूर्वी राज्‍य खुद को हिन्‍दी से नहीं जोड़ पाए हैं। वहाँ समय-समय पर हिन्‍दी विरोधी स्‍वर उठते रहते हैं। हम भले ही उनकी आवाज को अनसुना कर दें, लेकिन भाषा के स्‍तर पर आज भी देश एकमत नहीं है। उन्‍होंने कथित रूप से यह आवाज उठाई है कि- वे हिन्‍दी नहीं पढ़ना चाहते। अगर देखा जाए, तो यह विरोध निराधार भी नहीं। हिन्‍दी भाषी क्षेत्रों के साथ जिस तरह के दोयम दर्जे का व्‍यवहार होता है, उससे इंकार नहीं किया जा सकता। आए दिन उन पर हमले होते हैं, कई राज्‍यों में उन्‍हें हिन्‍दी भाषी क्षेत्र का निवासी होने का दंश झेलना पड़ता है। अपने ही देश में उनसे प्रवासियों जैसा बर्ताव किया जाता है।

आज देश में हजारों हिन्‍दी अखबार छपते हैं, उनकी पहुँच भी करोड़ों लोगों तक है, लेकिन ये चाय की गुमटियों की शोभा बढ़ाते हैं या खोमचे वालों के काम आते हैं। ये मुट्‍ठीभर अँगरेजी पढ़ने और समझने वाले देश की दशा और दिशा तय करते हैं।

हिन्‍दी को कामकाज की भाषा बनाने की कितनी ही दलीलें क्‍यों न दी जाएँ, आज क्रीमीलेयर मानी जाने वाली नौकरियों में प्राथमिकता अँग्रेजी बोलने और जानने वालों को दी जाती है। उन सरकारी स्‍कूलों के छात्रों को नहीं, जहाँ उनकी किताबों से लेकर बातची‍त का माध्‍यम भी हिन्‍दी हो। उनकी आँखों में भी सपने दमकते हैं, लेकिन उन आँखों को हक नहीं होता उन्‍हें साकार करने का।

आज देश में हजारों हिन्‍दी अखबार छपते हैं, उनकी पहुँच भी करोड़ों लोगों तक है, लेकिन ये चाय की गुमटियों की शोभा बढ़ाते हैं या खोमचे वालों के काम आते हैं। ये मुट्‍ठीभर अँगरेजी पढ़ने और समझने वाले देश की दशा और दिशा तय करते हैं। मैनेजमेंट की डिग्री चाहिए या मेडिकल की, कानून की पढ़ाई करनी हो या फैशन की दुनिया में चमकना हो अँगरेजी की बैसाखी के बिना आप एक कदम नहीं चल सकते। कई कोर्सों की पहली शर्त ही अँगरेजी होती है। भले ही देश के हमारे प्रतिनिधि देश के बाहर हिन्‍दी में भाषण देते हों, लेकिन देश के अंदर हिन्‍दी आज भी अपनी पहचान तलाश रही है। ऐसे में हिन्‍दी दिवस का औचित्‍य बेमानी जान पड़ता है।

**वेबदुनिया पोर्टल में प्रकाशित नीहारिका झा पांडेय का लेख, वहीं से साभार

Saturday, January 29, 2011

दिल्ली सबसे असुरक्षित महानगर


दिल्ली के खाते में एक और बदनुमा दाग जुड़ गया है और यह देश का सबसे असुरक्षित महानगर बन गया है। चाहे अपराध हो या महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार की गिनती, राष्ट्रीय राजधानी इन सबमें अव्वल हो गई है।

सरकार के ताजातरीन आँकड़ों के मुताबिक 2009 में देश के बड़े 35 नगरों में हुए 343749 अपराधों में दिल्ली का हिस्सा सबसे ज्यादा 13.2 फीसदी रहा। इसके बाद बेंगलुरु (9.4 फीसदी) और मुंबई (9.1 फीसदी) का स्थान रहा।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में बताया गया कि इन शहरों में बलात्कार के कुल 1696 मामलों में केवल दिल्ली में 404 मामले हुए। महिलाओं के अपहरण में भी दिल्ली का हिस्सा सबसे अधिक रहा। फिरौती 3544 मामलों में राजधानी का हिस्सा 38.9 फीसदी रहा।

2009 में दिल्ली में दहेज के दानवों ने कई नववधुओं को लील लिया। देश के बड़े 35 शहरों में दहेज हत्या के 684 मामलों में अकेली दिल्ली में 104 मामले सामने आए। छेड़छाड़ के मामलों में भी दिल्ली पीछे नहीं रही। कुल 3477 मामलों में यहाँ 14.1 फीसदी यानी 491 मामले हुए।

दिल्ली सबसे असुरक्षित महानगर


दिल्ली के खाते में एक और बदनुमा दाग जुड़ गया है और यह देश का सबसे असुरक्षित महानगर बन गया है। चाहे अपराध हो या महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार की गिनती, राष्ट्रीय राजधानी इन सबमें अव्वल हो गई है।

सरकार के ताजातरीन आँकड़ों के मुताबिक 2009 में देश के बड़े 35 नगरों में हुए 343749 अपराधों में दिल्ली का हिस्सा सबसे ज्यादा 13.2 फीसदी रहा। इसके बाद बेंगलुरु (9.4 फीसदी) और मुंबई (9.1 फीसदी) का स्थान रहा।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में बताया गया कि इन शहरों में बलात्कार के कुल 1696 मामलों में केवल दिल्ली में 404 मामले हुए। महिलाओं के अपहरण में भी दिल्ली का हिस्सा सबसे अधिक रहा। फिरौती 3544 मामलों में राजधानी का हिस्सा 38.9 फीसदी रहा।

2009 में दिल्ली में दहेज के दानवों ने कई नववधुओं को लील लिया। देश के बड़े 35 शहरों में दहेज हत्या के 684 मामलों में अकेली दिल्ली में 104 मामले सामने आए। छेड़छाड़ के मामलों में भी दिल्ली पीछे नहीं रही। कुल 3477 मामलों में यहाँ 14.1 फीसदी यानी 491 मामले हुए।

Friday, January 28, 2011

ज्वलंत विषय

ज्वलंत विषय ढूंढ़ा ताकि उस पर कुछ लिखूं
पाया हर चीज़ ज्वलनशील है

कभी देश तो कभी जनता जलती है
कभी शांति तो कभी नैतिकता धधकती है

सर पर टोपी हाथ में सीधी छड़ी वाला
वह युग बीत गया
तन पर सूट, हाथ में बंदूक लिए
शासक वह युग लूट गया

पाठकों ने कहा
यह तो घिसा पिटा विषय है
इस पर न लिखने को कुछ शेष है

लेकिन उन्हें न यह पता
यह तो अवशेष है
मूल बातें हैं लापता

भव्य समारोह की तैयारी थी
गोरी काली कन्याओं की सभा लगाई थी
आपस में गिट पिट कर
सुंदरी का खिताब किसी ने जीत लिया

सारी जनता बौखलाई सी
उमड़ी भीड़ देने बधाई
क्या पता उसे यह ताज किसलिए दिया गया
संस्कृति अपनी मर चुकी
उसी के शोक पर मनाई जा रही खुशी।

कहीं देश फैशन परस्त, तो कहीं पस्त है
कहीं नेताओं की तानाशाही
तो कहीं जनता की किस्मत अस्त है
इसी उलझन में फंसा
ज्वलंत विषय न ढूंढ़ सका।

नीहारिका जी की रचना