Wednesday, February 17, 2016

अभिव्‍यक्ति की आजा़दी के नाम पर क्‍या कुछ भी किया जा सकता है

असहिष्‍णुता और अभिव्‍यक्ति दो ऐसे शब्‍द हैं, जिन्‍होंने पिछले दो वर्षों में हमारे देश में काफी ख्‍याति पाई है। ऐसी ख्‍याति जो पूरी दुनिया में चर्चित हुई। कभी धर्म के नाम पर तो कभी बोलने के नाम पर असहिष्‍णुता और अभिव्‍यक्ति की बात की गई। यह तो सच है कि हमारे संविधान ने बोलने की स्‍वतंत्रता दी है, लेकिन इसकी आड़ में आप किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाएं, या मान‍हानि करें तो क्‍या इसे सही कहा जाएगा। अभिव्‍यक्ति की आजादी के नाम पर आप पाकिस्‍तान जिंदाबाद कहें तो क्‍या यह सही है। अफज़ल गुरु एक ऐसा शख्‍स था, जिसने देश की संसद पर हमले की साजिश में आतंकियों की मदद की। उसे देश की सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी।
तो, जो लोग उसकी मौत पर ग़म मना रहे हैं या फिर इसे अन्‍याय कह रहे हैं, उन्‍हें क्‍या माना जाए। यहां पर मैं धर्म या जाजि की बात नहीं कर रहा हूं। मैं एक घटना की बात कर रहा हूं।
मेरा एक सवाल है सहिष्‍णुता और अभिव्‍यक्ति के झंडाबरदारों से, कि क्‍या वो लोग कभी पाकिस्‍तान जाकर सरबजीत की मौत के लिए पाकिस्‍तानी सरकार का विरोध करेंगे। क्‍या उस क्रिकेट प्रेमी के समर्थन में रैलियां निकालेंगे, जिसे केवल इसलिए पाकिस्‍तान ने जेल में डाल दिया क्‍योंकि वो विराट कोहली का फैन है और उसने अपने घर की छत पर तिरंगा फहरा दिया था।
क्‍या अमेरिका में जाकर ओसामा बिन लादेन की हत्‍या के लिए अमेरिकी सरकार और फौज के खिलाफ रैलियां, आंदोलन और भाषणबाजी करेंगे। अगर वो ऐसा भी करते हैं तो निश्चित तौर पर हर भारतवासी दिल से उनका समर्थन करेगा।
लेकिन इस प्रकार की घटनाएं एक ऐसे देश में हो रही हैं, जहां अभिव्‍यक्ति के नाम पर ऐसा करने की पाबंदियां कम हैं। क्‍योंकि जैसे ही उन पर कार्रवाई होगी, तो कई राजनीतिक दल उनका समर्थन करते हुए अपनी रोटियां सेकने के लिए पहुंच जाएंगे।
यह बेहद अफसोसजनक है कि हमारे देश के विश्‍वविद्यालय और कॉलेज पढ़ाई से ज्‍यादा नेतागिरी और राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं। इस स्थिति में तो भारत में कभी भी ऑक्‍सफोर्ड या एमआईटी जैसे संस्‍थान खड़े नहीं हो पाएंगे, क्‍योंकि वहां तो लोग पढ़ने जाते हैं और हमारे यहां नेता बनने के लिए। देश में कई ऐसे विश्‍वविद्यालय हैं, जो पूरे साल किसी न किसी मामले पर सुर्खियों में बने रहे हैं। कभी राजनीतिक नियुक्तियों की वजह से तो कभी बयानबाजी या फिर छात्रसंघ के नाम पर।
लगता है कि मानो अभी तक यह तय नहीं हो सका है कि भारतीय शिक्षण संस्‍थान किसलिए बनाए गए हैं। ज्ञानार्जन के लिए या फिर राजनीति दलों को नए मुद्दे देने के लिए।
एक और सबसे मजे़दार बात। द वर्ल्‍ड यूनिसवर्सिटी रैंकिंग हर साल दुनिया के सर्वश्रेष्‍ठ 100 शिक्षण संस्‍थानों की एक सूची जारी करती है, जिसमें भारत का एक भी संस्‍थान नहीं है। क्‍या किसी ने कभी इस बात पर ध्‍यान दिया है कि आखिर क्‍या वजह है कि उक्‍त सूची की टॉप 100 में भारतीय संस्‍थान क्‍यों नहीं हैं।
दिल्‍ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में हुई ताज़ा घटना से यह तो स्‍पष्‍ट है कि भारतीय शिक्षण संस्‍थान पढ़ाई से इतर किन वजहों से दुनिया में चर्चित हो सकते हैं। यह तो हम पर निर्भर है कि हम नेकी में नाम चाहते हैं या फिर बदी में। देश हमारा है और हमें ही इसके बारे में सोचना होगा। सियासी दल और सियासतदां तो केवल मुद्दे को उछालने का मौका तलाशते हैं, क्‍योंकि उनके अस्तित्‍व के लिए यह जरूरी है, लेकिन हमारे लिए नहीं।

Wednesday, April 15, 2015

वोट के लिए तो जनहित किया ही जा सकता है

गूगल सर्च से साभार
देश में एक दशक तक एक ऐसी सरकार का राज रहा, जिसने योजनाएं तो खूब बनाईं, पर अमल तो चुनिंदा पर ही हो सका। हां, घोटाले जरूर एक से बढ़कर एक हुए। लाखों और करोड़ों लूटना तो अब पुरानी और शर्मनाक बात बन चुकी है। जब तक आंकड़ा 100 करोड़ से ऊपर न हो, इज्‍जत ही नहीं बनती है। सरकार बदली तो उम्‍मीद जगी कि शायद अब व्‍यवस्‍थाएं बदलें। लेकिन यह भी कोरी कल्‍पना साबित होती जा रही हैं।

भ्रष्‍टाचार अब भी बेलगाम है, हां यह कह सकते हैं कि अपनी पीठ थपथपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। विश्‍व की सबसे तेज उभरती हुई अर्थव्‍यवस्‍था की एक सचाई यह भी है कि यहां अब भी करोड़ों लोग गरीब और भूखे हैं। अशिक्षित और बेरोजगार हैं। जिनके पास पेट भरने को नहीं है। उनको सरकारों से मतलब नहीं होता है, उन्‍हें तो दो वक्‍त की रोटी की चिंता होती है।

बड़े बुजुर्गों में कहा है, 'भूखे भजन न होई गोपाला'। गलत नही है। मौसम की मार ने किसानों के सामने मुसीबत खड़ी कर दी है। देश के कई राज्‍यों में हजारों एकड़ फसल खेत में ही नष्‍ट हो गई है। न जाने कितने किसानों ने आत्‍महत्‍या कर ली है। सरकारों ने उनके जख्‍मों पर राहत का मरहम लगाने के स्‍थान पर महज कुछ सौ रुपए या कुछ हजार रुपए का मुआवजा रूपी झुनझुना थमा दिया है। एक राज्‍य में तो जिला कलेक्‍टर ने किसान की आत्‍महत्‍या का मजाक ही बना दिया।

अजब-गजब मध्‍यप्रदेश की तो बात ही क्‍या है। यहां की राजधानी भोपाल में वीआईपी क्षेत्रों में रहने वालों के लिए विशेष वाटर ट्रीटमेंट प्‍लांट लगाया गया है, ताकि मंत्री और नौकरशाह आरओ क्‍वालिटी का पानी नल से ही पी सकें। लेकिन उन लोगों की सुध कोई नहीं ले रहा है जो नदी में खड़े रहकर आंदोलन कर रहे हैं। एक तरफ खबरें छपती हैं कि राज्‍य का खजाना सस्‍ता हो चुका है और तनख्‍वाहों के अलावा कोई और भुगतान नहीं किया जा सकता है। तो दूसरी ओर रोज नई-नई घोषणाएं हो रही हैं। मजे की बात यह है कि घोषणाएं करने और पूरी होने का अनुपात अपने आप में एक शोध का विषय बन सकता है।

भ्रष्‍टाचार में तो सब एक से बढ़कर एक हैं। यदि फलाने ने ढिमाके पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लगाए तो ढिमाके ने उस पर कार्रवाई करने के बजाय फलाने के पाप गिनाना शुरू कर दिया। यानी लब्‍बोलुआब यह कि तुम्‍हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय।

सारा का सारा ध्‍यान केवल इस ओर है कि किस धर्म को कोसें और किसे अच्‍छा कहें। केंद्र में सत्‍ता परिवर्तन होते ही बचनवीर बुलंद हो गए हैं। आए दिन घर वापसी, लव जेहाद और नसबंदी जैसी बातें होने लगी हैं। क्‍या ऐसा करने से गरीब का पेट भर जाएगा। यदि कोई ईसाई अपना धर्म बदलकर हिंदू हो जाएगा, तो उसे रोजगार, रोटी और छत नसीब होगी। मेरी छोटी बुद्धि तो कहती है कि ऐसा शायद नहीं हो सकेगा।

हालांकि देवतातुल्‍य नेताओं की दृष्टि में ऐसा संभव हो सकता है, जो मेरी समझ में न आ रहा हो। लेकिन क्‍या करूं। आम इंसान जो ठहरा।

मेरे विचार से (शायद अधिकांश लोग इससे सहमत न हों) राजनीति को धर्म या पार्टी केंद्रित न होकर, जनकेंद्रित होना चाहिए। योजनाएं केवल बनाई न जाएं, उनको अमल में लाना भी सुनिश्चित किया जाए। शिक्षा की बात भर न की जाए, वाकई देश के अंतिम नागरिक तक उसे उपलब्‍ध कराया जाए। स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के लिए घोषणाएं भर न की जाएं, बल्कि उसे ऐसा बनाया जाए कि लोगों को सचमुच लाभ मिल सके।

चलिए एक विकल्‍प और बताता हूं। जनहित को यह सोचकर मत करिए कि इससे जनता का भला होगा। क्‍योंकि ऐसा सोचना भारत की राजनीतिज्ञों को शोभा नहीं देता है शायद। नेतागण यह सोचकर यह सब करें कि इससे उनका वोट बैंक मजबूत होगा। हां, शायद इस लालच में तो जनहित किया ही जा सकता है। बाकि देश और अभागी जनता का भाग्‍य। 

Saturday, October 25, 2014

सबके लिए मंगल है अंतरिक्ष अभियान?

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ‘विज्ञान से ही भूख और गरीबी की समस्या हल हो सकती है।‘ आज जब मंगलयान लाल ग्रह की कक्षा में प्रवेश करने जा रहा है और अमेरिका, चीन, जापान, रूस जैसे देश स्पेस मिशन्स पर अरबों रूपए खर्च कर रहे हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि इन अंतरिक्ष अभियानों की आम आदमी के लिए क्या उपयोगिता है?
भारत में अंतरिक्ष अभियान की शुरुआत करते समय डॉ. विक्रम साराभाई ने कहा था कि स्पेस साइंस और तकनीक का लाभ आम आदमी तक पहुंचना जरूरी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) में स्पेस विभाग के सचिव डॉ. के. राधाकृष्णन ने अपनी किताब ‘स्पेस टेक्नोलॉजी – बेनेफिट्स टू कॉमन मैन’ में लिखा है कि अंतरिक्ष में इसरो के 20 सेटेलाइट्स हैं, जो संचार, प्रसारण, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन, पर्यावरण की निगरानी, मौसम का पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन में सहायक साबित हो रहे हैं।
उनके मुताबिक, इन अंतरिक्ष यानों से हर देशवासी के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक लाभ हुए हैं, सूचना तकनीक के माध्यम से त्वरित फैसले संभव हुए हैं, प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लाखों लोगों की जिंदगियां बचाई गई हैं।
भारत के लिए अंतरिक्ष अभियान की कामयाबी आर्थिक दृष्टि से भी अहम है। इस समय दुनिया का स्पेस बाजार करीब 300 अरब डॉलर का है। इसमें सैटेलाइट प्रक्षेपण, उपग्रह बनाना, जमीनी उपकरण बनाना और सैटेलाइट ट्रैकिंग शामिल हैं। टेलीकम्युनिकेशन के साथ-साथ यह दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता कारोबार है। भारत ने कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर में सही समय से प्रवेश किया और आज दुनिया के लीडर हैं। स्पेस टेक्नॉलजी में भी हम सफलता हासिल कर सकते हैं। हमारा पीएसएलवी रॉकेट दुनिया के सबसे सफलतम रॉकेटों में एक है और उससे प्रक्षेपण कराना सबसे सस्ता पड़ता है।
पीने के पानी से लेकर मनोरंजन तक में फायदा

  • अस्सी के दशक में चुनिंदा शहरों में टीवी थे। आज लगभग हर घर में टीवी है और डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) तकनीक किसी क्रांति से कम नहीं है।
  • देश के करीब 70 हजार एटीएम इनसैट सैटेलाइट्स से कनेक्ट होकर ग्राहकों को बेहतर सेवाएं दे रहे हैं।
  • फिशिंग जोन में समय-समय पर एडवाइजरी जारी की जाती है। इससे हर जहाज हर साल औसतन पांच लाख रूपए का ईंधन बचाता है। देश में इस समय पचास हजार से ज्यादा मछली पकड़ने के जहाज संचालित हो रहे हैं।
  • सैटलाइट डेटा जमीन के अंदर पानी के संसाधनों का पता लगाने में बहुत कारगर साबित हुए हैं। राजीव गांधी पेयजल अभियान में इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। सैटेलाइट से मिले संकेतों के आधार पर तीन लाख कुएं खोदे गए। 95 फीसद में पानी निकला।
  • आज जीपीएस तकनीक आम बात हो चुकी है। जीपीएस की मदद से व्यक्ति तक राहत पहुंचाने के कई उदाहरण सामने हैं।

इनसान के स्पेस में जाने के बड़े कारण
अंतरिक्ष अभियानों की वकालत करने वालों से आमतौर पर पूछा जाता है कि जब धरती पर समस्याओं का अंबार लगा है तो दूसरे ग्रहों पर क्या चल रहा है, यह जानने के लिए हम अरबों रुपए क्यों खर्च करें? UniverseToday वेबसाइट ने यह सवाल अंतरिक्ष वैज्ञानिकों से पूछा, जो श्रेष्ठ जवाब मिले, वे इस प्रकार हैं :

धरती नष्ट हुई तो भी जिंदा रह सकेंगे : वर्तमान में जीवन सिर्फ धरती पर संभव है। यदि धरती को कुछ हो गया, मसलन- कोई विशाल ग्रह टकरा जाए, परमाणु युद्ध हो जाए, या प्राकृतिक आपदा सबकुछ बर्बाद कर जाए तो इनसान कहां जाएगा। दूसरे ग्रह पर जीवन तलाश लिया जाए, इसमें मानव जाति की भलाई है। चंद्रमा और मंगल पर जीवन मिलता है तो यह मानव जाति तथा धरती पर उसकी उपलब्धियों का बीमा होगा।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा : अपोलो मिशन की कामयाबी के बाद दुनियाभर के युवाओं में गणित तथा विज्ञान में करियर बनाने को लेकर जागरूकता बढ़ी है। समाज में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में यह जरूरी है कि नई पीढ़ी हमेशा कुछ नया करने को लेकर सोचती रहे। अंतरिक्ष मिशन जारी रहेंगे तो यह प्रेरणा कायम रहेगी।
दुनिया को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे : सभी अंतरिक्ष अभियानों का उद्देश्य ब्रह्मांड को समझना है। जीवन कैसे शुरू हुआ, ब्रह्मांड कैसे अस्तित्व में आया, क्या सिर्फ धरती पर ही जीवन संभव है...ऐसे सवालों के पुख्ता जवाब नई पीढ़ी को दे पाएंगे। बुध और मंगल ग्रह के अध्ययन से पता चलता है कि ग्रहों पर कितनी तेजी से परिस्थितियां बदल सकती हैं।
धन की बर्बादी नहीं : एक बड़ा तबका मानता है कि स्पेस मिशन्स धन की बर्बादी है, लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि सरकार जो धन आवंटित करती है, उससे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का वेतन दिया जाता है। वे अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरे ग्रहों पर जाते हैं।
नई तकनीक : अंतरिक्ष अभियानों के तहत दुनिया भर के जानकार लोग साथ काम कर रहे हैं। इस तरह इनसानों से जुड़ी सामान्य समस्याओं पर किए गए शोध बहुत कामयाब रहे हैं। हेल्दी बेबी फूड से लेकर कैंसर का पता लगाने की नई तकनीक और दूर जा रही गोल्फ की बॉल पर नजर रखने तक की तकनीक का संबंध स्पेस टेक्नोलॉजी से है।
एकता का संदेश : दुनियाभर के अंतरिक्ष अभियानों से यह संदेश मिलता है कि मानव जाति की बेहतरी के लिए सभी को मिलकर कार्य करना चाहिए। आज विभिन्न देशों के अंतरिक्ष वैज्ञानिक साथ काम करते हैं, अपनी उपलब्धियों को एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं।
एक पहलू यह भी
भारत : हमारा उद्देश्य जीवन की तलाश अमेरिका का अंतरिक्ष यान मावेन मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश कर चुका है। इसका मुख्य उद्देश्य लाल ग्रह के ऊपरी पर्यावरण, आयनमंडल, सूर्य और वहां से आ रही गर्म हवाओं के संबंध का पता लगाना है। वहीं भारतीय यान लाल ग्रह पर मिथेन की मौजूदगी का पता भी लगाएगा। इसरो स्पेस एप्लिकेशन सेंटर के सहायक निदेशक एएस किरण कुमार के मुताबिक, यदि मंगल ग्रह पर मिथेन की मौजूदगी के प्रमाण मिलते हैं तो वहां जीवन की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। मंगलवाय पर जो मिथेन सेंसर लगा है जो किरण कुमार ने ही बनाया है। इस तरह वहां बस्तियां बसाने का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा।
अमेरिका : दुनिया पर राज करने की मंशा अमेरिका ने हाल में कुछ ऐसे प्रयोग किए हैं, जिन्हें भविष्य के अंतरिक्ष हथियार के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिकी वायुसेना के एक्स-37बी रोबोटिक स्पेस प्लेन के परीक्षण और डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी के प्रोटोटाइप एचटीवी-3 ग्लाइडर के असफल परीक्षण को इसी श्रेणी में रखा जा रहा है। अमेरिका ने उपग्रहों को नष्ट करने वाली मिसाइलों का भी परीक्षण किया है। इस तरह कुछ देश अमेरिका के स्पेस प्रोग्राम को शक की निगाहों से देखते हैं। उनका कहना है कि अमेरिका दुनिया पर राज करना चाहता है।
चीन : सब्जियों के बहाने चांद पर मिसाइल बेस! चीन ने दावा किया था कि वह अंतरिक्ष में सब्जियां उगाएगा। हालांकि डेली मेल में छपी एक खबर के मुताबिक, वह चंद्रमा पर मिसाइल बेस बनाने की कोशिश कर रहा है। चीन के लुनार एक्सप्लोरेशन सेंटर के एक विशेषज्ञ के मुताबिक, इस तरह धरती के किसी भी कौन में हमला किया जा सकेगा। चीन की इस कवायद को स्टार वार्स फिल्म के डेथ स्टार से जोड़कर देखा जा रहा है।

Monday, September 15, 2014

हमेशा के लिए थम जाएगी 'देश की धड़कन' एचएमटी

90 के दशक तक आम लोगों के लिए हाथ घड़ी का मतलब केवल एचएमटी हुआ करता था। लेकिन पिछले 20-25 वर्षों से मानो यह नाम कहीं खो गया है। पचास वर्षों तक लोगों की कलाई पर सजने वाली यह घड़ी अब इतिहास में दर्ज होने जा रही है।

भारत सरकार का भारी उद्योग और सार्वजनिक उद्यम विभाग अब इस कंपनी को बंद करने के आदेश पर अंतिम मुहर लगाने जा रहा है। विभाग का कहना है कि एचएमटी पिछले एक दशक से भी ज्‍यादा समय से नुकसान में जा रही है।

नुकसान के लिए जिम्‍मेदार

एचएमटी ने 1961 में देश में घड़ि‍यों का उत्‍पादन शुरू किया था। इसके लिए कंपनी ने जापानी की घड़ी निर्माता कंपनी सिटीजन से अनुबंध किया था। 1970 में एचएमटी ने सोना और विजय ब्रांड नाम के साथ क्‍वार्ट्ज घड़ि‍यों का निर्माण भी शुरू किया था।

लेकिन यह कंपनी का यह कदम समय से काफी पहले लिया गया निर्णय साबित हुआ। दरअसल, उस दौर में भारत में महंगी घड़ि‍यों के चुनिंदा खरीदार ही होते थे। इसलिए कंपनी का यह प्रयोग घाटे का सौदा साबित हुआ। जल्‍द ही कंपनी को अपनी गलती का अहसास हुआ और एचएमटी ने दोबारा मैकेनिकल घड़ि‍यों का उत्‍पादन शुरू कर दिया।

1987 में दूसरी निजी कंपनियों ने भारतीय बाजार में क्‍वार्ट्ज घड़ि‍यों को बेचना शुरू कर दिया। तब तक एचएमटी का पूरा ध्‍यान केवल मैकेनिकल घड़ि‍यों पर ही था और इसी के संयंत्र लगाए जा रहे थे।

देश की एक नामी घड़ी निर्माता कंपनी के प्रबंध संचालक भास्‍कर भट्ट के अनुसार एचएमटी के पास सफलता की सारी कुंजियां थी। उनके पास ऐसे इंजीनियर्स की फौज थी, जो बेहतरीन तकनीक वाली घड़ि‍यां बनाना जानते थे। उनका रिटेल नेटवर्क, सर्विस और वितरण तंत्र भी काफी मजबूत था। हालांकि प्रबंधकीय कमियों के चलते उनकी इस फौज के कई सिपाही दूसरी कंपनियों से जुड़ते चले गए।

भट्ट का कहना है कि एचएमटी की स्थिति रॉयल एनफील्‍ड मोटरसाइकिल की तरह है। इसकी छवि देश की क्‍लासिक घड़ी निर्माता कंपनी की है। देश की कई पीढ़ि‍यों ने एचएमटी की घड़ि‍यां पहनी हैं। इसलिए यदि यह कंपनी दोबारा बाजार में आती है तो लोग जरूर हाथों हाथ लेंगे।


  • लगभग ढाई दशक पहले तक परीक्षा में पास होने पर माता-पिता अपने बच्‍चों के तोहफे में एचएमटी की घड़ि‍यां देते थे।
  • शादियों में दूल्‍हे को घड़ी खासतौर पर एचएमटी देने का रिवाज था।
  • दफ्तरों से रिटायर होने वाले कर्मियों को भी स्‍मृति चिन्‍ह के रूप में इसी ब्रांड की घड़ी दी जाती थी।

भारत के कलाई घड़ी बाजार में 1991 तक एचएमटी का एकतरफा बोलबाला था। तीन दशकों तक भारत में घड़ी का मतलब एचएमटी हुआ करता था और यही वजह थी कि कंपनी ने अपनी टैगलाइन 'देश की धड़कन' रखी थी। 1993 में आर्थिक सुधारों के दौर में भारतीय बाजारों को दुनिया के लिए खोल दिया गया और यहीं से एचएमटी का बुरा वक्‍त शुरू हुआ।

घड़ी से फैशन तक

विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते समय के साथ एचएमटी बदल नहीं सकी। कंपनी ने यह समझने में देर कर दी कि घड़ी अब, केवल वक्‍त देखने के लिए नहीं, बल्कि फैशन के लिए भी पहनी जाती है।

एचएमटी के पूर्व सीएमडी एन रामानुजन के अनुसार के 1990 तक को सबकुछ ठीक था। इसके बाद कंपनी की श्रीनगर स्थित फैक्‍टरी बंद हो गई और 500 कर्मचारियों को बिना काम के ही तनख्‍वाहें देनी पड़ीं, जिससे एचएमटी की माली हालत खराब होने लगी। यहीं से बुरे वक्‍त की शुरुआत मानी जा सकती है। कंपनी ने सरकार के सामने कई योजनाएं रखीं, लेकिन उन्‍हें नहीं माना गया और घाटा बढ़ता चला गया।

वित्‍तीय वर्ष 2013-14 में कंपनी का घाटा बढ़कर 233.08 करोड़ रुपए हो गया था, जो 2012-13 में 242.47 करोड़ था।

एक नजर कंपनी की शुरुआत पर


  • एचएमटी (हिंदुस्‍तान मशीन टूल्‍स) की स्‍थापना 1961 में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कहने पर की गई थी।
  • उस वक्‍त घड़ी ब्रांड का नाम जनता रखा गया था, जिसने अपने उत्‍पादन काल में 115 मिलियन से भी ज्‍यादा घड़ि‍यों का उत्‍पादन किया था।
  • कंपनी मैकेनिकल घड़ी, क्‍वार्ट्ज घड़ी, महिलाओं के लिए कलाई घड़ी, ऑटोमैटिक घड़ी और ब्रेल घड़ी का उत्‍पादन करती थी।
  • कंपनी की इकलौती घड़ी उत्‍पादन फैक्‍टरी कर्नाटक के तुमकुर में है, जिसकी प्रति वर्ष उत्‍पादन क्षमता 20 लाख घड़ि‍यां थीं।
  • एचएमटी की कंचन घड़ी का बाजार मूल्‍य 700 रुपए था, जबकि चोर बाजार में उसे 1000 रुपए तक में बेचा जाता था।

Friday, August 8, 2014

क्‍यों हुआ था ब्रिटिश भारत का बंटवारा

अगस्‍त 1947 से लगातार हर वर्ष दक्षिण एशिया के दो देश, भारत और पाकिस्‍तान अपना स्‍वतंत्रता दिवस मनाते हैं। 14 अगस्‍त को पाकिस्‍तान में यौम-ए-आजादी मनाई जाती है तो अगले दिन 15 अगस्‍त को भारत में स्‍वतंत्रता दिवस की धूम रहती है। लेकिन एक सवाल ऐसा है जो आज के युवाओं के मन-मस्तिष्‍क में रह-रहकर उठना चाहिए, वह यह है कि आखिर किन वजहों से भारत को दो (पूर्वी पाकिस्‍तान को मिलाकर 3) हिस्‍सों में बांट दिया।
बंटवारे को लेकर हमें जो ज्ञान किताबों और टीवी से मिलता है, वह यह है कि अंग्रेजों ने भारत से अपनी हुकूमत खत्‍म करने के पहले यह कदम उठाया था। इस बंटवारे की वजह से एक करोड़ से भी ज्‍यादा लोगों को अपनी-अपनी मातृभूमि छोड़कर जाना पड़ा था और आधिकारिक रूप से एक लाख से ज्‍यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था।
ब्रिटिश हुकूमत में मुस्लिम बाहुल्‍य क्षेत्र को पाकिस्‍तान और हिंदुओं के आधिक्‍य वाले क्षेत्र को भारत घोषित किया था। हालांकि माना तो यह भी जाता है कि इस बंटवारे के पीछे राजनीतिक महत्‍वकांक्षा सबसे बड़ी वजह थी। ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के अभिलेखों के मुताबिक भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के शीर्ष नेतृत्‍व की जिद के चलते बंटवारा किया गया और भारत और पाकिस्‍तान नाम से दो देश बनाए गए। इसमें से एक देश जिसे पूर्वी पाकिस्‍तान या पूर्वी बंगाल कहा जाता था (अब बांग्‍लादेश) वह पश्चिमी पाकिस्‍तान से 1700 किलोमीटर दूर था। इस तरह से कहा जाए तो धर्म के आधार पर भारत के तीन टुकड़े हुए थे।
यह संभव है कि मुस्लिम लीग के नेता मोहम्‍मद अली जिन्‍ना की यह ख्‍वाहिश रही हो कि मुस्लिमों को एक अलग आजाद देश दे दिया जाए, जहां वो अपने मुताबिक रह सकें। हालांकि पाकिस्‍तान का विचार सन 1930 से पहले तक अस्तित्‍व में ही नहीं था। दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद आर्थिक रूप से जीर्ण होने पर ब्रिटिश सरकार ने यह तय किया कि भारत में औपनिवेश बनाए रखना अब उनके लिए फायदे का सौदा नहीं रह गया है। रही सही कसर तब पूरी हो गई, जब ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी, जिसने यह तय किया था कि 1948 तक भारत की सत्‍ता भारतीयो के हाथ में दे दी जाएगी। हालांकि इस पर अमल एक वर्ष पहले ही हो गया और वो भी आनन-फानन में।
ब्रिटिश सरकार ने जल्‍द से जल्‍द वो भारत से अपना बोरिया बिस्‍तर समेटनी की योजना बनाई और जल्‍दबाजी में बिना नतीजों की परवाह किए भारत का बंटवारा कर पाकिस्‍तान बना दिया गया।
आपको जानकर हैरत होगी कि 14 अगस्‍त 1947 को पाकिस्‍तान में आजादी का जश्‍न और भारत 15 अगस्‍त को भारत में स्‍वतंत्रता दिवस मनाया गया। लेकिन दोनों देशों के बीच सीमा रेखा का निर्धारण 17 अगस्‍त 1947 को किया गया। ब्रि‍टेन के वकील साइरिल रेडक्लिफ ने भारत और पाकिस्‍तान के बीच सीमा का निर्धारण किया था। उन्‍हें भारतीय परिस्थितियों की थोड़ी बहुत समझ थी। उन्‍होंने कुछ पुराने जर्जर नक्‍शों पर उन्‍होंने इस सीमा को तय किया था। बंटवारे की लकीर को खींचने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा 1940 में कराई गई जनगणना को आधार बनाया गया था। इसी से यह स्‍पष्‍ट होता है कि देश का बंटवारा किस कदर जल्‍दबाजी में किया गया होगा।
वहीं भारत के अंतिम वायसराय लुईस माउंटबेटन ने भी महत्‍वपूर्ण मसलों पर विमर्श किए बगैर ही ब्रिटिश शासन के अंत की घोषणा कर दी थी।
दुनिया के कई देशों ने भारत के बंटवारे पर आश्‍चर्य जाहिर किया था। यह सवाल भी उठे थे कि आखिर इस काम को बिना नतीजों का अनुमान लगाए हुए, जल्‍दबाली में क्‍यों किया गया। इसका जवाव भी भारत में ही छिपा हुआ है। दरअसल, 1947 से कुछ वर्ष पहले से ही ब्रिटिश हुकूमत को यह आभास होने लगा था कि उनके लिए भारत पर राज करना अब महंगा साबित हो रहा है। दूसरे विश्‍य युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति बदतर हो रही थी। अंग्रेजी नेताओं को अपने ही देश में ही जवाब देना भारी पड़ रहा था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी सेना की 55 बटालियनों को तैनात करने की वजह से दंगे भड़क गए थे। इसके बाद अलावा खाद्यान्‍न संकट, सूखा और बढ़ती बेरोजगारी ने अंग्रेजों के लिए भारत पर राज करना महंगा सौदा बना दिया था। 1942 के बंगाल के अकाल के बाद अंग्रेजों ने भारत में राशन प्रणाली शुरू कर दी थी। इससे भी भारतीय जनता में आक्रोश बढ़ गया था।
उस वक्‍त तक अंग्रेजों की तरफदारी करने वाली मुस्लिम लीग का मोह भी उनसे भंग हो गया था। 16 अगस्‍त 1947 को मोहम्‍मद अली जिन्‍ना ने डायरेक्‍ट एक्‍शन डे कहा था। उनकी मांग थी कि मुस्लिमों के लिए पाकिस्‍तान नाम से एक अलग मुल्‍क घोषित किया जाए। इस मांग ने जोर पकड़ा तो पूरा उत्‍तर भारत दंगे की आग में जल उठा। हजारों-हजार लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। इस दंगे से ब्रिटिश हुकूमत की बंटवारे की योजना को बल मिल गया। उन्‍होंने यह तय किया कि हिंदू और मुस्लिम एक ही देश में मिलकर नहीं रह सकेंगे, इसलिए मुल्‍क का बंटवारा जरूरी है। जबकि सच यह था कि राजनीतिक नियंत्रण और पर्याप्‍त सैन्‍य बल न होने की वजह से दंगे फैले थे।
पंजाब और सिंध प्रांत में रहने वाले मुस्लिम भी पाकिस्‍तान के पक्षधर थे। दरअसल इस क्षेत्र में उन्‍हें हिंदु व्‍यापारियों से प्रतिस्‍पर्धा करनी पड़ती थी। इसलिए मुल्‍क के बंटवारे से उनकी यह समस्‍या खत्‍म होने वाली थी। वहीं पूर्वी पाकिस्‍तान (अब बांग्‍लादेश) के लोग भी गैर-मुस्लिम सूदखोरों के चंगुल से आजाद होना चाहते थे। हालांकि बंटवारे से सबसे ज्‍यादा व्‍यावसायिक फायदा भारत को ही हुआ। देश की आर्थिक तरक्‍की में 90 फीसदी भागीदारी वाले शहर और उद्योग भारत के हिस्‍से में ही थे। इसमें दिल्‍ली, मुंबई और कलकत्‍ता जैसे बड़ शहर भी शामिल थे। वहीं पाकिस्‍तान की अर्थव्‍यवस्‍था कृषि आधारित थी, जिस पर प्रभावशाली लोगों का एकाधिकार था।

Saturday, January 25, 2014

किस करवट बैठेगा 'आप' का ऊंट

आम आदमी पार्टी यानी 'आप' ने बहुत ही कम वक्त में वो शोहरत और कामयाबी हासिल की है, जो अब तक देश में किसी भी दूसरी पार्टी को नहीं मिली है। अपने गठन के महज एक वर्ष के अंदर उन्होंने दिल्ली के राज्य विधान सभा चुनावों में अप्रत्याशित जीत हासिल की, समर्थन से ही सही दिल्ली में सरकार भी बनाई। इसके बाद शुरू हुआ विवादों का सिलसिला, जो अब तक जारी है।
दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की वजह से पार्टी को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। दिल्ली सरकार ने दो पुलिसवालों के तबादले तथा निलंबन को लेकर सड़क पर आंदोलन किया। केंद्र सरकार के साथ सीधे आमना सामना भी हुआ, लेकिन अंततोगत्वा जीत केंद्र सरकार ही हुई।
केंद्रीय गृह मंत्रालय पुलिसवालों को छुट्टी पर भेज दिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपना धरना वापस ले लिया। दिल्ली के मुख्यमंत्री के इस कदम से यह तो स्पष्ट हो गया कि उनके पास प्रशासनिक अनुभव और दृष्ट‍ि की कमी है। दिल्ली में बिजली के दाम करने का उनका फैसला भी सराहा नहीं जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। शुक्रवार को एक टीवी चैनल से बातचीत में पार्टी के शीर्ष नेता योगेंद्र यादव ने भी यह तो मान ही लिया कि उनकी पार्टी की सरकार के कुछ फैसले अनुभवहीनता की वजह से हुए हैं। यहां तक कि उनके मंत्रियों के बड़बोलेपन का खामियाजा भी पार्टी को ही उठाना पड़ रहा है। दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर जो आरोप लगे हैं, पार्टी उनपर ध्यान नहीं दे रही है। उलटा मीडिया के बिकाऊ होने की बात कही जा रही है।
पार्टी जिस तेजी से आगे बढ़ी है, संभव है उसी तेजी से उसकी ख्याति में सेंध भी लगे। दरअसल खुद को पाक साफ बताने वाली आम आदमी पार्टी की सदस्यता हासिल करना कठिन नहीं है। इसलिए इससे कोई भी शख्स जुड़ सकता है। पार्टी ने बताया कि उसके सदस्यों की संख्या का आंकड़ा 50 लाख तक पहुंच चुका है। इस आंकड़े के साथ ही विवादों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। कुछ दिनों पहले ही खबर आई थी, कि किसी ने दाऊद इब्राहिम के नाम से भी पार्टी की सदस्यता हासिल कर ली थी।
कहने का मतलब यह है कि पार्टी का सदस्य बनना काफी आसान है और कोई भी बन सकता है। लेकिन डर सिर्फ इस बात का है कि अपराधियों से लेकर हर वो आदमी पार्टी का सदस्य बन सकता जो विवादास्पद है। 'आप' की विरोधी पार्टियां भी अपने लोगों को पार्टी में शामिल करा सकती हैं ताकि पार्टी के अंदर अराजकता फैला सके। नई पार्टी के लिए ये सब चीजें एक गंभीर समस्या पैदा कर सकती हैं।
पार्टी के पास नए सदस्यों के बारे में जानकारी जुटाने का कोई तंत्र या व्यवस्था नहीं है। आम आदमी पार्टी के गठन के वक्त अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी पार्टी में केवल उन्हीं लोगों को शामिल किया जाएगा, जो पाक-साफ होंगे। यह कहा जा सकता है कि 'आप' एक फैशन भी बन गया है। लोगों को आम आदमी पार्टी ज्वॉइन करने और मैं हूं आम आदमी लिखी हुई टोपी पहनने में मजा आने लगा है। स्पष्ट नीतियों के अभाव में 'आप' के नाम पर अराजकता भी फैल रही है। कुछ दिनों पहले ही बिहार में कुछ लोगों ने आप के नाम पर हुड़दंग मचाया था। बाद में पता चला था कि आम आदमी पार्टी से उनको कोई लेनदेन नही था।
केवल स्वयंसेवकों के बूते पर आखिर यह पार्टी कब तक चलेगी। अगर भारत के राजनीतिक पटल पर इन्हें अपनी छाप छोड़नी है और वाकई बदलाव लाना है तो कई गंभीर और दूरगामी फैसले लेने होंगे। आम आदमी पार्टी से इन्हें ऐसे लोगों को भी जोड़ना होगा जो राजनीति को कीचड़ मानते हैं और इससे दूर ही रहना चाहते हैं। पेशेवरों को अपने साथ जोड़ना होगा तथा गुटबाजी फैलाने वालों एवं खुद को मठाधीश समझने वालों से पार पाना होगा।

किस करवट बैठेगा 'आप' का ऊंट

आम आदमी पार्टी यानी 'आप' ने बहुत ही कम वक्त में वो शोहरत और कामयाबी हासिल की है, जो अब तक देश में किसी भी दूसरी पार्टी को नहीं मिली है। अपने गठन के महज एक वर्ष के अंदर उन्होंने दिल्ली के राज्य विधान सभा चुनावों में अप्रत्याशित जीत हासिल की, समर्थन से ही सही दिल्ली में सरकार भी बनाई। इसके बाद शुरू हुआ विवादों का सिलसिला, जो अब तक जारी है।
दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की वजह से पार्टी को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। दिल्ली सरकार ने दो पुलिसवालों के तबादले तथा निलंबन को लेकर सड़क पर आंदोलन किया। केंद्र सरकार के साथ सीधे आमना सामना भी हुआ, लेकिन अंततोगत्वा जीत केंद्र सरकार ही हुई।
केंद्रीय गृह मंत्रालय पुलिसवालों को छुट्टी पर भेज दिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपना धरना वापस ले लिया। दिल्ली के मुख्यमंत्री के इस कदम से यह तो स्पष्ट हो गया कि उनके पास प्रशासनिक अनुभव और दृष्ट‍ि की कमी है। दिल्ली में बिजली के दाम करने का उनका फैसला भी सराहा नहीं जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। शुक्रवार को एक टीवी चैनल से बातचीत में पार्टी के शीर्ष नेता योगेंद्र यादव ने भी यह तो मान ही लिया कि उनकी पार्टी की सरकार के कुछ फैसले अनुभवहीनता की वजह से हुए हैं। यहां तक कि उनके मंत्रियों के बड़बोलेपन का खामियाजा भी पार्टी को ही उठाना पड़ रहा है। दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर जो आरोप लगे हैं, पार्टी उनपर ध्यान नहीं दे रही है। उलटा मीडिया के बिकाऊ होने की बात कही जा रही है।
पार्टी जिस तेजी से आगे बढ़ी है, संभव है उसी तेजी से उसकी ख्याति में सेंध भी लगे। दरअसल खुद को पाक साफ बताने वाली आम आदमी पार्टी की सदस्यता हासिल करना कठिन नहीं है। इसलिए इससे कोई भी शख्स जुड़ सकता है। पार्टी ने बताया कि उसके सदस्यों की संख्या का आंकड़ा 50 लाख तक पहुंच चुका है। इस आंकड़े के साथ ही विवादों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। कुछ दिनों पहले ही खबर आई थी, कि किसी ने दाऊद इब्राहिम के नाम से भी पार्टी की सदस्यता हासिल कर ली थी।
कहने का मतलब यह है कि पार्टी का सदस्य बनना काफी आसान है और कोई भी बन सकता है। लेकिन डर सिर्फ इस बात का है कि अपराधियों से लेकर हर वो आदमी पार्टी का सदस्य बन सकता जो विवादास्पद है। 'आप' की विरोधी पार्टियां भी अपने लोगों को पार्टी में शामिल करा सकती हैं ताकि पार्टी के अंदर अराजकता फैला सके। नई पार्टी के लिए ये सब चीजें एक गंभीर समस्या पैदा कर सकती हैं।
पार्टी के पास नए सदस्यों के बारे में जानकारी जुटाने का कोई तंत्र या व्यवस्था नहीं है। आम आदमी पार्टी के गठन के वक्त अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी पार्टी में केवल उन्हीं लोगों को शामिल किया जाएगा, जो पाक-साफ होंगे। यह कहा जा सकता है कि 'आप' एक फैशन भी बन गया है। लोगों को आम आदमी पार्टी ज्वॉइन करने और मैं हूं आम आदमी लिखी हुई टोपी पहनने में मजा आने लगा है। स्पष्ट नीतियों के अभाव में 'आप' के नाम पर अराजकता भी फैल रही है। कुछ दिनों पहले ही बिहार में कुछ लोगों ने आप के नाम पर हुड़दंग मचाया था। बाद में पता चला था कि आम आदमी पार्टी से उनको कोई लेनदेन नही था।
केवल स्वयंसेवकों के बूते पर आखिर यह पार्टी कब तक चलेगी। अगर भारत के राजनीतिक पटल पर इन्हें अपनी छाप छोड़नी है और वाकई बदलाव लाना है तो कई गंभीर और दूरगामी फैसले लेने होंगे। आम आदमी पार्टी से इन्हें ऐसे लोगों को भी जोड़ना होगा जो राजनीति को कीचड़ मानते हैं और इससे दूर ही रहना चाहते हैं। पेशेवरों को अपने साथ जोड़ना होगा तथा गुटबाजी फैलाने वालों एवं खुद को मठाधीश समझने वालों से पार पाना होगा।

Friday, January 3, 2014

उफ्फ ये आलीशान सादगी

आम आदमी पार्टी यानी आप ने भ्रष्टाचार हटाने और सुशासन लाने के नाम पर खूब प्रचार किया और उन्हें इसका फल भी मिला। दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्हें अप्रत्याशित जीत हासिल हुई और पंद्रह वर्षों से सत्ता पर काबिज कांग्रेस पार्टी पर झाड़ू फिर गई। काफी उठा पटक के बाद अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाने की हामी भरी और कांग्रेस पार्टी ने समर्थन भी दिया।
इसके बाद सादगी के ओवरडोज से भरे भाषणों का दौर शुरू हुआ। लालबत्ती, सरकारी गाड़ी और बंगला न लेने की घोषणाओं की बाढ़ आ गई। दिल्ली विधानसभा के सत्र के पहले दिन सादगी दिखाई भी दी। क्योंकि कोई ऑटो से पहुंचा था तो कोई रिक्शे से। हालांकि यह सादगी का चोला केवल छह दिन में ही उतर गया।
अरविंद केजरीवाल जल्द ही दस कमरों के फ्लैट में रहने के लिए जाने वाले हैं। इतना ही नहीं उनके मंत्रिमंडल के साथी भी वीआईपी नंबरों वाले एसयूवी वाहनों में सचिवालय पहुंचने लगे। तिस पर मनीष सिसोदिया का तर्क कि उनकी पार्टी ने लालबत्ती न लेने की बात कही थीं और बंगलों में न रहने की बात की थी। बिना लालबत्ती की कार और सरकारी फ्लैट में तो रहना जायज बताया।
एक क्षेत्रीय कहावत में इसे गुड़ खाना और गुलगुले से परहेज करना भी कहा जाता है। आम आदमी पार्टी के उदय के साथ लोगों ने काफी उम्मीदें बनाई हैं। लेकिन यह कब तक कायम रहेगी यह कहना मुश्किल लग रहा है। अगर इसे सादगी कहते हैं तो फिर ममता बनर्जी और मानिक सरकार को क्या कहेंगे। लाल बहादुर शास्त्री और महात्मा गांधी को क्या कहेंगे।

Friday, November 29, 2013

पत्रकार या पैसा जुगाड़ने में माहिर व्यवसायी?

अभी तक आप तरुण तेजपाल को तहलका डॉट कॉम और तहलका पत्रिका के संस्थापक, प्रखर पत्रकार और चिंतक के रूप में ही जानते आए हैं। लेकिन आपको यह जानकारी नहीं है कि पत्रकारिता के साथ-साथ तरुण का व्यावसायिक सम्राज्य कितना फैला हुआ है या नियम विरुद्ध उन्होंने कहां-कहां जमीनें खरीद रखी हैं?

क्या आपको पता है कि तरुण तेजपाल की कम से कम आठ कंपनियों में और उनकी बहन नीना तेजपाल शर्मा की चार कंपनियों में हिस्सेदारी है? इनमें से अधिकांश कंपनियां पिछले दो सालों से नुकसान उठा रही हैं, फिर भी निवेशक इनमें पैसा लगाना क्यों व कैसे जारी रखे हुए हैं?

जिन निवेशकों ने तरुण तेजपाल की कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदी है, उन्होंने यह खरीदी बाजार भाव से काफी ज्यादा कीमत पर की है और नुकसान होने पर भी अपनी हिस्सेदारी नहीं बेची, क्यों व कैसे? यह 'क्यों व कैसे" बड़े सवाल बनकर सामने आते हैं, जब हमें पता चलता है कि पिछले साल मारे गए उत्तर प्रदेश के कुख्यात शराब माफिया पोंटी चड्ढा की कंपनी के साथ भी तेजपाल के व्यावसायिक संबंध थे और शायद आज भी हैं।

कंपनियां और तरुण की हिस्सेदारी

थिंकवर्क्स प्रायवेट लिमिटेड : 80 प्रतिशत
तहलका डॉट कॉम : 1.99 प्रतिशत
अनंत मीडिया प्रायवेट लिमिटेड : 19.25 प्रतिशत
एओडी लॉज्स प्रायवेट लिमिटेड : 50 प्रतिशत
चेस्टनट हाइट्स रिसोर्ट्स प्रायवेट लिमिटेड : 25 प्रतिशत
अमरमान इंडिया प्रायवेट लिमिटेड : 70 प्रतिशत
थ्राइविंग आर्ट्स प्रायवेट लिमिटेड : 80 प्रतिशत
एडर आर्ट्स प्रायवेट लिमिटेड : 0.02 प्रतिशत
अनंत मीडिया प्रालि. : राज्यसभा सांसद का पैसा

साप्ताहिक समाचार पत्रिका तहलका का प्रकाशन करने वाली इस कंपनी में तरुण तेजपाल की 19.25 फीसद हिस्सेदारी है। वित्त वर्ष 2011-12 में इस कंपनी को 13 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। इसमें 65.75 फीसद हिस्सेदारी रखने वाली कंपनी रॉयल बिल्डिंग एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर के 50 फीसद शेयर राज्यसभा सांसद केडी सिंह की कंपनी के पास हैं, जो बकौल उनके, सिर्फ व शुद्ध रूप से व्यावसायिक मकसद से खरीदे गए।

वर्ष 2011-12 के पहले अनंत मीडिया में केडी सिंह की कंपनी की हिस्सेदारी 30 फीसद थी, जिसे बाद में बढ़ाया गया और प्रीमियम पर 25.39 करोड़ रुपए में तेजपाल की कंपनी के शेयर खरीदे गए। यही नहीं, रॉयल बिल्डिंग एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर ने वर्ष 2011-12 में अनंत मीडिया को 19.6 करोड़ रुपए अनसिक्योर्ड लोन के रूप में भी दिए।

पोंटी चड्ढा का पैसा
पिछले साल अपने ही भाई के हाथों मारे गए उत्तर प्रदेश के कुख्यात शराब माफिया पोंटी चड्ढा की कंपनी वेव इंडस्ट्रीज ने भी तेजपाल की एक कंपनी थ्राइविंग आर्ट्स प्रालि. में पैसा लगाया। यह कंपनी वित्त वर्ष 2011-12 में ही खड़ी की गई थी और तेजपाल के एलीट आर्ट एंड डिनर क्लब 'प्रूफ्रॉक" की मालिक है।

चड्ढा ने कंपनी में 11,111 शेयर 1,800 रुपए प्रति शेयर की कीमत पर खरीदे यानी 1.999 करोड़ रुपए लगाए, जबकि इन शेयरों का अंकित मूल्य 10 रुपए प्रति शेयर था। सवाल उठता है कि चड्ढा ने इतनी ज्यादा कीमत पर हिस्सेदारी क्यों खरीदी, जबकि न तो तेजपाल की कंपनी के शेयरों को लेकर मारा-मारी थी और न ही उनकी कंपनियां मुनाफा कमा रही थीं।

फिर चड्ढा ने घाटे वाले समूह में पैसा क्यों लगाया? मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक हालांकि चड्ढा मारा गया, लेकिन उसके बेटे ने अपने पिता के सभी व्यावसायिक करारों को निभाने की इच्छा जताई है।

थिंकफेस्ट की कर्ताधर्ता कंपनी मुनाफे में कैसे
तरुण की ही कंपनी थिंकवर्क्स प्रालि. गोआ में होने वाले 'थिंकफेस्ट' का आयोजन करती है। सिर्फ यही कंपनी है, जो मुनाफे में है। थिंकवर्क्स को सबसे पहले बबलर बुक्स के नाम से फरवरी 2010 में खड़ी की गई थी।
इसमें तरुण तेजपाल की 80 फीसद हिस्सेदारी है, जबकि तेजपाल की बहन नीना तेजपाल शर्मा व तहलका की अभी तक मैनेजिंग एडिटर रही शोमा चौधरी के पास 10-10 फीसद हिस्सेदारी है। पहले साल यानी 2011-12 में इस कंपनी ने थिंकफेस्ट से कोई मुनाफा नहीं कमाया, जबकि पिछले साल इसे 1.99 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ।

इस साल थिंकफेस्ट 2013 का आयोजन बड़े पैमाने पर व फाइव स्टार होटल में किया गया, जिसमें रॉबर्ट डी नीरो, अमिताभ बच्चन, जावेद अख्तर समेत देश व दुनिया से बड़ी-बड़ी हस्तियां शामिल हुईं। यह भी गौर करने वाली बात है कि इस साल के इवेंट को कम से कम 34 बड़े कॉर्पोरेट दिग्गजों व सरकारी कंपनियों ने सह प्रायोजित किया।

इनमें भारती एयरटेल, एस्सार, डीएलएफ, कोका-कोला, यूनिटेक, वेव इंडस्ट्रीज, टोयोटा, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स, इंडसइंड बैंक व गोआ टूरिज्म शामिल हैं।

उत्तराखंड में जमीन व रिसोर्ट
तरुण तेजपाल व उनकी पत्नी गीतन बत्रा के नाम से उत्तराखंड में नैनीताल शहर से कुछ दूरी पर पहाड़ी वादियों में जमीनें व प्रॉपर्टी भी है। गेथिया गांव में मौजूद इन प्रॉपर्टीज में दो चिमनियां और एक हरा-भरा व खूबसूरत रिसोर्ट शामिल है।

चर्चा यह भी है कि तेजपाल परिवार के पास उत्तराखंड में और भी प्रॉपर्टीज हैं। नैनीताल जिला प्रशासन ने इनकी खोजबीन करनी शुरू कर दी है। जिला प्रशासन के मुताबिक तरुण तेजपाल के नाम यहां 14 नली (1 नली यानी 240 स्क्वैयर यार्ड और एक स्क्वैयर यार्ड यानी 9 वर्गफुट) जमीन है।

उनकी पत्नी के नाम पर भी 5 नली जमीन है। यानी तेजपाल दंपति के नाम यहां कुल 4560 स्क्वैयर यार्ड जमीन है, जबकि उत्तराखंड सरकार के नियमों के मुताबिक किसी अन्य राज्य के निवासी यहां 250 स्क्वैयर यार्ड से ज्यादा जमीन नहीं खरीद सकते। तेजपाल ने यह कहते हुए नियमों में ढील मांगी थी कि उन्होंने वर्ष 2003 में नए नियम बनने से पहले जमीन खरीद ली थी।

Monday, November 25, 2013

विकास के खोखले दावे

बात चाहे देश की हो या प्रदेश की, विकास और तरक्‍की की बात करते नेताओं का दम नहीं फूलता है। सबका एक ही राग रहता है कि उन्‍होंने अपने इलाके, प्रदेश या देश को जन्‍नत बना दिया है। जबकि सच्‍चाई यह है कि उनके यह दावे न सिर्फ खोखले होते हैं बल्कि हकीकत से कई प्रकाश वर्ष की दूरी पर होते हैं।

इसे कहने के पीछे कोई राजनीतिक प्रभाव या दुराभाव नहीं है, बल्कि ठोस कारण हैं। चलिए एक उदाहरण के जरिए बात करते हैं। मान लीजिए कोई बड़ा नेता या फिर उसके परिवार का कोई सदस्‍य बीमार हो जाए तो क्‍या वो अपने राज्‍य या फिर जिले के सरकारी अस्‍पताल में इलाज कराने जाता है। यहां यह याद रखना जरूरी है कि स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे भी वही नेता करता रहा होगा। या फिर चुनावों के वक्‍त उसे अपनी उप‍लब्धियों में शामिल किया होगा।

अच्‍छी शिक्षा की माला जपने वाले नेताओं के बच्‍चे क्‍या सरकारी स्‍कूल और कॉलेज में पढ़ते हैं। नहीं। तो फिर इनके नाम पर वोट मांगने से पहले जरा भी लाज नहीं आती है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस देश में अलग-अलग प्रकार के नागरिक और लोग रहते हैं। एक शासक वर्ग और दूसरी वो आम जनता जिसे मूर्ख समझा और बनाया जाता है।

मगर, यही नेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते वक्‍त शायद यह भूल जाते हैं कि उनकी कथनी और करनी पर आम नागरिकों की नजर रहती है। लैपटॉप या मोबाइल बांटकर पांच साल तक सत्‍ता सुख चाहने वालों की आत्‍माएं शायद मर चुकी हैं। चुनाव प्रचार के दौरान दर-दर हाथ फैलाने वाले नेता जीतने के बाद रसूख, पैसे और सत्‍ता के नशे में ऐसे चूर होते हैं कि उन्‍हें सबकुछ दिखना भूल जाता है। अरबों-करोड़ों रुपयों का घोटाला करने वालों को लगने लगता है कि 30 या 35 रुपए रोज बमुश्किल कमाने वाले गरीब नहीं रह गए हैं, बल्कि वो अमीर हो गए हैं। यदि नेताओं का बस चले तो वो उन्‍हें जीने के लिए हवा भी नसीब न होने दें।

कोई कहता है कि गरीब लोग दो वक्‍त खाने लगे हैं इसलिए देश में अन्‍न का संकट गहराता है तो कोई यह कहता है कि दो सब्जियां खाने वाले लोगों की वजह से महंगाई बढ़ रही है। शायद सफेद कुरते पहनने वाले काले चरित्र वाले नेता चाहते हैं कि लोग भूखे ही मरें, तभी देश की अर्थव्‍यवस्‍था सही चल सकेगी।

बड़बोले नेताओं की अक्‍ल तो देखिए, उनका कहना है कि गरीबी और गरीब तो मन का विकार होता है। यह इस देश की दुर्दशा ही है कि यहां ऐसे लोग राज कर रहे हैं, जिन्‍हें आम लोगों से कोई लेना देना नहीं है। जिसने कभी घंटों लाइन में लगकर ट्रेन का टिकट हासिल न किया हो और धक्‍के खाकर बस का सफर न किया हो, वो क्‍या जाने कि आम नागरिक अपनी जिंदगी कैसे जीते हैं।

उम्‍मीद है लोकतंत्र के महापर्व में लोग जागरूक होंगे और धूर्तों को कुर्सी से दूर करेंगे।

Sunday, September 29, 2013

जैसी जनता वैसी व्यवस्था और सरकार

देश के किसी भी कोने में चले जाइए, किसी भी पान की दुकान पर या शाम को बाजार या मोहल्लों में होने वाली पटियेबाजी पर। आपको देश की राजनीति और देश की दुर्दशा पर टिप्पणी करते विशेषज्ञ जरूर मिल जाएंगे। घोटालों से लेकर सियासी दांवपेच के बारे में उनका विश्लेषण सुनने लायक होता है। सभी यह मानते हैं कि हमारा देश भ्रष्टाचार और गंदी राजनीति का शिकार है। लेकिन क्या सारा दोष नेताओं पर मढना जायज है। जरा सोचिए।

नेता मंगल ग्रह से तो आए नहीं हैं जो हम पर राज कर रहे हैं। हमारे और आपके बीच में से ही चुनकर भेजे गए है। हम ही उनको भेजते हैं और फिर कोसते हैं। व्यवस्था पर दोष भी मढते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में चुनाव में नकारने का अधिकार देने की बात कही है। इससे पहले दोषियों को संसद और विधानसभाओं से दूर रखने का आदेश भी दिया था, जिसके खिलाफ केंद्र सरकार ने अध्यादेश पारित कर दिया था।

हम यानि आम जनता का मानस यह है कि तंत्र की बेकार है, उसे सुधारना होगा। इस तरह जिम्मेदारी टालने से बात नहीं बनने वाली है। व्यवस्था को सुधारना हमारे हाथों में ही है। इसके लिए सरकार या सुप्रीम कोर्ट का मुंह ताकने की कतई जरूरत नहीं पडे अगर थोडी समझदारी से काम लिया जाए। मसलन, आपको चुनावों में कोई पसंद नहीं है तो राइट टू रिजेक्ट के अलावा वोट न डालने का निर्णय भी तो कानून में दिया गया है। बस आपको पोल बूथ जाकर यह बताना होगा कि आपको किसी को भी वोट नहीं देना है।

इसी तरह से अगर आप अपने जनप्रतिनिधि से संतुष्ट नहीं हैं तो उसका सामाजिक बहिष्कार शुरू करिए, क्योंकि जनता ही उनकी ताकत है और जनता ही उनकी कमजोरी भी है।

लेकिन इससे भी जरूरी है खुद को बदलना। खुद सोचिए कि ईमानदार व्यवस्था की चाह रखने वाले आप और हम खुद कितने ईमानदार हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे काम होते हैं जहां आप भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं। चाहे वो सामान की खरीदारी हो या फिर​ किसी सरकारी दफ्तर से काम करवाना।

अगर लाइसेंस बनवाना हो तो एजेंट खोजते हैं। कोई सर्टिफिकेट बनवाना हो तो जुगाड निकालते हैं। जान पहचान के दम पर काम करवाना मानो शान की बात समझा जाता है। कोई नेता से पहचान का रौब दिखाता है तो कोई सरकारी अधिकारी का। पुलिस वालों से दोस्ती का भी इस्तेमाल किया जाता है। ट्रैफिक पुलिस पकड ले तो तुरंत जेब से फोन निकालकर किसी से बात करवाने लगते है। सडक पर रेड लाइट हो तब भी उसे क्रॉस करना मानो शान की बात है।

अगर हम अपना सिविक सेंस सुधारेंगे तो व्यवस्था भी सुधरने लगेगी और नेता भी लाइन पर आ जाएंगे। आखिर व्यवस्था हमारे लिए हैं, तो उसे बनाए रखना भी हमारी जिम्मेदारी ही तो है।

जैसी जनता वैसी व्यवस्था और सरकार

देश के किसी भी कोने में चले जाइए, किसी भी पान की दुकान पर या शाम को बाजार या मोहल्लों में होने वाली पटियेबाजी पर। आपको देश की राजनीति और देश की दुर्दशा पर टिप्पणी करते विशेषज्ञ जरूर मिल जाएंगे। घोटालों से लेकर सियासी दांवपेच के बारे में उनका विश्लेषण सुनने लायक होता है। सभी यह मानते हैं कि हमारा देश भ्रष्टाचार और गंदी राजनीति का शिकार है। लेकिन क्या सारा दोष नेताओं पर मढना जायज है। जरा सोचिए।

नेता मंगल ग्रह से तो आए नहीं हैं जो हम पर राज कर रहे हैं। हमारे और आपके बीच में से ही चुनकर भेजे गए है। हम ही उनको भेजते हैं और फिर कोसते हैं। व्यवस्था पर दोष भी मढते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में चुनाव में नकारने का अधिकार देने की बात कही है। इससे पहले दोषियों को संसद और विधानसभाओं से दूर रखने का आदेश भी दिया था, जिसके खिलाफ केंद्र सरकार ने अध्यादेश पारित कर दिया था।

हम यानि आम जनता का मानस यह है कि तंत्र की बेकार है, उसे सुधारना होगा। इस तरह जिम्मेदारी टालने से बात नहीं बनने वाली है। व्यवस्था को सुधारना हमारे हाथों में ही है। इसके लिए सरकार या सुप्रीम कोर्ट का मुंह ताकने की कतई जरूरत नहीं पडे अगर थोडी समझदारी से काम लिया जाए। मसलन, आपको चुनावों में कोई पसंद नहीं है तो राइट टू रिजेक्ट के अलावा वोट न डालने का निर्णय भी तो कानून में दिया गया है। बस आपको पोल बूथ जाकर यह बताना होगा कि आपको किसी को भी वोट नहीं देना है।

इसी तरह से अगर आप अपने जनप्रतिनिधि से संतुष्ट नहीं हैं तो उसका सामाजिक बहिष्कार शुरू करिए, क्योंकि जनता ही उनकी ताकत है और जनता ही उनकी कमजोरी भी है।

लेकिन इससे भी जरूरी है खुद को बदलना। खुद सोचिए कि ईमानदार व्यवस्था की चाह रखने वाले आप और हम खुद कितने ईमानदार हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे काम होते हैं जहां आप भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं। चाहे वो सामान की खरीदारी हो या फिर​ किसी सरकारी दफ्तर से काम करवाना।

अगर लाइसेंस बनवाना हो तो एजेंट खोजते हैं। कोई सर्टिफिकेट बनवाना हो तो जुगाड निकालते हैं। जान पहचान के दम पर काम करवाना मानो शान की बात समझा जाता है। कोई नेता से पहचान का रौब दिखाता है तो कोई सरकारी अधिकारी का। पुलिस वालों से दोस्ती का भी इस्तेमाल किया जाता है। ट्रैफिक पुलिस पकड ले तो तुरंत जेब से फोन निकालकर किसी से बात करवाने लगते है। सडक पर रेड लाइट हो तब भी उसे क्रॉस करना मानो शान की बात है।

अगर हम अपना सिविक सेंस सुधारेंगे तो व्यवस्था भी सुधरने लगेगी और नेता भी लाइन पर आ जाएंगे। आखिर व्यवस्था हमारे लिए हैं, तो उसे बनाए रखना भी हमारी जिम्मेदारी ही तो है।

Wednesday, July 17, 2013

एक कलम और किताब दुनिया को बदल सकते हैं

संयुक्त राष्ट्र महासभा में मलाला युसुफजई द्वारा दिए गए भाषण का ​अनुवाद

मैं सबसे पहले उस सर्वशक्तिमान, दयालु और परोपकारी खुदा का नाम लेती हूं।

सम्माननीय संयुक्त राष्ट्र महासचिव श्रीमान बान की मून,
महासभा के आदरणीय अध्यक्ष वुक जेरेमिक,
संयुक्त राष्ट्र वैश्विक शिक्षा के एनवॉय सम्मानीय गॉर्डन ब्राउन,
सभी वरिष्ठ सम्मानीय एवं मेरे प्यारे भाइयो और बहनो

आज, काफी लंबे अंतराल के बाद मुझे कुछ बोलने का मौका मिला है। इतने सम्माननीय लोगों के बीच आना मेरे लिए गौरव की बात है और यह क्षण मेरे जीवन के यादगार पलों में हमेशा रहेगा।

मैं नहीं समझ पा रही हूं कि अपनी बात को कहां से शुरू करूं। मैं यह भी नहीं जानती हूं कि लोग मुझसे क्या सुनने की उम्मीद कर रहे हैं। लेकिन मैं सबसे पहले उस सर्वशक्तिमान ईश्वर का धन्यवाद देना चाहती हूं, जिसके लिए हम सभी एक समान हैं और फिर उन सभी का आत्मीय आभार, जिन्होंने मेरे जीवन के लिए प्रार्थनाएं की हैं। मेरे प्रति लोगों का जो स्नेह है मैं उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती हूं। मुझे दुनियाभर से शुभकामना संदेशों से भरे काड्र्स और तोहफे मिले हैं। इसके लिए मैं एक बार फिर सभी का शुक्रिया करती हूं। मैं उन बच्चों की भी आभारी हूं, जिनके अबोध शब्दों ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है। मैं उन सभी वरिष्ठों को भी धन्यवाद देना चाहती हूं, जिनकी दुआओं ने मुझे शक्ति दी।

मैं उन सभी नर्स, डॉक्टर्स ,पाकिस्तान और ब्रिटेन के अस्पताल तथा यूएई की सरकार का भी शुक्रिया करती हूं, जिनकी मदद और इलाज की बदौलत मैं ठीक हो सकी हूं। मैं संयुक्त राष्ट्र संघ के ग्लोबल एजुकेशन फस्र्ट इनिशिएटिव कार्यक्रम को चलाने के फैसले पर महासचिव बान की मून और एनवॉय गॉर्डन ब्राउन का पूरी तरह समर्थन करती हूं। साथ ही मैं उनके नेतृत्व के लिए उन्हें धन्यवाद देती हूं। मुझे उम्मीद है कि वे हमेशा हम सभी को इसी तरह से काम करने के लिए प्रेरित करते रहेंगे।

प्यारे भाइयो और बहनो, हमेशा एक बात याद रखिएगा कि मलाला-डे मेरा दिन नहीं है। यह उन सभी महिलाओं और बच्चों का दिन है, जिन्होंने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई है। आज दुनियाभर में न जाने कितने मानवाधिकार संगठन हैं, जो शांति, समानता और शिक्षा के अधिकार के लिए काम कर रहे हैं। दुनिया में हजारों लोग हर साल आतंकी घटनाओं में मारे जाते हैं और लाखों घायल होते हैं। मैं भी उन्हीं में से एक हूं।

इसलिए मैं यहां खड़ी हूं...उन कई लड़कियों में से एक।

मैं अपने लिए नहीं, सभी लड़के और लड़कियों के बोल रही हूं।

मैंने अपनी आवाज शोर मचाने के लिए नहीं उठाई है, बल्कि मैं उन लोगों की आवाज बनना चाहती हूं, जिनकी बातें अनसुनी रह जाती हैं।

जो अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं :
उन्हें शांति से जीने का अधिकार मिले
समाज में समानता और सम्मान मिले
बराबरी का हक और दर्जा मिले
और शिक्षा का अधिकार मिले।

प्यारे दोस्तो, नौ अक्टूबर 2012 को तालिबान ने मेरे माथे के बाईं ओर गोली मारी थी। उसने मेरी दोस्त पर भी गोली चलाई थी। उसे लगा था कि उसकी गोलियों से हमारी आवाजें खामोश हो जाएंगी। लेकिन वो नाकाम रहे। इसके बाद उस खामोशी के बीच से हजारों आवाजें सामने आईं। आतंकवादी सोचते थे कि उनकी इस हरकत से मैं अपने लक्ष्य से भटक जाऊंगी, लेकिन मेरे जीवन से वे केवल कमजोरी, डर और निराशा को ही मार सके। उनकी इस कायराना हरकत के बाद मेरे अंदर दृढ़ता और ऊर्जा का जन्म हुआ। मैं आज भी वही मलाला हूं, आज भी मेरा वही लक्ष्य है, जो हमले के पहले था और आज भी मैं उतनी ही आशावान हूं। अब भी मैं अपने सपने को पूरा करने के लिए उतनी ही हिम्मत के साथ काम कर रही हूं।

प्यारे भाइयो और बहनो, मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं। न ही मैं, यहां तालिबान या किसी अन्य आतंकी गुट से अपनी निजी दुश्मनी या बदले का जिक्र करने आई हूं। मैं यहां हर बच्चे के लिए शिक्षा के अधिकार पर बात करने आई हूं। मैं चाहती हूं कि शिक्षा का अधिकार दुनिया में सभी के लिए हो। तालिबान और चरमपंथियों के बच्चों को तो खासतौर पर शिक्षा दी जानी चाहिए।

मुझे उस तालिबान से कोई घृणा नहीं है, जिसने मुझे गोली मारी थी। अगर वह मेरे सामने हो और मेरे हाथों में बंदूक हो, तब भी मैं उसे गोली नहीं मारूंगी। मैंने पैगम्बर मोहम्मद सा. से दयाभाव सीखा है और यही ज्ञान मुझे ईसा मसीह और भगवान बुद्ध को पढ़कर भी मिला है।

मार्टिन लूथर किंग, नेलसन मंडेला और मुहम्मद अली जिन्ना से भी मुझे इसी परंपरा की सीख मिली है। महात्मा गांधी, बचा खान और मदर टेरेसा के भी यही सिद्धांत थे। मैंने अपने माता-पिता से भी क्षमा करना ही सीखा है। मेरी आत्मा भी मुझसे यही कहती है कि सभी के लिए दिल में स्नेह रखो और अमन पसंद रहो।

प्यारी बहनो और भाइयो, जब हम अंधेरे में होते हैं तभी हमें प्रकाश का महत्व समझ में आता है। जब चारों ओर खामोशी और सन्नाटा हो, तभी आवाज की अहमियत समझ आती है। इसी तरह जब हम पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्र स्वात में थे और हर रोज बंदूक और धमाके सुनते थे, तभी हमें यह अहसास हुआ कि किताब और कलम कितनी जरूरी हैं।

एक कहावत है कि 'कलम के आगे तलवार भी नहीं टिक सकती है', यह वाकई सच है। आतंकी मेरी कलम और किताबों से खौफजदा थे। तालीम की ताकत से वो खौफ में थे। यहां तक कि वे एक औरत से डर गए थे। एक औरत की आवाज उन्हें डरा रही थी। यही वजह है कि हाल ही में क्वेटा में आतंकियों ने 14 निर्दोष मेडिकल स्टूडेंट्स को मौत के घाट उतार दिया। इसी कारण उन्होंने मेरी कई महिला टीचर्स और खैबर पख्तूनवा व फाटा में काम करने वाले पोलियो कार्यकर्ताओं की भी हत्या की है। वे रोज किसी न किसी स्कूल को धमाके से उड़ा रहे हैं। इसकी वजह समाज में आ रहे बदलाव और समानता है।

सम्मानीय महासचिव महोदय, शिक्षा के लिए अमन का होना बहुत जरूरी है। दुनिया के कई हिस्सों, खासकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवाद के चलते बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। हम इस तरह की लड़ाई से ऊब चुके हैं। दुनिया के कई हिस्सों में महिलाएं और बच्चे परेशान और साधनहीन हैं। भारत में बच्चों को बालश्रम में लगाया जाता है। नाइजीरिया में कई स्कूल तबाह हो चुके हैं। अफगानिस्तान में दशकों से लोग चरमपंथ का शिकार हैं। छोटी बच्चियों को बालश्रम और घरेलू कामकाज में जोत दिया जाता है और कम उम्र में भी उनकी शादी भी कर दी जाती है। ऐसे देशों में महिला और पुरुष दोनों को ही गरीबी, अज्ञानता, अन्याय, नस्लीय भेदभाव, मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

प्यारे साथियो, मेरा ध्यान महिलाओं के अधिकार और लड़कियों की शिक्षा पर है, क्योंकि वे ही सर्वाधिक पीडि़त होती हैं। एक समय था जब महिला सामाजिक कार्यकर्ता अपने अधिकारों के लिए पुरुषों का साथ चाहती थीं, लेकिन अब हम यही काम अपने बूते पर कर रही हैं। मेरा कहने का यह कतई मतलब नहीं है कि पुरुषों को महिलाओं के अधिकारों के लिए बात नहीं करना चाहिए। बल्कि मेरा आशय यह है कि महिलाओं को अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए आत्मनिर्भर होने की जरूरत है।

प्यारे भाइयो और बहनो, अब वक्त आ गया है कि हम अपनी आवाज बुलंद करें। आज हम, दुनिया के सभी नेतृत्वों का आह्वान करते हैं कि वे अपनी नीतियों को शांति और समृद्धि के अनुकूल बनाएं। हमारी दुनिया के सभी नेताओं से अपील है कि वे महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को मूल अधिकारों में शामिल करें। जो कदम महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध हो उसे अस्वीकार किया जाना चाहिए। दुनिया की सभी सरकारों से हमारी अपील है कि वे हर बच्चे के लिए शिक्षा को अनिवार्य करें। उनसे हमारी यह भी अपील है कि आतंकवाद और हिंसा के खिलाफ लड़ें और बच्चों के साथ क्रूरता को बंद किया जाए। सभी विकसित देशों से उम्मीद है कि वे लड़कियों के लिए शैक्षणिक अवसरों का विस्तार करेंगे।

सभी समुदायों से हम कहना चाहते हैं कि वे जाति, धर्म, क्षेत्र और लिंगभेद के आधार पर अलगाव और असमानता को समाप्त करने के लिए कदम उठाएं। अगर हम में से आधे लोग पीछे रह जाएंगे तो हम कभी आगे नहीं बढ़ सकेंगे। मैं दुनिया में अपनी सभी बहनों से कहना चाहूंगी कि वे बहादुर बनें और क्षमताओं को पहचानें।

प्यारे भाइयो और बहनो, हमें दुनिया के हर बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए शिक्षा और स्कूल की जरूरत है। जब तक कि सभी के लिए शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक हमारा यह सफर पूरा नहीं हो सकता है। हमें कोई नहीं रोक सकता है। हम अपने अधिकार के लिए आवाज उठाते रहेंगे और इसके बूते बदलाव लाकर भी रहेंगे। इसके लिए हमें अपने शब्दों की ताकत पर विश्वास रखना होगा। इसी से दुनिया बदलेगी। शिक्षा के लिए हम सभी एक हैं और एक साथ हैं। अगर हम लक्ष्य तक पहुंचना चाहते हैं तो हमें अपने आप को ज्ञान के हथियार और एकता की ढाल से लैस करना होगा।

प्यारे भाइयो और बहनो, हमें यह भी याद रखना होगा कि दुनिया में लाखों लोग गरीबी, अन्याय और अनभिज्ञता के शिकार हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि लाखों बच्चे आज भी स्कूल से बाहर हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे भाई और बहन आज भी उज्ज्वल और शांतिपूर्ण भविष्य का इंतजार कर रहे हैं।

आइए, हम सभी अशिक्षा, गरीबी और आतंकवाद के खिलाफ कलम और किताब उठाएं, क्योंकि यही वो हथियार हैं, जिनके जरिए हम इन तीनों से लड़ सकते हैं।

एक बच्चा, एक शिक्षक, एक कलम और किताब दुनिया को बदल सकते हैं।

शिक्षा ही एकमात्र हल है। एजुकेशन फर्स्ट

Friday, May 17, 2013

हेलीकॉप्टर डील : खेल के खिलाड़ी


Google searched image
इटली से हुए 3600 करोड़ रुपए के वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में 362 करोड़ रुपए की दलाली  के मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोमवार को कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है और वह संसद में हर मुद्दे पर बहस कराने को तैयार हैं। गौरतलब है कि इटली की अगस्ता वेस्टलैंड से 12 वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की खरीद में रिश्वतखोरी के मुद्दे को विपक्ष संसद के सत्र में जोरशोर से उठाने की तैयारी कर रहा है। दूसरी ओर रक्षा मंत्री एके एंटनी भी विपक्ष के तीखे सवालों का जवाब देने के लिए पूरा होमवर्क करने में जुटे हैं। वहीं एके एंटनी पर मुख्य आरोप यह है कि इटली में हेलीकॉप्टर कंपनी के प्रमुख के गिरफ्तार होने के बाद सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे।

3,546 करोड़ रुपए के हेलीकॉप्टर सौदे में दलाली का मामला उजागर होने के बाद इस रक्षा खरीद समझौते की जांच में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी का नाम आया है। इस घोटाले के तार दुनिया के कई देशों तक पहुंच रहे हैं। दलाली के इस पूरे खेल में शामिल प्रमुख खिलाडिय़ों पर एक नजर:

गियुसिपी ओरसी : फिनमैकेनिका कंपनी का सीईओ और चेयरमैन था इसे इटली में गिरफ्तार किया जा चुका है। आरोप है कि उसने 12 अगस्त को वेस्टलैंड हेलीकॉप्टरों की डील हासिल करने के लिए बिचौलियों की मदद ली और इसके लिए उनको 51 मिलियन यूरो (करीब 350 करोड़ रुपए) दिए।

गुइडो राल्फ हाशके : भारत में दलाली पहुंचाने के मामले में मुख्य सूत्रधार है। इस मामले में पिछले साल गिरफ्तार हुआ था। हाशके के पास स्विट्जरलैंड के अलावा अमेरिका की भी नागरिकता है। भारतीय रक्षा बिजनेस सर्किल में उसकी जबरदस्त पकड़ है। वह निर्बाध रूप से भारत आता रहता था और यहां के रक्षा सेक्टर की कार्यशैली से भलीभांति वाकिफ है। सेबी रिकॉर्ड के अनुसार वह 2009 तक एमजीएफ एमार के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में भी शामिल था।

कार्लो गेरोसा : हाशके का बिजनेस पार्टनर है। हेलीकॉप्टर डील के बारे में हाशके और पार्टनर कार्लो गेरोसा की बातचीत को गुप्त तरीके से रिकॉर्ड किया गया है।

क्रिस्टीन माइकल : ब्रिटेन का नागरिक है। भारत में शक्तिशाली राजनीतिक संपर्क हैं। कई बड़े नेताओं तक पहुंच। पिता वोल्फगांग रिचर्ड मैक्स माइकल के भी जबरदस्त भारतीय संपर्क हैं। माइकल, गियुसिपी ओरसी का विश्वासपात्र है। फिनमैकेनिका ने उसको 31 मिलियन यूरो की दलाली पहुंचाने का जिम्मा सौंपा। उसने रकम को इटली के राजनीतिज्ञों और यूरोप में अन्य लोगों तक पहुंचाया। स्विट्जरलैंड में जारी गिरफ्तारी वारंट से बचने के लिए दुबई में है।

गौतम खेतान : दिल्ली का वकील है और हाशके का बिजनेस पार्टनर है। हाशके और गेरोसा का कानूनी सलाहकार है। वह और हाशके चंडीगढ़ स्थित फर्म ऐरोमेट्रिक्स के प्रमोटर हैं। हाशके और गेरोसा की बातचीत में इसका नाम बार-बार आया है।

त्यागी बंधु : संजीव (जूली), डोक्सा और संदीप त्यागी पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी के करीबी रिश्तेदार हैं। पेशे से बिजनेसमैन हैं। नई दिल्ली के बाहरी इलाके में इनका फार्म हाउस है। पूर्व वायु सेना प्रमुख से हाशके की मुलाकात इन्हीं लोगों ने कराई।

एसपी त्यागी : 2005-07 के दौरान वायुसेना प्रमुख रहे। हाशके ने कहा है कि एडब्ल्यू 101 हेलीकॉप्टर के तकनीकी पहलुओं पर उसने त्यागी से विस्तृत बातचीत की थी। उसी आधार पर अगस्ता वेस्टलैंड ने एक तकनीकी रूप से मजबूत बेहतरीन दस्तावेज तैयार किया। जो कि होड़ में मौजूद प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले बेहतर था। त्यागी ने उस दस्तावेज का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद अगस्ता वेस्टलैंड को वापस देते हुए कहा कि इसको आधिकारिक रूप से भारतीय वायु सेना के पास भेज दो। त्यागी ने माना है कि उनकी बिचौलिए हाशके से मुलाकात हुई थी, लेकिन भ्रष्टाचार के किसी भी मामले का उन्होंने खंडन किया है।

दलाली
हाशके ने इटली अधिकारियों के सामने स्वीकार किया है कि उसने एसपी त्यागी से छह-सात बार मुलाकात की थी। उस दौरान उसने हेलीकॉप्टर के तकनीकी पहलुओं पर बातचीत की थी।
  • नवंबर, 2012 में अपने बयान में उसने स्वीकार किया है कि दलाली के रूप में उसको सौदे का 3.5 प्रतिशत यानी 20 मिलियन यूरो (144 करोड़ रुपए) मिले थे।
  • इसका 60 प्रतिशत यानी करीब 12 मिलियन यूरो उसने त्यागी बंधुओं को पहुंचा दिया।
  • बाकी बचे आठ मिलियन यूरो हाशके और कार्लो गेरोसा ने आपस में बांट लिए।
  • किसी भी जांच एजेंसी की निगाह से बचने के लिए भारत में वह रकम सॉफ्टवेयर निर्यात के फर्जी इंजीनियरिंग कॉन्ट्रेक्ट के जरिए ट्यूनीशिया के रास्ते भारत पहुंचाई गई।
लेन-देन में शामिल लोग
  • क्रिस्टीन
  • हाशके
  • हाशके कार्लो
  • त्यागी बंधु
समझौता

  • प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति समेत वीवीआईपी लोगों के इस्तेमाल के लिए फरवरी, 2010 में 12 अगस्त को वेस्टलैंड 101 हेलीकॉप्टर का समझौता सरकार और इटली की दिग्गज रक्षा कंपनी फिनमैकेनिका के बीच हुआ था।
  • फिनमैकेनिका की ब्रिटेन स्थित सहयोगी हेलीकॉप्टर निर्माता कंपनी का नाम अगस्त को वेस्टलैंड है। इस कंपनी पर भारत में सौदा हथियाने के लिए दलाली देने का आरोप है।

रक्षा घोटाले जिनसे हिली दुनिया..
रूस, चीन, इजरायल, इटली, फ्रांस जैसे हथियार बनाने वाले प्रमुख देशों के साथ-साथ दुनिया के दो तिहाई देशों में रक्षा सौदे में दलाली और भ्रष्टाचार आम बात है। बड़े रक्षा सौदों के ठेके हासिल करने के लिए रिश्वतखोरी का सहारा लेना कंपनियों की आदत-सी बन गई है। पूरी दुनिया में इस तरह के भ्रष्टाचार के मामले उजागर हो चुके हैं, जिनमें कुछ में से कुछ में तो आरोपी पर कार्रवाई भी हुई। पिछले कुछ सालों में दुनिया के विभिन्न देशों में हुए रक्षा घोटाले और उसमें हुई कार्रवाई पर डालते हैं एक नजर :
  1. रूस ने रक्षा मंत्री को हटाया : वैसे तो रक्षा घोटाले में अधिकारियों पर कार्रवाई आम बात मानी जाती है, लेकिन रूस में तो घोटाले में रक्षा मंत्री को ही अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। दुनिया के प्रमुख हथियार डीलर वाले देशों में शुमार रूस में कुछ महीने पहले राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने पिछले साल नवंबर में रक्षा मंत्री अनातोली सेरद्युकोव को विभाग में 95 मिलियन डॉलर के घोटाले के आरोप में पद से हटा दिया था। उन पर आरोप था कि रक्षा मंत्रालय की संपत्तियों को तीन अरब रूबल के घाटे में उन्होंने एक व्यावसायिक फर्म को बेचा। इस कदम से पुतिन ने यह संदेश देने की कोशिश की कि रक्षा विभाग में भ्रष्टाचार को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
  2. कनाडा में लड़ाकू विमान का घोटाला : हाल में अमेरिका से एफ-35 लड़ाकू विमानों की खरीद पर कनाडा में खूब हंगामा मचा। अप्रैल 2012 में कनाडा के ऑडिटर जनरल ने भी खरीद पर सवाल खड़े किए। इस रक्षा सौदे को देश के आर्थिक हितों के खिलाफ बताया गया। कनाडा के मीडिया की सुर्खियों में रहे इस सौदे को पूरी तरह से गलत करार दिया गया।
  3. फ्रांस का पनडुब्बी घोटाला : पनडुब्बी और लड़ाकू जहाज बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी डीएनएसएस और मलेशिया सरकार के बीच दो स्कॉर्पियन पनडुब्बी को लेकर समझौता हुआ। लेकिन समझौते पर उंगली उठने के बाद 2010 में फ्रांस सरकार ने मामले की जांच का आदेश दिया। बाद में खुलासा हुआ कि इस सौदे में मलेशिया के तत्कालीन रक्षा मंत्री के दोस्त की कंपनी ने भूमिका निभाई और उसने फ्रांस और मलेशिया के कई अधिकारियों को रिश्वत दी।
  4. ताइवान का युद्धपोत घोटाला : फ्रांस की कंपनी थेल्स और ताइवान के बीच युद्धपोत के लिए समझौता हुआ। इस सौदे को लेकर आरोप लगा कि थेल्स ने इस ठेके को हासिल करने के लिए पांच लाख डॉलर से ज्यादा की रिश्वत दोनों देशों के अधिकारियों को दी, जबकि ये युद्धपोत ताइवान की जरूरतों के लिए भी फिट नही बैठते थे। बाद में जब जांच शुरू हुई तो सौदों में शामिल रहे आठ अधिकारियों की संदिग्ध हालत में मौत हो गई। जांच के दौरान स्विस बैंक के 60 खातों में जमा साढ़े सात करोड़ डॉलर से ज्याद की रकम को सीज कर लिया गया। जून 2007 में इस रकम में से 34 लाख डॉलर की रकम स्विस बैंक ने ताइवान को लौटा दी, जबकि फ्रांस की अदालत ने थेल्स कंपनी पर जून 2011 में छह करोड़ तीस लाख यूरो का जुर्माना लगाया।
  5. श्रीलंका में घोटाला : श्रीलंका के पूर्व सेनाध्यक्ष सरत फोंसेका को हथियार सौदे में भ्रष्टाचार को लेकर कोर्ट मार्शल किया गया, जिसमें उन्हें तीन साल की सजा की सिफारिश की गई। इसके साथ ही उनका दर्जा, पेंशन और पदक वापस लेने के आदेश दिए गए थे। फोंसेका पर आरोप था कि सेनाध्यक्ष रहते हुए हथियार सौदों में अपने दामाद कंपनी का उन्होंने पक्ष लिया था।
  6. इराक में रक्षा सौदा घोटाला : इराक और रूस के बीच अक्टूबर 2009 में 4.2 अरब डॉलर से अधिक का हथियार सप्लाई का सौदा हुआ था। लेकिन इस सौदे को लेकर मीडिया रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी के बेटे तथा कुछ सांसद इस डील के पीछे थे और इसमें उन्होंने रिश्वत भी ली। इसकी जांच जारी है।

अरबों रुपए के घोटाले
यूपीए सरकार में लगातार सामने आ रहे घोटाले उसके लिए परेशानी का सबब बन गए हैं। इनकी वजह से देश की साख को भी बट्टा लगा है। टूजी घोटाला हो या सीडब्ल्यूजी घोटाला या फिर कोयला घोटाला, सभी का आंकड़ा लाख करोड़ तक पहुंच जाता है। विपक्ष का आरोप है कि संप्रग सरकार के यदि सभी घोटालों को मिला लिया जाए किसी संपन्न देश के सालाना बजट से ज्यादा के तो यहां घोटाले ही हुए हैं।

2जी घोटाला संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में ही हुआ था, लेकिन वह सामने आया दूसरे कार्यकाल में। किसानों की कर्ज माफी योजना में घोटाला तो नजर भी आने लगा है। संप्रग सरकार की बदनामी का कारण बनने वाले कुछ प्रमुख घोटाले इस प्रकार हैं :
  • 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला : 2008 में जारी कैग की रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री ए राजा के मनमाने रवैये और नीतियों के चलते 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन से देश को 1.76 लाख करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। बोली प्रक्रिया की जगह पहले आओ पहले पाओ नीति पर अमल किया गया। यह घोटाला 1.76 लाख करोड़ रुपए का निकला।
  • राष्ट्रमंडल खेल घोटाला : 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान कई प्रोजेक्टों में धांधली पाई गई। निविदाओं से लेकर मनमाने तरीके से ऊंचे दामों पर सामानों को खरीदा गया। कई ऐसी कंपनियों को भुगतान किया गया जो अस्तित्व में ही नहीं थीं। यह घोटाला करीब 70 हजार करोड़ रुपए का है।
  • कोयला घोटाला : 2009-2012 के बीच सरकार द्वारा निजी कंपनियों को आवेदन के आधार पर कोयले के 57 ब्लॉक आवंटित करने से इन कंपनियों को लाभ हुआ। बोली की प्रक्रिया से खजाने को नुकसान नहीं होता। कैग ने इस घोटाले में 1.86 लाख करोड़ रुपए के नुकसान का आकलन किया है।
बिजनेस का अनिवार्य हिस्सा है रिश्वत : बर्लुस्कोनी
इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिलवियो बर्लुस्कोनी ने रिश्वत मामले में जेल में बंद फिनमेकानिका एसपीए के पूर्व मुखिया ग्यूसेप ओर्सी का बचाव करते हुए गुरुवार को कहा है कि रिश्वत दुनिया भर में कारोबार का अनिवार्य हिस्सा है। भारत व इटली के बीच वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले पर बर्लुस्कोनी के इस बयान से विवाद पैदा हो गया है।

तीन बार इटली के प्रधानमंत्री रहे बलरुस्कोनी ने एक टेलीविजन को दिए अपने साक्षात्कार के दौरान कहा, रिश्वत सच्चाई है जो मौजूद है और इस तरह की अनिवार्य हालात से इनकार करने का कोई मतलब नहीं है। बर्लुस्कोनी ने कहा कि यह कोई अपराध नहीं है। उन्होंने कहा कि हम उस देश में किसी को कमीशन के भुगतान के बारे में बात कर रहे हैं क्योंकि उस देश में इस तरह के नियम हैं।

Wednesday, May 15, 2013

The IM Story


आतंकवाद के साप ने एक बार फिर भारत पर अपना जहर उगला है और हैदराबाद को दूसरी बार इसका शिकार बनाया है। हैदराबाद में हुए आतंकी धमाके की सुगबुगाहट कुछ महीने पहले से ही दिखने लगी थी। दरअसल, मुंबई और पुणे धमाकों में शामिल इंडियन मुजाहिदीन के तीन संदिग्ध आतंकी मुंबई के आसपास पिछले दो साल से भेष बदलकर घूम रहे थे। एटीएस के मुताबिक ये आतंकी बड़ी आतंकी योजना को अंजाम देने की फिराक में थे। एटीएस ने संदिग्ध आतंकियों की तस्वीरें जारी कर खबर देने वाले को 10 लाख रुपए इनाम देने का एलान भी किया था।

महाराष्ट्र एटीएस ने मुताबिक चारों मुंबई, पुणे के गुनहगार हैं और अब ये महाराष्ट्र में फिर कोई बड़ी आतंकवादी घटना को अंजाम देने का प्लान बना रहे हैं। यासीन भटकल उर्फ अहमद उर्फ जर्रार उर्फ सिद्धीबाबा उर्फ इमरान उर्फ शाहरुख, तहसीन उर्फ वसीम उर्फ मोनू उर्फ हसन, असदुल्लाह उर्फ जावेद उर्फ हड्डी उर्फ तबरेज उर्फ शाकिर उर्फ दानियाल और वकस उर्फ अहमद। महाराष्ट्र एटीएस के मुताबिक इन चारों ने 13 जुलाई 2011 को मुंबई और एक अगस्त 2012 को पुणे में हुए सीरियल बम धमाकों को अंजाम दिया। एटीएस के मुताबिक यासीन भटकल जो कि इंडियन मुजाहिदीन का मोस्ट वांटेड आतंकी है वो मुंबई और पुणे के अलावा कई और धमाकों में वांटेड है। बाकी तीनों भी न सिर्फ धमाकों की साजिश में शामिल थे बल्कि ये सभी धमाकों के प्लांटर्स भी हैं, यानि इन्होंने उन धमाकों को अंजाम देने के लिए बमों को उनकी जगहों पर रखा था।

महाराष्ट्र एटीएस के मुताबिक इनमें से तीन यासीन भटकल, तहसीन और असदुल्लाह पिछले दो सालों से मुंबई और उसके आसपास रह रहे हैं। उन्हें फिलहाल वकस उर्फ अहमद के बारे में ज्यादा पुख्ता जानकारी नहीं है। उसके मुताबिक शायद वो देश से बाहर निकल गया है। एटीएस की मानें तो ये सभी भेष बदलने में माहिर हैं और पिछले 2 साल से ये सभी मुंबई के आसपास कभी छात्र बनकर हॉस्टल में रह रहे हैं। कभी आईटी कंपनी के कर्मचारी बनकर रह रहे हैं तो कभी कॉल सेंटर के कर्मचारी बनकर रह रहे हैं। एटीएस कई बार इनके करीब पहुंची लेकिन ये इतने शातिर हैं कि इन्होंने एटीएस के पहुंचने से पहले ही अपना ठिकाना बार-बार बदल लिया। आखिरकार दो साल की तलाश में नाकाम रहने के बाद अब एटीएस ने इन्हें पकडऩे के लिए इनकी तस्वीर जारी की है। साथ ही इनके बारे में खबर देने वाले को 10 लाख रुपए के इनाम का भी एलान किया है।

आतंकियों के नापाक मंसूबों को रोकने के लिए एंटी टेरर सेल यानी एटीसी की नजर हॉस्टल और कॉल सेंटरों पर खास तौर से है। यही नहीं एटीएस ने देश के सभी पुलिस थानों और खुफिया विभागों को भी इन आतंकियो की तस्वीरें भेज दी हैं। एटीएस की सबसे बडी उम्मीद अब लोगों से हैं क्योंकि आंतकियों के चेहरे से छात्र का नकाब हटाने में आम आदमी ही अहम भूमिका निभा सकता है।

एक नजर डालते हैं दहशतगर्दों की हालिया करतूतों पर :

  • दिल्ली, सात सितंबर 2011 : सुबह दिल्ली हाईकोर्ट के गेट नंबर पांच के बाहर बम धमाका। नौ की मौत और 50 घायल।
  • मुंबई, 13 जुलाई, 2011 : शाम को हुए तीन बम धमाके से 17 की मौत और 131 लोग घायल।
  • दिल्ली, 19 सितंबर, 2010 : मोटरसाइकिल पर सवार अज्ञात बंदूकधारियों ने दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों से पहले जामा मस्जिद के बाहर विदेशी पर्यटकों की एक बस को निशाना बनाया और दो ताईवानी नागरिकों को घायल कर दिया।
  • बेंगलुरू, अप्रैल 17,2010 : बेंगलुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर हुए दो बम धमाकों में 15 लोग घायल।
  • पुणे, फरवरी 10, 2010 : पुणे में जर्मन बेकरी में हुए धमाके में पांच महिलाओं और कुछ विदेशियों समेत नौ लोग मारे गए और 45 घायल हुए।
मुंबई हमले
  • मुंबई, नवंबर 26-29, 2008 : मुंबई के तीन स्थानों: ताज होटल, ओबेरॉय होटल और विक्टोरिया टर्मिनस पर हुए हमले तीन दिन तक चले और इनमें लगभग 170 लोग मारे गए और 200 अन्य घायल हो गए।
  • असम, अक्टूबर 30, 2008 : असम में एक साथ 18 जगहों पर हुए बम धमाकों में 70 से अधिक लोग मारे गए और सौ से अधिक घायल हो गए।
  • इम्फाल, अक्टूबर 21, 2008 : मणिपुर पुलिस कमांडो परिसर पर हुए हमले में 17 लोग मारे गए
  • मालेगांव, सितंबर 29, 2008 : महाराष्ट्र के मालेगांव में एक वाहन में बम धमाके के कारण पांच लोगों की मौत।
  • मोडासा, सितंबर 29, 2008 : गुजरात के मोडासा में एक मस्जिद के पास हुए धमाके में एक व्यक्ति की जान चली गई।
दिल्ली में धमाका
  • दिल्ली, सितंबर 27, 2008 : दिल्ली में महरौली के बाजार में फेंके गए एक देसी बम के कारण तीन लोग मारे गए।
  • दिल्ली, सितंबर 13, 2008 : दिल्ली में अलग-अलग जगहों पर हुए बम धमाकों में कम के कम 26 लोग मारे गए और अनेक घायल हुए।
  • अहमदाबाद, जुलाई 26, 2008 : दो घंटे के भीतर 20 बम विस्फोट होने से 50 से अधिक लोग मारे गए।
  • जयपुर, मई 13, 2008 : शहर में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में 68 लोग मारे गए और अनेक घायल हुए।
  • रामपुर, जनवरी 1, 2008 : उत्तर प्रदेश के रामपुर में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कैंप पर हुए हमले में आठ लोगों की मौत।
  • लखनऊ, फैजाबाद, वाराणसी, नवंबर 23, 2007 : उत्तर प्रदेश के तीन शहरों में हुए धमाकों में 13 मारे गए कई घायल हुए।
  • अजमेर, अक्टूबर 11, 2007 : राजस्थान के अजमेर शरीफ में हुए धमाके में दो मारे गए।
हैदराबाद में धमाके
  • हैदराबाद, अगस्त 25, 2007 : आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में हुए धमाके में 35 लोगों की जान गई।
  • हैदराबाद, मई 18, 2007 : जयदराबाद में मक्का मस्जिद धमाके में 13 लोग मारे गए।
  • समझौता एक्सप्रेस, फरवरी 19, 2007 : भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में हरियाणा में धमाके, 66 यात्री मारे गए।
  • मालेगांव, सितंबर 8, 2006 : महाराष्ट्र के मालेगांव में तीन धमाकों में 32 लोग मारे गए और सौ से अधिक घायल हुए।
  • मुंबई, जुलाई 11, 2006 : मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में 170 लोग मारे गए और 200 घायल हो गए।
ब्लास्ट के बाद किसने क्या कहा?
प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने बम धमाकों को 'कायराना हमला' करार दिया है तो बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसकी गंभीरता से जांच कराने की मांग की है। वहीं, कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की काबिलियत पर ही सवाल उठा दिया है।

हमले बर्दाश्त नहीं
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि इस तरह की कायरतापूर्ण हरकतें शांति और सौहाद्र्र में खलल डालने वाली हैं। ऐसे हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे। हम लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करते हैं।

कायराना हमला
पीएमओ की ओर से किए गए ट्वीट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री ने बम विस्फोटों की कड़ी निंदा की है। साथ ही लोगों से धैर्य और शांति बनाए रखने की अपील की है।

गंभीरता से हो जांच
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने विस्फोट में शिकार हुए लोगों के लिए दुख प्रकट करते हुए ईश्वर से मृतकों के परिजनों को इस गम से लडऩे की शक्ति प्रदान करने की कामना की। उन्होंने सरकार से इस मामले की गंभीरता से जांच कराने की मांग की।

दुख का सामना करने की जरूरत
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि यह वाकई में बेहद ही निंदनीय काम है। इस घटना पर मुझे गहरा दुख है। भगवान इस घटना में मारे गए लोगों की आत्मा को शांति दें और उनके घर वालों को इससे लडऩे की शक्ति प्रदान करें। देशवासियों को इस समय संगठित होकर इस दुख का सामना करने की जरूरत है।

काबिलियत पर सवाल
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की काबिलियत पर ही सवाल उठा दिया है। उन्होंने कहा है कि जब गृह मंत्री का प्रमोशन उनकी कार्यक्षमता के बजाए वफादारी पर हुआ है तो ऐसे में उनसे क्या अपेक्षा की जा सकती है?

चार दिन पहले काटे थे सीसीटीवी के तार
दिलसुख नगर में लगे सीसीटीवी कैमरों के तार चार दिन पहले ही काट दिए गए थे। जबकि इससे पहले बताया जा रहा था कि उस इलाके के सीसीटीवी कैमरे खराब थे। आतंकी हमले की सूचना और एलर्ट के बाद भी हैदराबाद में सुरक्षा लचर रही, इस खुलासे से पुलिस की तैयारियों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।

ऐसे दिया गया हैदराबाद ब्लास्ट को अंजाम!

पुणे माड्यूल तर्ज पर ब्लास्ट
सूत्रों के मुताबिक लश्कर ने इस प्लानिंग का पूरा खाका यासीन भटकल और उसके साथियों को भी समझा दिया था। धमाकों का शक इंडियन मुजाहिदीन के पुणे मॉड्यूल पर है, क्योंकि ये हैदराबाद के धमाके पुणे के धमाकों से पूरी तरह मेल खा रहे हैं। अभी तक की जांच में धमाकों में इस्तेमाल किए गए सामान का पता चला है। आईईडी बनाने के लिए अमोनियम नाइट्रेट, सल्फ्यूरिक एसिड और कुछ ज्वलनशील पदार्थों का इस्तेमाल किया गया।

मोबाइल बना हथियार
सुरक्षा एजेंसियों को शक है कि धमाकों के लिए मोबाइल फोन को हथियार बनाया गया। मोबाइल ट्रिगर के जरिए ही हैदराबाद में दोनों धमाके किए गए। यही वजह है कि अब पुलिस दिलसुख नगर में किए गए सारे मोबाइल कॉल्स की डिटेल्स को खंगाल रही है। जांच एजेंसियां धमाके से आधे घंटे पहले और आधे घंटे बाद किए गए सारे कॉल की डिटेल्स निकालने में जुटी हैं। दिलसुख नगर में इस दौरान कुल 42,379 कॉल्स किए गए। सुरक्षा एजेंसियों को शक है कि इन्हीं कॉल्स में धमाकों का राज छिपा है।

धमाके के बाद कश्मीर से आई 8 संदिग्ध कॉल 
हैदराबाद सीरियल बम धमाके में जांच एजेंसियों को सुराग मिलने लगीं हैं। सूत्रों के मुताबिक धमाके के बाद हैदराबाद के शाहिन बाग में जम्मू कश्मीर से कॉल आई। करीब आठ कॉल आई। फिलहाल जांच एजेंसियां इस बारे में ज्यादा खुलासा नहीं करना चाहती है। महाराष्ट्र के नांदेड़ और अहमद नगर में महाराष्ट्र एटीएस की टीम छापेमारी कर रही है। जांच एजेंसियों का कहना है कि महाराष्ट्र के नांदेड़ और अहमद नगर में छापेमारी से कुछ लीड मिल सकते हैं। लेकिन कोई ठोस लीड की बात करें तो जांच एजेंसियों का कहना है कि इस बाबत उनके पास कुछ भी ठोस नहीं है। फिलहाल एनआईए, एनएसजी और महाराष्ट्र एटीएस की टीम हैदराबाद में ब्लास्ट स्थल पर मौजूद हैं। फॉरेंसिक साक्ष्य उठाए जा रहे हैं। जांच एजेंसियां जानकारी के आधार पर स्केच बना रही है।

ऑनलाइन बैंकिंग और शॉपिंग का बढ़ता बाजार


टैप, क्लिक और स्वाइप... ये तीन वह शब्द हैं, जो मौजूदा समय में शॉपिंग और फंड ट्रांसफर के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल ने शॉपिंग और बैंकिंग को पहले से कहीं ज्यादा आसान और पहुंच वाला बना दिया है। तकनीक की बदौलत बैंक के दस्तावेजों ने कम्प्यूटर फाइल्स का रूप ले लिया है और कैश काउंटर पर बैठने वाले की जगह एटीएम मशीनों ने ले ली है। पहले बैंकों में रोजाना होने वाले आर्थिक लेनदेनों को रजिस्टर में लिखकर रखा जाता था, जिसे दिन का काम खत्म होने के बाद अपडेट किया जाता था। अब यह काम कम्यूटरीकृत हो गया है, जिसका फायदा बैंक के आम ग्राहकों को मिल रहा है।

लगभग डेढ़ दशक पहले तक बैंक की शाखाएं बैंक और ग्राहक के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी हुआ करती थीं। लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है। अब ग्राहकों को बैंकिंग के लिए घड़ी देखकर नहीं जाना पड़ता है। चाहे रुपए निकालने की बात हो या फिर जमा करने की। यहां तक कि फंड ट्रांसफर का काम भी बिना बैंक गए ही होने लगा है। बैंक आपके टेलीफोन, मोबाइल और कम्प्यूटर पर उपलब्ध है।

अल्टरनेटिव बैंकिंग
आईसीआईसीआई बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पांच वर्षों के दौरान बैंकिंग से जुड़े उनके कई काम ऑनलाइन हो चुके हैं। जिसमें फंड ट्रांसफर, बचत खाता खोलना, चेकबुक मंगाना और डिमांड ड्राफ्ट के लिए बैंक की शाखा के चक्कर नहीं लगाने पड़ते हैं। साथ ही रोजमर्रा के बिल जिनमें बिजली, पानी, टेलीफोन और मोबाइल के बिल शामिल हैं, को भी बैंक की मदद से बिना शाखा जाए ही जमा किया जा सकता है। बैंकों ने अपनी इन सेवाओं को अल्टरनेटिव बैंकिंग का नाम दिया है। वर्तमान बैंकिंग परिदृश्य में लगभग सभी बैंकों के 40 प्रतिशत ग्राहक अल्टरनेटिव बैंकिंग का उपयोग कर रहे हैं और उनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

जल्द ही अल्टरनेटिव बैंकिंग उपयोग करने वालों की संख्या 80 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। बैंक के ऐसे ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जो बिना ब्रांच में गए अपनी बैंकिंग के काम पूरा कर लेते हैं। इस समय केवल 15 प्रतिशत ग्राहक ही बैंक की शाखाओं में पहुंच रहे हैं।

एटीएम सबसे पुराना और लोकप्रिय
भारतीय बैंकिंग के आधुनिकीकरण में एटीएम -ऑटोमेटेड टेलर मशीन- का रोल काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। यह अल्टरनेटिव बैंकिंग का सबसे पुराना, सफल और मौजूदा माध्यम है। एटीएम मशीनों ने भारतीय बैंकिंग की दिशा बदलने में जबरदस्त रोल निभाया है। यही वजह है कि बड़े और सरकारी बैंकों के अलावा छोटे तथा को-ऑपरेटिव बैंक भी अपनी एटीएम यूनिट स्थापित करने लगे हैं। पिछले तीन वर्षों में पूरे देश में एटीएम मशीनों की संख्या दोगुनी से ज्यादा होकर एक लाख का आंकड़ा पार कर चुकी हैं।

इनमें से 70 प्रतिशत मशीनें शहरी इलाकों में लगी हैं। बाकी मशीनें कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित की गई हैं। अंतरराष्ट्रीय सर्वे एजेंसी सेलेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2016 तक एटीएम मशीनों की संख्या दोगुनी हो जाएगी, जिनमें से 50 फीसदी छोटे शहरों में लगाई जाएंगी।

कैश से कहीं ज्यादा उपयोग
वर्तमान समय में एटीएम का उपयोग केवल नगद निकासी के लिए नहीं रह गया है। इसका उपयोग डिमांड ड्राफ्ट ऑर्डर, चेकबुक ऑर्डर के साथ ही फिक्स डिपॉजिट करने के लिए भी किया जा रहा है।

रिजर्व बैंक की पहल
बैंकिंग में बदलावों के लिए भारतीय रिवर्ज बैंक ने भी खासा काम किया है। कार्ड से होने वाले भुगतान और ऑनलाइन लेन-देन की प्रक्रिया को सुगम बनाकर उसने इसका सीधा फायदा आम बैंक उपभोक्ताओं को पहुंचाया है। आरबीआई की वेबसाइट पर उपलब्ध एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 के दौरान देश में ऑनलाइन ट्रांजेक्शंस की संख्या 71 फीसदी बढ़ी है। इसी दौरान चेक से होने वाले ट्रांजेक्शंस का प्रतिशत लगातार गिरता गया। 2007-08 से 2011-12 के दौरान पेपर बेस्ड पेमेंट में 8.4 प्रतिशत की कमी देखी गई।

मोबाइल का दौर
पिछले पांच वर्षों के दौरान मोबाइल से होने वाले भुगतानों का प्रतिशत बढ़ा है। मोबाइल मनी सुविधा शुरू होने के बाद इसमें और अधिक इजाफा हुआ है। हालांकि इसके उपयोगकर्ताओं का प्रतिशत अभी काफी कम है, लेकिन माना जा रहा है कि इसमें बढ़ोतरी होगी। आरबीआई के कार्यकारी निदेशक जी. पद्मनाभन के मुताबिक मोबाइल बैंकिंग तकनीक का भविष्य उज्जवल है और इस दिशा में लगातार काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि मौजूदा भारतीय अर्थव्यवस्था में केवल दो प्रतिशत लेनदेन ही इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट के जरिए किया जा रहा है। अभी भी देश में ऐसे स्थानों की संख्या बहुत कम है, जहां कार्ड के जरिए भुगतान लिया जाता है।

  • देश के 10 मिलियन से ज्यादा रिटेलर्स में से केवल 0.6 प्रतिशत ही कार्ड से भुगतान स्वीकार करते हैं।

Monday, February 25, 2013

अंदर नक्सली और आतंकवादी, बाहर दुश्मन देश


आपमें से अधिकांश ने आतंकवादियों और लिट्टे के 'ह्यूमन बॉम्ब' के बारे में सुना होगा। लेकिन नक्सलियों ने पेट के अंदर बॉम्ब प्लांट कर सिक्योरिटी एजेंसीज से लेकर आम आदमी तक के होश उड़ा दिए हैं। अभी तक बारूदी सुरंगों के जरिए जवानों पर हमला करने वाले माओवादियों ने दहशत फैलाने की यह नया तरीका अपनाना शुरू किया है। ये वाकया झारखंड के लातेहार जिले में जारी माओवादी और सुरक्षा बलों के बीच एनकाउंटर के बाद सामने आया है। गौरतलब है कि अभी तक दुनिया में सिर्फ मानव बम जैसी घटनाएं भी सामने आईं थीं, जिसमें आतंकवादी अपने शरीर पर विस्फोटक बांधकर खुद को धमाके से उड़ा देता था।

सर्जरी से प्लांट किया था आईईडी
लातेहार के नक्सली हमले में शहीद सीआरपीएफ के जवान बाबूलाल पटेल के पेट में नक्सलियों ने 1.5 किलोग्राम की एक आईईडी सर्जरी करके प्लांट कर दी थी। रिम्स (रांची इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस) के पोस्टमार्टम हाऊस में जब डॉक्टर्स और स्टाफ ने उनकी बॉडी को पोस्टमार्टम के लिए आपॅरेट किया तो सभी डर के साथ-साथ हैरान भी रह गए। डॉक्टर्स ने इसकी जानकारी सीआरपीएफ  ऑफिसर्स को दी, तब जाकर मामला खुला। गुरुवार की सुबह हजारीबाग से आई बम डिटेक्शन एंड डिस्पोजल स्क्वॉयड (बीडीडीएस) ने दोपहर दो बजे के करीब आईईडी को डिफ्यूज कर दिया। लातेहार जिले के बरवाडीह के कटिया जंगल में सात जनवरी से 'ऑपरेशन एनाकोंडा' के तहत नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन चल रहा है।

ऐसे हुआ खुलासा
लातेहार में तीन दिनों से 'ऑपरेशन एनाकोंडा' के तहत शहीद पांच जवानों के शवों का पोस्टमार्टम नौ जनवरी की रात में डीसी विनय कुमार चौबे के निर्देश पर किया जा रहा था। टीम में शामिल डॉ. अजीत कुमार चौधरी, डॉ.विनय कुमार, पोस्टमार्टम हाऊस का कर्मचारी मोहन मलिक, राजू मलिक, टिंकू जवानों के शव का पोस्टमार्टम कर रहे थे। टीम ने दो जवान सुदेश कुमार और चम्पालाल मालवीय का शव का पोस्टमार्टम किया। उस समय बाबूलाल पटेल का शव भी मॉर्चरी में गया। जैसे ही टीम शव का पोस्टमार्टम करने की तैयारी करने लगी, उसी समय राजू चिल्लाया, सर इसका तो पहले ही पोस्टमार्टम हो चुका है। सभी ने जाकर देखा तो बाबूलाल पटेल का पेट 15 फीट लंबा चीरा हुआ था और उसे बोरा सिलने के स्टाइल में सील दिया था। जब डॉक्टर्स ने उसे छूकर देखा तो पेट के अंदर कड़ी चीज होने का अहसास हुआ। डॉक्टर्स ने तुरंत पोस्टमार्टम रोक दिया। बाहर आकर उन्होंने इसकी जानकारी रिम्स के डायरेक्टर डॉ तुलसी महतो और सीआरपीएफ के अधिकारियों को दी गई। फिर, बताया गया कि जवान के शरीर से पहले ही छेड़छाड़ की गई है। डॉक्टर्स को यह बताया गया कि घटनास्थल से ही जवान के शव को रिम्स भेजा गया है। इसके बाद सीआरपीएफ ऑफिसर्स ने जवान के शव को बाहर रखने के लिए कहा और बम निरोधक दस्ता को बुलाया गया। बम निरोधक दस्ता ने पेट के अंदर बम होने की पुष्टि की।

एक और जवान की  सिलाई
रिम्स में आए एक जवान के शव का जब पोस्टमार्टम किया जा रहा था तो उस समय भी डॉक्टर्स ने पाया कि उसके शरीर का निचला हिस्सा पूरी तरह डैमेज हो गया था। उसके पेट पर भी सिलाई के निशान मिले थे।

पहला केस आया सामने
भारत में इस तरह से बम लगाने का यह पहला मामला है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के मामले को उन्होंने कभी हैंडल नहीं किया था और यह उनका पहला अनुभव था। हालांकि, नक्सलियों द्वारा शरीर के अंग में सीरिज में बम लगाए गए थे, ताकि प्रेशर पडऩे पर बम में धमाका हो जाए और ज्यादा से ज्यादा कैजुअलटी हो। विशेषज्ञों ने बताया कि इस तरह की तकनीक को श्रीलंका में लिट्टे द्वारा उपयोग किया जाता रहा है।

लगाया था शव के नीचे बम
पुलिस को धोखा देने के लिए और ज्यादा से ज्यादा क्षति पहुंचाने की नीयत से शहीदों के शव के नीचे बम लगा रखा था। सभी शवों के नीचे लगाए गए बम को बॉम्ब स्क्वॉयड ने डिफ्यूज किया था। पर, इनमें से कुछ जवानों के शवों का पेट ऑपरेट कर उसमें बम फिट कर दिया गया था।

घटना का बैकग्राउंड
अभियान के पहले दिन नक्सलियों ने सीआरपीएफ, एसटीएफ के जवानों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसानीं शुरू कर दी। ताबड़तोड़ हमले में दस जवान शहीद हो गए और 20 जवान जख्मी हो गए थे।

डॉक्टर्स कमेंट
रिम्स के डॉ. अजीत कुमार चौधरी और लैब टेक्निशियन दयामय मुखर्जी ने बताया कि उन लोगों को पहले यह आशंका हुई कि आखिर इसका पोस्टमार्टम किसने किया है। चूंकि जिस ढंग से सिलाई की गई थी वह डॉक्टर की सिलाई नहीं लग रही थी। वह किसी पैरा मेडिकल के द्वारा सिलाई लग रही थी। फिर, शव को 15 इंच तक सिला गया था। अमूमन पेशेवर डॉक्टर किसी बॉडी को उतनी लंबाई तक नहीं सिलता। उसे बोरे की तरह सिल दिया गया था। फिर, इसकी जांच की गई कि यदि जवान का ऑपरेशन पहले ही हुआ होगा तो घाव लेकर वह 'ऑपरेशन एनाकोंडा' में भाग क्यों लेगा। इसलिए उन लोगों को शक हुआ और पोस्टमार्टम रोक दिया गया।

...तो उड़ जाता रिम्स
बीडीडीएस के अधिकारी का कहना था कि यदि सिलाई को तोड़ा जाता तो एक बड़ा ब्लास्ट भी हो सकता था। इस ब्लास्ट की चपेट में आकर रिम्स की मॉर्चरी बिल्डिंग को काफी नुकसान पहुंचता और कई लोग मारे जाते। इस तरह के बम को प्रेशर रिलीज डिवाइस बम कहा जाता है। इसमें चार-पांच लोगों के उडऩे की संभावना बनती है।

Wednesday, February 13, 2013

चार राज्यों के 42 विधायकों पर दर्ज हैं बलात्कार के मामले

असम में कांग्रेसी विधायक बिक्रम सिंह ब्रह्म को
महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से पीटा

दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश है। लोग दोषियों को फांसी और महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर कड़े कानून की मांग कर रहे हैं। लेकिन यदि सरकार में ही बैठे कई नेता बलात्कार के आरोपी हों तो फिर क्या उम्मीद की जा सकती है। उधर, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह बलात्कार के मामले में चार्जशीटेड विधायक व सांसदों को निलंबित करने का निर्देश नहीं दे सकता है। यह मामला विधायिका का है और वह उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा बलात्कारियों के नाम, फोटो और पता वेबसाइट पर सार्वजनिक करने की तैयारी बीच यह बात सामने आई है कि देशभर में 42 ऐसे विधायक हैं जिन पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज हैं, जिनमें छह ऐसे हैं जिन पर सीधे बलात्कार का आरोप है।

नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू) और एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है। यह रिपोर्ट जनप्रतिनिधियों द्वारा चुनाव में नामांकन के दौरान दायर शपथ पत्र के आधार पर तैयार की गई है। इन संस्थानों ने माना है कि कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी ऐसे नेताओं को टिकट देती है जिन पर रेप के आरोप लगे हुए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, जिन छह विधायकों पर बलात्कार के आरोप हैं उनमें से तीन उत्तर प्रदेश के हैं। ये विधायक सपा से हैं और इनके नाम श्रीभगवान शर्मा, अनूप संदा और मनोज कुमार पारस हैं। वहीं बाकी के तीन का नाम मो. अलीम खान (उप्र, भाजपा), जेठाभाई जी अहिर (गुजरात, भाजपा), कंडीकुंता वेकांता प्रसाद (तेलगू देशम पार्टी, आंध्र प्रदेश) है।

दूसरी ओर, जिन 36 विधायकों का नाम महिलाओं के शोषण के मामले में सामने आए आए हैं उनमें से छह कांग्रेस, पांच भाजपा और तीन सपा के हैं।

राज्यवार बात करें तो महिलाओं का शोषण करने वाले सबसे ज्यादा विधायक उत्तर प्रदेश से हैं। इनकी संख्या सर्वाधिक आठ हैं। इसके बाद उड़ीसा और पश्चिम बंगाल का नाम आता है, जहां के सात-सात विधायक हैं। वहीं बलात्कार के आरोपी 27 उम्मीदवारों ने पिछले साल में अलग-अलग जगह से चुनाव लड़े हैं।

एनईडब्ल्यू और एडीआर के मुताबिक अन्नाद्रमुक के सांसद एस सेममाल और तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुवेंदु अधिकारी ने यह माना है कि उन पर महिला का अपमान और उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करने का आरोप लगाया गया है। ऐसे जनप्रतिनिधियों से भला और क्या उम्मीद की जा सकती है।

विभिन्न राज्यों में महिला के खिलाफ अपराध करने वाले आरोपी विधायकों की सूची इस प्रकार है:

उत्तर प्रदेश : श्रीभगवान शर्मा, मोहम्मद अलीम खान, अनूप संदा, मनोज कुमार पारस, डॉ. रीता जोशी, रामवीर सिंह, उदय राज राजाराम
ओडिशा : डॉ. एनरुसिंहा साहू, माहेश्वरी मोहंती, शिबाजी माझी, प्रदीप महारथा, भीमसेन चौधरी, समीर रंजन दास, प्रताप चंद्र
पश्चिम बंगाल : बेचराम मन्ना, विल्सन चंप्रामरी, दीपक कुमार हल्दर, भूपेंद्रनाथ हल्दर, विश्वजीत दास, डॉ. हरका बहादुर छत्री, अशोक मल
महाराष्ट्र : अतुल देशकर, भूसे दादाजी दागादू, हर्षवर्धन जाधव, प्रकाश सावंत
झारखंड : चमरा लिंडा, बंधु तिर्की, बन्ना गुप्ता
दिल्ली : मोहन सिंह विष्ट, शोएब इकबाल
राजस्थान : नवल किशोर, भरोसी लाल
आंध्र प्रदेश : कांडीकुंता वी प्रसाद, प्रभाकर चिंतामनेनी
पंजाब : रंजीत सिंह ढिल्लन
बिहार : राम बालक सिंह
तमिलनाडु : सेंथी बालाजी
असम : अबुल कलाम आजाद
गुजरात : जेठाभाई जी अहिर
मध्य प्रदेश : मोती कश्यप
कर्नाटक : मंजू ए

Tuesday, February 12, 2013

शहरी विकास का खेल


कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया (सीएजी) की पिछले साल जारी की आखिरी रिपोर्ट में देश में शहरी विकास के नाम पर हो रहे घपले की पोल खोली गई थी। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने देश के कई शहरों में विकास के लिए जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिनुवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) नाम की योजना चला रखी है। आम बजट में इसके लिए फंड का प्रावधान भी किया गया है। लेकिन असली खेल फंड की राशि को लेकर ही खेला जा रहा है। सीएजी का कहना है कि इस मिशन के तहत जारी फंड को दूसरी योजनाओं में उपयोग किया जा रहा है और कुछ राज्यों में इसे इस्तेमाल ही नहीं किया गया है। जिस वजह से राशि लैप्स हो गई है।

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक शहरी विकास के लिए शुरू किया गया यह मिशन अपने उद्देश्य से भटककर फ्लॉप हो चुका है। साथ ही इससे जुड़े नोडल मंत्रालयों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी विकास, शहरी गरीबी उन्मूलन और आवास मंत्रालय के बीच आपसी समन्वय की कमी के साथ ही विशेषज्ञता की कमी के चलते यह मिशन विफल हुआ है।

सक्षम नहीं थे मंत्रालय
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस स्तर की वृहद योजना को लागू करने और उसकी मॉनिटरिंग करने की विशेषज्ञता मंत्रालयों के पास न होने की वजह से योजना सफल नहीं हो पाई। इन्हीं कमियों के चलते जेएनएनयूआरएम के लिए जारी फंड को डाइवर्ट करके अन्य योजनाओं में लगा दिया गया।

एक लाख करोड़ का मिशन
गौरतलब है कि इस मिशन को शहरी गरीबों के उत्थान के लिए शुरू किया गया था। योजना आयोग की पहल पर शुरू की गई इस योजना के तहत पूरे देश में एक लाख करोड़ रुपए खर्च करके विकास किया जाना था। जिसमें केंद्र सरकार ने 66084.65 करोड़ रुपए अपनी ओर से दिए थे। लेकिन अब तक इसके लिए 45066.23 करोड़ रुपए ही बजट द्वारा आवंटित किए गए हैं और इसमें से भी 40584.21 रिलीज किए गए हैं।

अधूरे हैं काम
दिल्ली, भोपाल, इंदौर, रायपुर और बिलासपुर जैसे कई शहर इस योजना की जद में हैं। लेकिन कहीं भी यह पूरी नहीं हो सकी है। यहां तक कि राष्ट्रीय राजधानी में भी जेएनएनयूआरएम के कई कार्य अधूरे पड़े हैं। जबकि मिशन का पहला चरण मार्च 2012 में ही खत्म हो जाना तय किया गया था।

आवासीय योजनाएं भी विफल
सीएजी के मुताबिक जेएनएनयूआरएम के तहत देश के कई शहरों को झुग्गी मुक्त बनाने की योजना थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि 82 आवासीय परियोजनाओं में से 73 अब तक अधूरी हैं। और तो और सात शहरों में तो इसे शुरू भी नहीं किया जा सका है।

मनचाहा इस्तेमाल
सबसे ज्यादा अनियमितता जेएनएनयूआरएम के फंड प्रबंधन में बताई गई है। सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया है कि 114.68 करोड़ रुपए का फंड अन्य योजनाओं में खर्च कर दिया गया है। इसी तरह से मई 2010 में आंध्रप्रदेश हाउसिंग बोर्ड को 72.72 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, जिसे बोर्ड ने राज्य सरकार की राजीव गृहकल्प योजना में उपयोग कर लिया है।

क्या है जेएनएनयूआरएम
दिसंबर 2005 में जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिनुवल मिशन की शुरुआत की गई थी। इसका उद्देश्य देश के शहरों में अधोसंरचना विकास और गरीबी उन्मूलन करना था। इस योजना के तहत स्थानीय प्रशासन को विकास कार्य योजनाएं तय समय में पूरी करना था।

  • 2005 से 2012 के बीच इस योजना में एक लाख करोड़ रुपए खर्च किया जाना था। इसके लिए केंद्र सरकार ने 66.09 हजार करोड़ रुपए दिए।
  • शुरुआत में इस मिशन को देश के 65 शहरों में लागू किया गया था।
  • जेएनएनयूआरएम के अंतर्गत दो उप-मिशन भी बनाए गए थे, जिसमें शहरी अधोसंरचना और शहरी गरीबों के लिए आधारभूत सुविधाएं मुहैया कराना था।
  • शहरी विकास, शहरी गरीबी उन्मूलन और आवास मंत्रालय को इसके लिए बतौर नोडल एजेंसी काम करना था।

हार्ड फैक्ट्स

  • 16.07 लाख रुपए ड्वेलिंग यूनिट्स के लिए जारी किए गए, जिसमें से 4.18 लाख के काम मार्च 2011 तक पूरा होना था। जबकि खर्च हुए केवल 2.21 लाख।
  • 56 सीवरेज और पाइपलाइन प्रोजेक्ट अप्रूव किए गए थे, जिसमें से केवल चार ही पूरे हुए हैं।
  • 19 सड़कें और फ्लाइओवर बनाए जाने थे, लेकिन चार ही बन सके।
  • 37 वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट्स में से तीन ही पूरे हुए हैं।

फेल हुए रिफॉर्म्स

  • शहरी विकास मंत्रालय ने जेएनएनयूआरएम की मॉनिटरिंग के लिए वेब आधारित ऑनलाइन सिस्टम विकसित किया था। हालांकि उसने भी दम तोड़ दिया।
  • केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी रही।
  • अधिकतर डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोट्र्स में पर्यावरण एवं सामाजिक प्रभावों का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।

राष्ट्रीय शर्म के विषय



एक देश जो उपग्रह प्रक्षेपित करने और बनाने में सक्षम हो, परमाणु विखंडन में अपनी पकड़ बना रहा हो। उसके लिए बलात्कार के अलावा और भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां उसे राष्ट्रीय शर्म का सामना करना पड़ रहा है। ब्रिटेन ने अपनी राजधानी लंदन के बीचो-बीच के गुजरने वाले थेम्स नदी की सफाई की योजना बनाई और उसे सफलतापूर्वक पूरा किया। वहीं भारत की राजधानी दिल्ली से होकर बहने वाली यमुना के हालात ऐसे हैं कि उसके आसपास से गुजरने वाले को भी नाक ढंककर निकलना पड़ता है।

आइए कुछ ऐसे ही विषयों की पड़ताल करें, जिनमें सुधार के बिना देश की छवि को बदलना नामुमकिन है:

तोंदु पुलिस बल
पिछले तीन दशकों में आतंकवाद और हमलों ने अपना रूप काफी बदल लिया है। ऐसे में जरूरत ऐसे पुलिसवालों की है, जो कमांडो की तर्ज पर एक्शन ले सकें और कानून तोडऩे वालों में जिनका खौफ हो। लेकिन ऐसा नहीं है। देश के हर राज्य में पुलिस बल तोंदु होता जा रहा है। इसका असर इनकी सक्रियता और डयूटी पर भी दिखाई देता है। अपराध रोकने के लिए इनका फिट रहना भी जरूरी है।

यमुना
यमुना नदी का उल्लेख 1700-1100 ईसवी पूर्व लिखे गए ऋग्वेद में भी मिलता है। वेदों में पूजनीय बताई गई इस नदी की हालत इतनी बदतर हो चुकी है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रदूषण पर जारी अपनी रिपोर्ट में यमुना को गंदे नाले से भी गया-गुजरा बताया है। वहीं लंदन की थेम्स और पेरिस की सीन नदी को देखकर पता चलता है कि कौन सा देश नदियों को कितना महत्व दे रहा है।

मृत्युदंड
किसी भी सभ्य समाज में मृत्युदंड को सही नहीं माना जाता है। हालांकि 26/11 की घटना के मुख्य आरोपी अजमल कसाब को फांसी दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि मृत्युदंड देने के कानूनी पहलुओं पर विचार किया जाना आवश्यक है।

रेलवे टॉयलेट्स
देश के एक रेलमंत्री में एक बयान में कहा था कि भारतीय रेलवे ट्रैक दुनिया के सबसे बड़े ओपन टॉयलेट हैं। भारतीय रेलों में आज भी ऐसे टॉयलेट नहीं लगाए जा सके हैं, जो पर्यावरण को दूषित न करें।

सीवेज की सफाई
हमारे देश में आज भी सीवेज की सफाई के लिए कामगारों को नियुक्त किया जाता है। महाशक्ति बनते देश की राजधानी में हर साल कई सफाईकर्मियों की मौत सीवेज में उतरने और वहां की जहरीली गैस की वजह से हो जाती है। यह हालात तब हैं, जबकि देश में मैला ढोना गैरकानूनी है।

यूनिवर्सल ब्रॉडबैंड
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के तकनीकी सलाहकार राज रेड्डी ने कहा था कि किसी भी देश के विकास के लिए सूचनाओं का आम लोगों तक पहुंचना बहुत जरूरी है। उनका तर्क था कि असाक्षर व्यक्ति भी चित्रों और चिन्हों के जरिए संदेश समझ सकता है। इसलिए ब्रॉडबैंड के जरिए इंटरनेट से दी जाने वाली सरल सूचनाएं हर आम-ओ-खास के लिए लाभकारी होती हैं।

बुलेट ट्रेन
चीन ने हाल ही में दुनिया की सबसे तेज चलने वाली बुलेट ट्रेन की सबसे लंबे रूट की सेवा शुरू की है। बीजिंग के गुआंग्जू के बीच की 2298 किलोमीटर की दूरी को यह ट्रेन 300 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से पूरा करती है। वहीं इसके मुकाबले भारत में ट्रेनों की औसत गति मात्र 85 किलोमीटर प्रति घंटा है। युवा भारतीय चाहते हैं कि उन्हें काम के लिए ज्यादा से ज्यादा वक्त मिले। इसके लिए तेज ट्रांसपोर्टेशन होना बहुत जरूरी है।