Saturday, January 25, 2014

किस करवट बैठेगा 'आप' का ऊंट

आम आदमी पार्टी यानी 'आप' ने बहुत ही कम वक्त में वो शोहरत और कामयाबी हासिल की है, जो अब तक देश में किसी भी दूसरी पार्टी को नहीं मिली है। अपने गठन के महज एक वर्ष के अंदर उन्होंने दिल्ली के राज्य विधान सभा चुनावों में अप्रत्याशित जीत हासिल की, समर्थन से ही सही दिल्ली में सरकार भी बनाई। इसके बाद शुरू हुआ विवादों का सिलसिला, जो अब तक जारी है।
दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की वजह से पार्टी को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। दिल्ली सरकार ने दो पुलिसवालों के तबादले तथा निलंबन को लेकर सड़क पर आंदोलन किया। केंद्र सरकार के साथ सीधे आमना सामना भी हुआ, लेकिन अंततोगत्वा जीत केंद्र सरकार ही हुई।
केंद्रीय गृह मंत्रालय पुलिसवालों को छुट्टी पर भेज दिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपना धरना वापस ले लिया। दिल्ली के मुख्यमंत्री के इस कदम से यह तो स्पष्ट हो गया कि उनके पास प्रशासनिक अनुभव और दृष्ट‍ि की कमी है। दिल्ली में बिजली के दाम करने का उनका फैसला भी सराहा नहीं जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। शुक्रवार को एक टीवी चैनल से बातचीत में पार्टी के शीर्ष नेता योगेंद्र यादव ने भी यह तो मान ही लिया कि उनकी पार्टी की सरकार के कुछ फैसले अनुभवहीनता की वजह से हुए हैं। यहां तक कि उनके मंत्रियों के बड़बोलेपन का खामियाजा भी पार्टी को ही उठाना पड़ रहा है। दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर जो आरोप लगे हैं, पार्टी उनपर ध्यान नहीं दे रही है। उलटा मीडिया के बिकाऊ होने की बात कही जा रही है।
पार्टी जिस तेजी से आगे बढ़ी है, संभव है उसी तेजी से उसकी ख्याति में सेंध भी लगे। दरअसल खुद को पाक साफ बताने वाली आम आदमी पार्टी की सदस्यता हासिल करना कठिन नहीं है। इसलिए इससे कोई भी शख्स जुड़ सकता है। पार्टी ने बताया कि उसके सदस्यों की संख्या का आंकड़ा 50 लाख तक पहुंच चुका है। इस आंकड़े के साथ ही विवादों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। कुछ दिनों पहले ही खबर आई थी, कि किसी ने दाऊद इब्राहिम के नाम से भी पार्टी की सदस्यता हासिल कर ली थी।
कहने का मतलब यह है कि पार्टी का सदस्य बनना काफी आसान है और कोई भी बन सकता है। लेकिन डर सिर्फ इस बात का है कि अपराधियों से लेकर हर वो आदमी पार्टी का सदस्य बन सकता जो विवादास्पद है। 'आप' की विरोधी पार्टियां भी अपने लोगों को पार्टी में शामिल करा सकती हैं ताकि पार्टी के अंदर अराजकता फैला सके। नई पार्टी के लिए ये सब चीजें एक गंभीर समस्या पैदा कर सकती हैं।
पार्टी के पास नए सदस्यों के बारे में जानकारी जुटाने का कोई तंत्र या व्यवस्था नहीं है। आम आदमी पार्टी के गठन के वक्त अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी पार्टी में केवल उन्हीं लोगों को शामिल किया जाएगा, जो पाक-साफ होंगे। यह कहा जा सकता है कि 'आप' एक फैशन भी बन गया है। लोगों को आम आदमी पार्टी ज्वॉइन करने और मैं हूं आम आदमी लिखी हुई टोपी पहनने में मजा आने लगा है। स्पष्ट नीतियों के अभाव में 'आप' के नाम पर अराजकता भी फैल रही है। कुछ दिनों पहले ही बिहार में कुछ लोगों ने आप के नाम पर हुड़दंग मचाया था। बाद में पता चला था कि आम आदमी पार्टी से उनको कोई लेनदेन नही था।
केवल स्वयंसेवकों के बूते पर आखिर यह पार्टी कब तक चलेगी। अगर भारत के राजनीतिक पटल पर इन्हें अपनी छाप छोड़नी है और वाकई बदलाव लाना है तो कई गंभीर और दूरगामी फैसले लेने होंगे। आम आदमी पार्टी से इन्हें ऐसे लोगों को भी जोड़ना होगा जो राजनीति को कीचड़ मानते हैं और इससे दूर ही रहना चाहते हैं। पेशेवरों को अपने साथ जोड़ना होगा तथा गुटबाजी फैलाने वालों एवं खुद को मठाधीश समझने वालों से पार पाना होगा।

किस करवट बैठेगा 'आप' का ऊंट

आम आदमी पार्टी यानी 'आप' ने बहुत ही कम वक्त में वो शोहरत और कामयाबी हासिल की है, जो अब तक देश में किसी भी दूसरी पार्टी को नहीं मिली है। अपने गठन के महज एक वर्ष के अंदर उन्होंने दिल्ली के राज्य विधान सभा चुनावों में अप्रत्याशित जीत हासिल की, समर्थन से ही सही दिल्ली में सरकार भी बनाई। इसके बाद शुरू हुआ विवादों का सिलसिला, जो अब तक जारी है।
दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की वजह से पार्टी को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। दिल्ली सरकार ने दो पुलिसवालों के तबादले तथा निलंबन को लेकर सड़क पर आंदोलन किया। केंद्र सरकार के साथ सीधे आमना सामना भी हुआ, लेकिन अंततोगत्वा जीत केंद्र सरकार ही हुई।
केंद्रीय गृह मंत्रालय पुलिसवालों को छुट्टी पर भेज दिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपना धरना वापस ले लिया। दिल्ली के मुख्यमंत्री के इस कदम से यह तो स्पष्ट हो गया कि उनके पास प्रशासनिक अनुभव और दृष्ट‍ि की कमी है। दिल्ली में बिजली के दाम करने का उनका फैसला भी सराहा नहीं जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। शुक्रवार को एक टीवी चैनल से बातचीत में पार्टी के शीर्ष नेता योगेंद्र यादव ने भी यह तो मान ही लिया कि उनकी पार्टी की सरकार के कुछ फैसले अनुभवहीनता की वजह से हुए हैं। यहां तक कि उनके मंत्रियों के बड़बोलेपन का खामियाजा भी पार्टी को ही उठाना पड़ रहा है। दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर जो आरोप लगे हैं, पार्टी उनपर ध्यान नहीं दे रही है। उलटा मीडिया के बिकाऊ होने की बात कही जा रही है।
पार्टी जिस तेजी से आगे बढ़ी है, संभव है उसी तेजी से उसकी ख्याति में सेंध भी लगे। दरअसल खुद को पाक साफ बताने वाली आम आदमी पार्टी की सदस्यता हासिल करना कठिन नहीं है। इसलिए इससे कोई भी शख्स जुड़ सकता है। पार्टी ने बताया कि उसके सदस्यों की संख्या का आंकड़ा 50 लाख तक पहुंच चुका है। इस आंकड़े के साथ ही विवादों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। कुछ दिनों पहले ही खबर आई थी, कि किसी ने दाऊद इब्राहिम के नाम से भी पार्टी की सदस्यता हासिल कर ली थी।
कहने का मतलब यह है कि पार्टी का सदस्य बनना काफी आसान है और कोई भी बन सकता है। लेकिन डर सिर्फ इस बात का है कि अपराधियों से लेकर हर वो आदमी पार्टी का सदस्य बन सकता जो विवादास्पद है। 'आप' की विरोधी पार्टियां भी अपने लोगों को पार्टी में शामिल करा सकती हैं ताकि पार्टी के अंदर अराजकता फैला सके। नई पार्टी के लिए ये सब चीजें एक गंभीर समस्या पैदा कर सकती हैं।
पार्टी के पास नए सदस्यों के बारे में जानकारी जुटाने का कोई तंत्र या व्यवस्था नहीं है। आम आदमी पार्टी के गठन के वक्त अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी पार्टी में केवल उन्हीं लोगों को शामिल किया जाएगा, जो पाक-साफ होंगे। यह कहा जा सकता है कि 'आप' एक फैशन भी बन गया है। लोगों को आम आदमी पार्टी ज्वॉइन करने और मैं हूं आम आदमी लिखी हुई टोपी पहनने में मजा आने लगा है। स्पष्ट नीतियों के अभाव में 'आप' के नाम पर अराजकता भी फैल रही है। कुछ दिनों पहले ही बिहार में कुछ लोगों ने आप के नाम पर हुड़दंग मचाया था। बाद में पता चला था कि आम आदमी पार्टी से उनको कोई लेनदेन नही था।
केवल स्वयंसेवकों के बूते पर आखिर यह पार्टी कब तक चलेगी। अगर भारत के राजनीतिक पटल पर इन्हें अपनी छाप छोड़नी है और वाकई बदलाव लाना है तो कई गंभीर और दूरगामी फैसले लेने होंगे। आम आदमी पार्टी से इन्हें ऐसे लोगों को भी जोड़ना होगा जो राजनीति को कीचड़ मानते हैं और इससे दूर ही रहना चाहते हैं। पेशेवरों को अपने साथ जोड़ना होगा तथा गुटबाजी फैलाने वालों एवं खुद को मठाधीश समझने वालों से पार पाना होगा।

Friday, January 3, 2014

उफ्फ ये आलीशान सादगी

आम आदमी पार्टी यानी आप ने भ्रष्टाचार हटाने और सुशासन लाने के नाम पर खूब प्रचार किया और उन्हें इसका फल भी मिला। दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्हें अप्रत्याशित जीत हासिल हुई और पंद्रह वर्षों से सत्ता पर काबिज कांग्रेस पार्टी पर झाड़ू फिर गई। काफी उठा पटक के बाद अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाने की हामी भरी और कांग्रेस पार्टी ने समर्थन भी दिया।
इसके बाद सादगी के ओवरडोज से भरे भाषणों का दौर शुरू हुआ। लालबत्ती, सरकारी गाड़ी और बंगला न लेने की घोषणाओं की बाढ़ आ गई। दिल्ली विधानसभा के सत्र के पहले दिन सादगी दिखाई भी दी। क्योंकि कोई ऑटो से पहुंचा था तो कोई रिक्शे से। हालांकि यह सादगी का चोला केवल छह दिन में ही उतर गया।
अरविंद केजरीवाल जल्द ही दस कमरों के फ्लैट में रहने के लिए जाने वाले हैं। इतना ही नहीं उनके मंत्रिमंडल के साथी भी वीआईपी नंबरों वाले एसयूवी वाहनों में सचिवालय पहुंचने लगे। तिस पर मनीष सिसोदिया का तर्क कि उनकी पार्टी ने लालबत्ती न लेने की बात कही थीं और बंगलों में न रहने की बात की थी। बिना लालबत्ती की कार और सरकारी फ्लैट में तो रहना जायज बताया।
एक क्षेत्रीय कहावत में इसे गुड़ खाना और गुलगुले से परहेज करना भी कहा जाता है। आम आदमी पार्टी के उदय के साथ लोगों ने काफी उम्मीदें बनाई हैं। लेकिन यह कब तक कायम रहेगी यह कहना मुश्किल लग रहा है। अगर इसे सादगी कहते हैं तो फिर ममता बनर्जी और मानिक सरकार को क्या कहेंगे। लाल बहादुर शास्त्री और महात्मा गांधी को क्या कहेंगे।

Friday, November 29, 2013

पत्रकार या पैसा जुगाड़ने में माहिर व्यवसायी?

अभी तक आप तरुण तेजपाल को तहलका डॉट कॉम और तहलका पत्रिका के संस्थापक, प्रखर पत्रकार और चिंतक के रूप में ही जानते आए हैं। लेकिन आपको यह जानकारी नहीं है कि पत्रकारिता के साथ-साथ तरुण का व्यावसायिक सम्राज्य कितना फैला हुआ है या नियम विरुद्ध उन्होंने कहां-कहां जमीनें खरीद रखी हैं?

क्या आपको पता है कि तरुण तेजपाल की कम से कम आठ कंपनियों में और उनकी बहन नीना तेजपाल शर्मा की चार कंपनियों में हिस्सेदारी है? इनमें से अधिकांश कंपनियां पिछले दो सालों से नुकसान उठा रही हैं, फिर भी निवेशक इनमें पैसा लगाना क्यों व कैसे जारी रखे हुए हैं?

जिन निवेशकों ने तरुण तेजपाल की कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदी है, उन्होंने यह खरीदी बाजार भाव से काफी ज्यादा कीमत पर की है और नुकसान होने पर भी अपनी हिस्सेदारी नहीं बेची, क्यों व कैसे? यह 'क्यों व कैसे" बड़े सवाल बनकर सामने आते हैं, जब हमें पता चलता है कि पिछले साल मारे गए उत्तर प्रदेश के कुख्यात शराब माफिया पोंटी चड्ढा की कंपनी के साथ भी तेजपाल के व्यावसायिक संबंध थे और शायद आज भी हैं।

कंपनियां और तरुण की हिस्सेदारी

थिंकवर्क्स प्रायवेट लिमिटेड : 80 प्रतिशत
तहलका डॉट कॉम : 1.99 प्रतिशत
अनंत मीडिया प्रायवेट लिमिटेड : 19.25 प्रतिशत
एओडी लॉज्स प्रायवेट लिमिटेड : 50 प्रतिशत
चेस्टनट हाइट्स रिसोर्ट्स प्रायवेट लिमिटेड : 25 प्रतिशत
अमरमान इंडिया प्रायवेट लिमिटेड : 70 प्रतिशत
थ्राइविंग आर्ट्स प्रायवेट लिमिटेड : 80 प्रतिशत
एडर आर्ट्स प्रायवेट लिमिटेड : 0.02 प्रतिशत
अनंत मीडिया प्रालि. : राज्यसभा सांसद का पैसा

साप्ताहिक समाचार पत्रिका तहलका का प्रकाशन करने वाली इस कंपनी में तरुण तेजपाल की 19.25 फीसद हिस्सेदारी है। वित्त वर्ष 2011-12 में इस कंपनी को 13 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। इसमें 65.75 फीसद हिस्सेदारी रखने वाली कंपनी रॉयल बिल्डिंग एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर के 50 फीसद शेयर राज्यसभा सांसद केडी सिंह की कंपनी के पास हैं, जो बकौल उनके, सिर्फ व शुद्ध रूप से व्यावसायिक मकसद से खरीदे गए।

वर्ष 2011-12 के पहले अनंत मीडिया में केडी सिंह की कंपनी की हिस्सेदारी 30 फीसद थी, जिसे बाद में बढ़ाया गया और प्रीमियम पर 25.39 करोड़ रुपए में तेजपाल की कंपनी के शेयर खरीदे गए। यही नहीं, रॉयल बिल्डिंग एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर ने वर्ष 2011-12 में अनंत मीडिया को 19.6 करोड़ रुपए अनसिक्योर्ड लोन के रूप में भी दिए।

पोंटी चड्ढा का पैसा
पिछले साल अपने ही भाई के हाथों मारे गए उत्तर प्रदेश के कुख्यात शराब माफिया पोंटी चड्ढा की कंपनी वेव इंडस्ट्रीज ने भी तेजपाल की एक कंपनी थ्राइविंग आर्ट्स प्रालि. में पैसा लगाया। यह कंपनी वित्त वर्ष 2011-12 में ही खड़ी की गई थी और तेजपाल के एलीट आर्ट एंड डिनर क्लब 'प्रूफ्रॉक" की मालिक है।

चड्ढा ने कंपनी में 11,111 शेयर 1,800 रुपए प्रति शेयर की कीमत पर खरीदे यानी 1.999 करोड़ रुपए लगाए, जबकि इन शेयरों का अंकित मूल्य 10 रुपए प्रति शेयर था। सवाल उठता है कि चड्ढा ने इतनी ज्यादा कीमत पर हिस्सेदारी क्यों खरीदी, जबकि न तो तेजपाल की कंपनी के शेयरों को लेकर मारा-मारी थी और न ही उनकी कंपनियां मुनाफा कमा रही थीं।

फिर चड्ढा ने घाटे वाले समूह में पैसा क्यों लगाया? मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक हालांकि चड्ढा मारा गया, लेकिन उसके बेटे ने अपने पिता के सभी व्यावसायिक करारों को निभाने की इच्छा जताई है।

थिंकफेस्ट की कर्ताधर्ता कंपनी मुनाफे में कैसे
तरुण की ही कंपनी थिंकवर्क्स प्रालि. गोआ में होने वाले 'थिंकफेस्ट' का आयोजन करती है। सिर्फ यही कंपनी है, जो मुनाफे में है। थिंकवर्क्स को सबसे पहले बबलर बुक्स के नाम से फरवरी 2010 में खड़ी की गई थी।
इसमें तरुण तेजपाल की 80 फीसद हिस्सेदारी है, जबकि तेजपाल की बहन नीना तेजपाल शर्मा व तहलका की अभी तक मैनेजिंग एडिटर रही शोमा चौधरी के पास 10-10 फीसद हिस्सेदारी है। पहले साल यानी 2011-12 में इस कंपनी ने थिंकफेस्ट से कोई मुनाफा नहीं कमाया, जबकि पिछले साल इसे 1.99 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ।

इस साल थिंकफेस्ट 2013 का आयोजन बड़े पैमाने पर व फाइव स्टार होटल में किया गया, जिसमें रॉबर्ट डी नीरो, अमिताभ बच्चन, जावेद अख्तर समेत देश व दुनिया से बड़ी-बड़ी हस्तियां शामिल हुईं। यह भी गौर करने वाली बात है कि इस साल के इवेंट को कम से कम 34 बड़े कॉर्पोरेट दिग्गजों व सरकारी कंपनियों ने सह प्रायोजित किया।

इनमें भारती एयरटेल, एस्सार, डीएलएफ, कोका-कोला, यूनिटेक, वेव इंडस्ट्रीज, टोयोटा, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स, इंडसइंड बैंक व गोआ टूरिज्म शामिल हैं।

उत्तराखंड में जमीन व रिसोर्ट
तरुण तेजपाल व उनकी पत्नी गीतन बत्रा के नाम से उत्तराखंड में नैनीताल शहर से कुछ दूरी पर पहाड़ी वादियों में जमीनें व प्रॉपर्टी भी है। गेथिया गांव में मौजूद इन प्रॉपर्टीज में दो चिमनियां और एक हरा-भरा व खूबसूरत रिसोर्ट शामिल है।

चर्चा यह भी है कि तेजपाल परिवार के पास उत्तराखंड में और भी प्रॉपर्टीज हैं। नैनीताल जिला प्रशासन ने इनकी खोजबीन करनी शुरू कर दी है। जिला प्रशासन के मुताबिक तरुण तेजपाल के नाम यहां 14 नली (1 नली यानी 240 स्क्वैयर यार्ड और एक स्क्वैयर यार्ड यानी 9 वर्गफुट) जमीन है।

उनकी पत्नी के नाम पर भी 5 नली जमीन है। यानी तेजपाल दंपति के नाम यहां कुल 4560 स्क्वैयर यार्ड जमीन है, जबकि उत्तराखंड सरकार के नियमों के मुताबिक किसी अन्य राज्य के निवासी यहां 250 स्क्वैयर यार्ड से ज्यादा जमीन नहीं खरीद सकते। तेजपाल ने यह कहते हुए नियमों में ढील मांगी थी कि उन्होंने वर्ष 2003 में नए नियम बनने से पहले जमीन खरीद ली थी।

Monday, November 25, 2013

विकास के खोखले दावे

बात चाहे देश की हो या प्रदेश की, विकास और तरक्‍की की बात करते नेताओं का दम नहीं फूलता है। सबका एक ही राग रहता है कि उन्‍होंने अपने इलाके, प्रदेश या देश को जन्‍नत बना दिया है। जबकि सच्‍चाई यह है कि उनके यह दावे न सिर्फ खोखले होते हैं बल्कि हकीकत से कई प्रकाश वर्ष की दूरी पर होते हैं।

इसे कहने के पीछे कोई राजनीतिक प्रभाव या दुराभाव नहीं है, बल्कि ठोस कारण हैं। चलिए एक उदाहरण के जरिए बात करते हैं। मान लीजिए कोई बड़ा नेता या फिर उसके परिवार का कोई सदस्‍य बीमार हो जाए तो क्‍या वो अपने राज्‍य या फिर जिले के सरकारी अस्‍पताल में इलाज कराने जाता है। यहां यह याद रखना जरूरी है कि स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे भी वही नेता करता रहा होगा। या फिर चुनावों के वक्‍त उसे अपनी उप‍लब्धियों में शामिल किया होगा।

अच्‍छी शिक्षा की माला जपने वाले नेताओं के बच्‍चे क्‍या सरकारी स्‍कूल और कॉलेज में पढ़ते हैं। नहीं। तो फिर इनके नाम पर वोट मांगने से पहले जरा भी लाज नहीं आती है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस देश में अलग-अलग प्रकार के नागरिक और लोग रहते हैं। एक शासक वर्ग और दूसरी वो आम जनता जिसे मूर्ख समझा और बनाया जाता है।

मगर, यही नेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते वक्‍त शायद यह भूल जाते हैं कि उनकी कथनी और करनी पर आम नागरिकों की नजर रहती है। लैपटॉप या मोबाइल बांटकर पांच साल तक सत्‍ता सुख चाहने वालों की आत्‍माएं शायद मर चुकी हैं। चुनाव प्रचार के दौरान दर-दर हाथ फैलाने वाले नेता जीतने के बाद रसूख, पैसे और सत्‍ता के नशे में ऐसे चूर होते हैं कि उन्‍हें सबकुछ दिखना भूल जाता है। अरबों-करोड़ों रुपयों का घोटाला करने वालों को लगने लगता है कि 30 या 35 रुपए रोज बमुश्किल कमाने वाले गरीब नहीं रह गए हैं, बल्कि वो अमीर हो गए हैं। यदि नेताओं का बस चले तो वो उन्‍हें जीने के लिए हवा भी नसीब न होने दें।

कोई कहता है कि गरीब लोग दो वक्‍त खाने लगे हैं इसलिए देश में अन्‍न का संकट गहराता है तो कोई यह कहता है कि दो सब्जियां खाने वाले लोगों की वजह से महंगाई बढ़ रही है। शायद सफेद कुरते पहनने वाले काले चरित्र वाले नेता चाहते हैं कि लोग भूखे ही मरें, तभी देश की अर्थव्‍यवस्‍था सही चल सकेगी।

बड़बोले नेताओं की अक्‍ल तो देखिए, उनका कहना है कि गरीबी और गरीब तो मन का विकार होता है। यह इस देश की दुर्दशा ही है कि यहां ऐसे लोग राज कर रहे हैं, जिन्‍हें आम लोगों से कोई लेना देना नहीं है। जिसने कभी घंटों लाइन में लगकर ट्रेन का टिकट हासिल न किया हो और धक्‍के खाकर बस का सफर न किया हो, वो क्‍या जाने कि आम नागरिक अपनी जिंदगी कैसे जीते हैं।

उम्‍मीद है लोकतंत्र के महापर्व में लोग जागरूक होंगे और धूर्तों को कुर्सी से दूर करेंगे।

Sunday, September 29, 2013

जैसी जनता वैसी व्यवस्था और सरकार

देश के किसी भी कोने में चले जाइए, किसी भी पान की दुकान पर या शाम को बाजार या मोहल्लों में होने वाली पटियेबाजी पर। आपको देश की राजनीति और देश की दुर्दशा पर टिप्पणी करते विशेषज्ञ जरूर मिल जाएंगे। घोटालों से लेकर सियासी दांवपेच के बारे में उनका विश्लेषण सुनने लायक होता है। सभी यह मानते हैं कि हमारा देश भ्रष्टाचार और गंदी राजनीति का शिकार है। लेकिन क्या सारा दोष नेताओं पर मढना जायज है। जरा सोचिए।

नेता मंगल ग्रह से तो आए नहीं हैं जो हम पर राज कर रहे हैं। हमारे और आपके बीच में से ही चुनकर भेजे गए है। हम ही उनको भेजते हैं और फिर कोसते हैं। व्यवस्था पर दोष भी मढते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में चुनाव में नकारने का अधिकार देने की बात कही है। इससे पहले दोषियों को संसद और विधानसभाओं से दूर रखने का आदेश भी दिया था, जिसके खिलाफ केंद्र सरकार ने अध्यादेश पारित कर दिया था।

हम यानि आम जनता का मानस यह है कि तंत्र की बेकार है, उसे सुधारना होगा। इस तरह जिम्मेदारी टालने से बात नहीं बनने वाली है। व्यवस्था को सुधारना हमारे हाथों में ही है। इसके लिए सरकार या सुप्रीम कोर्ट का मुंह ताकने की कतई जरूरत नहीं पडे अगर थोडी समझदारी से काम लिया जाए। मसलन, आपको चुनावों में कोई पसंद नहीं है तो राइट टू रिजेक्ट के अलावा वोट न डालने का निर्णय भी तो कानून में दिया गया है। बस आपको पोल बूथ जाकर यह बताना होगा कि आपको किसी को भी वोट नहीं देना है।

इसी तरह से अगर आप अपने जनप्रतिनिधि से संतुष्ट नहीं हैं तो उसका सामाजिक बहिष्कार शुरू करिए, क्योंकि जनता ही उनकी ताकत है और जनता ही उनकी कमजोरी भी है।

लेकिन इससे भी जरूरी है खुद को बदलना। खुद सोचिए कि ईमानदार व्यवस्था की चाह रखने वाले आप और हम खुद कितने ईमानदार हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे काम होते हैं जहां आप भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं। चाहे वो सामान की खरीदारी हो या फिर​ किसी सरकारी दफ्तर से काम करवाना।

अगर लाइसेंस बनवाना हो तो एजेंट खोजते हैं। कोई सर्टिफिकेट बनवाना हो तो जुगाड निकालते हैं। जान पहचान के दम पर काम करवाना मानो शान की बात समझा जाता है। कोई नेता से पहचान का रौब दिखाता है तो कोई सरकारी अधिकारी का। पुलिस वालों से दोस्ती का भी इस्तेमाल किया जाता है। ट्रैफिक पुलिस पकड ले तो तुरंत जेब से फोन निकालकर किसी से बात करवाने लगते है। सडक पर रेड लाइट हो तब भी उसे क्रॉस करना मानो शान की बात है।

अगर हम अपना सिविक सेंस सुधारेंगे तो व्यवस्था भी सुधरने लगेगी और नेता भी लाइन पर आ जाएंगे। आखिर व्यवस्था हमारे लिए हैं, तो उसे बनाए रखना भी हमारी जिम्मेदारी ही तो है।

जैसी जनता वैसी व्यवस्था और सरकार

देश के किसी भी कोने में चले जाइए, किसी भी पान की दुकान पर या शाम को बाजार या मोहल्लों में होने वाली पटियेबाजी पर। आपको देश की राजनीति और देश की दुर्दशा पर टिप्पणी करते विशेषज्ञ जरूर मिल जाएंगे। घोटालों से लेकर सियासी दांवपेच के बारे में उनका विश्लेषण सुनने लायक होता है। सभी यह मानते हैं कि हमारा देश भ्रष्टाचार और गंदी राजनीति का शिकार है। लेकिन क्या सारा दोष नेताओं पर मढना जायज है। जरा सोचिए।

नेता मंगल ग्रह से तो आए नहीं हैं जो हम पर राज कर रहे हैं। हमारे और आपके बीच में से ही चुनकर भेजे गए है। हम ही उनको भेजते हैं और फिर कोसते हैं। व्यवस्था पर दोष भी मढते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में चुनाव में नकारने का अधिकार देने की बात कही है। इससे पहले दोषियों को संसद और विधानसभाओं से दूर रखने का आदेश भी दिया था, जिसके खिलाफ केंद्र सरकार ने अध्यादेश पारित कर दिया था।

हम यानि आम जनता का मानस यह है कि तंत्र की बेकार है, उसे सुधारना होगा। इस तरह जिम्मेदारी टालने से बात नहीं बनने वाली है। व्यवस्था को सुधारना हमारे हाथों में ही है। इसके लिए सरकार या सुप्रीम कोर्ट का मुंह ताकने की कतई जरूरत नहीं पडे अगर थोडी समझदारी से काम लिया जाए। मसलन, आपको चुनावों में कोई पसंद नहीं है तो राइट टू रिजेक्ट के अलावा वोट न डालने का निर्णय भी तो कानून में दिया गया है। बस आपको पोल बूथ जाकर यह बताना होगा कि आपको किसी को भी वोट नहीं देना है।

इसी तरह से अगर आप अपने जनप्रतिनिधि से संतुष्ट नहीं हैं तो उसका सामाजिक बहिष्कार शुरू करिए, क्योंकि जनता ही उनकी ताकत है और जनता ही उनकी कमजोरी भी है।

लेकिन इससे भी जरूरी है खुद को बदलना। खुद सोचिए कि ईमानदार व्यवस्था की चाह रखने वाले आप और हम खुद कितने ईमानदार हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे काम होते हैं जहां आप भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं। चाहे वो सामान की खरीदारी हो या फिर​ किसी सरकारी दफ्तर से काम करवाना।

अगर लाइसेंस बनवाना हो तो एजेंट खोजते हैं। कोई सर्टिफिकेट बनवाना हो तो जुगाड निकालते हैं। जान पहचान के दम पर काम करवाना मानो शान की बात समझा जाता है। कोई नेता से पहचान का रौब दिखाता है तो कोई सरकारी अधिकारी का। पुलिस वालों से दोस्ती का भी इस्तेमाल किया जाता है। ट्रैफिक पुलिस पकड ले तो तुरंत जेब से फोन निकालकर किसी से बात करवाने लगते है। सडक पर रेड लाइट हो तब भी उसे क्रॉस करना मानो शान की बात है।

अगर हम अपना सिविक सेंस सुधारेंगे तो व्यवस्था भी सुधरने लगेगी और नेता भी लाइन पर आ जाएंगे। आखिर व्यवस्था हमारे लिए हैं, तो उसे बनाए रखना भी हमारी जिम्मेदारी ही तो है।