Friday, November 16, 2007

आईबीएन 7 ने माफ़ी मांगी


आईबीएन 7 ने अपने '' किस पर रोक नहीं'' कार्यक्रम के लिए खेद व्यक्त किया है. इस कार्यक्रम में चैनल ने चुम्बन के दृश्य को दिखाया था. जिसपर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नाराज़गी जताई थी. चैनल ने इस के लिए खेद व्यक्त करते हुए कहा कि आगे इस बात का ध्यान रखा जाएगा. यह ख़बर बोल हल्ला ने दी.

Thursday, November 15, 2007

एनडीटीवी लाएगा नया चैनल

लीजये एक और ख़बर. एनडीटीवी अब मनोरंजन क्षेत्र में भी कदम रखने जा रहा है। इसके लिए वह जनवरी, 2008 के पहले सप्ताह से एक नया चैनल 'इमैजिन' शुरू करने जा रहा है। इस एंटरटेनमेंट चैनल में समाज के हर तबके को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रमों का चुनाव किया गया है.

इससे पहले ख़बर आई थी कि एनडीटीवी जल्दी ही अपना एक हिन्दी न्यूज़ पोर्टल लाँच करने वाला है. दुनिया भर में इंटरनेट के बढ़ते उपयोग को देखते हुए यह फ़ैसला लिया है. एनडीटीवी इस पोर्टल से पहले एक मोबाइल पोर्टल लाँच करेगी जिसका नाम एनडीटीवी एक्टिव होगा. कहा जा रहा है कि मध्य नवम्बर से यह चालू हो सकता है. जबकि हिन्दी न्यूज़ पोर्टल जिसका नाम एनडीटीवी ख़बर होगा, यह दो महीने बाद यानी अगले साल तक लाँच हो जाएगा. एनडीटीवी इसके अलावा लाइफ स्टाइल, बालीवुड और शिक्षा को लेकर भी कुछ वेब पोर्टल लाने पर कार्य कर रहा है

Monday, November 12, 2007

प्रलय...कोहराम...कत्ले आम.....फिर खामोशी.....और बस सन्नाटा

मुझे उसका नाम तो याद नहीं है लेकिन उससे मेरी पहली मुलाकात उस वक्त हुई कि जब लोग एक दूसरे के लिए जान देते थे. असीम प्रेम का सबके बीच. चारों और शान्ति और सभ्य समाज था. लेकिन ना जाने उसके जाने के बाद पूरी दुनिया ही तब्दील हो गई. लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए. लोग एक दूसरे को देख नहीं सकते हैं.. ऐसा क्यों हुआ. मुझे भी नहीं मालूम? लेकिन सालों बाद उसी ने बताया कि यह सब के पीछे किसका हाथ है. वो और कोई नहीं बल्कि वही थी जिससे मेरी पहली मुलाकात उस वक्त हुई थी जब चारों और शान्ति और खुश हाली थी. तो फिर अब क्यों नहीं ऐसा है ? वजह कुछ खास थी. उसने अपनी ज़िंदगी से ही नहीं बल्कि उससे भी दगा किया जिसकी वजह से आज वो इस जहाँ में थी...आखिर ऐसा क्यों किया इसने...? अरे यह क्या ? अचानक काले काले बादल छाने लगे...चारों और शोर...कोई कुछ करता क्यों नहीं?...प्रलय...कोहराम...कत्ले आम.....फिर खामोशी.....और बस सन्नाटा ....................

प्रलय...कोहराम...कत्ले आम.....फिर खामोशी.....और बस सन्नाटा

मुझे उसका नाम तो याद नहीं है लेकिन उससे मेरी पहली मुलाकात उस वक्त हुई कि जब लोग एक दूसरे के लिए जान देते थे. असीम प्रेम का सबके बीच. चारों और शान्ति और सभ्य समाज था. लेकिन ना जाने उसके जाने के बाद पूरी दुनिया ही तब्दील हो गई. लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए. लोग एक दूसरे को देख नहीं सकते हैं.. ऐसा क्यों हुआ. मुझे भी नहीं मालूम? लेकिन सालों बाद उसी ने बताया कि यह सब के पीछे किसका हाथ है. वो और कोई नहीं बल्कि वही थी जिससे मेरी पहली मुलाकात उस वक्त हुई थी जब चारों और शान्ति और खुश हाली थी. तो फिर अब क्यों नहीं ऐसा है ? वजह कुछ खास थी. उसने अपनी ज़िंदगी से ही नहीं बल्कि उससे भी दगा किया जिसकी वजह से आज वो इस जहाँ में थी...आखिर ऐसा क्यों किया इसने...? अरे यह क्या ? अचानक काले काले बादल छाने लगे...चारों और शोर...कोई कुछ करता क्यों नहीं?...प्रलय...कोहराम...कत्ले आम.....फिर खामोशी.....और बस सन्नाटा ....................

Sunday, November 11, 2007

पिता


मेरी बिटिया रानी गढ़ूंगा तेरे लिए अलग कहानी
सफलता, खुशियां, ममता तेरी झोली में डालूंगा,
पिता हूं तेरे सारे दु:ख हरूंगा।
पकड़कर ऊंगली जब सीखा तूने चलना,
मन पुलकित और हर्षित हुआ ,
तुझे ले जाऊंगा बादलों के भी पार,
सपना यह संजोता रहा।


तेरी हर इच्‍छा पूरी करूं,
मैं संभालूं, मैं संजोऊं तेरे सपनों का घरौंदा।
यह जाने बिना कि तू पंछी है किसी और डाल की
तेरा दाना-पानी नहीं हमारे अंगान का,
तू बादल है उमड़ता-घुमड़ता,
जो बरसेगा किसी और की बगिया में।


घर में शहनाई, मेहमानों का शोर है
तेरी किलकारियां अब खामोश हैं
ना तूने थामी है मेरी ऊंगली अब,
शर्माई, सकुचाई-सी एक मूरत, आंसुओं की बहती धार,
मैं भी हूं एक असहाय पिता
जो केवल संजो सकता है सपने अपनी बिटिया के,
आकार पाते हैं वो सपने दूर कहीं, दूर कहीं....।

पिता


मेरी बिटिया रानी गढ़ूंगा तेरे लिए अलग कहानी
सफलता, खुशियां, ममता तेरी झोली में डालूंगा,
पिता हूं तेरे सारे दु:ख हरूंगा।
पकड़कर ऊंगली जब सीखा तूने चलना,
मन पुलकित और हर्षित हुआ ,
तुझे ले जाऊंगा बादलों के भी पार,
सपना यह संजोता रहा।


तेरी हर इच्‍छा पूरी करूं,
मैं संभालूं, मैं संजोऊं तेरे सपनों का घरौंदा।
यह जाने बिना कि तू पंछी है किसी और डाल की
तेरा दाना-पानी नहीं हमारे अंगान का,
तू बादल है उमड़ता-घुमड़ता,
जो बरसेगा किसी और की बगिया में।


घर में शहनाई, मेहमानों का शोर है
तेरी किलकारियां अब खामोश हैं
ना तूने थामी है मेरी ऊंगली अब,
शर्माई, सकुचाई-सी एक मूरत, आंसुओं की बहती धार,
मैं भी हूं एक असहाय पिता
जो केवल संजो सकता है सपने अपनी बिटिया के,
आकार पाते हैं वो सपने दूर कहीं, दूर कहीं....।

Saturday, November 3, 2007

बोल हल्ला की नई पहल...पत्रकारों का अपना कोना

हम ख़बर लेने वाले रोजाना न जाने कितनों की ख़बर लेते है. लेकिन आज से एक नई पहल बोल हल्ला शुरू करने जा रहा है. यह है पत्रकारों का कोना. यहाँ पत्रकारों से जुड़ी खबरों के अलावा उन खबरों को भी स्थान दिया जाएगा जिससे इस पेशे से जुड़े लोगों के आवाजाही की ख़बर होगी..ताकि जो इस पेशे से नहीं जुड़े हैं, उन्हें भी पता चले कि मीडिया जगत में क्या चल रहा है..इस कोने का मकसद किसी के मन को ठेस पहुंचाना नहीं है...