लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया भारत में हांलाकि बहुत स्वतंत्र है लेकिन अपने दायित्वों को पूरा करते समय मीडिया को हजार तरह की बंदिशों का भी सामना करना पड़ता है। पत्रकार संगठन रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स ने कुछ यूरोपीय देशों में प्रेस पर बढ़ते नियंत्रण की आलोचना की है, लेकिन छह देशों की प्रेस स्वतंत्रता के लिए सराहना की है। जिसमें भारत को 122 स्थान प्राप्त किया है।
प्रेस की आजादी पर न्यूयॉर्क में अपनी ताजा सूची जारी करते हुए रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर्स ने कहा है कि फिनलैंड, आइसलैंड, नीडरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और स्विट्जरलैंड 2002 में सूची की शुरू होने के बाद से ही चोटी पर है।
पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके साथ वे पत्रकारों के सम्मान और मीडिया की सुरक्षा में अनुकरणीय उदाहरण हैं।
पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके विपरीत यूरोपीय संघ मीडिया की आजादी के सवाल पर नेतृत्व खोने के खतरे में है। हालाँकि यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में से 13 रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स की सूची में पहले 20 में शामिल हैं, लेकिन बाकी 14 सूची में बहुत नीचे हैं।
यूरोपीय संघ के महत्वपूर्ण सदस्यों में शामिल फ्रांस 44वें, इटली 49वें, रुमानिया 52वें और ग्रीस तथा बुल्गारिया बेनिनकेन्या और कोमोरोन के साथ 70वें स्थान पर हैं। जर्मनी की स्थिति पिछले साल के मुकाबले सुधरी है और वह 17वें स्थान पर पहुँच गया है जबकि अमेरिका 20वें स्थान पर है। भारत 17 स्थान गिरकर 122वें स्थान पर पहुँच गया है। 178 देशों की सूची में चीन 171वें स्थान पर है।
Thursday, October 21, 2010
प्रेस स्वतंत्रता में भारत 122वें स्थान पर
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया भारत में हांलाकि बहुत स्वतंत्र है लेकिन अपने दायित्वों को पूरा करते समय मीडिया को हजार तरह की बंदिशों का भी सामना करना पड़ता है। पत्रकार संगठन रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स ने कुछ यूरोपीय देशों में प्रेस पर बढ़ते नियंत्रण की आलोचना की है, लेकिन छह देशों की प्रेस स्वतंत्रता के लिए सराहना की है। जिसमें भारत को 122 स्थान प्राप्त किया है।
प्रेस की आजादी पर न्यूयॉर्क में अपनी ताजा सूची जारी करते हुए रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर्स ने कहा है कि फिनलैंड, आइसलैंड, नीडरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और स्विट्जरलैंड 2002 में सूची की शुरू होने के बाद से ही चोटी पर है।
पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके साथ वे पत्रकारों के सम्मान और मीडिया की सुरक्षा में अनुकरणीय उदाहरण हैं।
पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके विपरीत यूरोपीय संघ मीडिया की आजादी के सवाल पर नेतृत्व खोने के खतरे में है। हालाँकि यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में से 13 रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स की सूची में पहले 20 में शामिल हैं, लेकिन बाकी 14 सूची में बहुत नीचे हैं।
यूरोपीय संघ के महत्वपूर्ण सदस्यों में शामिल फ्रांस 44वें, इटली 49वें, रुमानिया 52वें और ग्रीस तथा बुल्गारिया बेनिनकेन्या और कोमोरोन के साथ 70वें स्थान पर हैं। जर्मनी की स्थिति पिछले साल के मुकाबले सुधरी है और वह 17वें स्थान पर पहुँच गया है जबकि अमेरिका 20वें स्थान पर है। भारत 17 स्थान गिरकर 122वें स्थान पर पहुँच गया है। 178 देशों की सूची में चीन 171वें स्थान पर है।
प्रेस की आजादी पर न्यूयॉर्क में अपनी ताजा सूची जारी करते हुए रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर्स ने कहा है कि फिनलैंड, आइसलैंड, नीडरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और स्विट्जरलैंड 2002 में सूची की शुरू होने के बाद से ही चोटी पर है।
पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके साथ वे पत्रकारों के सम्मान और मीडिया की सुरक्षा में अनुकरणीय उदाहरण हैं।
पत्रकार संगठन का कहना है कि इसके विपरीत यूरोपीय संघ मीडिया की आजादी के सवाल पर नेतृत्व खोने के खतरे में है। हालाँकि यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में से 13 रिपोर्टर विदाउट बोर्डर्स की सूची में पहले 20 में शामिल हैं, लेकिन बाकी 14 सूची में बहुत नीचे हैं।
यूरोपीय संघ के महत्वपूर्ण सदस्यों में शामिल फ्रांस 44वें, इटली 49वें, रुमानिया 52वें और ग्रीस तथा बुल्गारिया बेनिनकेन्या और कोमोरोन के साथ 70वें स्थान पर हैं। जर्मनी की स्थिति पिछले साल के मुकाबले सुधरी है और वह 17वें स्थान पर पहुँच गया है जबकि अमेरिका 20वें स्थान पर है। भारत 17 स्थान गिरकर 122वें स्थान पर पहुँच गया है। 178 देशों की सूची में चीन 171वें स्थान पर है।
Thursday, October 14, 2010
नए ट्रेंड के साथ तिवारी जी
दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान के तेजतर्रार संपादक में गिने जाने वाले राजेंद्र तिवारी के बारे में लगाए जा रहे कयासों का बाजार खत्म अब हो गया है। खबर आ रही है कि वे अब अमर उजाला का पार्ट नहीं बनने जा रहे हैं। वे अपने प्रोजेक्ट के साथ विनिंग स्टोक्स के साथ जुड़ने जा रहे हैं।
विनिंग स्टोक्स एक मीडिया एचआर कंसल्टेंसी कंपनी है जो देशभर के कई बड़े मीडिया घरानों (जिसमें न्यूज एक्स और प्रभात खबर शामिल हैं) को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराती है। इस कंपनी के मालिक हैं विप्लव बनर्जी। विप्लव बनर्जी के बारे में आपको बता दें कि वे वहीं विप्लव बनर्जी हैं जो कुछ समय पहले दैनिक भास्कर समूह के एचआर हेड हुआ करते थे। विप्लव दैनिक भास्कर के आलावा जी समूह के भी एचआर हेड रह चुके हैं। इन दोनों मीडिया संस्थानों के आलावा भी वे हिंदुस्तान लीवर में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा चुके हैं।
सूत्रों ने बताया कि इसी विनिंग स्टोक्स के साथ राजेंद्र तिवारी भी अपने नए प्रोजेक्ट के साथ जुड़ने जा रहे हैं। वे वहां संपादकीय प्रभारी होंगे। यानी कंपनी में उनकी हैसियत संपादक की होगी। कंपनी अब नए नवेले और पुराने लोगों को तकनीक के इस्तेमाल के साथ संपादकीय के गुर सिखाएगी। जिसकी कमान राजेंद्र तिवारी के हाथ में होगी। यह कंपनी न्यूज रूम ट्रेनिंग देगी। देश में इस तरह की ट्रेनिंग देने वाली यह पहली कंपनी है। क्योंकि अभी तक आडियो वीडियो और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के साथ कोई भी इस प्रकार की ट्रेनिंग नहीं देता। राजेंद्र तिवारी कई मीडिया हाउसों में संपादकीय प्रभारी के रूम में काम कर चुके हैं। वे सहारा और अमर उजाला में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनके बारे में कयास लगाया जा रहा था कि वे हिंदुस्तान के बाद अमर उजाला जा सकते हैं पर उन्होंने पत्रकारिता में कुछ नया करने की ठानी और अब वे नए नवेले और पुराने लोगों को अपने न्यूज रूम ट्रेनिंग के माध्यम से संपादकीय के गुर सिखाएंगे।
जनसत्ता एक्सप्रेस डॉट नेट से साभार
विनिंग स्टोक्स एक मीडिया एचआर कंसल्टेंसी कंपनी है जो देशभर के कई बड़े मीडिया घरानों (जिसमें न्यूज एक्स और प्रभात खबर शामिल हैं) को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराती है। इस कंपनी के मालिक हैं विप्लव बनर्जी। विप्लव बनर्जी के बारे में आपको बता दें कि वे वहीं विप्लव बनर्जी हैं जो कुछ समय पहले दैनिक भास्कर समूह के एचआर हेड हुआ करते थे। विप्लव दैनिक भास्कर के आलावा जी समूह के भी एचआर हेड रह चुके हैं। इन दोनों मीडिया संस्थानों के आलावा भी वे हिंदुस्तान लीवर में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा चुके हैं।
सूत्रों ने बताया कि इसी विनिंग स्टोक्स के साथ राजेंद्र तिवारी भी अपने नए प्रोजेक्ट के साथ जुड़ने जा रहे हैं। वे वहां संपादकीय प्रभारी होंगे। यानी कंपनी में उनकी हैसियत संपादक की होगी। कंपनी अब नए नवेले और पुराने लोगों को तकनीक के इस्तेमाल के साथ संपादकीय के गुर सिखाएगी। जिसकी कमान राजेंद्र तिवारी के हाथ में होगी। यह कंपनी न्यूज रूम ट्रेनिंग देगी। देश में इस तरह की ट्रेनिंग देने वाली यह पहली कंपनी है। क्योंकि अभी तक आडियो वीडियो और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के साथ कोई भी इस प्रकार की ट्रेनिंग नहीं देता। राजेंद्र तिवारी कई मीडिया हाउसों में संपादकीय प्रभारी के रूम में काम कर चुके हैं। वे सहारा और अमर उजाला में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनके बारे में कयास लगाया जा रहा था कि वे हिंदुस्तान के बाद अमर उजाला जा सकते हैं पर उन्होंने पत्रकारिता में कुछ नया करने की ठानी और अब वे नए नवेले और पुराने लोगों को अपने न्यूज रूम ट्रेनिंग के माध्यम से संपादकीय के गुर सिखाएंगे।
जनसत्ता एक्सप्रेस डॉट नेट से साभार
नए ट्रेंड के साथ तिवारी जी
दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान के तेजतर्रार संपादक में गिने जाने वाले राजेंद्र तिवारी के बारे में लगाए जा रहे कयासों का बाजार खत्म अब हो गया है। खबर आ रही है कि वे अब अमर उजाला का पार्ट नहीं बनने जा रहे हैं। वे अपने प्रोजेक्ट के साथ विनिंग स्टोक्स के साथ जुड़ने जा रहे हैं।
विनिंग स्टोक्स एक मीडिया एचआर कंसल्टेंसी कंपनी है जो देशभर के कई बड़े मीडिया घरानों (जिसमें न्यूज एक्स और प्रभात खबर शामिल हैं) को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराती है। इस कंपनी के मालिक हैं विप्लव बनर्जी। विप्लव बनर्जी के बारे में आपको बता दें कि वे वहीं विप्लव बनर्जी हैं जो कुछ समय पहले दैनिक भास्कर समूह के एचआर हेड हुआ करते थे। विप्लव दैनिक भास्कर के आलावा जी समूह के भी एचआर हेड रह चुके हैं। इन दोनों मीडिया संस्थानों के आलावा भी वे हिंदुस्तान लीवर में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा चुके हैं।
सूत्रों ने बताया कि इसी विनिंग स्टोक्स के साथ राजेंद्र तिवारी भी अपने नए प्रोजेक्ट के साथ जुड़ने जा रहे हैं। वे वहां संपादकीय प्रभारी होंगे। यानी कंपनी में उनकी हैसियत संपादक की होगी। कंपनी अब नए नवेले और पुराने लोगों को तकनीक के इस्तेमाल के साथ संपादकीय के गुर सिखाएगी। जिसकी कमान राजेंद्र तिवारी के हाथ में होगी। यह कंपनी न्यूज रूम ट्रेनिंग देगी। देश में इस तरह की ट्रेनिंग देने वाली यह पहली कंपनी है। क्योंकि अभी तक आडियो वीडियो और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के साथ कोई भी इस प्रकार की ट्रेनिंग नहीं देता। राजेंद्र तिवारी कई मीडिया हाउसों में संपादकीय प्रभारी के रूम में काम कर चुके हैं। वे सहारा और अमर उजाला में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनके बारे में कयास लगाया जा रहा था कि वे हिंदुस्तान के बाद अमर उजाला जा सकते हैं पर उन्होंने पत्रकारिता में कुछ नया करने की ठानी और अब वे नए नवेले और पुराने लोगों को अपने न्यूज रूम ट्रेनिंग के माध्यम से संपादकीय के गुर सिखाएंगे।
जनसत्ता एक्सप्रेस डॉट नेट से साभार
विनिंग स्टोक्स एक मीडिया एचआर कंसल्टेंसी कंपनी है जो देशभर के कई बड़े मीडिया घरानों (जिसमें न्यूज एक्स और प्रभात खबर शामिल हैं) को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराती है। इस कंपनी के मालिक हैं विप्लव बनर्जी। विप्लव बनर्जी के बारे में आपको बता दें कि वे वहीं विप्लव बनर्जी हैं जो कुछ समय पहले दैनिक भास्कर समूह के एचआर हेड हुआ करते थे। विप्लव दैनिक भास्कर के आलावा जी समूह के भी एचआर हेड रह चुके हैं। इन दोनों मीडिया संस्थानों के आलावा भी वे हिंदुस्तान लीवर में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा चुके हैं।
सूत्रों ने बताया कि इसी विनिंग स्टोक्स के साथ राजेंद्र तिवारी भी अपने नए प्रोजेक्ट के साथ जुड़ने जा रहे हैं। वे वहां संपादकीय प्रभारी होंगे। यानी कंपनी में उनकी हैसियत संपादक की होगी। कंपनी अब नए नवेले और पुराने लोगों को तकनीक के इस्तेमाल के साथ संपादकीय के गुर सिखाएगी। जिसकी कमान राजेंद्र तिवारी के हाथ में होगी। यह कंपनी न्यूज रूम ट्रेनिंग देगी। देश में इस तरह की ट्रेनिंग देने वाली यह पहली कंपनी है। क्योंकि अभी तक आडियो वीडियो और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के साथ कोई भी इस प्रकार की ट्रेनिंग नहीं देता। राजेंद्र तिवारी कई मीडिया हाउसों में संपादकीय प्रभारी के रूम में काम कर चुके हैं। वे सहारा और अमर उजाला में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनके बारे में कयास लगाया जा रहा था कि वे हिंदुस्तान के बाद अमर उजाला जा सकते हैं पर उन्होंने पत्रकारिता में कुछ नया करने की ठानी और अब वे नए नवेले और पुराने लोगों को अपने न्यूज रूम ट्रेनिंग के माध्यम से संपादकीय के गुर सिखाएंगे।
जनसत्ता एक्सप्रेस डॉट नेट से साभार
Tuesday, October 5, 2010
इस हूटिंग की गूंज सुनें
कॉमनवेल्थ खेलों का भव्य और रंगारंग शुभारंभ हुआ और हमने अपनी लोक-शास्त्रीय शैली की कलाओं के साथ ही अत्याधुनिक तकनीक का प्रदर्शन कर पूरी दुनिया का मन मोह लिया। लेकिन इस अवसर पर एक और महत्वपूर्ण बात हुई। भारत के कॉमनवेल्थ दल का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत करने वाले दर्शकों ने आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी का नाम पुकारे जाने पर उनकी हूटिंग की। इस हूटिंग के आश्य स्पष्ट हैं। यह हमारे तंत्र के लिए अवाम का साफ संदेश है कि अब वह भ्रष्टाचार और अनियमितता को बर्दाश्त नहीं करेगी। हमारे हुक्मरान इस हूटिंग की गूंज सुन रहे हैं?
साभारः दैनिक भास्कर अखबार
साभारः दैनिक भास्कर अखबार
इस हूटिंग की गूंज सुनें
कॉमनवेल्थ खेलों का भव्य और रंगारंग शुभारंभ हुआ और हमने अपनी लोक-शास्त्रीय शैली की कलाओं के साथ ही अत्याधुनिक तकनीक का प्रदर्शन कर पूरी दुनिया का मन मोह लिया। लेकिन इस अवसर पर एक और महत्वपूर्ण बात हुई। भारत के कॉमनवेल्थ दल का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत करने वाले दर्शकों ने आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी का नाम पुकारे जाने पर उनकी हूटिंग की। इस हूटिंग के आश्य स्पष्ट हैं। यह हमारे तंत्र के लिए अवाम का साफ संदेश है कि अब वह भ्रष्टाचार और अनियमितता को बर्दाश्त नहीं करेगी। हमारे हुक्मरान इस हूटिंग की गूंज सुन रहे हैं?
साभारः दैनिक भास्कर अखबार
साभारः दैनिक भास्कर अखबार
Saturday, August 21, 2010
भारतीय रुपए की विकास यात्रा
भारतीय रुपए के लिए 15 जुलाई, 2010 का दिन एक ऐतिहासिक दिन कहलाएगा। इसी दिन भारतीय रुपये को भी विष्व की अन्य प्रमुख मुद्राओं की भांति अलग पहचान मिली। डॉलर, यूरो, पौंड और येन की तरह अब रुपये को भी नया प्रतीक मिल गया है। रुपये का नया प्रतीक देवनागरी लिपि के 'र' और रोमन लिपि के 'आर' को मिला कर बना है। अभी तक रुपये की अभिव्यक्ति विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग संक्षिप्ताक्षरों में की जाती थी।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई आई टी), मुम्बई के पोस्ट ग्रेजुएट श्री डी. उदय कुमार द्वारा रचित रुपये के नए प्रतीक का अनुमोदन केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 15 जुलाई को कर दिया। मंत्रिमंडल के निर्णय के बारे में पत्रकारों को जानकारी देते हुए केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती अंबिका सोनी ने कहा कि भारतीय मुद्रा के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है। यह प्रतीक भारतीय मुद्रा को एक विषिष्ट पहचान और चरित्र प्रदान करेगा। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया वैष्विक चेहरा पेष करने के अतिरिक्त उसे सुदृढ़ता भी प्रदान करेगा।
नया प्रतीक न तो नोटों पर छापा जाएगा और न ही उसे सिक्कों में ढाला जाएगा। इसे यूनिकोड स्टैंडर्ड' में शामिल किया जाएगा, ताकि यह सुनिष्चित किया जा सके कि इसे इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में आसानी से प्रदर्षित और मुद्रित किया जा सके। भारतीय मानक में रुपये के प्रतीक की इनकोडिंग (कूटांकन) में संभवत: 6 महीने का समय लगेगा, जबकि यूनिकोड और आई एस ओ#आई ई सी 10646 में इनकोडिंग के लिए डेढ़ से दो साल गने का अनुमान है। भारत में प्रयुक्त कीबोर्डों और साफ्टवेयर पैकेजों में इसे समाविष्ट किया जाएगा।
पांच मार्च 2009 को सरकार ने रुपये का प्रतीक चिह्न तैयार करने के लिए एक प्रतियोगिता की घोषणा की। भारतीय संस्कृति और स्वभाव को परिलक्षित और प्रतिबिम्बित करने वाली प्रविष्टियां देष भर से आमंत्रित की गईं। तीन हजार से अधिक प्रविष्टियां प्राप्त हुईं। जिनका मूल्यांकन भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर की अध्यक्षता वाले एक निर्णायक मंडल ने किया। निर्णायक मंडल में कला और अभिकल्पन संस्थाओं के तीन प्रतिष्ठित विशेषज्ञ भी शामिल थे। उसने पांच प्रविष्टियों का चुनाव कर अपनी टिप्पणियों के साथ अंतिम निर्णय के लिए सरकार के पास भेज दिया।
श्री उदय कुमार की प्रविष्टि को इन पांचों में सर्वश्रेष्ठ पाया गया। उन्हें ढाई लाख रुपये का पुरस्कार तो मिलेगा ही, बल्कि उससे भी अधिक रुपये के प्रतीक चिह्न की रचना करने वाले व्यक्ति के तौर पर भारी प्रसिध्दि भी मिलेगी। अपनी प्रविष्टि के चयन से प्रसन्न उदय ने कहा कि 'मेरी डिजाइन (रूपांकन) भारतीय (देवनागरी) लिपि के 'र' और रोमन लिपि के 'आर' का आदर्श मिश्रण है। भारतीय रुपये का प्रतिनिधित्व करने वाला यह प्रतीक भारतीय और अन्तर्राष्ट्रीय (गुण ग्राहको) सभी को अपील करेगा। यह भारतीय तिरंगे से प्रेरित है। ऊपर दो लाइनें दी गई हैं और बीच में रिक्त स्थान रखा गया है।'
रुपया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द 'रौप्य' से हुई है, जिसका अर्थ होता है, चांदी। भारतीय रुपये को हिंदी में 'रुपया,' गुजराती में रुपयों, तेलगू और कन्नड़ में 'रूपई', तमिल में 'रुबाई' और संस्कृत में 'रुप्यकम' कहा जाता है, परन्तु पूर्वी भारत में, बंगाल और असमिया में टका#टॉका और तथा ओड़िया में 'टंका' कहा जाता है।
भारत की गिनती उन गिने चुने देशों में होती है जिसने सबसे पहले सिक्के जारी किए। परिणामत: इसके इतिहास में अनेक मौद्रिक इकाइयों (मुद्राओं) का उल्लेख मिलता है। इस बात के कुछ ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं कि पहले सिक्के 2500 और 1750 ईसा पूर्व के बीच कभी जारी किए गए थे। परन्तु दस्तावेजी प्रभाव सातवीं#छठी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच सिक्कों की ढलाई के ही मिले हैं। इन सिक्कों के निर्माण की विशिष्ट तकनीक के कारण इन्हें पंच मार्क्ड सिक्के कहा जाता है।
अगली कुछ सदियों के दौरान जैसे-जैसे साम्राज्यों का उदय और पतन हुआ तथा परम्पराओं का विकास हुआ, देश की मुद्राओं में इसका प्रगति-क्रम दिखाई देने लगा। इन मुद्राओं से प्राय: तत्कालीन राजवंश, सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं, आराहय देवों और प्रकृति का परिचय मिलता था। इनमें इंडो-ग्रीक (भारत-यूनान) काल के यूनानी देवताओं और उसके बाद के पश्चिमी क्षत्रप वाली तांबे की मुद्रायें शामिल हैं जो पहली और चौथी शताब्दी (ईसवीं) के दौरान जारी की गई थी।
अरबों ने 712 ईसवीं में भारत के सिंघ प्रांत को जीत कर उस पर अपना प्रमुख स्थापित किया। बारहवीं शताब्दी तक दिल्ली के तुर्क सुल्तानों ने लंबे समय से चली आ रही अरबी डिजाइन को हटाकर उनके स्थान पर इस्लामी लिखावटों को मुद्रित कराया। इस मुद्रा को 'टंका' कहा जाता था। दिल्ली के सुल्तानों ने इस मौद्रिक प्रणाली का मानकीकरण करने का प्रयास किया और फिर बाद में सोने, चांदी और तांबे की मुद्राओं का प्रचलन शुरू हो गया।
सन् 1526 में मुगलों का शासन काल शुरू होने के बाद समूचे साम्राज्य में एकीकृत और सुगठित मौद्रिक प्रणाली की शुरूआत हुई। अफगान सुल्तान शेरशाह सूरी (1540 से 1545) ने चांदी के 'रुपैये' अथवा रुपये के सिक्के की शुरूआत की। पूर्व-उपनिवेशकाल के भारत के राजे-रजवाड़ों ने अपनी अलग मुद्राओं की ढलाई करवाई, जो मुख्यत: चांदी के रुपये जैसे ही दिखती थीं, केवल उन पर उनके मूल स्थान (रियासतों) की क्षेत्रीय विशेषतायें भर अंकित होती थीं।
अट्ठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द में, एजेंसी घरानों ने बैंको का विकास किया। बैंक ऑफ बंगाल, दि बैंक ऑफ हिन्दुस्तान, ओरियंटल बैंक कार्पोरेशन और दि बैंक ऑफ वेस्टर्न इंडिया इनमें प्रमुख थे। इन बैंकों ने अपनी अलग-अलग कागजी मुद्रायें-उर्दू, बंगला और देवनागरी लिपियों में मुद्रित करवाई।
लगभग सौ वर्षों तक निजी और प्रेसीडेंसी बैंकों द्वारा जारी बैंक नोटों का प्रचलन बना रहा, परन्तु 1961 के पेपर करेंसी कानून बनने के बाद इस पर केवल सरकार का एकाधिकार रह गया। ब्रिटिश सरकार ने बैंक नोटों के वितरण में मदद के लिए पहले तो प्रेसीडेंसी बैंकों को ही अपने एजेंट के रूप में नियुक्त किया, क्योंकि एक बड़े भू-भाग में सामान्य नोटों के इस्तेमाल को बढ़ाया देना एक दुष्कर कार्य था। महारानी विक्टोरिया के सम्मान में 1867 में पहली बार उनके चित्र की श्रृंखला वाले बैंक नोट जारी किए गए। ये नोट एक ही ओर छापे गए (यूनीफेस्ड) थे और पांच मूल्यों में जारी किए गए थे।
बैंक नोटों के मुद्रण और वितरण का दायित्व 1935 में भारतीय रिजर्व बैंक के हाथ में आ गया। जार्ज पंचम के चित्र वाले नोटों के स्थान पर 1938 में जार्ज षष्ठम के चित्र वाले नोट जारी किए गए, जो 1947 तक प्रचलन में रहे। भारत की स्वतंत्रता के बाद उनकी छपाई बंद हो गई और सारनाथ के सिंहों के स्तम्भ वाले नोटों ने इन का स्थान ले लिया।
भारतीय रुपया 1957 तक तो 16 आनों में विभाजित रहा, परन्तु उसके बाद (1957) में ही उसने मुद्रा की दशमलव प्रणाली अपना ली और एक रुपये का पुनर्गन 100 समान पैसों में किया गया। महात्मा गांधी वाले कागजी नोटों की श्रृंखला की शुरूआत 1996 में हुई, जो आज तक चलन में है।
नकली मुद्रा की चुनौती से निपटने के लिए भारतीय रुपये के नोटों में सुरक्षा संबंधी अनेक विशेषताओं को समाहित किया गया है। नोटों के एक ओर सफेद वाले भाग में महात्मा गांधी का जल चिन्ह् (वाटर मार्क) बना हुआ है। सभी नोटों में चांदी का सुरक्षा धागा लगा हुआ है जिस पर अंग्रेजी में आर बी आई और हिंदी में भारत अंकित है। प्रकाष के सामने लाने पर इनको देखा जा सकता है। पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों में उनका मूल्य प्रकाष में परिवर्तनीय स्याही से लिखा हुआ है। धरती के समानान्तर रखने पर ये संख्या हरी दिखाई देती हैं परन्तु तिरछे या कोण से देखने पर नीले रंग में लिखी हुई दिखाई देती हैं।
भारतीय रुपये के नोट के भाषा पटल पर भारत की 22 सरकारी भाषााओं में से 15 में उनका मूल्य मुद्रित है। ऊपर से नीचे इनका क्रम इस प्रकार है-असमिया, बंगला, गुजराती, कन्नड़, कष्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी संस्कृत, तमिल, तेलुगु और उर्दू।
सरकारी मुद्रा को रुपया कहा जाता है, जो भारत, भूटान, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, मॉरिषस, मालदीव और इंडोनेषिया सहित कई देषों में प्रचलित हैं। इन सभी देषों में भारतीय रुपया, मूल्य, स्वीकार्यता और लोकप्रियता के हिसाब से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
नया प्रतीक चिन्ह पाने के साथ ही भारतीय रुपया अब विष्व की प्रमुख मुद्राओं-डॉलर, यूरो, पौंड और येन के साथ आ खड़ा हुआ है। नया प्रतीक आत्मविष्वास से परिपूर्ण नए भारत के अभ्युदय का भी प्रतीक है, जो अब वैष्विक अर्थव्यवस्था में एक विषेष जगह बना चुका है।
पत्र सूचना कार्यालय की वेबसाइट से साभार
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई आई टी), मुम्बई के पोस्ट ग्रेजुएट श्री डी. उदय कुमार द्वारा रचित रुपये के नए प्रतीक का अनुमोदन केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 15 जुलाई को कर दिया। मंत्रिमंडल के निर्णय के बारे में पत्रकारों को जानकारी देते हुए केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती अंबिका सोनी ने कहा कि भारतीय मुद्रा के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है। यह प्रतीक भारतीय मुद्रा को एक विषिष्ट पहचान और चरित्र प्रदान करेगा। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया वैष्विक चेहरा पेष करने के अतिरिक्त उसे सुदृढ़ता भी प्रदान करेगा।
नया प्रतीक न तो नोटों पर छापा जाएगा और न ही उसे सिक्कों में ढाला जाएगा। इसे यूनिकोड स्टैंडर्ड' में शामिल किया जाएगा, ताकि यह सुनिष्चित किया जा सके कि इसे इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में आसानी से प्रदर्षित और मुद्रित किया जा सके। भारतीय मानक में रुपये के प्रतीक की इनकोडिंग (कूटांकन) में संभवत: 6 महीने का समय लगेगा, जबकि यूनिकोड और आई एस ओ#आई ई सी 10646 में इनकोडिंग के लिए डेढ़ से दो साल गने का अनुमान है। भारत में प्रयुक्त कीबोर्डों और साफ्टवेयर पैकेजों में इसे समाविष्ट किया जाएगा।
पांच मार्च 2009 को सरकार ने रुपये का प्रतीक चिह्न तैयार करने के लिए एक प्रतियोगिता की घोषणा की। भारतीय संस्कृति और स्वभाव को परिलक्षित और प्रतिबिम्बित करने वाली प्रविष्टियां देष भर से आमंत्रित की गईं। तीन हजार से अधिक प्रविष्टियां प्राप्त हुईं। जिनका मूल्यांकन भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर की अध्यक्षता वाले एक निर्णायक मंडल ने किया। निर्णायक मंडल में कला और अभिकल्पन संस्थाओं के तीन प्रतिष्ठित विशेषज्ञ भी शामिल थे। उसने पांच प्रविष्टियों का चुनाव कर अपनी टिप्पणियों के साथ अंतिम निर्णय के लिए सरकार के पास भेज दिया।
श्री उदय कुमार की प्रविष्टि को इन पांचों में सर्वश्रेष्ठ पाया गया। उन्हें ढाई लाख रुपये का पुरस्कार तो मिलेगा ही, बल्कि उससे भी अधिक रुपये के प्रतीक चिह्न की रचना करने वाले व्यक्ति के तौर पर भारी प्रसिध्दि भी मिलेगी। अपनी प्रविष्टि के चयन से प्रसन्न उदय ने कहा कि 'मेरी डिजाइन (रूपांकन) भारतीय (देवनागरी) लिपि के 'र' और रोमन लिपि के 'आर' का आदर्श मिश्रण है। भारतीय रुपये का प्रतिनिधित्व करने वाला यह प्रतीक भारतीय और अन्तर्राष्ट्रीय (गुण ग्राहको) सभी को अपील करेगा। यह भारतीय तिरंगे से प्रेरित है। ऊपर दो लाइनें दी गई हैं और बीच में रिक्त स्थान रखा गया है।'
रुपया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द 'रौप्य' से हुई है, जिसका अर्थ होता है, चांदी। भारतीय रुपये को हिंदी में 'रुपया,' गुजराती में रुपयों, तेलगू और कन्नड़ में 'रूपई', तमिल में 'रुबाई' और संस्कृत में 'रुप्यकम' कहा जाता है, परन्तु पूर्वी भारत में, बंगाल और असमिया में टका#टॉका और तथा ओड़िया में 'टंका' कहा जाता है।
भारत की गिनती उन गिने चुने देशों में होती है जिसने सबसे पहले सिक्के जारी किए। परिणामत: इसके इतिहास में अनेक मौद्रिक इकाइयों (मुद्राओं) का उल्लेख मिलता है। इस बात के कुछ ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं कि पहले सिक्के 2500 और 1750 ईसा पूर्व के बीच कभी जारी किए गए थे। परन्तु दस्तावेजी प्रभाव सातवीं#छठी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच सिक्कों की ढलाई के ही मिले हैं। इन सिक्कों के निर्माण की विशिष्ट तकनीक के कारण इन्हें पंच मार्क्ड सिक्के कहा जाता है।
अगली कुछ सदियों के दौरान जैसे-जैसे साम्राज्यों का उदय और पतन हुआ तथा परम्पराओं का विकास हुआ, देश की मुद्राओं में इसका प्रगति-क्रम दिखाई देने लगा। इन मुद्राओं से प्राय: तत्कालीन राजवंश, सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं, आराहय देवों और प्रकृति का परिचय मिलता था। इनमें इंडो-ग्रीक (भारत-यूनान) काल के यूनानी देवताओं और उसके बाद के पश्चिमी क्षत्रप वाली तांबे की मुद्रायें शामिल हैं जो पहली और चौथी शताब्दी (ईसवीं) के दौरान जारी की गई थी।
अरबों ने 712 ईसवीं में भारत के सिंघ प्रांत को जीत कर उस पर अपना प्रमुख स्थापित किया। बारहवीं शताब्दी तक दिल्ली के तुर्क सुल्तानों ने लंबे समय से चली आ रही अरबी डिजाइन को हटाकर उनके स्थान पर इस्लामी लिखावटों को मुद्रित कराया। इस मुद्रा को 'टंका' कहा जाता था। दिल्ली के सुल्तानों ने इस मौद्रिक प्रणाली का मानकीकरण करने का प्रयास किया और फिर बाद में सोने, चांदी और तांबे की मुद्राओं का प्रचलन शुरू हो गया।
सन् 1526 में मुगलों का शासन काल शुरू होने के बाद समूचे साम्राज्य में एकीकृत और सुगठित मौद्रिक प्रणाली की शुरूआत हुई। अफगान सुल्तान शेरशाह सूरी (1540 से 1545) ने चांदी के 'रुपैये' अथवा रुपये के सिक्के की शुरूआत की। पूर्व-उपनिवेशकाल के भारत के राजे-रजवाड़ों ने अपनी अलग मुद्राओं की ढलाई करवाई, जो मुख्यत: चांदी के रुपये जैसे ही दिखती थीं, केवल उन पर उनके मूल स्थान (रियासतों) की क्षेत्रीय विशेषतायें भर अंकित होती थीं।
अट्ठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द में, एजेंसी घरानों ने बैंको का विकास किया। बैंक ऑफ बंगाल, दि बैंक ऑफ हिन्दुस्तान, ओरियंटल बैंक कार्पोरेशन और दि बैंक ऑफ वेस्टर्न इंडिया इनमें प्रमुख थे। इन बैंकों ने अपनी अलग-अलग कागजी मुद्रायें-उर्दू, बंगला और देवनागरी लिपियों में मुद्रित करवाई।
लगभग सौ वर्षों तक निजी और प्रेसीडेंसी बैंकों द्वारा जारी बैंक नोटों का प्रचलन बना रहा, परन्तु 1961 के पेपर करेंसी कानून बनने के बाद इस पर केवल सरकार का एकाधिकार रह गया। ब्रिटिश सरकार ने बैंक नोटों के वितरण में मदद के लिए पहले तो प्रेसीडेंसी बैंकों को ही अपने एजेंट के रूप में नियुक्त किया, क्योंकि एक बड़े भू-भाग में सामान्य नोटों के इस्तेमाल को बढ़ाया देना एक दुष्कर कार्य था। महारानी विक्टोरिया के सम्मान में 1867 में पहली बार उनके चित्र की श्रृंखला वाले बैंक नोट जारी किए गए। ये नोट एक ही ओर छापे गए (यूनीफेस्ड) थे और पांच मूल्यों में जारी किए गए थे।
बैंक नोटों के मुद्रण और वितरण का दायित्व 1935 में भारतीय रिजर्व बैंक के हाथ में आ गया। जार्ज पंचम के चित्र वाले नोटों के स्थान पर 1938 में जार्ज षष्ठम के चित्र वाले नोट जारी किए गए, जो 1947 तक प्रचलन में रहे। भारत की स्वतंत्रता के बाद उनकी छपाई बंद हो गई और सारनाथ के सिंहों के स्तम्भ वाले नोटों ने इन का स्थान ले लिया।
भारतीय रुपया 1957 तक तो 16 आनों में विभाजित रहा, परन्तु उसके बाद (1957) में ही उसने मुद्रा की दशमलव प्रणाली अपना ली और एक रुपये का पुनर्गन 100 समान पैसों में किया गया। महात्मा गांधी वाले कागजी नोटों की श्रृंखला की शुरूआत 1996 में हुई, जो आज तक चलन में है।
नकली मुद्रा की चुनौती से निपटने के लिए भारतीय रुपये के नोटों में सुरक्षा संबंधी अनेक विशेषताओं को समाहित किया गया है। नोटों के एक ओर सफेद वाले भाग में महात्मा गांधी का जल चिन्ह् (वाटर मार्क) बना हुआ है। सभी नोटों में चांदी का सुरक्षा धागा लगा हुआ है जिस पर अंग्रेजी में आर बी आई और हिंदी में भारत अंकित है। प्रकाष के सामने लाने पर इनको देखा जा सकता है। पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों में उनका मूल्य प्रकाष में परिवर्तनीय स्याही से लिखा हुआ है। धरती के समानान्तर रखने पर ये संख्या हरी दिखाई देती हैं परन्तु तिरछे या कोण से देखने पर नीले रंग में लिखी हुई दिखाई देती हैं।
भारतीय रुपये के नोट के भाषा पटल पर भारत की 22 सरकारी भाषााओं में से 15 में उनका मूल्य मुद्रित है। ऊपर से नीचे इनका क्रम इस प्रकार है-असमिया, बंगला, गुजराती, कन्नड़, कष्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी संस्कृत, तमिल, तेलुगु और उर्दू।
सरकारी मुद्रा को रुपया कहा जाता है, जो भारत, भूटान, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, मॉरिषस, मालदीव और इंडोनेषिया सहित कई देषों में प्रचलित हैं। इन सभी देषों में भारतीय रुपया, मूल्य, स्वीकार्यता और लोकप्रियता के हिसाब से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
नया प्रतीक चिन्ह पाने के साथ ही भारतीय रुपया अब विष्व की प्रमुख मुद्राओं-डॉलर, यूरो, पौंड और येन के साथ आ खड़ा हुआ है। नया प्रतीक आत्मविष्वास से परिपूर्ण नए भारत के अभ्युदय का भी प्रतीक है, जो अब वैष्विक अर्थव्यवस्था में एक विषेष जगह बना चुका है।
पत्र सूचना कार्यालय की वेबसाइट से साभार
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