Monday, July 5, 2010

छह महीने में 59 पत्रकारों की हत्या

इस साल के पहले छह महीनों में दुनियाभर के 59 पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है। मीडिया अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह पीईसी के मुताबिक पिछले साल इसी अवधि में 56 पत्रकार मारे गए थे। जिनेवा स्थित इस गैर सरकारी संगठन ने एक बयान में बताया कि सबसे ज्यादा पत्रकारों की हत्या मैक्सिको में हुई, जहां संगठित अपराधी गिरोह पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं।

इस मामले में दूसरा सबसे खतरनाक देश होंडुरास है, जहां आठ पत्रकारों की हत्या हुई है।

इस दौरान पाकिस्तान में 6, नाइजीरिया में 4 और फिलीपीन में 4 पत्रकारों की हत्या की गई। इनके अलावा जिन देशों में पत्रकारों की हत्या की गई हैं उनमें:

  • रूस (3)
  • कोलंबिया (3)
  • इराक (2)
  • नेपाल (2)
  • थाइलैंड (2)
  • वेनेजुएला (2) शामिल हैं।


अफगानिस्तान, अंगोला, बांग्लादेश, ब्राजील, बुल्गारिया, कैमरून, साइप्रस, एक्वाडोर, इजरायल, लोकतांत्रिक कांगो गणराज्य, रवांडा, तुर्की, सोमालिया और यमन में भी एक-एक पत्रकार की हत्या हुई है।

“पत्रकार उन देशों में सबसे ज्यादा खतरों से जूझते हैं जो आंतरिक समस्याओं से गुजर रहे हैं।“ - ब्लैस लेंपेन, पीईसी महासचिव

छह महीने में 59 पत्रकारों की हत्या

इस साल के पहले छह महीनों में दुनियाभर के 59 पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है। मीडिया अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह पीईसी के मुताबिक पिछले साल इसी अवधि में 56 पत्रकार मारे गए थे। जिनेवा स्थित इस गैर सरकारी संगठन ने एक बयान में बताया कि सबसे ज्यादा पत्रकारों की हत्या मैक्सिको में हुई, जहां संगठित अपराधी गिरोह पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं।

इस मामले में दूसरा सबसे खतरनाक देश होंडुरास है, जहां आठ पत्रकारों की हत्या हुई है।

इस दौरान पाकिस्तान में 6, नाइजीरिया में 4 और फिलीपीन में 4 पत्रकारों की हत्या की गई। इनके अलावा जिन देशों में पत्रकारों की हत्या की गई हैं उनमें:

  • रूस (3)
  • कोलंबिया (3)
  • इराक (2)
  • नेपाल (2)
  • थाइलैंड (2)
  • वेनेजुएला (2) शामिल हैं।


अफगानिस्तान, अंगोला, बांग्लादेश, ब्राजील, बुल्गारिया, कैमरून, साइप्रस, एक्वाडोर, इजरायल, लोकतांत्रिक कांगो गणराज्य, रवांडा, तुर्की, सोमालिया और यमन में भी एक-एक पत्रकार की हत्या हुई है।

“पत्रकार उन देशों में सबसे ज्यादा खतरों से जूझते हैं जो आंतरिक समस्याओं से गुजर रहे हैं।“ - ब्लैस लेंपेन, पीईसी महासचिव

Saturday, July 3, 2010

अभी भी कहर ढा रहा है यूनियन कार्बाइड

यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के 346 टन रेडियोएक्टिव कचरे को ठिकाने लगाने का अभ्यास करते वक्त 6 कर्मचारियों की आंखों की रोशनी कुछ हद तक चली गई। यह हादसा इंदौर से 22 किमी दूर पीथमपुर में रैम्की एनवायरो इंजीनियर्स की फैक्ट्री में हुआ। यहीं पर यूनियन कार्बाइड के जहरीले मलबे को ठिकाने लगाए जाने की योजना है।

भोपाल में हजारों लोगों की जान लेने वाली यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री का जहरीला मलबा अब भी ऐसे ही पड़ा हुआ है। हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस जगह से खतरनाक केमिकलों को हटाकर सफाई कराने की योजना को मंजूरी दी है।

इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिए पीठमपुर में इन्सिनरेटर लगाया गया है। फिलहाल इसका ट्रायल चल रहा है। इसी दौरान शुक्रवार रात को इस टॉक्सिक कचरे के संपर्क में आने से 6 कर्मचारियों की आंखों की रोशनी पर असर पड़ा है। उनके शरीर के दूसरे अंगों पर भी असर पड़ा है। केंदीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भी इस हादसे पर चुप्पी साध ली।

कुछ एनजीओ पीठमपुर में यूनियन कार्बाइड के टॉक्सिक कचरे को ठिकाने लगाने का विरोध कर रहे हैं। इस हादसे के बाद उनका कहना है कि वह अपना आंदोलन तेज करेंगे।

नवभारत टाइम्स से साभार

अभी भी कहर ढा रहा है यूनियन कार्बाइड

यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के 346 टन रेडियोएक्टिव कचरे को ठिकाने लगाने का अभ्यास करते वक्त 6 कर्मचारियों की आंखों की रोशनी कुछ हद तक चली गई। यह हादसा इंदौर से 22 किमी दूर पीथमपुर में रैम्की एनवायरो इंजीनियर्स की फैक्ट्री में हुआ। यहीं पर यूनियन कार्बाइड के जहरीले मलबे को ठिकाने लगाए जाने की योजना है।

भोपाल में हजारों लोगों की जान लेने वाली यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री का जहरीला मलबा अब भी ऐसे ही पड़ा हुआ है। हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस जगह से खतरनाक केमिकलों को हटाकर सफाई कराने की योजना को मंजूरी दी है।

इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिए पीठमपुर में इन्सिनरेटर लगाया गया है। फिलहाल इसका ट्रायल चल रहा है। इसी दौरान शुक्रवार रात को इस टॉक्सिक कचरे के संपर्क में आने से 6 कर्मचारियों की आंखों की रोशनी पर असर पड़ा है। उनके शरीर के दूसरे अंगों पर भी असर पड़ा है। केंदीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भी इस हादसे पर चुप्पी साध ली।

कुछ एनजीओ पीठमपुर में यूनियन कार्बाइड के टॉक्सिक कचरे को ठिकाने लगाने का विरोध कर रहे हैं। इस हादसे के बाद उनका कहना है कि वह अपना आंदोलन तेज करेंगे।

नवभारत टाइम्स से साभार

Wednesday, June 30, 2010

भोपाल कांड से सबक लेने की जरूरत है

पच्चीस साल पहले भोपाल में वह दर्दनाक हादसा हुआ था। अगर हताहतों की संख्या पर गौर करें तो सिद्ध हो जाएगा कि वह दुनिया की भयावहतम औद्योगिक त्रासदी थी। यकीनन खतरनाक जहरीले केमिकल का इतनी लापरवाही से रखरखाव एक आपराधिक मामला था। लेकिन जो अदालती फैसला आया उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता।

हजारों मौतों के जिम्मेदार लोगों में से कोई भी जेल में नहीं है। अमेरिका ने यूनियन कार्बाइड प्रमुख वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। भारत की न्याय प्रणाली में पैठी सुस्ती को भी दोष दिया जाना चाहिए। अनुमान के मुताबिक भारत की अदालतों में 2 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं, जिन्हें निपटाने में 320 साल लग जाएंगे।

भोपाल केस इसलिए भी सुस्त पड़ गया, क्योंकि भारत का जोर पहले मुआवजे पर था। हादसे के तीन साल बाद जाकर आपराधिक मामला शुरू हुआ। पांच साल बाद जाकर यूनियन कार्बाइड ने 45 करोड़ डॉलर का मुआवजा दिया, जबकि इससे कहीं ज्यादा मांगे गए थे। इससे तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सीधे-सीधे यही संदेश जाता है कि वे आएं, पर्यावरण को दूषित करें और फिर कोई बखेड़ा होने पर चुपचाप बच निकलें। मैक्सिको की खाड़ी के तटवर्ती इलाकों में रहने वाले बाशिंदों को भी यही डर सता रहा है, क्योंकि बीपी, उसके सहयोगियों और अमेरिकी नियामक एजेंसियों के बीच फिलहाल दोषारोपण का खेल चल रहा है। खाड़ी को भोपाल के सबक याद रखने होंगे।

द वैंकुवर सन से अनूदित

भोपाल कांड से सबक लेने की जरूरत है

पच्चीस साल पहले भोपाल में वह दर्दनाक हादसा हुआ था। अगर हताहतों की संख्या पर गौर करें तो सिद्ध हो जाएगा कि वह दुनिया की भयावहतम औद्योगिक त्रासदी थी। यकीनन खतरनाक जहरीले केमिकल का इतनी लापरवाही से रखरखाव एक आपराधिक मामला था। लेकिन जो अदालती फैसला आया उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता।

हजारों मौतों के जिम्मेदार लोगों में से कोई भी जेल में नहीं है। अमेरिका ने यूनियन कार्बाइड प्रमुख वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। भारत की न्याय प्रणाली में पैठी सुस्ती को भी दोष दिया जाना चाहिए। अनुमान के मुताबिक भारत की अदालतों में 2 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं, जिन्हें निपटाने में 320 साल लग जाएंगे।

भोपाल केस इसलिए भी सुस्त पड़ गया, क्योंकि भारत का जोर पहले मुआवजे पर था। हादसे के तीन साल बाद जाकर आपराधिक मामला शुरू हुआ। पांच साल बाद जाकर यूनियन कार्बाइड ने 45 करोड़ डॉलर का मुआवजा दिया, जबकि इससे कहीं ज्यादा मांगे गए थे। इससे तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सीधे-सीधे यही संदेश जाता है कि वे आएं, पर्यावरण को दूषित करें और फिर कोई बखेड़ा होने पर चुपचाप बच निकलें। मैक्सिको की खाड़ी के तटवर्ती इलाकों में रहने वाले बाशिंदों को भी यही डर सता रहा है, क्योंकि बीपी, उसके सहयोगियों और अमेरिकी नियामक एजेंसियों के बीच फिलहाल दोषारोपण का खेल चल रहा है। खाड़ी को भोपाल के सबक याद रखने होंगे।

द वैंकुवर सन से अनूदित

Monday, June 28, 2010

दिल मानता नहीं और जेब है कि भरती नहीं

और कितना कमाना चाहते हैं ये हमारे "माननीय"। जनता को महंगाई और टैक्स के दो पाटों के बीच रहे हैं और अपनी जेबें भरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जरा ये आंकड़े देखिए। पहले ही भारी हैं सुविधाएं:
  • सांसदों पर हर महीने 21 करोड़ 14 लाख, 70 हजार रुपए खर्च किया जाता है।
  • करीब 14 हजार रुपए तो ऑफिस का ही खर्च है।
  • संसदीय क्षेत्र के लिए मासिक अलाउंस 10 हजार मिलता है।
  • संसद के तीन सत्र होते हैं। प्रत्येक सत्र के लिए इन्हें डेली अलाउंस के तौर पर एक हजार रुपए मिलते हैं।
  • हर सांसद और उनके पति या पत्नी को रेलवे की तरफ से मुफ्त एसी-1 की सुविधा भी।
  • पति या पत्नी के साथ बिजनेस क्लास में देश में कहीं भी 40 यात्राएं मुफ्त करते हैं सांसद।
  • इन्हें दिल्ली में बंगला या फ्लैट दिया जाता है, जिसका किराया मात्र दो हजार रुपए होता है।
  • पचास हजार यूनिट बिजली मुफ्त और साथ में पानी फ्री।
  • बंगलों में एसी, फ्रिज, टीवी की सुविधा। सोफा की सफाई, पर्दो की धुलाई मुफ्त की जाती है।
  • तीन फोन लाइनों की पात्रता। हर साल 170,000 लोकल कॉल फ्री किए जा सकते हैं।